Tuesday, 2 August 2022

आखिर इसकी जड़ कहां है?

कोई भी घटना घटित होने के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण अवश्य होता है। अपने आप कोई भी घटना घटित नहीं होती है। इसके पीछे कोई कारण अवश्य रहा होगा कि यह घटना घट गई। लेकिन हम अक्सर उन वैज्ञानिक कारणों को नहीं जान या पहचान पाते हैं, बल्कि मान जाते हैं और उस पर विश्वास करने लग जाते हैं। इसी को कहा जाता है - अंधभक्ति और इसकी पूजा करने वाले को अंधभक्त। एक छोटा-सा उदाहरण लेते हैं। अभी-अभी इसी सड़क से एक नौजवान सरपट दौड़ा जा रहा था। इसके ठीक दो सेकंड पहले ही एक बस भी चली गई। लोगों ने देखा कि उस नौजवान के पीछे एक कुत्ता भी भागा जा रहा था। आस-पास के लोगों से पूछा गया कि आखिर वह नौजवान क्यों दौड़ रहा था? इस पर लोगों की अलग-अलग राय थी। किसी ने कहा कि बेचारा नौजवान! उसको कहीं जाना था। इसलिए वह बस पकड़ने के लिए दौड़ रहा था। परंतु उसकी बस छूट गई। किसी और ने बताया - गलत। देखते नहीं हो, उस नौजवान के पीछे एक कुत्ता दौड़ रहा था। वह नौजवान कुत्ते के डर से भागा जा रहा था। जितने मुँह, उतनी बातें। जब इस मसले पर अच्छी तरह शोध किया गया, तो पता चला कि वह नौजवान न तो बस पकड़ने और न ही कुत्ते के डर से भाग रहा था। बल्कि यह तो उनका दैनिक जीवन की एक दिनचर्या थी। वह कसरत/व्यायाम कर रहा था।

इस वक्त संताल जगत में लिपि की चर्चा ने सबकी नींद हराम कर रखी है। सभी बेगाने की शादी में अब्दुल्ला दीवाना बने फिर रहे हैं। सभी अपने आपको महान भाषावैज्ञानिक साबित करने में लगे हुए हैं। एक पक्ष का दावा है कि इस लिपि विशेष से दुनिया की तमाम भाषाएँ शुद्ध-शुद्ध लिखी जा सकती हैं, यहाँ तक कि चाइनीज भाषा को भी लिखा जा सकता है। इस पक्ष का कोई ... पति नामक महापण्डित विदेश भ्रमण पर निकला था। उसके अनुसार इस लिपि को जल्द ही दुनिया के तमाम राष्ट्र अपनाने जा रहे हैं। अरे भई, आपको अग्रिम मुबारक हो, आपकी लिपि यथाशीघ्र दुनिया की लिपि बन जाए। लेकिन इतना तो बता जा कि आपकी लिपि कहीं चोरी की हुई लिपि तो नहीं है? यह वर्णमाला नहीं अपितु यह शब्दमाला है। 

संयोग ही कहा जाएगा कि जब दक्षिण में ओ़ल चिकी लिपि का आविष्कार हो रहा था, तब उत्तर (संताल परगना) में 7 खण्डों में संताल विश्वशब्दकोश बनकर तैयार हो चुका था। इतना ही नहीं, उसी समय जब भारतीय भाषाई सर्वेक्षण की रिपोर्ट उसके महानिदेशक जी. ए. ग्रियर्सन द्वारा लिखी जा रही थी, तो उसने साफ-साफ शब्दों में लिख दिया कि उड़ीसा की संताली आर्यों की भाषा के साथ घुलमिल गई है, इसलिए यह एक बोली है और अमानक भी है। जबकि उत्तर (संताल परगना) की संताली निष्कलंक है, इसलिए संताल परगना की संताली ही विशुद्ध और मानक है।

इस लिपि विवाद पर एक शोधार्थी ने अपने शोधपत्रा में बड़े ही दिलचस्प तथ्यों को उजागर किया है। वह लिखता है कि यह विवाद ओल चिकी बनाम देवनागरी कतई नहीं है। बल्कि इसके सूत्राधार और कहीं बैठे हुए हैं। बल्कि यह लड़ाई वर्षों पुरानी है। अपने शोध में उसने यहाँ तक लिख दिया है कि यह सुर-असुर के जमाने की लड़ाई है। दिन-समय और घटना के हिसाब से इसके पात्र बदले गए हैं। पटकथा वही पुरानी है।

उस शोधार्थी का शोधपत्र बहुत लंबा है। अतएव यहाँ उसका सार बताना ही उचित होगा। वह आगे लिखता है कि अगर भारत में अंग्रेज न आये होते, तो भारत में विशेषकर अ.ज,अ.ज.ज, ओ.बी.सी एवं अल्पसंख्यों की स्थिति आज बद से बदतर हुई होती। आप यकीन करोगे कि दबे-कुचलों को अंग्रेज आगमन से पहले पढ़ने-लिखने भी नहीं दिया जाता था। अगर किसी ने चोरी-छिपे शैक्षिक बातें सुनने की चेष्टा की, तो उसके कान में गरम शीशा डाला जाता था। और जिसने भी शिक्षा की बात की, उसकी जीभ काट दी जाती थी। छुआछूत किस कदर अभी भी जिंदा है, वह आपके सामने है। अगर डॉ भीमराव अम्बेडकर साहब भारत का संविधान न लिखे होते, तो हम यह सब सोचने के काबिल भी न होते। अंग्रेजों की देन विस्मरणीय है।

उस शोधपत्र के पृष्ठ संख्या 540 पर शोधार्थी दलील के साथ लिखता है कि संताल हूल-1855 दिकू महाजनों के विरुद्ध हुआ था न कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ। उन दिकू महाजनों का अत्याचार संतालों के प्रति इतना बढ़ गया था कि संतालों के पास हूल के सिवा और कोई चारा न था। शोधार्थी आगे डंके की चोट पर लिखता है कि उस समय संताल परगना में एक ही तो अंग्रेज साहब-जेम्स पोण्टेट था। क्या एक अंग्रेज अफसर के विरुद्ध हूल किया जाता है? क्या एक व्यक्ति के खिलाफ हूल किया जा सकता है? कदापि नहीं। 

शोधार्थी लिखता है; असली कहानी हूल के बाद घटती है। सूर-असूर की लड़ाई रहते हुए भी असुरों ने मिशनरियों के भरोसे शिक्षा ग्रहण की। असुरों की आँखें खुलीं। वे दूध का दूध और पानी का पानी के न्याय को जानते हैं।

लिपि विवाद की असली जड़ संताल हूल में छिपी हुई है। हूल का मुख्य कारण; दिकू महाजनों ने संतालों को जीभर कर लूटा। दिकूओं ने दमन व अत्याचार की सारी हदें पार कर दी थीं। महाजनों के उत्पीड़न से मानवता तार-तार हो गई थी। यह सच है कि संताल लोग महाजनों से ऋण लेते थे। इनका ब्याज दर 500 गुना से भी ज्यादा होता था। इूसरा सच यह भी है कि जो ऋण नहीं लेते थे, उनको भी बेवजह ऋण के जाल में फंसा दिया जाता था। वैसे तो महाजन खलिहान से ही धान के रूप में ऋण वसूली कर लिया करते थे। लेकिन अदायगी न कर पाने की स्थिति में महाजन संतालों की जमीन-जयदाद, मवेशी यहाँ तक की उनके बीबी-बच्चे को उम्र भर जीभर कर दोहन करते एवं बेगारी के रूप में अपने यहाँ नौकर रख लेते थे।

दंतकथाओं के अनुसार सूर-असूर के युद्ध में छल-कपट के सहारे असूर हमेशा पराजित होते रहे हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण “दिबी दासाँय” है, जिसमें संतालों के राजा हुदुड़ दुर्गा़ को छल-कपट के सहारे किसी वेश्या के द्वारा मारा जाता है। इस त्योहार में दिकू उस वेश्या की पूजा-अर्चना करते हैं, तो संताल इसके विरोध में दासाँय करते हैं एवं अपने राजा की हत्या होने पर हाय-हाय करते हैं।

मालूम हो कि संतालों ने हूल में सूद सहित दिकुओं से बदला ले लिया था। जितने भी महाजनी का करोबारी करते थे, उनको चुन-चुनकर मौत के घाट उतारा। ऐसा नरसंहार दुनिया के इतिहास में नहीं मिलता है। ऐसा नहीं है कि संतालों ने हूल के बारे में ब्रिटिश शासक को आगाह नहीं किया था। आगाह किया था, पर अंग्रेजों ने मजाक समझकर इसे धता बता दिया था। अंग्रेज कभी सोच भी नहीं सकते थे कि जिनके तन-बदन में कपड़ा तक नहीं, जिनको कोई भी आक्षरिक ज्ञान नहीं। क्या वे कभी हूल को अंजाम दे सकते हैं? इसलिए अंग्रेज हूल की संभावना से कोसों दूर थे।

हूल का श्रीगणेश 7 जुलाई, 1855 को पंचकठिया वट वृक्ष के नीचे से हुआ। इसी दिन कुख्यात महाजन केनाराम भगत एवं दबंग दरोगा महेशलाल दत्ता की हत्या कर दी गई। करीब सप्ताह भर तक महाजनों को मौत के घाट उतारा गया। किसी तरह ब्रिटिश शासकों को इस खबर की भनक लगी। पहले तो इन्होंने इस कत्लेआम को रोकने के लिए “हिल रेन्जर्स” को भेजा। पर “हिल रेन्जर्स” संताल सेनानियों के सामने टिक न पाए। बाद में कोलकाता-दानापुर से सेना बुला लिए गए। संताल सेनानी एवं अंग्रेज सैनिकों के बीच घमासान युद्ध हुआ। युद्ध इतना भयंकार था कि ब्रिटिश शासकों को मार्शल लॉ लागू करना पड़ा। विडंबना यही है कि संतालों को हार की जीत मिली। अंग्रेजों को मजबूरन संतालों के लिए एक अलग प्रदेश - संताल परगना देना पड़ा। यहाँ तक कि उस नये प्रदेश में संतालों को अपनी परंपरा के अनुसार राज करने का अधिकार भी मिल गया। 

हूल के ठीक 5 वर्ष के बाद संताल परगना में मिशनरियों को आगमन हुआ। उन्हें संतालों की आर्थिक स्थिति को देखकर तरस आया। संतालों को गरीबी के दलदल से उठाने के लिए उन मिशनरियों ने शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया। संताल परगना में जगह-जगह स्कूल खोल दिए गए। उस शिक्षा के बदौलत ही संतालों की आँखें खुली। उनमें अच्छे-बुरे को पहचानने की शक्ति बढ़ती गई। स्वाभाविक है कि शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने अपनी साहित्यिक गति-विधि को भी बढ़ा दी थी।

हूल के परिणाम से बौखलाए महाजन संतालों की इस तरह की प्रगति को देखकर ईर्ष्या से जल उठे। इन्होंने संतालों की प्रगति में बाधा डालने के लिए भेद की नीति के तहत सबसे संवेदनशील मुद्दा धर्म को इनके बीच लाया। वे प्रत्यक्ष रूप से इनके बीच नहीं आये, परंतु इन्होंने अपने चेलों को उनके बीच भेजा। इस कड़ी के प्रथम चेलों में खेरवाड़ (साफा हो़ड़) आंदोलन के अगुआ बाबा भगीरथ का नाम आता है।

शोधार्थी प्रमाण के साथ लिखता है कि संताल परगना के लोगों ने हमेशा ही झारखण्ड आंदोलनकारियों का साथ दिया है। लेकिन दिकू लोगों ने हमेशा ही अपनी कूटनीति के तहत धर्म को बीच में लाकर संतालों की उन्नति को अवरुद्ध करने का काम किया है। लिपि विवाद कोई विवाद ही नहीं है। उड़ीसा में जन्मी इस लिपि के समर्थक सभी हिंदु हो चुके हैं। हिंदुवादी संगठनों की दाल संताल परगना में नहीं गल रही है। इसीलिए इन्होंने संताल परगना के कट्टर हिंदु समर्थक संतालों का चयन किया हुआ है; जिन्हें लिपि का रत्ती भर ज्ञान नहीं। इसीलिए तो वे हर हमेशा लिपि के तर्क में हार जाने के बाद धर्म-धर्म चिल्ला उठते हैं। इस आलेख का सार यही है कि ओल चिकी एक ऐसा हथियार है जिससे संताल समाज का नाश निश्चित है।

संताली साहित्य का भविष्य

जब संताली के लिए रोमन, देवनागरी एवं बंगला लिपि चलन में थी, तो चौथी अवैज्ञानिक लिपि बनाने की क्या जरुरत थी? सुना है, 1900 के दशक में उड़िसा के मयुरभंज इलाके में किसी लिपि चोर का उदय हुआ। उस लिपि चोर को भाषाविज्ञान के बारे में क, ख, ग ... भी मालूम नहीं। उसके साथ भाषा के मामले में एक तो करेला और दूजा ऊपर से नीम चढ़ा वाली बात हो गई। उसने आव देखा न ताव, इधर-उधर से लिपियों की चोरी कर ली। और इस तरह कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा उस भानुमति भाई ने कुनबा जोड़ दिया। यह भी कहा जाता है कि मूलतः वह लिपि मुण्डारी भाषा समूह के लिए बनाई गई थी। पर संताल छोड़ अन्यों ने अवैज्ञानिक होने के कारण उसे अस्वीकार कर दिया। फिर भागते चोर को लंगोटा ही सही, उसने अपनी लिपि के प्रचार हेतु एक संस्था की स्थापना कर डाली। तब से यह संस्था अपने खट्टे दही का प्रचार-प्रसार में जुटी हुई है। उस प्रचार की कड़ी में सबसे अहम मुद्दा बना "पहचान"। यह किस तरह की पहचान हुई? जबकि वे चौबीसों घंटे विदेशी वस्तुओं का उपयोग करने में तल्लीन हैं, और जब पढ़ाई-लिखाई के लिए लिपि की बात आती है, तो वे "आबुआक्-आबुआक्" करने लग जाते हैं। ज्ञात हो कि "मोंज दान्देर आंक" भी आबोआक् है, और यह इससे पहले और इससे भी अच्छी लिपि बन पड़ी है। फिर भी, क्यों नहीं उसे "आबुआक्-आबुआक्" करते हैं? अब जब "आबुआक्-आबुआक्" करने वाले चारों खाने चित हो गए, तो इन्होंने लिपि के साथ धर्म को भी जोड़ दिया है। जबकि धर्म के साथ भाषा व लिपि का कोई संबंध नहीं है। दुनिया में कई ऐसे देश हैं, जिनका रोम की जात-पात और धर्म के साथ कोई मेल नहीं, फिर भी इन्होंने रोमन लिपि को अपना रखा है। अंग्रेज को ही देख लो, उनकी अपनी कोई लिपि नहीं है। अंग्रेजी रोमन लिपि में लिखी जाती है, और इस वक्त अंग्रेजी दुनिया में अपना डंका बजा रही है। और तो और अपने पड़ोसी देश बंग्लादेश को ही देख लो। यह एक मुस्लिम बाहुल देश है। फिर भी यहां की जनता ने उर्दू-फारसी को छोड़कर बंगला लिपि को अपना रखा है। एक बात समझ में नहीं आती है, जब वे अंग्रेजों की पोशाक पैंट को बड़ी शान के साथ पहनते हैं, तो उनकी पहचान कहां चली जाती है? है न यह अजीब बात! इसे ही कहा जाता है - "गुड़ खाये, गुलगुले से परहेज।"

जब से उस नई लिपि का सृजन हुआ है, तब से उसके अंधभक्त उसके प्रचार कार्य में लगे हुए हैं। शुरुआती दौर में इसका खूब प्रचार-प्रसार हुआ। उनके लिए भाषा भाड़ में जाय, उनके लिए लिपि ही महत्वपूर्ण हो गई। यही कारण है कि 100 वर्ष की जयंती पर उन्होंने अब ओल चिकी मिशन - 2025  चला रखा है। लेकिन इनके सभी प्रचारक कंबल ओढ़कर घी पीने में मस्त निकले। न अभिावक, न मां-बाप और न ही कोई बच्चा, उस नई अवैज्ञानिक लिपि को सीख रहा है। कारण, पैंट के सामने सारी संताली पोशाक बेकार साबित हो गई।

स्पष्ट रूप से कहा जाय, तो हम तो डूबे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे वाली कहावत चरितार्थ हो गई। उन्होंने कोई ऐसी जगह न छोड़ी है, जहां उनका कब्जा न हो। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से लेकर हर जगह उनकी तूती बोल रही है। पाटाबिन्दा हो या लालपनिया धा़ेरो़म गढ़ हर जगह उनके परचम लहरा रहे हैं। लेकिन यह सच है, उनका यह खोटा सिक्का अब तक तो कामयाब होते दीख रहा है। इसका एकमात्र कारण यही है कि अच्छे लोग बुराई पर अपनी जुबान बंद रखे हुए हैं। जौहरी अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभा रहे हैं। तभी तो सोना के बदले लोहा हर जगह फुदक रहा है। "आबुआक्-आबुआक्" सिर्फ भावुकता पर अटकी हुई है। अंदर से यह पूरी तरह खोखली है। इसका साक्षात प्रमाण आपने हाल में संपन्न हुए जमशेदपुर पुस्तक मेले का नजारा देख ही लिया। उस मेले में ओल चिकी से मुद्रित संताली पुस्तकों का स्टॉल भी लगा हुआ था। परंतु कितनी अफसोस की बात है कि उस मेले में एक भी ओल चिकी संताली पुस्तक की बिक्री न हो सकी। हां, संताली पुस्तक प्रेमी देवनागरी/रोमन में प्रकाशित पुस्तकों के बारे में जानकारी अवश्य ले रहे थे। जमशेदपुर के उस पुस्तक मेले ने ओल चिकी के अंधभक्तों को अपना आईना दिखा ही दिया।

सत्य को परेशान किया जा सकता है। पर उसकी जीत अवश्यंभावी है। ओल चिकी एक मरा हुआ हाथी साबित हो रहा है। फिर भी कुछ अंधभक्त उसे जीवित होने की सूई भोंकने में जुटे हुए हैं। झारखण्ड के मुखिया धो़रो़म गढ़ से ओल चिकी की पैरवी करे, तो दाल में कुछ काला नजर आना स्वाभाविक है।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...