अच्छे दोस्त की पहचान
कल और आज झारखण्ड में बिजली क्या कड़की, जो डरा वो भागते हुए नजर आए। कल एक तथाकथित टाइगर ने फूलवालों के घर में पनाह ले ली। उसने अपने पैतृक दल पर आरोप लगाया कि उसकी उपेक्षा हुई है। हो सकता है शायद उस नए आशियाने में उसकी आरती उतारी जायेगी। लेकिन इतना तो सच है कि अब तक उसे अपने पैतृक घर में जो इज्जत मिल रही थी, क्या वह बनावटी थी? उस घर ने उसे विधायक से लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचा दिया। क्या यह कम है? हो सकता है; शायद अब उसका प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा हो जायगा? और आज एक “कैंची” वाले ने भी फूलवालों के घर में शरण ले ली। आपने भी 25 वर्षों तक विधायक एवं मंत्री बनकर जनता की सेवा की है। तब आपकी आँखेँ पीछे की ओर रही होंगी, तभी आपको “बदलती डेमोग्राफी” नहीं दिखाई दे रही थी। कुछ भी हो; आप दोनों महानुभाओं को अग्रिम मुबारक हो! अब सवाल यह उठता है कि इस वक्त वास्तव में झारखण्ड जल रहा है। इस समस्या का समाधान सिर्फ नेताओं का नहीं है, बल्कि हमारा भी फर्ज बनता है। लेकिन आप दोनों तो अपनी इज्जत बचाने के चक्कर में आशियाना बदलते फिर रहे हैं। जनता आप दोनों को स्वार्थी नेताओं की श्रेणी में रख रहे हैं। कोई गलत उपाधि तो नहीं दे रहे हैं? क्योंकि बड़े बुजुर्ग भी कह गए हैं; “जो दुख की घड़ी में साथ दे, वही सच्चा दोस्त कहलाता है।"