Sunday, 12 May 2024

करो या मरो

दुनिया में राजनीति का नशा बड़ा ही अद्भूत है। एक पैर कब्र पर है, फिर भी यह नशा उतरने का नाम नहीं लेता है। जिस तरह दर्जी का बेटा दर्जी, कुम्हार का बेटा कुम्हार उसी तरह यह पेशा भी खानदानी बन जाने का रिवाज है। 

देश में तीसरे चरण का मतदान हो चुका है। 13 मई 2024 को चौथे चरण का मतदान होना है। अब तक सभी चरणों में मतदान करने वालों की संख्या गिर गई है। आखिर ऐसा क्यों? इस संबंध में सौ बात की एक बात लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठना बताया जा रहा है। उनके अनुसार सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे होते हैं। उनकी दलील है कि इस बार तुम लुट लो, फिर हमें अगले पाँच साल बाद लुटने का मौका दो। यह सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। परंतु यह भी सच है कि अधिक दिनों तक जमा किया हुआ पानी जरुर गंदा होता है, अतः इसकी सफाई बहुत जरुरी है। एवं उस तालाब पर नये जल का भराव अत्यावश्यक है। इसे ही एंटीइनकॉम्बेन्सी कहा जाता है।

विश्वास बहुत बड़ी चीज है। अगर विश्वास ही उठ गया, तो सबकुछ का सत्यानाश तय है। आजकल ईव्हीएम द्वारा मतदान का प्रावधान है। ईव्हीएम एक मतदान करने की मशीन है। उस पर आरोप लगते रहा है कि उस मशीन को अपने मनमुताबिक सेट किया जा सकता है। आरोपकर्ता की दलील है कि उसे इस तरह सेट किया जा सकता है कि अगर उस मशीन में दस वोट पड़ा, तो छः वोटों को अपने खाते में आसानी से परिवर्तित किया जा सकता है। लो कर लो बात। कुछ भी चिल्लाते रहो। जीत तो उसी की होगी, जिसके पास लाठी है। 

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अब देश में गरीबों की संख्या 84 करोड़ हो गई है। यह जनसंख्या सिर्फ पाँच किलो सरकारी राशन पर जीवित है। यह भी सच है कि आने वाले दिनों में इनकी संख्या घटेगी नहीं, बल्कि बढ़ती ही जायगी। देश में नौकरी करने की सुविधा गायब हो गई है। वंचित एवं दबे-कुचले लोग अब आसमान से गिरे तो खजूर पर अटक गए हैं। उनकी आरक्षित सीट घटा दी गई है। उन्हें अपने हाल में जीने के लिए अवारा छोड़ दिया गया है। देश की सरकारी संपत्तियों को धड़ल्ले से बेचा रहा है। और जैसे कि आपको मालूम है कि प्राईवेट संस्थानों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। बेचारा आरक्षित वर्ग आखिर जांय तो कहाँ जांय?

देश के संविधान पर भयानक खतरा मंडरा रहा है। बीते दिनों इसे संसद भवन के समीप जलाया गया। जगह-जगह आरक्षण का विरोध किया जा रहा है। इस बात की पुष्टि भी हो चुकी है कि सत्तापक्ष के लोकसभा उम्मीदवारों ने चार सौ पर लाने की दुहाई देते हुए संविधान को बदलने की वकालत कर डाली है। इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि वह दिन दूर नहीं जब देश से लोकतंत्र एवं संविधान का नामोनिशान मिट जाएगा।

अतः अब देश में "करो या मरो" की स्थिति आ गई है। अगर आपसे किसी तरह की चूक हो गई, तो यह आपका अंतिम मतदान होगा। इसके बाद देश जल रहा होगा और साहब बांसुरी बजाने में मस्त होंगे। तब तक देश खण्ड-खण्ड हो जायगा। 

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...