Tuesday, 4 August 2020

यह कैसी विडंबना?

कोई कल्पना नहीं, परंतु आँखों देखी घटना है। बचपना था। पर उस समय की याद आज भी तरोतजा है। तब हमारा समाज कैसा था और अब किस मोड़ पर है, लेखक को अपने विवेकानुसार अच्छी तरह पता है। इस पर किसी का मतभेद होना स्वाभाविक है। खैर, समाज सुधार का बागडोर तब भी राजनीतिज्ञों के हाथों था, और आज भी उन्हीं राजकुमारों के हाथों सुपुर्द है। किसी भी सामाजिक संस्थाओं को तब भी और आज भी कोई घास नहीं डालता है। तब खासकर संताल परगना में ‘जोड़ा बैल’ और ‘मुर्गा’ के बीच राजनीतिक द्वन्द था। माराङ गोमके ने आदिवासियों को पता नहीं कौन-सी घुट्ठी पिलाई थी कि लोग अलग प्रांत के लिए अत्यधिक मदहोश थे। कहीं भी माराङ गोमके का भाषण होता, लोग ‘ताबेन और सा़तु' बांधकर’ दूर-दूर से चले आते थे। इतनी भीड़ होती थी कि सभास्थल पर तिल रखने के लिए जगह नहीं होती थी। तब जनता भी सा़ेहराय नृत्य करते हुए अपना मताधिकार का प्रयोग करने हेतु पोलिंग बुथ तक जाती थी। पर कुछ ही वर्षों के बाद किसी राजनीतिक दांव-पेच के कारण उस मुर्गा को चखना कर दिया गया। झारखण्ड पार्टी दो बैलों के साथ जुड़ गई। आदिवासी जनता इस बारे में अनभिज्ञ थी। 

संताल परगना के लोगों ने तब ‘जोड़ा पत्ता’ में खूब खाना खाया। लेकिन जल्द ही ‘जोड़ा पत्ता’ भी फट गया। अब संताल परगना में एक राजनैतिक सूनापन-सा छाने लगा। तब उसकी भरपाई हेतु आंधी-तूफान की तरह एक बावंडर आ गया। यह कोई 1972 की घटना है। संताल परगना में एक ऐसा महाबलि का उदय हुआ था, जो पेड़ को हिला दे, तो उनसे रोटियों की बरसात होती थी, जल के अंदर मोटर साईकिल चलाने की कूवत थी और तो और उनपर चली गोलियां सब पानी बन जाती थीं। उनपर किसी तरह का कोई भी प्रहार असर नहीं करता था। और इस तरह धान काटो व महाजनों के विरुद्ध आंदोलन अपनी चरम स्थिति को छू गई थी। तब जनता ने भी नई आस के साथ उनका खूब साथ दिया। लोगों ने अलग प्रांत को ‘संजीवनी बूटी’ मान लिया था। जनता ने अपना सब काम छोड़कर उनका खूब साथ दिया। इस आंदोलन में न जाने कितनों की जानें चली गईं, कोई हिसाब नहीं।

और इस तरह 15 नवंबर, 2000 को झारखण्ड के आदिवासियों के लिए एक नई सुबह आई। ऐसी सुबह जिसमें एक नये अलग झारखण्ड राज्य का उदय हुआ था। नये राज्य का उदय होते ही कुछ लोग बालू फांकने के लिए अपनी बोरियां समेटने लगे थे, पर किसी ने बड़े भाई समझकर उसे अपने पास ही पनाह दे दी। 

नये राज्य का गठन किए आज 20 वर्ष भी बीत चले। पर संजीवनी बूटी भी काम न आई। खोदा पहाड़ निकली चुहिया, वह भी मरी हुई। आदिवासियों की आस पर पानी फिर गया। मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक। जनता अब किंकर्तव्यविमूढ़ है। आइए इसका कारण ढूंढ़कर समाधान निकालने की कोशिश करते हैं।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...