एकता में ही बल था ...
संताल इतिहास में दो सबसे बड़ी ऐसी घटना हुई है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। पहली घटना थी; जब "चाम्पा देश" में हमारा साम्राज्य था। संतालों के बारह गोत्रों के पास अलग-अलग किले थे; एवं उन सभी गोत्रों का व्यापार भी अलग-अलग था। यही कारण था कि हम दूध-दही की नदियों में नहाया करते थे। परंतु समय ने पलटा खाया। और समाज की इज्जत को बचाने हेतु “माधो सिञ” के डर से हम उस देश को सदा के लिए छोड़कर वहां से पलायन कर गए।
दूसरी घटना; आज से ठीक 168 वर्ष पूर्व, तब देश में अंग्रेजों का शासन था। हमने उनसे अत्याचार के विरुद्ध "हूल" किया और शेर के जबड़े से अपने संताल परगना को खींचकर बाहर निकाल लिया। ऐसा इसलिए संभव हो सका, क्योंकि तब हम एकता के सूत्र में बंधे हुए थे। उस समय संतालों के बीच न लिपि विवाद था, न धर्म की खेती होती थी और न ही तब संतालों में उत्तरी-दक्षिणी की कोई लउ़ाई थी। लेकिन आज? आज हम हजार टुकड़ों में बंट गए हैं। हमारा कोई माय-बाप नहीं। यही कारण है कि आज संताल समाज गर्त्त में जा रहा है। इसे शायद भगवान भी न बचा पाएगा।
हो सकता है संतालों के डीएनए में ही कोई खराबी हो। हो सकता है उनके खून में ही कोई खोट हो। नहीं तो क्या कारण है कि हम आपस में तो बेवजह खून के प्यासे हो जाते हैं, परंतु दुश्मनों के सामने हमारी घिग्घी बंध जाती है। उनके सामने हम शेर से चूहा बन जाते हैं।
यह शोध का विषय हो सकता है; क्यों उत्तरी-दक्षिणों के संतालों में इतना कहर बरपा है? क्यों इन दोनों के बीच लिपि के चक्कर में इतनी बड़ी दीवार खड़ी हो गई है? क्यों वे एक दूसरे के खून के प्यासे हो चले हैं? और तो और संताल समाज वर्तमान में कई समस्याओं से जूझ रहा है। पर लोग सभी समस्याओं को छोड़कर लिपि विवाद में ही उलझकर रह गए हैं। इससे अच्छी तरह समझने के लिए ब्रिटिश काल में हुए एक भाषाई सर्वेक्षण की ओर नजर दौड़ाते हैं।
तब देश में अंग्रेजों का शासन था। उसी दौरान सन् 1894 से लेकर 1928 तक भारत में जी. ए. ग्रियर्सन की अगुवाई में एक भाषाई सर्वेक्षण हुआ था। उस सर्वेक्षण में भाषाविदों ने स्पष्ट तौर पर अपनी रिपोर्ट मे लिख डाला; चूंकि संतालों के दक्षिण हिस्से में जो संताली बोली जाती है; वह मिश्रित व प्रदूषित हो चुकी है, जबकि उत्तर में बोली जाने वाली संताली अभी तक विशुद्ध है; अतएव उत्तरी संताली ही मानक (Standard) है। (Linguistic Survey of India, Vol-IV, Page No. 32).
ध्यान रहे; तब उत्तर में संताली साहित्य ने गति पकड़ ली थी। वगैर किसी रोक-टोक व बधित हुए कई पुस्तकें व पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगीं। यह भी संज्ञान लेने वाली बात है कि उत्तर संतालों का गढ़ मना जाने वाला संताल परगना के संतालों ने ब्रिटिश शासक के खिलाफ सन् 1855 में एक बहुत बड़ा “हूल” कर दिया था। इस हूल ने संतालों की महानता पर एक अमिट छाप छोड़ दी है। क्योंकि उस हूल के बदौलत ही संतालों के लिए एक अलग देश (जिला) संताल परगना का गठन हुआ है।
सन् 1947 में भारत देश आजाद हुआ। तब सरकारी स्तर पर शैक्षणिक क्षेत्रों पर बगैर रोमन लिपि की अवहेलना किए देननागरी लिपि से पुस्तकों का प्रकाशन होते रहा है। खसियत यही है कि रोमन हो या देवनागरी, दोनों लिपियों से शुद्ध-शूद्ध उत्तरी संताली लिखी व पढ़ी जाती है।
फिर क्या था? दक्षिण के संताल ईर्ष्या की बीमारी से पीड़ित तो थे ही, उन्होंने आनन-फानन में एक चोरी की हुई लिपि को जन्म दिया। और उस लिपि के प्रचार में रात-दिन एक कर दिया। उनके पास और कोई चारा तो था नहीं, अतएव उन्होंने लिपि को अपनी पहचान एवं अस्मिता के रूप में ढाल की तरह उपयोग करना शुरु कर दिया। जब लोगों ने इस लिपि को सिरे से खारिज कर दिया, तो इन्होंने इसे "आबोवाक्-आबोवाक्" कहा एवं इसे धर्म के साथ जोड़ दिया। मामला यहीं नहीं रुका, कुछ दिन पूर्व झारखण्ड सरकार देवनागरी लिपि से संताली पुस्तकों का प्रकाशन कर रही थी। फिर इन बुगड़ीधारियों ने जिनकी भाषा ही बिगड़ चुकी है, इन पर टांग अड़ा दी। इसके बाद सोशल मीडिया में इन्होंने जिस असंवैधानिक भाषा का उपयोग करते हुए देवनागरी समर्थकों को गाली-गलौच दिया है, यह किसी से छुपा नहीं है।
ओल चिकी समर्थक कितना भी जोर लगा लें, कोई भी राजनीतिज्ञ कितना भी ट्वीट कर लें, लेकिन यह सच है कि “कागज के फूलों से कभी खुशबू आ नहीं सकती है।” अतएव कभी एकता थी, अब वह कहीं गुम हो गई।