सूरज को दीया दिखाना
इतिहास में हमने पढ़ा है कि तेरहवीं सदी में एक मुगल बादशाह हुआ था। उसका नाम था मोहम्मद बिन तुगलक। बादशाह विद्वान तो था ही, पर कभी-कभी उसकी बुद्धि घास चरने चली जाती थी। वह कई भाषाओं का ज्ञाता भी था। एक दिन ना जाने उसे क्या सूझा, उसने दिल्ली में बनी-बनाई राजधानी को नजदीक के एक छोटा-सा कस्बानुमा तुगलाकाबाद में स्थानांतरण करने का फरमान दे डाला। इस फरमान से उसके राज-दरबारी एवं लाव-लश्कर को मानो सांप सूंघ गया। तमाम राजधानीवासी इस फरमान से नाराज हो उठे। बादशाह की इस बु़िद्धमत्ता पर प्रजा भी नाखुश थी। लेकिन बादशाह का हुक्म सिर आंखों पर। और एक दिन सुनहरी राजधानी दिल्ली से तुगलाकाबाद को उठ चली गई।
समय का चक्र घुमता गया। मोहम्मद बिन तुगलक ने नई राजधानी में अपने राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में चमड़े का सिक्का भी चलवा दिया। शायद नीयति को यह नई राजधानी पसंद न आई। तुगलाकाबाद में पानी की किल्लत होने लगी। साथ ही भयंकार अकाल भी पड़ गया। फिर क्या था? सुबह का भूला बादशाह शाम को वापस दिल्ली लौट चला।
कहीं ऐसा ही तो नहीं? कहीं हमारे आंगने में चमड़े का सिक्का तो जबरन नहीं चलवाया जा रहा है? जब सोने का सुनहरा सिक्का हमारे पास पहले से ही मौजूद है, तो फिर इस खोटे सिक्के का हमारे यहां क्या काम?
उनकी तरफ से लिपि के बारे में रटे-रटाए ये दो-तीन तर्क दिए जाते रहे हैं:- 1. यह ”आबोवाक्“ है; 2. रोमन इसाईयों की लिपि है; 3. रोमन से संताली नहीं लिखी जा सकती है; आदि।
इस संबंध में इतना ही कहना है कि उनके तर्क बेतुके हैं। उनके तर्क को सिरे से खारिज किया जाता है। उनके तर्क में कोई सिर-पैर नहीं है। विदित हो कि भाषाविज्ञान में लिपि एक गौण विषय है। अर्थात् भाषाविज्ञान में कई शाखाएं होती हैं, जिनके विष्वविद्यालयों में अध्ययन किए जाते हैं। उदाहरणार्थ - ध्वनिविज्ञान; पदविज्ञान; वाक्यविज्ञान; अर्थविज्ञान; प्रोक्तिविज्ञान; मनोविज्ञान-भाषाविज्ञान; इतिहास-भाषाविज्ञान; भूगोल-भाषाविज्ञान; समाजविज्ञान-भाषाविज्ञान। इन समस्त कार्यों में ध्वनिविज्ञान, रूपग्रामविज्ञान, अर्थविज्ञान एवं ऐतिहासिक-विज्ञान उसकी प्रत्येक पग पर सहायता करते हैं। वस्तुतः भाषा विज्ञान एवं कोश (निघण्टु एवं निरूक्त) एक दूसरे के पूरक हैं।
आइए, अब उनके बेतुके तर्क को ही देख लेते हैं:-
1. यह ”आबोवाक्“ है - किस संदर्भ में यह ”आबोवाक्“ है? रोजमर्रा के काम में आने वाली समस्त वस्तुएं तो उनकी हैं। सुबह से लेकर शाम तक उपयोग में आने वाली तमाम चीजें तो उनकी हैं। तुम्हारी कौन-सी चीज है? शायद तुम्हारी ईजाद की हुई एक भी चीज नहीं मिल सकती है। यह तुम्हारा कोरा बकवास है। यह लोगों को बरगलाने के सिवा कुछ नहीं है। अपनी लिपि को ”आबोवाक्“ कहना छोड़ दो, क्योंकि यह चोरी की हुई लिपि है।
2. रोमन इसाईयों की लिपि है - जब लिपि संबंधी तुम्हारे सारे तर्क निष्क्रिय कर दिए गए, तो अब धर्म-धर्म के खेल में उतर आए हो। किसी भी निर्जीव वस्तुओं का कोई धार्मिक रंग नहीं होता है। मनुष्यों में भी किसी का कोई धार्मिक रंग नहीं होता है, बल्कि हर मनुष्य इंसान होता है। याद रहे; भाषा और लिपि का कोई आंतरिक संबंध नहीं है। वाणी बोलने में लिपि की कोई आवश्यकता नहीं होती है। कितना ही हस्यास्पद है कि आपने तो अपनी लिपि को ही भाषा मान बैठे हो - ऑल चिकी भाषा। पहले भाषा इसके बाद ही लिपि का आविष्कार होता है। ऐसा कतई संभव नहीं है कि पहले लिपि, तत्पश्चात् भाषा की उत्पत्ति होती है।
3. रोमन से संताली नहीं लिखी जा सकती है - ध्यान से सुन लो। आप जिस रोमन लिपि का जिक्र कर रहे हो, उस लिपि का उसी वक्त संतालीकरण कर दिया गया था, जिस वक्त यह संताली के लिए उपयुक्त घोषित किया गया था। अब यह लिपि लैटिन, रोमन, अंग्रेजी वगैरह कहना भूल जाओ। अब यह लिपि संताली लिपि बन गई है। ठीक उसी तरह जिस तरह आप अपने हर काम में बाहरियों के चीजों का इस्तेमाल करते हो। ध्वनिविज्ञान के अनुसार संताली के लिए 59 वर्णों की जरुरत है। जबकि आपके पास सिर्फ 30 वर्ण हैं। आप बताओ, संताली के लिए बाकी वर्ण कहां से लाओगे? अतः सिद्ध हो गया कि आपकी लिपि ही संताली लिखने के लिए नपुंसक है।
लिपि के साथ-साथ आपने धर्म को भी जोड़ दिया है, जिससे आपकी मानसिक दिवालियापन की बदबू आने का संकेत देता है।
अंत में यही कि आपकी भाषा, भाषा नहीं है, बल्कि यह एक बोली की श्रेणी में आती है। क्योंकि संताली व्याकरण के अनुसार आपकी भाषा में अनेकों त्रुटियां हैं। अतः सूरज को दीया दिखाने की चेष्टा कभी मत करना।