आज के गरभू देशमांझी ...
यह सोलह आना सही है कि कोई भी चीज हाथ में आ जाय, तो उसकी अहमियत तत्क्षण खत्म हो जाती है। वह चीज क्यों और कैसे मिली? उसके संघर्ष की गाथा शनैः-शनैः मलिन हो जाती है। इस रहस्य को आप ऐसे भी समझ सकते हैं। मान लो; कोई ऑरिजिनल (मूल) दस्तावेज है। उस ऑरिजिनल से एक फोटोकॉपी निकाली गई। फिर उस फोटोकॉपी से और कोई फोटोकॉपी निकाली गई। इस तरह फोटोकॉपी से फोटोकॉपी निकलती गई। यकीन मानो, कुछ वर्षों के बाद वह फोटोकॉपी धूमिल हो जाएगी। उस फोटोकॉपी में ऑरिजिनल जैसा अब कुछ भी नहीं दिखाई देगा। अब फोटोकॉपी करने से कागज सफेद ही निकलेगा। ठीक यही स्थिति संताल हूल, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और झारखण्ड आंदोलन के साथ भी घटित हो गई है।
आज से ठीक 169 वर्ष पूर्व की घटना है। तब लोगों के हाथ में न एंड्रोयड फोन उपलब्ध था, न चमचमाती कार थी और न ही उनके पास बड़े-बड़े मकान थै। उनके पास आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं। उनमें एक भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति मौजूद नहीं था। एक हाथ वस्त्र से पूरा शरीर ढंका जाता था। ऐसी हालत में करेला तो करेला, वह भी ऊपर से नीम चढ़ा। लोग सीधे और सरल थे। उनका सीधापन का अशुभ लाभ गैरों ने खूब उठाया। तब अत्याचार की बाढ़ सिर से ऊपर बहने लगी थी। पर जनता इस मुस्किलत से उबार पाने के लिए अंदर ही अंदर योजनाएं बनाने में व्यस्त थीं। वे अपने संघर्ष का रोड मैप बना रहे थे।
6 जुलाई 1855 की घटना। आज के संताल परगना के आमड़ापाड़ा-लिटीपाड़ा आसपास के गाँवों से चार लोगों को आज के ई.डी. ने गिरफ्तार कर लिया। उनका कसूर भी आपके सीटिंग मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के सीटिंग मुख्यमंत्री केजरीवाल के सदृश था। ई.डी. के अफसर उन गिरफ्तार हुए कैदी को आमड़ापाड़ा, बरहेट के रास्ते भागलपुर जेल पैदल ही ले जा रहे थे। कड़ाके की धूप थी। चारों कैदियों के हाथ-पैर बांधे हुए थे। कैदियों को खाना तो दूर, प्यास बुझाने के लिए एक बूंद पानी तक नसीब न था। ई.डी. के दो अफसर सफेद घोड़े पर शान के साथ सवार थे। दोनों अफसरों को धूप से बचाने के लिए सिपाहियों ने उनके सिर के ऊपर छतरी लिये हुए थे। उन कैदियों में से एक कदकाठी (हेमंत/केजरी) नौजवान भी था। वह भूख और प्यास से तड़प रहा था। वह चल सकने में भी असमर्थ था। ऐसी हालत में भी उसे घसीटा जा रहा था। उनकी हालत पर किसी ई.डी. अफसरों को तरस न आया। और वे आमड़ापाड़ा से चलकर पाडेरकोला पहुंच गए। पाडेरकोला में शाम परगना एक सज्जन व्यक्ति का वास था। वह व्यक्ति बहुत ईमानदार और बुद्धिमान था। उसने ई.डी. के अफसरों से नाक रगड़ते हुए गुहार लगाई - "ये लोग निर्दोष हैं। इन्हें कृपया रिहा कर दो।" पर आका का हुक्म था, ई.डी. के अफसरों ने उनकी एक न सुनी। और वे कैदियों के साथ अपने गंतब्य की ओर आगे बढ़ चले।
देश की जनता को अच्छी तरह मालूम था कि एक न एक दिन हमारे निर्दोष लोगों को गिरफ्तार कर लिया जायगा। ऐसी स्थिति को संभाल पाने के लिए वे साल भर पूर्व से तैयारी करने में जुटे हुए थे। कहा जाता है कि लोगों ने बन-जंगलों से तीर-धुनष बनाने के लिए बांस-बल्ली (बुरु-मात्) ले आये थे। उन्हें काट-झांटकर सूखने के लिए पत्थरों से दबा दिया था। राहुल का हुक्म था कि प्रत्येक घर से कम से कम एक बैलगाड़ी (मिमित् सागाड़काते) के बराबर तीर-धनुष तैयार हो जाना चाहिए। तलवार, टांगी, फरसा निर्माण हेतु लोहारों की मदद ली जाए। यह योजना साल भर में तब तक तैयार हो चुकी थी।
अपने निर्दाेष लोगों की गिरफ्तारी की खबर देश भर में दावानाल की तरह फैल गई। सिदो-कान्हू के नेतृत्व में रात भर में अस्त्र-शस्त्र से लैश 30 हजार लोगों की भीड़़ बरहेट के समीप पांचकठिया में एकत्रित हो गई। तड़के सुबह अर्थात् 7 जुलाई 1855 ई.डी. अफसरों की भिड़ंत सिदो-कान्हू से हुई। उनलोगों के बीच तू-तू, मैं-मैं होती रही और इधर गारभू ने का़पी (A battle axe) से दोनों अफसरों को मौत के घाट उतार दिया। हूल संपन्न हुआ। और उस हूल के बदौलत संताल परगना मिल गया। (रावण को मालूम था कि उसकी मौत राम के हाथों होगी। उसी तरह आज के रावण को भी मालूम है, उसकी मौत किसके हाथ होगी।)