Showing posts with label राजनीतिक चिंतन. Show all posts
Showing posts with label राजनीतिक चिंतन. Show all posts

Wednesday, 25 September 2024



संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त 
होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है

यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्य हो जाती है। विडंबना है कि जबतक उस चीज की प्राप्ती नहीं हो जाती, तबतक उसकी प्राप्ती हेतु जान तक की बाजी भी लगाई जाती है। यह कड़ुवा सच है; हमारे पूर्वजों ने 1855 में अन्याय के विरुद्ध हूल किया। और उस हूल की एवज में उन्हें एक बड़ा-सा भूखण्ड मिल गया। पर हम उस भूखण्ड को संभाल पाने में विफल रहे। सोचने वाली बात है; इतना सख्त कानून रहने के बावजूद भी उस नये भूखण्ड में बाहरियों की बाढ़ आ गई और उसने हमारी ”डेमोग्राफी“ ही बदलकर रख दी है। अब उसमें हिन्दु आये या मुसलमां; यह शोध का विषय हो सकता है। संताल परगना गजेटियर्स बताता है कि अलग संताल परगना गठन होने के समय देवघर एवं राजमहल में मात्र 10% ही बाहरी आबादी थी। लेकिन इस आबादी के साथ जादुई करिश्मा हो गई, जिससे आज सच में संताल परगना की डेमोग्राफी बदली हुई है। संताल परगना के छोटे-बड़े शहरों की बात ही छोड़ दीजिए। अब तो गांव-देहातों में भी बाहरी घुसपैठियों की बाढ़ आ गई है। आश्चर्य करने वाली बात तो यह है कि एसपीटी एक्ट के तहत जमीन की खरीद-बिक्री नहीं हो सकती है। फिर भी हो सकता है; शायद ये बाहरी घुसपैठिये आसमान से टपक पड़े हों!

देश 1947 को आजाद हुआ। हम अपने हूल के परिणामस्वरुप मिले भूखण्ड को संभालने में विफल रहे। महानायक सिदो-कान्हू एवं हूल में शहीदों के सपने अधूरे रह गए। फिर हम झारखण्ड अलग प्रांत के आंदोलन में कूद पड़े। इस आंदोलन के परिणामस्वरुप भी हमें 50 वर्षों के बाद 2000 को अलग झारखण्ड राज्य तो मिल गया, पर उसे भी संभाल न पाए। तब बाहरी आबादी अपना बोरिया-बिस्तार समेट ही चुकी थे कि हमने उसे अग्रज मानकर उन्हें अपने पास ही पनाह दे डाली। अब डेमोग्राफी ... डेमोग्राफी चुनावी झुनझुना बजाते रहो। इससे कुछ होना-जाना नहीं है। परिणाम यह हुआ कि हमारे लोग अपनी मातृभूमि से पलायन कर रहे हैं, जबकि बाहरी आबादी टिड्डी की भांति उसकी भरपाई हेतु घुसपैठ कर रहे हैं। दोनों ही परिस्थितियों में हमारी हालत पतली हुई जा रही है।

आदिवासी संतालों की सुरक्षा हेतु क्या नहीं है? उनके पास सभी तरह के कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। फिर भी वे लुप्त होने की कगार पर खड़े हैं। अब उनकी जनसंख्या झारखण्ड में 2011 के अनुसार मात्र 26% रह गई है।

झारखण्ड में चुनावी शंखनाद हो चुका है। इस चुनाव के दौरान काले-पीले सभी तरह के राजनैतिक दल आयेंगे। और वे भूतकाल की तरह संतालों को किसी दुधारी गाय की तरह दुहकर अंतर्धान हो जाएंगे। और हम मूरख संताल भाषा को छोड़ धर्म और लिपि का घूंट पीने में मस्त हो जाएंगे। वाह रे आदिम जाति संताड़ खेरवाल!

Tuesday, 3 September 2024

आखिर दो-दो सृष्टि क्यों?

भगवान भी बड़ा अजीब है! उसने ब्रह्माण्ड की सृष्टि कर दी और कहाँ गायब हो गया? आजतक किसी को कुछ पता न चल पाया। न वह बोलता है, न सुनता है और न ही वह किसी के सामने प्रकट होता है। सबकुछ सृष्टि करने के बाद उसने प्रथम नर-नारी को बनाया होगा। जहां से मानव सृष्टि की शुरुआत हुई। उसी का ही परिणाम है कि आज हम हिन्दू-मुस्लिम करने में सक्षम हैं। यह परंपरा आगे भी बढ़ती जाएगी।

बेशक भगवान न दीखते हों। परंतु उसने अपनी सृष्टि के माध्यम से सबकुछ बताने की चेष्टा की है। इसके लिए समझने की दिव्यदृष्टि होनी चाहिए। आश्चर्य तो तब होता है, जब हम पाते हैं कि उसने एक अकेला नहीं बल्कि जोड़े में ही किसी सजीव-निर्जीव की सृष्टि कर रखी है। जैसे - नर-नारी, सूरज-चंद्रमा, दिन-रात, सूख-दुख वगैरह। अपने शरीरांग को ही देख लो। कोई भी अंग अकेला नहीं बल्कि जोड़े में हैं - हाथ, पैर, नाक, कान .. सभी डबल हैं। यहाँ तक कि दांत की भी ऊपर-नीचे दो पंक्तियाँ हैं। सोचो, अगर एक ही पंक्ति होती, तो क्या हम खाने को सक्षम होते? नहीं। ऐसा इसलिए; वे एक दूसरे के पूरक हैं। वे आपस में एक दूसरे के अच्छे दोस्त एवं सहायक हैं। वे एक दूसरे के मददगार हैं। वे आपसी दुश्मन तो कतई नहीं हैं। ठीक यही स्थिति सबके साथ है। देखो न; देश सन् 1947 को आजाद हुआ। संविधान बना। और देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए एक राष्ट्र एवं कई राज्यों का निर्माण हुआ। राष्ट्र व देश को चलाने के लिए सांसदों एवं राज्य को चलाने के लिए विधायकों की जरूरत होती है। इन सांसदों/विधायकों का चुनाव जनता करती है। अतः स्पष्ट हो गया कि सांसद-विधायक एवं जनता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक दूसरे की अनुपस्थिति में न तो राष्ट्र और न ही राज्य चल सकता है। अर्थात नेता और जनता एक दूसरे के पूरक हैं।

जब जनता और नेता का इतना घनिष्ठ संबंध हो, फिर भी दोनों एक दूसरे के घोर शत्रु बने हुए हैं। क्यों? क्योंकि दोनों के बीच आपसी तालमेल नहीं है। बल्कि नेता जनता का शोषण करना अपना धर्म समझता है। यही कारण है कि नेताओं की हार-जीत होती रहती है। अतः जब तक नेता-जनता के बीच शरीरांग माफिक सामंजस्य स्थापित नहीं होगा, तब तक देश की उन्नति के बारे में सोचना फिजूल की बातें होंगी।
शिक्षा रूपी मशाल दे दो!

ओशो ने ठीक कहा है - "राजनीति...! क्या ही सुंदर शब्द गढ़ा है लोगों ने “राजनीति!” जिसमें नीति बिलकुल भी नहीं है, उसको कहते हैं “राजनीति”। राजनीति सिर्फ चालबाजी है, धोखा-धड़ी है, लुटपाट है, बेईमानी है। इसकी खासियत यही है कि जो नेता जनता को जितना ठग सके, वह उतना ही कामयाब कहलाएगा। हालांकि राजनीतिज्ञों को ईमानदारी के नकाब ओढ़ने पड़ते हैं, मुखौटे ओढ़ने पड़ते हैं, अपने को छिपा-छिपा कर चलना पड़ता है। राजनीतिक नेताओं के पास जितने चेहरे होते हैं, उतने किसी के पास नहीं होते। उनको खुद ही पता नहीं होता है कि उसका असली चेहरा कौन-सा है। मुखौटे ही बदलते रहते हैं, गिरगिट की तरह।” जैसे कि हमारे झारखण्ड में इस वक्त कई तरह के गिरगिट उग आए हैं!

इस वक्त हमारे पास सबसे बड़ा सवाल क्या है? यही न कि हमें सिदो-बिरसा का झारखण्ड दे दो, कहानी खत्म, अध्याय समाप्त। सिदो-बिरसा ने हमें एस पी टी एवं सी एन टी एक्ट दिया। आपने हमें कौन-सा एक्ट दिया? बताओ जरा। इन तथाकथित राजनीतिज्ञों से डोमिसाइल नीति नहीं बन पा रही है, खतियान का बँटाधार हो चला है, पेसा एक्ट नहीं लागू हो रहा है। भ्रष्टाचार आसमान छू रहा है। फिर क्या दोगे? खाक दोगे? जब तक आरक्षण है, मजे लूटते रहो।

फ्री बी का जमाना चल पड़ा है। आपने चौरासी करोड़ जनता को भिखारियों की लाइन में खड़ा कर दिया है। आप भी खुश और जनता भी खुश! हिन्दू-मुस्लिम करते रहो, आबोआक्-आबोआक् करते रहो। किसने रोका है? आपकी गाड़ी चल रही है, चलाते रहो। हमें कुछ भी नहीं चाहिए। हमें शिक्षा रूपी मशाल दे दो। हम अपना रास्ता खुद-ब-खुद ढूँढ़ लेंगे।

Sunday, 1 September 2024

राजनीतिज्ञ और डाकू

ओशो ने कहीं कहा है - "राजनीति...! क्या ही सुंदर शब्द गढ़ा है लोगों ने ”राजनीति!“ जिसमें नीति बिलकुल भी नहीं है, उसको कहते हैं राजनीति। सिर्फ चालबाजी है, धोखा-धड़ी है, बेईमानी है। हालांकि ईमानदारी के नकाब ओढ़ने पड़ते हैं, मुखौटे ओढ़ने पड़ते हैं, अपने को छिपा-छिपा कर चलना पड़ता है। राजनीतिक नेताओं के पास जितने चेहरे होते हैं, उतने किसी के पास नहीं होते। उनको खुद ही पता नहीं होता कि उसका असली चेहरा कौन-सा है। मुखौटे ही बदलते रहते हैं, गिरगिट की तरह।

राजनीति डकैती है। दिन-दहाड़े! जिनको लूटो, वे भी समझते हैं कि उनकी बड़ी सेवा की जा रही है! यह बड़ी अदभुत डकैती है। डाकू भी इससे मात खा गए। डाकू भी पिछड़ गए। सब तिथि-बाह्य हो गए "आउट ऑफ डेट।" इसलिए तो बेचारे डाकू समर्पण करने लगे कि क्या सार है! चुनाव लड़ेंगे, उसमें ज्यादा सार है। तो राजनीतिज्ञों के सामने डाकू समर्पण कर रहे हैं, क्योंकि देख लिया डाकुओं ने, इतनी समझ तो उनमें भी है, कि मारे-मारे फिरो जंगल-जंगल और हाथ क्या खाक लगता है कुछ! और हमेशा जीवन खतरे में। इससे तो राजनीति बेहतर, राजनीति डकैती की आधुनिक व्यवस्था है, प्रक्रिया है। 

एक मिनिस्टर जनसंपर्क दौरे पर बाहर निकले। मंजिल पर पहुंचने से पहले डाकुओं द्वारा पकड़े गए। रस्सियों से जकड़े गए कार से उतार कर पेश किए गए। सामने सरकार के बुरी तरह हांफ रहे थे मारे डर के कांप रहे थे। तभी बोल उठा सरदार डरो मत यार हम तुम एक हैं। दोनों के इरादे नेक हैं। तुम्हारे हाथ सत्ता ... हमारे हाथ बंदूक, दोनों के निशाने अचूक। हम बच रहे हैं अड्डे बदल और तुम दल बदल कर दोनों ही एक-दूसरे के प्रचंड फ्रेंड जनता को लूटने में दोनों ट्रेंड। या यों कह लो सगे भैया, रास्ते अलग-अलग लक्ष्य दोनों का रुपैया। दोनों के साथ पुलिस हमारे पीछे, तुम्हारे आगे। यहां आए हो तो एक काम कर जाओ, अपनों के बीच आराम कर जाओ। बैंक लूटने के उपलक्ष में, हमारे पक्ष में आज की रात ठीक आठ बजे तुम्हारा भाषण है और तुम्हारे ही हाथों नए अड्डे का कल उदघाटन है। राजनीति एक संगठित लूट-तंत्र है। पूरे देश में राजनीति की आड़ में भ्रष्टखोरों की नूरा-कुश्ती-कबड्डी जारी है और रैफरी भी कोई नहीं।

”राजनीति”... यह खेल ठीक वैसा ही है जैसे सब चोर मिल कर विचार करें कि देश में चोरी कैसे बंद हो? भ्रष्टाचार कैसे बंद हो? अपराध कैसे बंद हो? सब एक-दूसरे की तरफ देखें, हंसें, मुस्कराएं, सभाएं करें, लंबे-लंबे भाषण करें और फिर अपने-अपने उसी काम-धंधे पर निकल जाएं। जैसे छिपकलियां रातभर हजारों कीड़े-मकौड़े खाकर सुबह होते ही दीवारों पर टंगी हुई देवी-देवताओं - संतों-महापुरुषों की तस्वीरों के पीछे जाकर छुप जाती हैं। ठीक यही चरित्र राजनैतिक दलों और राजनेताओं का है।   

राजनीति तो विध्वंस है, शोषण है, हिंसा है; शुद्ध डकैती है। डाकुओं के दल हैं। और उन्होंने बड़ा जाल रच लिया है। एक डाकुओं का दल हार जाता है, दूसरों का जीत जाता है; दूसरों का हार जाता है, पहलों का जीत जाता है। और जनता एक डाकुओं के दल से दूसरे डाकुओं के दल के हाथ में डोलती रहती है। यहां भी लुटोगे, वहां भी लुटोगे। यहां भी पिटोगे, वहां भी पिटोगे। राजनैतिक पार्टियां सिर्फ शोषण करती हैं। पांच साल एक पार्टी शोषण करती है, तब तक लोग दूसरी पार्टी के संबंध में भूल जाते हैं। फिर दूसरी पार्टी सत्ता में आ जाती है, पांच साल तक वह शोषण करती है, तब तक लोग पहली पार्टी के संबंध में भूल जाते हैं। यह एक बहुत मजेदार खेल है। होश पता नहीं तुम्हें कब आए! जिस दिन तुम्हें होश आएगा, उस दिन राजनीति दुनिया से उठ जाएगी; उस दिन राजनीति पर कफन ओढ़ा दिया जाएगा; राजनीति की कब्र बन जाएगी। 

मैंने सुना है कि जंगल के जानवरों को आदमियों का एक दफे रोग लग गया। जंगल में दौड़ती जीपें और झंडे और चुनाव! जानवरों ने कहा, हमको भी चुनाव करना चाहिए। लोकतंत्र हमें भी चाहिए। बड़ी अशांति फैल गई जंगल में। सिंह ने भी देखा कि अगर लोकतंत्र का साथ न दे तो उसका सिंहासन डंवाडोल हो जाएगा। तो उसने कहा, भई, हम तो पहले ही से लोकतंत्री हैं। खतम करो इमरजेंसी, चुनाव होगा। चुनाव होने लगा। अब बिचारे सिंह को घर-घर, द्वार-द्वार हाथ जोड़कर खड़ा होना पड़ा। गधों से बाप कहना पड़ा। एक लोमड़ी उसके साथ चलती थी, सलाहकार, जैसे दिल्ली में होते हैं। उस लोमड़ी ने कहा, एक बात बड़ी कठिन है। आप अभी-अभी भेड़ों से मिलकर आए और आपने भेड़ों से कहा कि तुम्हारे हित के लिए ही खड़ा हुआ हूं। तुम्हारा विकास हो। सदा से तुम्हारा शोषण किया गया है, प्यारी भेड़ो, तुम्हारे ही लिए मैं खड़ा हुआ हूं। आपने भेड़ों से यह कह दिया है। और आप भेड़ों के दुश्मन भेड़ियों के पास भी कल गए थे और उनसे भी आप कह रहे थे कि प्यारे भेडियो, तुम्हारे हित के लिए मैं खड़ा हूं। तुम्हारा हित हो, तुम्हें रोज-रोज नयी-नयी जवान-जवान भेड़ें खाने को मिलें, यही तो हमारा लक्ष्य है। तो लोमड़ी ने कहा, यह तो ठीक है कि इधर तुमने भेड़ों को भी समझा दिया है, भेड़ियों को भी समझा दिया है। और अगर अब दोनों कभी साथ-साथ मिल जाएं, फिर क्या करोगे? उसने कहा, तुम गांधी बाबा का नाम सुने कि नहीं? सुने, उस लोमड़ी ने कहा, गांधी बाबा का नाम सुने। तो उसने कहा, गांधी बाबा हर तरकीब छोड़ गए हैं। जब दोनों साथ मिल जाते हैं तब मैं कहता हूं, मैं सर्वाेदयी हूं? सबका उदय चाहता हूं। भेड़ों का भी उदय हो, भेड़ियों का भी उदय हो, सबका उदय चाहता हूं। जब अकेले-अकेले मिलता हूं तो उनको बता देता हूं, जब सबको मिलता हूं तो सर्वाेदयी की बात कर देता हूं। तुम अपने मन को जांचो। तुम बड़ी राजनीति मन में पाओगे। तुम चकित होओगे देखकर कि तुम्हारा मन कितना अवसरवादी है लेकिन तुम एक मजे की बात देखोगे, पार्टी कोई भी हो, कांग्रेस हों, भारतीय जनता पार्टी हो, पार्टी कोई भी हो, लेकिन सब कहेंगे कि महात्मा गांधी के अनुयायी हैं हम। कुछ बात है गांधी बाबा में। समय पर काम पड़ते हैं। कुछ तरकीब है। तरकीब है - अवसरवादिता के लिए सुविधा है। तो है। जब जो तुम्हारे अनुकूल पड़ जाता है, उसी को तुम स्वीकार कर लेते हो। जब जिस चीज से जिस तरह शोषण हो सके, तुम वैसा ही शोषण कर लेते हो। जब जैसा स्वांग रचना पड़े, वैसा ही स्वांग रच लेते हो।" 

सत्ता का खेल अजीबोगरीब है

आपका यह मंगरु कोई राजनीतिज्ञ नहीं है और न ही उसे राजनीति के बारे में a, b, c मालूम है। हाँ, इतना जरूर है कि उसके पास कच्चा-पक्का ढेर सारा अनुभव है। उसने अपनी निरीह आँखों से इन चिन्हों के उगते-डूबते सूरज को बहुत करीब से देखा है; यथा - मुर्गा, जोड़ा पत्ता और अब तीर-धनुष; जोड़ा बैल, गाय-बछड़ा और अब पंजा। इसके अलावे उसने टिमटिमाती दीये की लौ को भी बहुत करीब से देखा है। अब वह दीया फूल बनकर एक से तीन सौ पार करेगा, उसे विश्वास ही नहीं हो रहा है। उसे घोर आश्चर्य तो तब हुआ जब उसकी नींद खुली तो देखा कि केंद्र में तीन टर्म से उसकी सरकार चल रही है। बाकी कई राज्यों में भी उसकी सरकार है।

मंगरु झाखण्ड की कल-परसों की घटना को देखकर अत्यधिक विचलित हुआ जा रहा है। सुना है कि तथाकथित डूबते जहाज से कुछ कप्तान कूद गए हैं और वे अपना बेड़ा पार करने हेतु दूसरे जहाज पर सवार हो गए हैं। उनकी यात्रा मंगलमय हो! यह भी सुना है कि सत्ता का नशा अपरंपार है। यह नशा मरते दम तक उतरने का नाम ही नहीं लेता है। राजनीति के सामने नीतिविज्ञान फेल है। यह भी सच है कि अब मुर्गे का दौर समाप्त हो चुका है। मीटिंगों में कोई स्वयं जाता नहीं है बल्कि उन्हें ले जाना पड़ता है। जनता भी पैसे की भाषा को ही समझती है। हाय पैसा! चुनावी खर्चा हद से ज्यादा हो गया है। सत्ता पैसामय हो चुका है। और उस पैसे का जुगाड़ जनता को सूली पर टाँग कर ही प्राप्त किया जा सकता है। सोचो फिर दोनों विभीषणों ने कितने पैसों का डील किया होगा? इसीलिए कहा जाता है कि सत्ता का खेल जैसा दीखता है, वैसा वह है नहीं।

Saturday, 31 August 2024

अच्छे दोस्त की पहचान

कल और आज झारखण्ड में बिजली क्या कड़की, जो डरा वो भागते हुए नजर आए। कल एक तथाकथित टाइगर ने फूलवालों के घर में पनाह ले ली। उसने अपने पैतृक दल पर आरोप लगाया कि उसकी उपेक्षा हुई है। हो सकता है शायद उस नए आशियाने में उसकी आरती उतारी जायेगी। लेकिन इतना तो सच है कि अब तक उसे अपने पैतृक घर में जो इज्जत मिल रही थी, क्या वह बनावटी थी? उस घर ने उसे विधायक से लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचा दिया। क्या यह कम है? हो सकता है; शायद अब उसका प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा हो जायगा? और आज एक “कैंची” वाले ने भी फूलवालों के घर में शरण ले ली। आपने भी 25 वर्षों तक विधायक एवं मंत्री बनकर जनता की सेवा की है। तब आपकी आँखेँ पीछे की ओर रही होंगी, तभी आपको “बदलती डेमोग्राफी” नहीं दिखाई दे रही थी। कुछ भी हो; आप दोनों महानुभाओं को अग्रिम मुबारक हो! अब सवाल यह उठता है कि इस वक्त वास्तव में झारखण्ड जल रहा है। इस समस्या का समाधान सिर्फ नेताओं का नहीं है, बल्कि हमारा भी फर्ज बनता है। लेकिन आप दोनों तो अपनी इज्जत बचाने के चक्कर में आशियाना बदलते फिर रहे हैं। जनता आप दोनों को स्वार्थी नेताओं की श्रेणी में रख रहे हैं। कोई गलत उपाधि तो नहीं दे रहे हैं? क्योंकि बड़े बुजुर्ग भी कह गए हैं; “जो दुख की घड़ी में साथ दे, वही सच्चा दोस्त कहलाता है।"

Friday, 30 August 2024

डूबता जहाज या नूह की नाव?

सिदो-बिरसा के सपने को साकार करने हेतु आदिवासियों ने माराङ गोमके के नेतृत्व में जिस झारखण्ड पार्टी का गठन किया था, वह आंधी की तरह आया और तूफान की तरह चल बसा। कुछ आदिवासी शुभचिंतकों ने अलग प्रांत की मांग को जिंदा रखने की कोशिश की पर वे असफल रहे। फिर 1970 के दशक में गुरुजी का उदय हुआ। आप आदिवासी भावनाओं के साथ क्रीड़ा करने में सफल रहे। झारखण्ड आंदोलन का उतार-चढ़ाव होते रहा। लेकिन आश्चर्य तो तब हुआ जब आदिवासियों को अपना सपने का अलग प्रांत नसीब नहीं हुआ। फूलवालों ने इस मांग का अपहरण कर लिया। और इस तरह अलग झारखण्ड राज्य 15 नवंबर, 2000 को मिला। लेकिन खोदा पहाड़ निकली चुहिया, वह भी मरी हुई।

झारखण्ड मिले 24 वर्ष बीत चुके हैं। इस दौरान की कहानी आपके सामने है। यह सच है कि सिदो-बिरसा का सपना चकनाचूर हो गया। इसके लिए हमारे नेताओं को जितना दोष दिया जाय कम है। लेकिन इसके लिए हम भी कम जिम्मेवार नहीं हैं। हम वोट के बदले नोट एवं हँडिया-दारू के अत्यधिक लती व आदी हो चुके हैं। इस वक्त सभी सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं। हर तरफ घूसखोरी का आलम है। माफियाओं का राज कायम है। बेचारी झारखण्डी जनता बेमौत मरी जा रही है। वह नरक में जीने को मजबूर है।

आजकल झामुमो जिसकी राज्य में गठबंधन सरकार चल रही है, उसके बारे में जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं। कोई कह रहा है झामुमो एक डूबता जहाज है। सवारी कूदकर अपनी जान बचा रहे हैं। लेकिन इतिहास साक्षी है; जो भी इस जहाज से कूदा, वह मर-खप गया। या यों कहें की वह विलीन हो गया। कोई कह रहा है चिंटू-पिंटूओं ने झामुमो का हैजाक कर रखा है। आरोप-प्रत्यारोप लगाना बहुत आसान है। बांझ क्या जाने प्रसव की पीड़ा? नई पार्टी बनाना इतना आसान नहीं है।

आज वो देखो कोल्हन का शेर तथाकथित डूबता जहाज से कूद गया है। लेकिन कूदकर वह जिस दूसरे जहाज में सवार हो रहा है, वह तो इससे भी बड़ा खतरनाक है। अब उसका चड्डी-बनियान भी छीना जायगा। खासकर इस वक्त अगर आदिवासियों को धीमा जहर दिया जा रहा है, तो अब उनकी दिन-दहाड़े कत्लेआम होगी। अतः इस नादान मंगरु की सलाह यही है कि हो सकता है कि आपका भवन पुराना हो गया हो, इसे मरम्मत की जरूरत है। इतने आच्छादित मकान को क्यों तोड़ने के लिए लालायित हो रहे हो? नया आशियाना बनाना बहुत मुश्किल है। और दूसरा घर जहां जा रहे हो वह डाकुओं का बसेरा है। वहाँ आपका पनाह लेना खतरे से खाली नहीं होगा। अतः इस परिस्थिति में झामुमो डूबता जहाज है अथवा नूह की नाव? इस पर मंथन करना आपका कर्तव्य है।

Friday, 31 May 2024

 आओ चुनाव-चुनाव खेलें

यह कैसी विडंबना है कि आजकल धर्म-धर्म एवं चिकी-चिकी का खेल कुछ सुस्त-सा पड़ गया है। हो सकता है शायद लोकसभा चुनाव की बाढ़ उन्हें बहा ले गई होगी। यह सत्य है कि अभी तक धर्म और चिकी से किसी की क्षुधा नहीं मिट पाई है। हो सकता है; देश से इस चुनाव के वक्त जब धर्म-धर्म का खेल ही समाप्त हो गया, तो हमारे आंगने में इनका क्या काम? 

छठवें चरण का मतदान समाप्त हो गया है। अब सातवें और अंतिम चरण का मतदान 01 जून को होगा। देशभर का संपूर्ण नतीजा 4 जून 2024 को घोषित होगा। कहा जाता है कि साहब अपनी निश्चित हार को देखते हुए पगला गया है। वह अनाप-शनाप बकवास किए जा रहा है। छठवें चरण का मतदान आते-आते उसकी सारी चालें निष्क्रिय होती गई। यही वजह है कि अब वह किसी कोठे में मुजरे का मजा ले रहा होगा। 

इस बार का लोकसभा चुनाव बड़ा अनोखा रहा! इस तरह का चुनाव न कभी हुआ था और न ही कभी होगा। एक तरफ सारी सरकारी मशीनरी, तो दूसरी तरफ विपक्ष न होकर जनता सत्ता पक्ष का डटकर मुकाबला कर रही है। वाकई यह चुनाव अद्भूत है! इस चुनाव में साहब ने अपने आपको किसी भगवान का अवतार घोषित कर रखा है। इतना ही नहीं भगवान भी उनकी आरती उतारने को मजबूर हो गया है। इसीलिए तो "जो राम को लाये हैं, हम उनको लायेंगे" का डंका बज रहा है।

Whatsapp University में चुनाव का खेल खेलने में सभी तथाकथित छात्र-छात्राओं को बड़ा मजा आता है। आपके बुजुर्ग छात्र को भी यह खेल बड़ा सुहाता है। इस वक्त दुमका-राजमहल लोकसभा क्षेत्र आरक्षित है। याद रखना जिस दिन भी यह क्षेत्र सामान्य हो जाएगा, फिर समझो आपका यह चुनाव चुनाव का खेल भी समाप्त हो जाएगा। इसलिए कबीर दास सही कह गए हैं - "कल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय होएगी, बहुरि करोगे कब?"

ज्ञात हो कि दुमका-राजमहल से जहां इंडिया गठबंधन और एनडीए के बीच कांटे का टक्कर है, तो वहीं दूसरी ओर झामुमो को अपने ही मीरजाफरों से दो-दो हाथ करने पड़ रहे हैं। दुमका से जामा की वर्तमान विधायक बागी बनकर कमल फूल सूंघ रही है। वह अपने ही ससुराल वालों को आईना दिखाने में जुट गई है। जनता से उनकी एक ही अपील है कि उसे ही भारी से भारी मतों से जीताएं, ताकि वह ससुराल वालों से बदला ले सके।

दूसरी ओर राजमहल के झामुमो विभीषण बोरियो विधायक ने अपने ही राज में आक्रमण कर दिया है। उनका एक ही आरोप है कि वर्तमान राजा ठीक नहीं है। वह दस वर्षों से भगौड़ा और लापता हैं। इसलिए वह कहता है कि जीत जाने पर वह घर-घर विकास को पहुंचा देगा।

इस तरह विभिन्न छात्र-छात्राओं का थीसिस अलग-अलग है। उनके बारे में ज्यादा कुछ कहना उचित नहीं। सुना है; वर्षों पहले कुछ मीरजाफर, जयचंद, विभीषण, मुनिया मांझी भी पार्टी छोड़कर चले गए थे। कुछ तो शाम को घर वापस लौट आए थे पर कुछ गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं।

मंगरु को किसी से कोई लेना-देना नहीं है। पर इतना तय है कि Whatsapp University में बहुत तरह के मतभेद हो सकते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अब समय बहुत बदल चुका है। आपको वक्त की नजाकत को पहचानना ही होगा। कभी अंधेरे में तीर मत चला देना।

विशेषकर युवकों से अपील है। हूल हुआ संताल परगना मिल गया, झारखण्ड आंदोलन हुआ और अलग झारखण्ड राज्य भी मिल गया। पर हम आदिवासियों की हालत अभी भी जस की तस बनी हुई है। इसके एक नहीं हजार कारण हो सकते हैं। इस चुनाव में सिर्फ बदलाव मात्र से समाज का कोई भला होने वाला नहीं है। इस बरसात में सिर्फ मेढ़कों का टर्र-टर्र करने मात्र से भी कोई लाभ नहीं है। अगर वास्तव में आपको समाज की चिंता है, तो अविराम फुल टाईमर के रूप में अभी और आज से लोगों के बीच सामाजिक चेतना जगाने के लिए दिन और रात एक करना होगा। आपको समाज उत्थान के लिए पूर्व में ही ब्लूप्रिंट और रोड मैप तैयार करना होगा। वरना आओ चुनाव-चुनाव का खेल खेलें।

Thursday, 23 May 2024

जिसकी लाठी उसकी भैंस

न चाहते हुए भी मंगरु को अपना मुंह खोलना पड़ रहा है कि इस वक्त संतालों की आधी जमीन परायों के हाथों चली गई है। क्यों? कानून तो कहता है कि एसपीटी एक्ट के तहत संतालों की जमीन की खरीद-बिक्री नहीं हो सकती है। फिर भी क्यों संतालों की जमीन को हड़पा जा रहा है? इसके कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण तो यही है - ”मियां-बीबी राजी तो क्या करेगा काजी।“ अब दुनिया बदल चुकी है। हर परिवार में एक चमकता हुआ एंड्रोयड फोन की जरुरत है। समय को देखते हुए घर में मोटर साईकिल की मांग भी बढ़ती गई है। आमदनी आठन्नी, खर्चा रुपैया वाली बात हो गई है। समय की मांग को देखते हुए आधुनिक आवश्यकताओं की पूर्ति किस तरह हो, एक बहुत बड़ी समस्या मुंह बांयें खड़ी है। कोई और उपाय न देख, चलो अपनी अचल संपत्ति पर ही अपना हाथ साफ कर लें। मना करने पर, नोट कर लो आपकी एक भी दलील चलने वाली नहीं है। अब इसमें किसी भी राजनीतिक दल का क्या कसूर? इस समस्या से आपका भगवान भी आपको नहीं बचा पाएगा।

चुनाव का माहौल है। मतदान की तारिख नजदीक आ रही है। दुमका-राजमहल से खड़े उम्मीदवारों की सांसे फूली हुई हैं। सभी अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। हर गली-कूचों की जनता के बीच राजनीतिक बहस छिड़ी हुई है। हर किसी उम्मीदवार पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। हर व्यक्ति अपनी पीड़ा का ठीकरा अपने विधायक/सांसदों पर फोड़ रहा है। सच देखा जाय, तो जितनी गलियां राजनीतिज्ञों को दिया जाता है, शायद ही किसी और को दिया जाता हो।

सत्ता का नशा बादशाहों को मतवाला बना देता है। वे सत्ता वापसी के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाते हैं। वे सरकारी मशीनरियों का दुरुपयोग करने से बाज नहीं आते। कभी-कभी वे अपने ही बुने हुए जाल में फंस जाते हैं। उदाहारणार्थ - इलेक्ट्रोल बॉण्ड। सुना है; सत्ताधारियों ने कोई धुलाई मशीन की ईजाद की हुई है। इस मशीन की हैसियत बहुत अनोखी है! लोग कहते हैं, जितना भी बड़ा भ्रष्टाचारी क्यों न हो, इस मशीन में धुलाई के उपरांत वह दूध-सा उज्जवल चमकने लगता है। वाह री, मोती धुलाई मशीन!

आपने सुना होगा। सत्ता में आसीन बादशाह का हुक्म हुआ - "जाओ, विपक्ष के सभी सदस्यों को अपने खेमे में शामिल कर लो। इससे हमारी शक्ति मजबूत होगी।"

"हुजूर अनार्थ हो जाएगा। वे सभी महा भ्रष्टाचारी हैं।"

"कोई बात नहीं। उन्हें हमारी धुलाई मशीन में नहला दो। जाओ, हमारा मुंह क्या ताक रहे हो?"

"हुजूर उनका क्या करें, जो उस मशीन में नहाने से मना कर दे?"

"उन्हें सलाखों के पीछे धकेल दो। कितनी बार समझाया? समझ में नहीं आता है क्या?"

थानेदार मुंह लटकाये चला गया। उसने आव देखा न ताव, एक आदिवासी मुख्यमंत्री को अकारण ही पकड़ कर जेल में ठूंस दिया। बेचारा शरीफ आदिवासी चुपचाप त्यागपत्र देकर जेल चला गया।

इसके बाद बादशाह का हुक्म हुआ - "दिल्ली का मुख्यमंत्री बहुत फड़फड़ा रहा है। चुनाव में वह हमारा मटियामेट कर देगा। अतः उसे भी जेल में ठूंस दो।" और इस तरह थानेदार ने बादशाह की आज्ञा का पालन किया। लेकिन दिल्ली के सीएम ने हुंकार भरी - "तू डाल-डाल, तो हम पात-पात। हम रिजाईन नहीं करेंगे।"

देशभर में विपक्षी दलों को परेशान करने का सिलसिला जारी है। बादशाह की इच्छा जो चाहे वह कर रहा है। देश की संपत्ति को बेच दो और वह बेच रहा है। वह संविधान, आरक्षण, लोकतंत्र सबकुछ बेच देना चाहता है। वह जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली कहावत को चरितार्थ करने पर उतारु हो गया है। इंडिया गठबंधन उस बादशाह का जोरदार विरोध कर रहा है। चुनाव विश्लेषकों की मानें, तो बादशाह 400 नहीं 140 सीट पर अटक रहा है।

दुमका-राजमहल से भी इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार कमर कस कर मैदान में आ डटे हैं। बादशाह के चेले भी रणक्षेत्र में है। इसमें आश्चर्य की बात यही है कि कुछ निर्दलीय उम्मीदवार बदलाव चाहते हैं। उनका मनिफेस्टो क्या कहता है, यह तो राम जाने। पर वे अकेले ही संविधान एवं आरक्षण को बचा लेने का दंभ भर रहे हैं। आइए, 4 जून 2024 का इंतजार करें।

Sunday, 12 May 2024

करो या मरो

दुनिया में राजनीति का नशा बड़ा ही अद्भूत है। एक पैर कब्र पर है, फिर भी यह नशा उतरने का नाम नहीं लेता है। जिस तरह दर्जी का बेटा दर्जी, कुम्हार का बेटा कुम्हार उसी तरह यह पेशा भी खानदानी बन जाने का रिवाज है। 

देश में तीसरे चरण का मतदान हो चुका है। 13 मई 2024 को चौथे चरण का मतदान होना है। अब तक सभी चरणों में मतदान करने वालों की संख्या गिर गई है। आखिर ऐसा क्यों? इस संबंध में सौ बात की एक बात लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठना बताया जा रहा है। उनके अनुसार सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे होते हैं। उनकी दलील है कि इस बार तुम लुट लो, फिर हमें अगले पाँच साल बाद लुटने का मौका दो। यह सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। परंतु यह भी सच है कि अधिक दिनों तक जमा किया हुआ पानी जरुर गंदा होता है, अतः इसकी सफाई बहुत जरुरी है। एवं उस तालाब पर नये जल का भराव अत्यावश्यक है। इसे ही एंटीइनकॉम्बेन्सी कहा जाता है।

विश्वास बहुत बड़ी चीज है। अगर विश्वास ही उठ गया, तो सबकुछ का सत्यानाश तय है। आजकल ईव्हीएम द्वारा मतदान का प्रावधान है। ईव्हीएम एक मतदान करने की मशीन है। उस पर आरोप लगते रहा है कि उस मशीन को अपने मनमुताबिक सेट किया जा सकता है। आरोपकर्ता की दलील है कि उसे इस तरह सेट किया जा सकता है कि अगर उस मशीन में दस वोट पड़ा, तो छः वोटों को अपने खाते में आसानी से परिवर्तित किया जा सकता है। लो कर लो बात। कुछ भी चिल्लाते रहो। जीत तो उसी की होगी, जिसके पास लाठी है। 

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अब देश में गरीबों की संख्या 84 करोड़ हो गई है। यह जनसंख्या सिर्फ पाँच किलो सरकारी राशन पर जीवित है। यह भी सच है कि आने वाले दिनों में इनकी संख्या घटेगी नहीं, बल्कि बढ़ती ही जायगी। देश में नौकरी करने की सुविधा गायब हो गई है। वंचित एवं दबे-कुचले लोग अब आसमान से गिरे तो खजूर पर अटक गए हैं। उनकी आरक्षित सीट घटा दी गई है। उन्हें अपने हाल में जीने के लिए अवारा छोड़ दिया गया है। देश की सरकारी संपत्तियों को धड़ल्ले से बेचा रहा है। और जैसे कि आपको मालूम है कि प्राईवेट संस्थानों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। बेचारा आरक्षित वर्ग आखिर जांय तो कहाँ जांय?

देश के संविधान पर भयानक खतरा मंडरा रहा है। बीते दिनों इसे संसद भवन के समीप जलाया गया। जगह-जगह आरक्षण का विरोध किया जा रहा है। इस बात की पुष्टि भी हो चुकी है कि सत्तापक्ष के लोकसभा उम्मीदवारों ने चार सौ पर लाने की दुहाई देते हुए संविधान को बदलने की वकालत कर डाली है। इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि वह दिन दूर नहीं जब देश से लोकतंत्र एवं संविधान का नामोनिशान मिट जाएगा।

अतः अब देश में "करो या मरो" की स्थिति आ गई है। अगर आपसे किसी तरह की चूक हो गई, तो यह आपका अंतिम मतदान होगा। इसके बाद देश जल रहा होगा और साहब बांसुरी बजाने में मस्त होंगे। तब तक देश खण्ड-खण्ड हो जायगा। 

Sunday, 5 May 2024

मान लो; संविधान बदल गया?

तर्क विज्ञान के कई नियमों में यह भी एक नियम है कि जहां धुआँ उठे, समझो वहां आग है। इसका मतलब अगर वहां धुआँ हो, तो वहां आग होने की पूरी-पूरी संभावना से कोई नहीं इंकार कर सकता है। धुआँ और आग में चोली-दामन का साथ है। बगैर धुआँ आग की कल्पना हो ही नहीं सकती है। इसका अर्थ यही हुआ कि भाजपा एवं उसके सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक गाहे-बगाहे यह जो संविधान बदलने की बात उठाते हैं, यह सत्य प्रतीत होता है। इसी चुनाव में भाजपा के कुछ उम्मीदवारों ने साफ तौर पर कह दिया है कि उन्हें 400 पार करा दो, वे संविधान अवश्य बदल देंगे। और तो और वे खुलेआम संविधान को जलाते हैं। उनके समर्थक एससी/एसटी/ओबीसी मुर्दाबाद के नारे लगाते हैं। यह सब धुआँ क्यों उठ रहा है? इसका मतलब साफ है कि वहां आग लगी हुई। वे संविधान बदलने को उतारु हैं।

भारत देश सन् 1947 को आजाद हुआ। बाबा साहब डॉ भीमराव आम्बेडकर की अगुवाई में लिखे हुए इस संविधान को 1949 में हम भारत के लोगों ने उसे अंगीकृत किया। और इसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया। कुछ संशोधनों के साथ फिलहाल इसमें 25 भाग और 448 अनुच्छेद हैं। भारत का संविधान दुनिया के सर्वोत्तम संविधानों में से एक है। परंतु इतना उच्च कोटि का संविधान रहते हुए भी कुछेक घटनाओं को देखकर मन बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर हो जाता है। संविधान के अनुसार भारत का हर नागरिक बराबरी का हक रखता है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है। इस देश में छुआछूत के लिए कोई जगह नहीं, उसे सदा के लिए मिटा दिया गया है। हर नागरिक को मौलिक अधिकारों से सुसज्जित किया गया है। फिर भी हमारे वर्तमान महामहिम राष्ट्रपति के साथ ऐसा तुच्छ भेदभाव क्यों? इसके पूर्व में भी कई दलित नेताओं के साथ ऐसा ही भेदभाव किया गया है। ऐसा क्यों? इसके अलावे भी दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने पर मनाही क्यों? इस तरह के कई उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं।

अब सवाल उठता है मान लो; संविधान को बदल दिया गया, फिर क्या होगा? क्या होगा? ये जो चुनाव-चुनाव हमलोग खेल रहे हैं, सब खत्म। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। न तुम्हारे विधायक होंगे और न कोई सांसद। पंचायत चुनाव में भी आपकी कोई भागीदारी नहीं होगी। सरकारी आरक्षण खत्म हो जायगा। राजनैतिक हो अथवा सरकारी नौकरी, सब समाप्त। याद रखना, सदियों से दबाए गए दलित फिर वहीं पहुंच जाएंगे, जहां से वे आये थे। सभी दलित गले में हांड़ी और कमर में झाड़ू टांगते हुए नजर आएंगे। महिलाओं को स्तन ढांकने की आजादी नहीं होगी। जिस दलित को शिक्षा ग्रहण करने का भूत सवार हो, उनके कानों में पिघलते हुए शीशे डाले जाएंगे। दलित गुलामगीरी करने के लिए मजबूर हो जाएंगे। पक्का सबूत के तौर पर अभी देख लेना। लोकसभा सामान्य सीट से उम्मीदवारी करके देख लेना। वहां से बाहरी जीत सकता है, पर आपकी पूछ नहीं के बराबर होगी। 

सवाल यह नहीं है कि जब संविधान बदलने की घड़ी आएगी, फिर देखा जाएगा। आग लगने पर कुआँ खोदना कहां की बुद्धिमानी होगी? आदिवासी विरोधी मानसिकता वाले को कौन नहीं जानता है? 1977 से पहले वे ”दीया“ दिखाया करते थे। इसके बाद उनके हाथ में "कमल फूल" उग आया। तब से वे धीरे-धीरे सत्तासीन होते गए। और अब तो वे 10 वर्षों से हमारे सिर पर सवार हो गये हैं। उनके काले करतूतों के बारे में इतना ही काफी है कि वे आपको "वनवासी" के नाम से पुकारते हैं एवं धर्म की घूंट पिलाते हैं।

एसपीटी एक्ट इतना सख्त कानून रहते हुए भी किसने मनुवादियों को अपने इलाके में प्रवेश करने की अनुमति दी? उन्हें किसने आमंत्रण दिया? सिर्फ राजनीतिज्ञों को दोष देने मात्र से आपकी समस्या नहीं सुलझ सकती है। इसके जिम्मेवार आप स्वयं हो। यहां "मियां बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी" वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। आपके इलाके में इतने सारे पत्थर एवं कोयला खदान के स्वामी कौन लोग हैं। सारे के सारे मालिक मनुवादी हैं। 

चालू लोकसभा चुनाव में वे किस तरह की चाल चल रहे हैं, आप पूर्णतः अनभिज्ञ मालूम पड़ते हो। पूरे देश में एक ओर संविधान बचाने वाले खड़े हैं, तो दूसरी ओर इसको बदलने वाले 400 पार का नारा दे रहे हैं। साफ शब्दों में कहा जाय, तो राजमहल की सीट किसकी झोली में जाती है, देखना बड़ा दिलचस्प होगा।  आपकी सावधानी हटी, तो दुर्घटना घट सकती है। पछताने से कोई लाभ नहीं, जब चिड़िया चुग गई खेत।

Saturday, 4 May 2024

अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता

यह लेख लिखने तक लोकसभा-2024 चुनाव के चौथे चरण का मतदान हो रहा है। आपका यह मंगरु कोई चुनाव विश्लेषक नहीं। वह सिर्फ इतना जानता है कि देश में चुनाव दो दलों के बीच हो रहा है - इण्डिया गठबंधन तथा एनडीए। इन गठबंधनों से मंगरु को क्या लेना-देना? आग लग जाए ऐसे गठबंधनों को। इससे हमें क्या फर्क पड़ता है? कोई राजा बने या रंक? हमें इससे क्या मतलब? देश में तानाशाही आए या प्रजाशाही? रोजगार-नौकरी मिले या पकौड़ा तलना पड़े? महंगाई आसमान भी छू ले। हमें तो बस अपने हाल ही में जीना है। संविधान मरे-जीये, आरक्षण खत्म हो जाए। हमारा क्या जाता है? जिसका जाता है, वो लड़े। हमें किसी से कोई मतलब नहीं। हमें न उधो का देना और न ही माधो का लेना। इन 75 सालों में बहुत देख लिया। देखो न, मुर्गे ने बांग दी और हम उधर हो लिए। जोड़ा पत्ता आया। हमने उसपर खूब खाना खाया। अब तीर-कमान का जमाना आ गया है। हम आदिवासी जो ठहरे। एकलव्य हमारा आईकॉन है। और हम तीर-कमान के शिकार हो गए। उजड़े वन-जंगलों में शिकार करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

चुनाव का मौसम है। सड़क किनारे गांव है। और उस गांव के सड़क किनारे मंगरु की छोटी-सी झोपड़ी है। रोज कोई न कोई किसी पार्टी के चुनाव प्रचारकों से भेंट-मुलाकात हो ही जाती है। कल की ही तो बात है। गोधूलि का बेला था। कोई नेता जी अपने लव-लश्कर के साथ आपके इस गरीब मंगरु की झोपड़ी में दर्शन दे गए। "बैठिए-बैठिए। बैठिए नेताजी।" यह सुनते ही नेताजी के सभी छोटे-बड़े चमचे अपने आंगने में घुस आए। उनलोगों को बिठाने की बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई। खैर, झोपड़ी में आदम जमाने की कुर्सी पड़ी थी। उसे नेताजी की तरफ खिस्का दी गई। बाकी लोग ईश प्रदत्त कुर्सी पर तशरीफ रख दिए। देखते ही देखते गांव के तमाम लोग इस झोपड़ी की ओर दौड़े चले आए। अच्छी-खासी भीड़ एकट्ठी हो गई। नेताजी को बिन मांगे मोती मिल गई। उम्र का लिहाज रखते हुए सभी समाज सुधारकों ने "डो़बो़क्" किया। दुआ-सलाम के बाद नेताजी ने बात बढ़ाते हुए कहा - "भाईयो तथा बहनो! इधर से गुजर रहा था। याद आई आपकी मंगरु बाबा की। इनकी उम्र बढ़ चली है। सोचा, क्यों न इनसे आशीर्वाद लिया जाय? देखिए, मैं इस राजमहल सीट से एक आजाद उम्मीदवार के रूप में आपकी खिदमत में पेश हूं। विगत दस वर्षों में आपके लिए कुछ भी नहीं हुआ है। मैं आपके लिए टेण्डेण्सी एक्ट, पेसा एक्ट, खतियान एक्ट सब लागू करके रहुंगा। मैं गुरुजी का पक्का चेला हूं। अतः आप हमें गुरुजी के नाम पर भारी से भारी मतों से विजयी बनावें ...।

यह छोटी-सी मुलाकत यहीं समाप्त हो गई। मंगरु ने मेहमानों को अंतःमन से लाल चाय पिलाई। नेताजी बहुत खुश थे। अतः जाते-जाते उसने प्रधान के हाथ में एक मोटा-सा लिफाफा थमाते हुए कहा - "मेरी तरफ से यह एक छोटी-सी भेंट है। ध्यान दीजिएगा।"

गांव वाले समझ गए थे कि नेताजी गुरुजी के चेले हैं। अतः उन्हें गुरुजी के चुनाव चिन्ह पर वोट देकर उनका हाथ मजबूत करना है। पर मंगरु यह पूछना तो भूल ही गया कि आपके पच्चीस वर्षों की विधायकी/मंत्री पद का हिसाब-किताब कौन देगा? आपकी मांगें तब क्यों नहीं पूर्ण हुई? आप अकेले इतनी बड़ी लोकसभा में कुछ कर पाओगे? या यह भी कोई जुमला ही साबित होगा? और तो और इतने मोटे-मोटे लिफाफे का स्त्रोत कहां है? कुबेर का हाथ कहां लग गया? वाह री माया!

Friday, 3 May 2024

 अब कौन होगा दलितों का तारणहार?

जिन्हें हम भगवान मानते हैं, जब वे अपने आपको बचा न पाये, तो हम किस खेत की मूली हैं। कोई मानव प्राणी इस दुनिया में सदा रहने के लिए नहीं आया है। इस धरा पर आने का कुछ पता नहीं, पर जाना निश्चित है। हम-तुम बस इस लेख पर विचार-मंथन करते रहेंगे। और एक दिन हम भी चल बसेंगे। बापू नहीं रहे, बाबा नहीं रहे, सिदो-कान्हू भी नहीं रहे। बाबा साहब जिन्होंने इतना अच्छा संविधान दिया, सब चले गए। पर उनकी कृति हमें बहुत कुछ बता रही है। 

जिन अंग्रेजों ने दलितों को जीवनदान दिया, उन अंग्रेजों को मनुवादियों द्वारा जी भरकर गाली देना कहाँ की इंसानियत है? यह समझने वाली बात है। मनुवादी अंग्रेजों को गाली क्यों दे रहे हैं? वे इसलिए गाली दे रहे हैं क्योंकि अंग्रेजों ने मनुवादियों के गुलामों को मुक्ति दिलाई है। इसके सिवा और कोई कारण ही नहीं है। इस मसले को आप इस तरह भी समझ सकते हैं। कानून की भाषा में या यों कहें उचित निर्णय देने हेतु जज को निष्पक्ष होना अति आवश्यक है। यह सौ फीसदी सच है कि निष्पक्ष हुए बगैर कहीं भी और किसी भी मामले में उचित फैसला हो ही नहीं सकता है। जिस देश में सदियों से दलितों को सताया जा रहा हो, उन्हें गुलाम बनाया जा रहा हो, उनपर बेतहाशा अत्याचार किये जा रहे हों और तो और उन्हें तमाम तरह के मानवाधिकार के अंतर्गत मिलने वाली सुविधाओं से भी वंचित किये जा रहे हों, तो इनका न्यायाधीश किसे नियुक्त किया जाय, ताकि पीड़ितों को प्राकृतिक न्याय मिल सके? इस भारत देश के साथ यही हुआ है। यहाँ मनुवादियों का साम्राज्य था। ये सदियों से शूद्रों को प्रताड़ित करते आ रहे थे। भगवान ने शूद्रों की सुनी। और उसने अपने प्रतिनिधि के रूप में अंग्रेजों को भारत भेजा। अंग्रेजी काल में भारत में क्या हुआ? इसे आप अच्छी तरह परिचित हैं। सार यही है कि अंग्रेजों ने मनुवादी साम्राज्य को ध्वंस कर दिया। जज बनकर शूद्रों को उचित निर्णय दिया। अंतोगत्वा भगवान द्वारा आवंटित काम को अंजाम देने के पश्चात् वे सन् 1947 को अपना घर वापस लौट चले। साथ ही वे अपने होनहार छात्र डॉ भीम राव अम्बेडकर को भारत का संविधान लिखने के लिए तमाम तरह के नोट्स देकर इस देश से बिदा हो लिए।

भगवान द्वारा प्रेषित निष्पक्ष जज अंग्रेज पुनः मनुवादी को भारत की सत्ता सौंपकर अपने वतन को लौट चले। अब शूद्रों का क्या होगा? शूद्रों का वही होगा जो मंजूरे खुदा। यही सच है कि भारत के हर नागरिक को संविधान के अनुसार चलना चाहिए। लेकिन बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस वक्त मनुवादियों के फन उठने लगे हैं। मनुवादियों द्वारा गाहे-बगाहे इसकी आलोचना करना एक बहुत बड़ा अशुभ संदेश है। जिस तरह संविधान की धज्जियां उड़ रही हैं, वह आपके सामने है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। अब यहाँ के सत्ताधीश किसी एक धर्म विशेष को ही बढ़ावे दे, यह कहीं से भी शोभा नहीं देता है। पूरी सरकारी मशीनरी प्राण प्रतिष्ठा में लग जाय, तो इसे क्या धर्मनिरपेक्ष कहा जा सकता है? इसी तरह आरक्षण को समाप्त करने हेतु सभी सरकारी संस्थाओं को ही बेच देना, कहाँ तक उचित है? ईडी, चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट जैसी स्वतंत्र निकाय, अब सरकार के दिशा निर्देश पर काम करे, तो दाल में कुछ काला जरुर नजर आता है। इस हालात में अब कौन होगा दलितों का तारणहार? मामला सोचनीय है।

Thursday, 2 May 2024

"अफीम" की खेती को नष्ट करो

कहा जाता है; भाजपा केन्द्र में नफराती करतूतों एवं जनता को धार्मिक "अफीम" का घूंट पिलाकर सत्ता में आई थी। शुरुआती दौर में इस पार्टी का नाम जनसंघ था। इनका चुनाव चिन्ह "दीया" था जो अब "कमल फूल" में तब्दील होकर भाजपा के रूप में विकसित हो गई है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक भाजपा की रीढ़ मानी जाती है। भाजपा ने देश में धार्मिक उन्माद फैलाया, हिन्दु-मुसलमान करते रहा और इस तरह देश को एक जलती भट्टी में झोंक दिया। सार यही है कि भाजपा ने धर्म की आड़ में देश का सत्यानाश कर रखा है। लोगों का आरोप है कि इव्हीएम ने सत्तासीन लोगों की खूब मदद की है। लोग तो इतना तक कहते सुने गए हैं कि ईव्हीएम की चोरी में दस वोट डालो तो छः वोट भाजपा की झोली में जाना तय माना जाता है। यह सिलसिला विगत दस वर्षों से चला आ रहा है। अब देश की जनता ने मन बना लिया है कि ऐसी तानाशाह सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने में ही भलाई है।

इतिहास बताता है कि जब से देश में लोकतंत्र के तहत मतदान की प्रक्रिया चली आ रही है, तब से झारखण्ड खासकर संताल परगना के आदिवासियों को चुनाव की महत्ता समझ में आई है। जनता बहुत दिनों तक "दीया" तो दूर "कमल फूल" से अनभिज्ञ थी, पर वे "मुर्गा", "जोड़ा पत्ता" हो या "तीर-धनुष" उनको अच्छी तरह पहचानती है।

थोड़ी देर के लिए इतिहास में जो घटना घटी, उसे भूल जाओ। कारण, उसे याद कर आंसू बहाने से रंचमात्र भी कोई लाभ नहीं, बल्कि वर्तमान में जो कुछ भी हो रहा है, उस पर विशेष ध्यान देने की जरुरत है। पूरे देश में चुनाव का महापर्व है। अतः क्यों न इस पर कुछ चर्चा किया जाय?

दुमका लोकसभा 2024 (अजज) की सीट का ही आंकलन किया जाय। भाजपा ने इस सीट से सीटिंग सांसद सुनील सोरेन के हाथ में टिकट देने के बाद अब उस सीट से जेएमएम की बागी सीता मैया को अपनी धुलाई मशीन में नहलाने के बाद उम्मीदवार बना दिया है। ज्ञात हो कि सीता मैया 15 वर्षों तक अपने ससूर शिबू सोरेन की पार्टी जेएमएम की बैसाखी पर सत्ता सुख भोग चुकी है। कारण कुछ भी हो, पर भाजपा वालों को जेएमएम को तोड़ने के लिए सीता मैया से कोई दूसरा अच्छा उम्मीदवार नहीं दिखाई दिया। इसीलिए सुनील सोरेन के मुंह से रोटी छिनकर सीता मैया को दी गई है। ज्ञात हो कि दुमका में भी इंडिया गठबंधन एवं भाजपा के बीच ही मुकाबला है। बाकी सभी उम्मीदवार वोट कटुवे ही साबित होंगे। 

सीता मैया को जिस तरह विधानसभा जामा की जनता से कोई लेना-देना नहीं था, उसी तरह उन्हें दुमका लोकसभा की जनता से भी कोई सरोकार नहीं होगा। वह अपने परिवार की आपसी कलह को चुनावी मुद्दा बनाकर मैदान में कूद पड़ी है। उसने घोषणा कर रखी है कि जीत जाने पर वह अपने पतिदेव की रहस्मय मौत को सीबीआई से जांच करवायेगी। दूसरा वह भाजपा के हिन्दुत्व के मुद्दा को आगे बढ़ाएगी, तभी तो उसने जय श्रीराम का उद्घोष करते हुए पार्टी में प्रवेश किया है। अगर उसकी गाड़ी ठीक चल पड़ी, तो अपनी दोनों बेटियों के लिए जामा-दुमका आरक्षित रखी हुई है। दुमका के बाकी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो जाएगी।

कमोवेश दुमका-राजमहल का वोट पैटर्न वही रहेगा। अगर दोनों जगहों के उम्मीदवारों को देखा जाय, तो दुमका के जेएमएम उम्मीदवार नलिन सोरेन शिकारीपाड़ा से सातवीं बार विधायक रहे हैं। जबकि सीता मैया भी तीसरी बार जेएमएम से जामा की विधायक रही हैं। दूसरी ओर राजमहल लोकसभा से जेएमएम के उम्मीदवार विजय हाँसदाक् हैट ट्रिक लगाने जा रहा है। वहीं भाजपा उम्मीदवार ताला मराण्डी भी एक बार बोरियो विधानसभा से भाजपा विधायक रह चुके हैं। इस क्षेत्र के जेएमएम के वर्तमान बागी विधायक लोबिन हेम्बरोम भी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूर्ण करने हेतु निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में होंगे। इनका घमंड भी शीघ्र ही धराशायी हो जायेगा। यहाँ भी बाकी उम्मीदवरों की जमानत जब्त होगी।

सार यही है कि दुमका-राजमहल से जिन्हें धर्मनिरपेक्ष देश पसंद है, वे सभी इंडिया गठबंधन के उम्मीदवारों को जीताने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। और इस तरह "अफीम" की खेती को नष्ट कर देंगे।

Wednesday, 1 May 2024

 कथनी और करनी ...

"कोशिश करने पर भी अगर सफलता न मिलती हो, तो समझो कोशिश करने में कोई खोट अवश्य है।" यह सिद्धांत हम संतालों के विकास में अक्षरशः लागू होता है, नहीं तो क्या कारण हे कि तीन-तीन बार अलग प्रदेश मिलने के बावजूद भी मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक ही सीमित रही। संताल हूल के परिणामस्वरुप संताल परगना मिला, भारत देश गुलामी से आजाद हुआ और आज से ठीक 24 वर्ष पूर्व अलग झारखण्ड राज्य भी मिला। फिर भी खोदा पहाड़ निकली चुहिया, वह भी मरी हुई। इसका मतलब हमारी कोशिश में कोई न कोई खोट अवश्य रहा होगा।

चुनावी मौसम है, अतः सोशल मीडिया में राजनीति पर बरसाती मेढ़कों का टर्र-टर्र होना स्वाभाविक है। राजनीति एवं राजनीतिज्ञों पर चर्चा करना लाजिमी हो जाता है। घर बैठे सोशल मीडिया पर राजनीति के बारे सुतर्क-कुतर्क करना अंतःमन की खुजली को अवश्य मिटा देता है। लेकिन, ध्यान रहे, उन्हें इंगित करने पर तीनों उंगलियां अपनी ही ओर इशारा कर रही हैं। 

इस चुनावी मौसम में राष्ट्र के बड़े-बड़े नेता इधर से उधर पल्टी मार रहे हैं। हम झारखण्डी नेता उनके सामने किस खेत की मूली हैं? उनकी आंच हम पर भी पड़ेगी, निश्चित है। लोबिन हेम्बरो़म, सीता सोरेन सरीखे नेताओं की उनकी अपनी मजबूरी होगी। वे गये, तो कौन-सा पहाड़ टूट गया? हमारे मतदाताओं को किस श्रेणी में रखा जाय? यह एक अति विचारणीय तथ्य है। क्या वे देश-दुनिया की समस्याओं से वाकिफ हैं? क्या उन्हें आपनी खुद की समस्या के बारे में कुछ पता है? शायद नहीं। जिस एसपीटी एक्ट के बारे में हम दहाड़ मार रहे हैं, क्या हमारे मतदाताओं को उससे कोई सरोकार है? उस एक्ट के बारे में अगर उन्हें खाक भी पता न हो, पर उन्हें यह तो अच्छी तरह पता है कि संतालों की जमीन न तो वे (संताल) बेच सकते हैं और न ही कोई गैर संताल उनकी जमीन को खरीद सकता है। फिर भी संतालों ने अब तक अपनी आधी जमीन को बेच चुका है। क्यों? लैण्ड पुलिंग से मतदाता वाकिफ हैं अथवा नहीं, क्या पता।  सार यही है कि हम संताल सिर्फ एक समस्या से जूझ रहे हैं, ऐसी बात नहीं है। हमारी हजार तरह की समस्याएं हैं। सर्वप्रथम किस समस्या को सुलझाया जाय, इसकी प्राथमिकता निर्धारित करना अति कठिन कार्य है। तीर-धनुष चले या कमल फूल खिले हमारे नादान वोटर्स को क्या फर्क पड़ता है। उन्हें तो "खायेंगे-पीयेंगे और मस्तपूर्वक जीयेंगे" से फुर्सत ही कहाँ?

समय के साथ बहुत कुछ बदल चुका है। सिर्फ व्हाट्सअप पर उंगली फेर देने मात्र से कुछ नहीं होने वाला है। राजनीति पर बहस जरुरी है। पर इस पर मनमुटाव गलत है। कहने के लिए बड़ी-बड़ी बातें कही जा सकती हैं, पर उसे धरातल पर ला सकना उससे भी और कठिन कार्य है। कहा गया है कि कथनी और करनी में जमीन-आसमान का फर्क है। हेल्दी बहस जारी रहे, इससे सुदूर बैठे मंगरुओं का ज्ञानवर्धन होते रहता है।

लोकसभा चुनाव-2024
(अपना कीमती वोट किसे दें?)

(दुमका-राजमहल लोकसभा क्षेत्र। यह मात्र एक विश्लेषण है। इस विश्लेषण का उद्देश्य किसी वोटर को जबरन किसी दल विशेष को मत देने का आह्वन कतई नहीं है। यह विश्लेषण "सुनो सबकी, करो मनकी" सिद्धांत पर आधारित है।)

एनडीए गठबंधन - भाजपा इस गठबंधन के प्रमुख दलों में से एक है। भाजपा का पुराना नाम जनसंघ है। 1980 दशक में यह दल समय की मांग को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी के नाम से उभर कर सामने आया। इस पार्टी पर हमेशा संप्रदायिक होने का आरोप लगते रहा है। इसका एकमात्र कारण है कि इनके मूल सिद्धांतों में हिंदी, हिंदु, हिंदुस्तान का नारा सर्वोपरी है। 

भाजपा 10 वर्षों से केन्द्र में सत्ता पर काबिज है। इसने "सबका साथ सबका विकास" के नारा के  साथ-साथ 2 करोड़ नौकरी देने एवं सस्ते पेट्रोल-डीजल देने सहित कई तरह के वादे किए थे। यह पार्टी हमेशा हिंदु-मुस्लिम करती रही है। भाजपा ने इन दस वर्षों में विकास के नाम पर एक ढेले का काम नहीं किया है। वह अपने काम पर वोट नहीं मांग रही है। बल्कि इनके प्रमुख हिंदु-मुस्लिम, मंगलसूत्र, गाय-बैल एवं भैंस के नाम पर वोट मांग रही है।

भाजपा संविधान को खत्म करना चाहती है। भाजपा आरक्षण का घोर विरोधी है। यह आदिवासी, दलितों एवं अल्पसंख्यकों को गर्त्त में ले जाना चाहती है। सीधे तौर पर कहें, तो भाजपा एसटी/एससी/ओबीसी को अपना गुलाम बनाना चाहती है।

भाजपा की ओर से दुमका में सीता सोरेन को प्रत्याशी बनाया गया है। आप दिवंगत दुर्गा सोरेन की धर्मपत्नी है। सीता सोरेन माननीय शिबू सोरेन की बड़ी पुत्रवधू है। आप 15 वर्षों से जामा विधानसभा से विधायक रही हैं। आपने झामुमो से बगावत कर दी है एवं सीटिंग सांसद सुनील सोरेन के मुंह से भाजपा की टिकट छीनकर खुद मैदान में आ डटी हैं। आप शिबू सोरेन परिवार से बदला लेने के लिए जनता से वोट मांग रही हैं। 

निर्दलीय उम्मीदवार - राजमहल लोकसभा क्षेत्र से पंद्रह प्रत्याशी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं। एक को छोड़ बाकीयों की जमानत रद्द हो जाएगी। एक निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में हैं। आप वर्तमान में बोरियो विधानसभा से झामुमो के विधायक हैं। बोरियो में आप 25 वर्षों से विधायक एवं एक बार मंत्री भी रह चुके हैं। राजनीतिक नशा के कारण आपने राजमहल लोकसभा से झामुमो से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी। पर झामुमो हाईकमान ने आपकी मांग को ठुकरा दी। आपने पार्टी की आज्ञा का उल्लंघन किया और आपको पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया है। फिर भी आप बागी उम्मीदवार के रूप में डटे हुए हैं। आप पर भाजपा की बी टीम होने का संगीन आरोप है। आप वोट कटुआ ही साबित होंगे।

इंडिया गठबंधन - इस गठबंधन में कांग्रेस/झामुमो सहित कई अन्य कई दल शामिल हैं। इस वक्त देश इंडिया गठबंधन के साथ खड़ा है। इंडिया गठबंधन संविधान एवं आरक्षण बचाने के साथ-साथ "हिंदु, मुस्लिम, सिख, ईसाई; हम सभी हैं भाई-भाई" की बात कर रहा है। जिसकी वजह से नौकरी पेशा, व्यापारी, किसान, मजदूर सभी इसके पक्ष में आ गए हैं।

आप किसको अपना कीमती वोट देंगे? यह आप पर निर्भर करता है। 

Thursday, 4 April 2024

आओ शेरनी का दूध पीयें 

"शिक्षा शेरनी का वह दूध है, जो इसे पीयेगा वह दहाड़ेगा।" - बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर। 

बाबा साहेब का उपरोक्त कथन सौ प्रतिशत सत्य है। हूल तक संताल आदिवासी अर्द्धनग्न ही रहा करते थे। वे दुनिया से वाकिफ न थे। पर उसने जो हूल किया, वह अपवाद ही है। ऐसा इसलिए संभव हो सका, क्योंकि वे अनपढ़ जरुर थे पर ज्ञानी थे। हूल के ठीक 5 वर्ष बाद 1860 को संताल परगना में ईसाई मिशनरियों को आगमन हुआ। उन्हें अच्छी तरह समझ में आ गया था कि अगर इन भोले-भाले संतालों को शिक्षित नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं, जब वे दुबारा इन्हीं कुख्यात महाजनों के गुलाम बन जाएंगे। इसलिए मिशनरियों ने शिक्षा पर विशेष ध्यान देना उचित समझा। इसका नतीजा आज आपके सामने है कि जगह-जगह मिशन स्कूल चलाये जा रहे हैं। अगर उनकी मंशा लोगों को ईसाई बनाना ही होता, तो वे कबके सबों को ईसाई बना दिए होते। 2011 के जनगणना के अनुसार संताल परगना में ईसाईयों की जनसंख्या मात्र 5 प्रतिशत ही है। जनसंख्या छोटी है, पर घाव करे गंभीर। उसने चींटी की भाँति हाथी की नाक में दमकर रखा है। आखिर उसने शेरनी का दूध जो पीया है। अतः वह दहाड़ तो मारेगा ही। जब भी आदिवासियों के साथ अन्याय व अत्याचार हुआ है, यही वह शेरनी का दूध पीने वाला शख्स है, जिसके दहाड़ से अच्छे-अच्छों की बोलती बंद होती है। झारखण्ड आंदोलन हो या और कोई अन्य आदिवासी आंदोलन, इन शेरनी का दूध पीने वालों ने बढचढ़ कर हिस्सा लिया है। जहां कहीं भी आदिवासियों के साथ अन्याय हुआ है, ईसाई आदिवासियों ने इसका जमकर प्रतिरोध किया है। सिर्फ एक घटना ही उदाहरण के लिए काफी है। और वह है - बांझी कांड। यह घटना 19 अप्रैल, 1985 को घटित हुई, जिसमें भू.पू. सांसद फादर अन्थोनी मुर्मू सहित 19 लोग शहीद हो गए। 

रहस्य यही है कि जब भी आदिवासियों के साथ अन्याय होता है, यही ईसाई आदिवासी उसके विरोध में ढाल की तरह सामने आ खड़े होते हैं। ईसाई आदिवासी ने कभी अपने आपको आदिवासी समुदाय से अलग नहीं रखा है। बल्कि उसने हर आदिवासी सामुदायिक कार्यक्रम में बढचढ़ कर हिस्सा लिया है। यहां एक बात समझना बहुत जरुरी है। अंग्रेज आगमन से पूर्व आदिवासी/हरिजन/पिछड़ा वर्ग हिन्दुओं की जाति व्यवस्था के अंतर्गत शूद्र की श्रेणी में रखा गया है। जिन्हें तथाकथित हिन्दुओं द्वारा भयानक रूप से प्रताड़ित किया गया था। अब हिन्दुओं के ठेकेदार भाजपा/आरएसएस फिर से वही दिन लाना चाहते हैं, जिसमें शूद्रों को गुलाम बनाये व पीटे जाने की प्रथा है। हिन्दुओं के धर्म ग्रंथों में भी साफ-साफ उल्लेख है कि ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी। अब बाबा लोग इसकी व्याख्या कुछ भी करता रहे, पर इसका भावार्थ ‘पीटे जाने’ से ही संबंधित है।

ईसाई आदिवासी, आदिवासियों के ढाल हैं। यही कारण है कि मनुवादी विचारधारा के लोग अर्थात् भाजपा/आरएसएस जब तक ईसाईयों को आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) सूची से बाहर नहीं करता है, तब तक उनकी दाल गलने वाली नहीं है। यही कारण है कि भाजपा/आरएसएस वालों ने भेद की नीति के तहत जिन आदिवासियों ने हिन्दु धर्म को अपना रखा है, उन्हें ईसाईयों के खिलाफ खड़ा कर दिया है।

यहां समझने वाली बात यह है कि इस लड़ाई में मनुवादी (भाजपा/आरएसएस) कभी सामने नहीं आते हैं, बल्कि इस काम के लिए उन्होंने अपने गुर्गे छोड़ रखे हैं। और वे सिर्फ सूत्रधार का काम करते हैं। अर्थात् वे आदिवासी के विरुद्ध आदिवासी को खड़ा करने में सफल हो गए हैं।

सबसे अश्चर्य वाली बात तो यह है कि जिस आदिवासी ने पूर्णरुपेण हिन्दु धर्म को अंगीकृत किया हुआ है, वैसे ही आदिवासी, ईसाईयों को डीलिस्ट करने की बात कर रहा है। इसका अर्थ यही हुआ, अगर डीलिस्ट करने की नौबत आ गई, तो सबसे पहले ऐसे ही आदिवासी हिन्दुओं को डीलिस्ट किया जाएगा। इसे ही कहा जाता है; जिस डाली पर बैठना, उसी को काटना। 

यह भी सच है कि किसी मनुष्य जाति के माथे पर उसकी पहचान संबंधित कोई भी चिन्ह् अंकित नहीं होता है। फिर उसे डीलिस्ट करने के लिए कौन-सा मापदंड अपनाया जाएगा एवं ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में कौन होगा उसे पहचान करने वाला अधिकारी? यह एक विकट समस्या आ खड़ी होगी। अगर संताल आदिवासी की बात की जाए, तो उनके बारह गोत्रों में कोई मुर्मू, टुडू ...वगैरह होगा, तो उसकी पहचान संतालों में तो हो ही जाएगी, पर वह किस धर्म को मानता है, यह पता लगाना बहुत ही मुश्किल काम होगा। 

थोड़ी देर के लिए माना कि डीलिस्टिंग करने का आदेश हो गया। फिर आदिवासियों का क्या होगा? आदिवासियों के उपरोक्त धार्मिक विभाजन को देख लें, तो उसके अनुसार 95 प्रतिशत (हिन्दु, ईसाई, अन्य) आदिवासी तो डीलिस्ट हो गए। फिर आरक्षण किसके लिए? घ्यान देने वाली बात है कि अगर ऐसा हुआ, तो बाबा साहेब द्वारा निर्धारित आरक्षण देने की मूल आवधारणा ही बेमानी हो जाएगी। कारण; विशेषकर आदिवासियों के मामले में आरक्षण के लिए धर्म को आधार कभी नहीं माना गया है।

जब तक संविधान जिन्दा है, तब तक आदिवासियों का डीलिस्ट होना संभव नहीं है। फिर भाजपा के गुर्गे क्योंकर डीलिस्टिंग के मुद्दे को हर पांच साल में उछालते रहा है? ऐसा इसलिए ताकि ऐसा कृत्यकर आगामी लोकसभा चुनाव में अपने पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण कर सके। 2024 के लोकसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठता है, यह तो वक्त ही बता पाएगा। 

खैर कुछ भी हो, पर इतना सच है कि भाजपा/आरएसएस वाले आदिवासियों को गुमराह करने में सफलता पा लिया है। अगर समय रहते इस षड्यंत्र को नष्ट नहीं किया गया, तो निश्चित रूप से आदिवासियों का भविष्य अंधकारमय ही होगा। आइए सभी आदिवासी जागें एवं भाजपा/आरएसएस की चाल को बेनकाब करने की कसमें खा लें।


Monday, 5 February 2024

 आज ही रो लो ...

प्रकृति का यह विचित्र नियम है। मनुष्य बीते हुए कल के लिए रोता है। वह आने वाला कल के लिए भी आंसू बहाता है। और आश्चर्य तो तब होता है, जब वह वर्तमान में भी रो-रोकर जीता है। आगे नाथ न पीछे पगहा। हर मनुष्य अत्यधिक पीड़ित है। उसपर नानक दुखिया सब संसार वाली बात हो जाती है। इस धरती पर उसका आगमन रोते हुए होता है, तो जाना भी हाय कितना पीड़ादायक है?! उसे जिंदगी में चैन ही नहीं। तभी तो दार्शनिकों के कुछ समूह ने संघर्ष ही जीवन है का नाम दिया है। अतः अभी रो लेने में ही भलाई है।

 संविधान के साथ ही सूर्योदय हो चुका है। सूरज देवता मीठी-मीठी मुस्कान लिए सर्वत्र अपनी भीनी-भीनी खुशबू बिखेर रहा है। हर प्राणी जाग उठा है। और सभी प्राणी अपने-अपने कामों में अति व्यस्त हो चले हैं। लेकिन अब सूरज ढल चुका है। सभी प्राणी अब थक हार चुके हैं। और वह देखो, अब सूर्यास्त हो ही चुका है। अब घनी अंधेरी रात आएगी। विडंबना यही कि यह एक ऐसी काली रात होगी जो कभी सुबह का मुख न देख पाएगी! 

आज की तारीख में ध्रुव राठी को कौन नहीं जानता है? उसने चाय वाले को अपना आईना दिखा दिया है। उनकी दिलेरी देखो। उसने अभिमन्यु की तरह आज के तनाशाह की मांद में घुसकर हमला बोल दिया है। फिर भी न जागो, तो लाख ध्रुव राठी भी आपको कुछ नहीं कर सकता है।

स्मरण दिला दूं 16 दिसंबर, 2023 दुमका की घटना। एक ऐसा शख्स जिसे जनता ने दिल्ली दरबार के लिए अपने प्रतिनिधि के रूप में चुना है, वह अपने ही समाज को आग के हवाले कर रहा था। वह उल जलूल तर्कों पर वाहवाही लूटने के लिए दर्शको से बार-बार चाय वाले के स्टाईल में कह रहा था - ”सा़री काना से बाङ बोयहा?“ खैर, 4 फरवरी 2024 उसको  जवाब दिया जा चुका है।

दुनिया कहां जा रही? देश कहां जा रहा है? राज्य कहां जा रहा है? और तो और हम आदिवासी कहां जा रहे हैं? आदिवासियों में भी संताल कहां जा रहे हैं? एकमुश्त देखा जाए, तो संतालों की समस्या अनगिनत हैं। संताल समाज को सिर्फ सर्दी-खासी ही नहीं, बल्कि वह किसी लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो गया है। इसे आप कैंसर रूपी बीमारी भी कह लें, तो कोई हर्जा नहीं है। अब कैंसर का एक ही इलाज ऑपरेशन।

2024 लोकसभा चुनाव दस्तक दे चुका है। इस चुनाव में कई तरह के छोटे-बड़े मदारियों का पदार्पण होगा। मदारी अपने-अपने पिटारे से कई तरह के सांप-बिच्छुओं को निकालेंगे। कई तरह के तमाशे होंगे। और अंत में मदारी पैसा वसूल कर वहां से 5 वर्षें के लिए रफूचक्कर हो जाएगा।

अब यह जानना बड़ा दिलचस्प होगा कि संताल इस भागमभग की दौड़ में कहां स्थित है? क्या वह इस वैज्ञानिक की आधुनिक दौड़ में शामिल भी है अथवा नहीं? कहीं वह धरती का बोझ तो नहीं हो गया है? कहीं वह लाश में परिवर्तित तो नहीं हो गया है? इस छोटे-से लेख में खासकर संताल परगना में बसे संतालों की बात हो रही है। कारण कुछ भी रहा हो, पर यहां कोई भी सामाजिक संगठन हो, अपना दायित्व निभाने में विफल रहा है। यहां की जनता खासकर संताल अपने अस्तित्व की रक्षार्थ राजनीतिक दलों की बाट जोहते-जोहते उनकी आंखें पथरा गई हैं। 

संताल हूल-1855 ने हमें बहुत कुछ दिया। पर हम नादान बालक उसे संभाल न पाए। हूल के परिणाम  अपनी यौवनावस्था को देख भी न पाया और वह चल बसा। अलग राज्य भी मिला। पर वह भी खोदा पहाड़ निकली चूहिया, वह भी मरी हुई। हमारी हालत  करेला तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ी वाली बात हो गई। बेबुनियाद समस्याओं को लेकर हम आपस में ही पिल पड़े हैं। पेट में अन्न नहीं और हम अपनी पहचान पाने के लिए जूझ रहे हैं। धर्म और लिपि के लिए हम एक दूसरे के खून के प्यासे हो चले हैं। भाई को भाई समझने में हम विफल रहे हैं।

निवेदन है; समय की मांग को देखते हुए चलो हम एकजुट हो जाएं। तमाम तरह के विभेदों से ऊपर उठ जाएं। सभी मिलकर अपने दुश्मनों से लड़ने की कसम खा लें। वरना हमारी मौत निश्चित है। संविधान एवं एसपीटी को जिंदा ही दफना दिया गया है। वह दुर्दिन ज्यादा दूर नहीं, जब हम गुलामी की जिंदगी जीने को मजबूर हो जाएंगे। 

Monday, 29 January 2024

 कैसी और किसकी आजादी (6)?

पिछले अंक में हमने जान लिया था कि भारत में अंग्रेज आगमन से पूर्व शूद्रों की क्या स्थिति थी। शूद्रों की धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक एवं ऐतिहासिक परिस्थिति के बारे में अच्छी तरह जान लिया। उनकी क्या ही अमानवीय व विभत्स स्थिति थी। शूद्रों की नवविवाहिता को पंडित जी को सुपुर्द करना, पहले बेटे को गंगा में दान करना, नरबलि के लिए अपने को सुपुर्द करना, उन्हें किसी तरह की कोई चल-अचल संपत्ति रखने का अधिकार नहीं, आदि। और तो और उनको कुर्सी तक में बैठने की इजाजत नहीं थी। खैर, अंग्रेजों ने शूद्रों के विरुद्ध ब्राह्मणों की ऐसी ही तमाम अमानवीय परंपराओं को तोड़ दिया था। अगर अंग्रेज न आये होते, तो अब तक शूद्रों की क्या हालत होती? इस बारे में आप सोच भी नहीं सकते। सन् 1947 को देश आजाद हुआ और एक शूद्र ने देश का संविधान लिख डाला। भारत का संविधान विश्व का सर्वश्रेष्ठ संविधान माना जाता है। फिर भी इतना बढ़िया संविधान होते हुए भी ये ब्राह्मण रोज ही इनकी आलोचना करते रहते हैं। इतना ही नहीं वाभन सरेआम इसकी प्रतियों को जलाते हैं। संविधान में प्रदत्त आरक्षण के विरुद्ध धरना-प्रदर्शन करते रहते हैं। शूद्रों को सदियों से प्रताड़ित करते हुए भी अब तक इनका पेट नहीं भरा है। अब वह घड़ी फिर आ चुकी है, जिसमें शूद्रों को अंग्रेज भारत आगमन से पूर्व की भाँति प्रताड़ित किया जाएगा। शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। अगर यही स्थिति रही, तो इस खेल में शूद्रों का पराजित होना निश्चित है।

 सुर-असुर का खेल बहुत ही पुराना खेल है। यह अनादि काल से चला आ रहा है। इस खेल को समझ पाना उतना आसान नहीं है, जितना हम समझ रहे हैं। इस खेल में दीखता कुछ है और होता कुछ है। इस खेल की विडंबना यही है कि जब शेर को एक बार मानव खून का चस्का लग जाए, तो यह छुटाये नहीं छुटता है। खासकर बरसात के दिनों में आपने किसी जलते हुए बल्ब की रोशनी को अवश्य देखा होगा। यह भी जरुर देखा होगा; किस तरह छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़े उस रोशनी की तरफ अपने आप दौड़े चले आते हैं और थोड़ी देर तक उस जलते बल्ब की परिक्रमा करने के बाद भस्म हो जाते हैं। इस दृश्य में आपने नोट किया होगा कि कीड़े-मकोड़े को छोड़ कोई हाथी-घोड़े नहीं आते हैं। तत्पर्य यही है कि वे छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़े अपने अंतःमन से ”मनुस्मृति“ को स्वीकार कर ले, तो कौन क्या कर सकता है। इसे ही कहा जाता है; मियां-बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी।

देश बदल रहा है। 2024 का चुनावी बिगुल बज चुका है। सियासी दांव-पेंच का खेल चरम पर है। कल (28.1.2024) को बिहार का तख्ता पलट चुका है। अब दो दिन के अंदर झारखण्ड में भी बड़ा खेला होने वाला है। क्योंकि कहा जाता है कि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है।

Tuesday, 2 January 2024

 कैसी और किसकी आजादी (5)?

संताल संताल परगना में प्रवेश तो कर गए पर वे देश-दुनिया की खबरों से अनभिज्ञ थै। हां, उन्होंने सिर्फ किसी ”कुपनी“ (ईस्ट इण्डिया कंपनी) का नाम अवश्य सुन रखा था। पर वे उनकी कार्यशैली से कोसों दूर थे। तब संताल अपने में मस्त होकर बड़े आनंद के साथ अपना जीवनयापन कर रहे थे। ब्रिटिश काल में इनके साथ घटी घटनाओं को हम बाद में जानेंगे। इससे पहले हम भारत में अंग्रेजों द्वारा किए गए कार्यों को संक्षेप में जानने की कोशिश करते हैं। अंग्रेजों द्वारा खासकर दलितों के लिए किए गए कार्यों का विवरण कुछ इस तरह है:-

1. अंग्रेजों ने 1795 में अधिनियम 11 द्वारा शूद्रों को भी संपत्ति रखने का कानून बनाया।

2. 1773 में ईस्ट इण्डिया कंपनी ने रेगुलेटिंग एक्ट पास किया, जिसमें न्याय व्यवस्था समानता पर आधारित थी। 6 मई 1775 को इसी कानून के तहत बंगाल के सामंत ब्राह्मण नन्द कुमार देव को फांसी की सजा दी गई।

3. 1804 अधिनियम 3 द्वारा अंग्रेजों ने कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाई (लड़कियों के पैदा होते ही तालु में अफीम चिपका कर, मां के स्तन पर धतूरे का लेप लगाकर एवं गड्ढा बनाकर उसमें दूध भरकर डूबो कर मारा जाता था।)।

4. 1813 में ब्रिटिश सरकार ने कानून बनाकर शिक्षा ग्रहण करने का सभी जातियों और धर्मों के लोगों को अधिकार दे दिया।

5. 1813 में अंग्रेजों ने कानून बनाकर दास प्रथा का अंत कर दिया।

6. 1817 में अंग्रेजों ने समान नागरिक संहिता कानून बनाया (1817 के पहले सजा का प्रावधान वर्ण के आधार पर था। ब्राह्मण को कोई सजा नहीं होती थी, बल्कि शूद्र को कठोर दण्ड दिया जाता था। अंग्रेजों ने सजा प्रावधान समान कर दिया।)।

7. 1819 में अधिनियम 7 द्वारा ब्राह्मणों द्वारा शूद्रों के शुद्धिकरण पर रोक लगाई। (शूद्रों की शादी होने पर दुल्हन को अपने दूल्हे के घर न जाकर कम से कम तीन रात ब्राह्मण के घर शारीरिक सेवा देनी पड़ती थी।)

8. 1830 नरबलि प्रथा पर रोक लगा दिया। (देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए ब्राह्मण शूद्रों, स्त्री व पुरुष दोनों को मंदिर में सिर पटक-पटक कर चढ़ा देता था।)।

9. 1833 अधिनियम 87 द्वारा सरकारी सेवा में भेदभाव पर रोक अर्थात् योग्यता ही सेवा का आधार स्वीकार किया गया तथा कंपनी के अधीन किसी भारतीय नागरिक को जन्म स्थान, धर्म, जाति या रंग के आधार पर पद से वंचित नहीं रखा जा सकता है।

10. 1834 में पहला भारतीय विधि आयोग का गठन हुआ। कानून बनाने की व्यवस्था जाति, वर्ण, धर्म और क्षेत्र की भावना से ऊपर उठकर करना आयोग का प्रमुख उद्देश्य था।

11. 1835 प्रथम पुत्र को गंगा दान पर रोक लगा दिया। (ब्राह्मणों ने नियम बनाया कि शूद्रों के घर यदि पहला बच्चा लड़का पैदा हो, तो उसे गंगा में फेंक देना चाहिए। पहला पुत्र हृष्ट-पुष्ट ब्राह्मणों से लड़ न पाए, इसलिए उसे पैदा होते ही गंगा को दान करवा देते थे।)

12. 7 मार्च 1835 को लॉर्ड मैकाले ने शिक्षा नीति को राज्य का विषय बनाया और उच्च शिक्षा को अंग्रेजी भाषा का माध्यम बनाया।

13. 1835 को कानून बनाकर अंग्रेजों ने शूद्रों को कुर्सी पर बैठने का अधिकार दिया।

14. दिसम्बर 1829 के नियम 17 द्वारा विधवाओं को जलाना अवैध घोषित कर सती प्रथा का अंत किया।

15. देवदासी प्रथा पर रोक लगाई। ब्राह्मणों के कहने से शूद्र अपनी लड़कियों को मंदिर की सेवा के लिए दान देते थे। मंदिर के पुजारी उनका शारीरिक शोषण करते थे। बच्चा पैदा होने पर उसे फेंक देते थे और उस बच्चे को “हरिजन” नाम देते थे।

1921 को जातिवार जनगणना के आंकड़े के अनुसार अकेले मद्रास में कुल जनसंख्या 4 करोड़ 23 लाख थी, जिसमें 2 लाख देवदासियां मंदिरों में पड़ी थी। यह प्रथा अभी भी दक्षिण भारत के मंदिरों में चल रही है।

16. 1837 अधिनियम द्वारा ठगी प्रथा का अंत किया।

17. 1849 में कलकत्ता में एक बालिका विद्यालय जे. ई. डी. बेटन ने स्थापित किया।

18. 1854 में अंग्रेजों ने 3 विश्वविद्यालय कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे में स्थापित किया। और 1902 में विश्वविद्यालय आयोग नियुक्त किया।

19. 6 अक्टूबर 1860 को अंग्रेजों ने इण्डियन पैनल कोड-प्च्ब् बनाया। लार्ड मैकाले ने सदियों से जकड़े शूद्रों की जंजीरों को काट दिया और भारत में जाति, वर्ण और धर्म के बिना एक समान क्रिमिनल लॉ लागू कर दिया।

20. 1863 में अंग्रेजों ने कानून बनाकर चरक पूजा पर रोक लगा दिया। (आलिशान भवन एवं पुल निर्माण पर शूद्रों को पकड़कर जिन्दा चुनवा दिया जाता था। इस पूजा में मान्यता थी कि भवन और पुल ज्यादा दिनों तक टिकाऊ रहेंगे।)

21. 1867 में बहुविवाह प्रथा पर पूरे देश में प्रतिबंध लगाने के उद्देश्य से बंगाल सकार ने एक कमिटि गठित किया।

22. 1871 में अंग्रेजों ने भारत में जातिवार गणना प्रारंभ की। यह जनगण्ना 1941 तक हुई। 1948 में पण्डित नेहरु ने कानून बनाकर जातिवार गणना पर रोक लगा दी।

23. 1872 में सिविल मैरिज एक्ट द्वारा 14 वर्ष से कम आयु की कन्याओं एवं 18 वर्ष से कम आयु के लड़कों का विवाह पर रोक लगाई।

24. अंग्रेजों ने महार और चमार रेजिमेंट बनाकर इन जातियों को सेना में भर्ती किया, लेकिन 1892 में ब्राह्मणों के दबाव के कारण सेना में अछूतों की भर्ती बन्द हो गई।

25. रैयत वाणी पद्धति अंग्रेजों ने बनाकर प्रत्येक पंजीकृत भूमिदार को भूमि का स्वामी स्वीकार किया।

26. 1918 में साऊथबरो कमेटी को भारत में अंग्रेजो ने भेजा। यह कमेटी भारत में सभी जातियों का विधि मण्डल (कानून बनाने की संस्था) में भागीदारी के लिए आया। शाहू जी महाराज के कहने पर पिछड़ों के नेता भाष्कर राव जाधव एवं अछूतों के नेता डॉ. अम्बेडकर ने अपने लोगों को विधि मण्डल में भागीदारी के लिए मेमोरेंडम/ज्ञापन दिया।

27. अंग्रेजों ने 1919 में भारत सरकार अधिनियम का गठन किया।

28. 1919 में अंग्रेजों ने ब्राह्मणों को जज बनने पर रोक लगा दी थी और कहा था कि इनके अंदर न्यायिक चरित्र नहीं होता है।

29. 25 दिसम्बर 1927 को डॉ. अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति का दहन किया गया। मनुस्मृति में शूद्रों और महिलाओं को गुलाम तथा भोग की वस्तु समझा जाता था, एक पुरुष को अनगिनत शादियां करने का धार्मिक अधिकार है, महिला अधिकार विहीन तथा दासी की स्थिति में थी। एक-एक औरत के अनगिनत सौतनें हुआ करती थीं। औरतों-शूद्रों के लिए सिर्फ और सिर्फ गुलामी लिखा है, जिसको ब्राह्मण मनु ने धर्म का नाम दिया है।

30. 1 मार्च 1930 को डॉ. अम्बेडकर द्वारा काला राम मंदिर (नासिक) प्रवेश का आंदोलन चलाया गया।

31. 1927 को अंग्रेजों ने कानून बनाकर शूद्रों के सार्वजनिक स्थानों पर जाने का अधिकार दिया।

32. 1927 में साईमन कमीशन की नियुक्ति की जो 1928 में भारत के अछूत लोगों की स्थिति का सर्वे करने और उनको अतिरिक्त अधिकार देने के लिए आया। भारत के लोगों को अंग्रेज अधिकार न दे सके, इसलिए इस कमीशन के भारत पहुंचते ही गांधी और लाला लाजपत राय ने इस कमीशन के विरोध में बहुत बड़ा आंदोलन चलाया। जिस कारण साईमन कमीशन अधूरी रिपोर्ट लेकर वापस चला गया। इस पर अंतिम फैसले के लिए अंग्रेजों ने भारतीय प्रतिनिधियों को 12 नवम्बर 1930 को लंदन गोलमेज सम्मेलन में बुलाया।

33. 24 सितम्बर 1932 को अंग्रेजों ने कम्ययुनल अवार्ड घोषित किया, जिसमें निम्न प्रमुख अधिकार दिये:-

ंद्ध वयस्क मताधिकार

इद्ध विधान मण्डलों और संघीय सरकार में जनसंख्या के अनुपात में अछूतों को आरक्षण का अधिकार

बद्ध सिक्ख, ईसाई और मुसलमानों की तरह अछूतों ;ैब्ध्ैज्द्ध को भी स्वतंत्र निर्वाचन के क्षेत्र का अधिकार मिला। जिन क्षेत्रों में अछूत प्रतिनिधि खड़े होंगे, उनका चुनाव केवल अछूत ही करेंगे।

कद्ध प्रतिनिधियों को चुनने के लिए दो बार वोट देने का अधिकार मिला, जिसमें एक बार सिर्फ अपने प्रतिनिधियों को वोट देंगे तो दूसरी बार सामान्य प्रतिनिधियों को वोट देंगे।

34. 19 मार्च 1928 को बेगारी प्रथा के विरुद्ध डॉ. अम्बेडकर ने मुम्बई विधान परिषद में आवाज उठाई, जिसके बाद अंग्रेजों ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया।

35. अंग्रेजो ने 1 जुलाई 1942 से लेकर 10 सितम्बर 1946 तक डॉ. अम्बेडकर को वायसराय की कार्य साधक कौंसिल में लेबर मेम्बर बनाया। लेबरों को डॉ. अम्बेडकर ने 8.3 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दिलवाया।

36. 1937 में अंग्रेजों ने भारत में प्रोविंशियल गवर्नमेंट का चुनाव करवाया।

37. 1942 में अंग्रेजों से डॉ. अम्बेडकर ने 50 हजार हेक्टेयर भूमि को अछूतों एवं पिछड़ों में बांट देने के लिए अपील किया। अंग्रेजों ने 20 वर्षों की समय सीमा तय किया था।

38. अंग्रेजों के शासन प्रशासन में ब्राह्मण की भागीदारी को 100 से 2.5 पर लाकर खड़ा कर दिया था।

इन्हीं सब कारणों से ब्राह्मणों ने अ्रंग्रेजों के खिलाफ क्रांति शुरु कर दी। क्योंकि अंग्रेजों ने शूद्रों और महिलाओं को सारे अधिकार दे दिये थे और सब जातियों के लोगों को एक समान अधिकार देकर सबको बराबरी में लाकर खड़ा कर दिया था। 

(... अगले अंक में जारी।)

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...