Saturday, 4 May 2024

अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता

यह लेख लिखने तक लोकसभा-2024 चुनाव के चौथे चरण का मतदान हो रहा है। आपका यह मंगरु कोई चुनाव विश्लेषक नहीं। वह सिर्फ इतना जानता है कि देश में चुनाव दो दलों के बीच हो रहा है - इण्डिया गठबंधन तथा एनडीए। इन गठबंधनों से मंगरु को क्या लेना-देना? आग लग जाए ऐसे गठबंधनों को। इससे हमें क्या फर्क पड़ता है? कोई राजा बने या रंक? हमें इससे क्या मतलब? देश में तानाशाही आए या प्रजाशाही? रोजगार-नौकरी मिले या पकौड़ा तलना पड़े? महंगाई आसमान भी छू ले। हमें तो बस अपने हाल ही में जीना है। संविधान मरे-जीये, आरक्षण खत्म हो जाए। हमारा क्या जाता है? जिसका जाता है, वो लड़े। हमें किसी से कोई मतलब नहीं। हमें न उधो का देना और न ही माधो का लेना। इन 75 सालों में बहुत देख लिया। देखो न, मुर्गे ने बांग दी और हम उधर हो लिए। जोड़ा पत्ता आया। हमने उसपर खूब खाना खाया। अब तीर-कमान का जमाना आ गया है। हम आदिवासी जो ठहरे। एकलव्य हमारा आईकॉन है। और हम तीर-कमान के शिकार हो गए। उजड़े वन-जंगलों में शिकार करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

चुनाव का मौसम है। सड़क किनारे गांव है। और उस गांव के सड़क किनारे मंगरु की छोटी-सी झोपड़ी है। रोज कोई न कोई किसी पार्टी के चुनाव प्रचारकों से भेंट-मुलाकात हो ही जाती है। कल की ही तो बात है। गोधूलि का बेला था। कोई नेता जी अपने लव-लश्कर के साथ आपके इस गरीब मंगरु की झोपड़ी में दर्शन दे गए। "बैठिए-बैठिए। बैठिए नेताजी।" यह सुनते ही नेताजी के सभी छोटे-बड़े चमचे अपने आंगने में घुस आए। उनलोगों को बिठाने की बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई। खैर, झोपड़ी में आदम जमाने की कुर्सी पड़ी थी। उसे नेताजी की तरफ खिस्का दी गई। बाकी लोग ईश प्रदत्त कुर्सी पर तशरीफ रख दिए। देखते ही देखते गांव के तमाम लोग इस झोपड़ी की ओर दौड़े चले आए। अच्छी-खासी भीड़ एकट्ठी हो गई। नेताजी को बिन मांगे मोती मिल गई। उम्र का लिहाज रखते हुए सभी समाज सुधारकों ने "डो़बो़क्" किया। दुआ-सलाम के बाद नेताजी ने बात बढ़ाते हुए कहा - "भाईयो तथा बहनो! इधर से गुजर रहा था। याद आई आपकी मंगरु बाबा की। इनकी उम्र बढ़ चली है। सोचा, क्यों न इनसे आशीर्वाद लिया जाय? देखिए, मैं इस राजमहल सीट से एक आजाद उम्मीदवार के रूप में आपकी खिदमत में पेश हूं। विगत दस वर्षों में आपके लिए कुछ भी नहीं हुआ है। मैं आपके लिए टेण्डेण्सी एक्ट, पेसा एक्ट, खतियान एक्ट सब लागू करके रहुंगा। मैं गुरुजी का पक्का चेला हूं। अतः आप हमें गुरुजी के नाम पर भारी से भारी मतों से विजयी बनावें ...।

यह छोटी-सी मुलाकत यहीं समाप्त हो गई। मंगरु ने मेहमानों को अंतःमन से लाल चाय पिलाई। नेताजी बहुत खुश थे। अतः जाते-जाते उसने प्रधान के हाथ में एक मोटा-सा लिफाफा थमाते हुए कहा - "मेरी तरफ से यह एक छोटी-सी भेंट है। ध्यान दीजिएगा।"

गांव वाले समझ गए थे कि नेताजी गुरुजी के चेले हैं। अतः उन्हें गुरुजी के चुनाव चिन्ह पर वोट देकर उनका हाथ मजबूत करना है। पर मंगरु यह पूछना तो भूल ही गया कि आपके पच्चीस वर्षों की विधायकी/मंत्री पद का हिसाब-किताब कौन देगा? आपकी मांगें तब क्यों नहीं पूर्ण हुई? आप अकेले इतनी बड़ी लोकसभा में कुछ कर पाओगे? या यह भी कोई जुमला ही साबित होगा? और तो और इतने मोटे-मोटे लिफाफे का स्त्रोत कहां है? कुबेर का हाथ कहां लग गया? वाह री माया!

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...