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Monday, 9 September 2024

पी. ओ. बोडिंग साहब की अनमोल भेंट

तब संतालों में एक भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति नहीं था, फिर भी वे शेर के जबड़े से संताल परगना को खींच निकालने में सफल रहे। इसके विपरीत, आज हर घर में पढे-लिखे लोग मौजूद हैं। संतालों के अत्याचारियों ने जुल्म करने की सीमा को लांघ दिया है। फिर भी हम भिंगी बिल्ली बनकर किसी एक कोने में दुबके हुए हैं। हूल बीते मात्र 5 वर्ष ही बीते थे। हूल एवं हूल के परिणामों से मनुवादी अत्यधिक बौखला उठे थे। उनकी बौखलाहट स्वाभाविक थी। कारण, हूल में महाजनों को अपने किये का फल मिल चुका था। जहां भी दा॑व लगा, वे मौत के घाट उतारे गए थे। हूल तत्कालीन अंग्रेज साम्राज्य के विरुद्ध नहीं बल्कि अत्याचारी महाजनों के विरुद्ध था। अतः मनुवादियों का जख्मी शेर में परिणत होना स्वाभाविक था। हुआ यूं कि अब महाजन दुगुना रफ्तार से संतालों पर अत्याचार करने लगे थे। ऐसी हालत में मिशनरियों का संताल परगना में आगमन और निरीह संतालों की मदद करना; इन सूदखोर महाजनों को फूटी कौड़ी नहीं सुहाया।

तब बेनगड़िया मिशन पापा-केराप की भलमनसाहत के कारण अपनी प्रसिद्धि पाने में सफल हो चुका था। पापा-केराप साहब ने संतालों की भलाई हेतु कोई कोर कसर न छोड़ रखी थी। कुछ वर्षों बाद उसी स्थान पर पी. ओ. बोडिंग का भी आगमन हुआ। कुछ ही वर्षों के बाद दोनों संतालों के मसीहा पापा-केराप साहब इस दुनिया से चल बसे। अब संतालों की देखरेख का सारा भार बोडिंग साहब पर आ गिरा था।

पी. ओ. बोडिंग साहब एक महान भाषावैज्ञानिक थे। वे संताली के अलावे अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मनी, नॉर्वेजियन आदि भाषाओं के भी अच्छे जानकार थे। उन्हें संताली भाषा-साहित्य से बेहद लगाव था। उन्होंने 44 वर्षों तक संतालों के बीच रहकर संताली साहित्य की सेवा की है।

भारत प्रवास के दौरान उन्होंने देखा कि संतालों की आर्थिक स्थिति बहुत ही नाजुक अवस्था में पड़ी हुई थी। और इधर महाजनों ने भी संतालों का जीना हराम कर रखा था। मिशन स्कूल के भरोसे एकाध संताल जरूर अपना नाम व कुछ पढ़-लिख सकने में कामयाब तो हो चुके थे। परंतु वे इतने योग्य नहीं थे कि वे अपनी भाषा की समृद्धि एवं शब्द संचयन के मामले में कुछ कर सकें। बोडिंग साहब को डर सता रहा था, अगर समय रहते संताली शब्दावली को संजोकर नहीं रखा गया, तो वह दिन दूर नहीं जब संताली भी एक न एक दिन विलुप्त होने के कगार पर पहुँच जाएगी। यही एकमात्र कारण था कि बोडिंग साहब की 20 वर्षों की कड़ी मेहनत ने रंग लाई। जिसके फलस्वरूप उनके द्वारा संग्रहित, लिखित, संपादित एवं प्रकाशित A Santal Dictionary (5 Vol) हमारे लिये छोड़ गए। इस डिक्शनरी की उपयोगिता तब तक होती रहेगी, जब तक एक भी संताल इस धरा पर विचरण करता रहेगा। पी. ओ. बोडिंग का नाम सदा-सदा के लिये स्वर्ण अक्षरों में चमकता रहेगा! संताली साहित्य के मसीहा पी. ओ. बोडिंग साहब को शत-शत नमन!

Friday, 6 September 2024

 रोमन लिपि : परिवर्धित संताली लिपि

आखिर कोट-टाई-पैन्ट किसकी पोशाक है? नि:संदेह यह अंग्रेजों की पोशाक है। पर इस वक्त इसे दुनिया तो छोड़ो हर संताल द्वारा इसका उपयोग बड़े ही गर्व के साथ किया जाता है। इसे पहनने में किसी भी संताल को कोई गुरेज व एतराज नहीं और न ही कोई इसके विरोध में चूँ तक कर रहा है। सभी संताल इसे पहनने में अपना गौरव महसूस करते हैं। लेकिन रोमन संताली लिपि के साथ ठीक इसके विपरीत हो गया। अक्सर इनपर आरोप मढ़ दिया जाता है कि यह तो ईसाईयों द्वारा ईजाद की हुई लिपि है। अतः यह संतालों की लिपि कतई नहीं हो सकती है। यह लिपि हमें किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। हमें तो किसी संताल द्वारा ईजाद की हुई अपनी लिपि चाहिए, जिससे हम अपनी पहचान को बरकरार रखते हुए गौरव महसूस कर सकें। बेशक वह लिपि चोरी की हुई, अवैज्ञानिक एवं मानक संताली के लिये अनुपयुक्त ही क्यों न हों।

मालूम हो कि रेव्ह. पी. ओ. बोडिंग ने जिस रोमन लिपि को संताली के लिये परिवर्धित कर संताली लिखने के लिये ईजाद किया, इससे श्रेष्ठ, उत्कृष्ट एवं बेहत्तर संताली लिपि और कोई दूसरी नहीं हो सकती है। अतः इस संताली लिपि को कोई अन्य माने या न माने, अपनाए या न अपनाए, इसका विरोध करे; हमें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। हमें इस संताली लिपि की उन्नति के लिये हर संभव प्रयास करते रहना चाहिए। यह लिपि संताली के लिये सर्वश्रेष्ठ लिपि है।
बोडिंग साहब : एक महान संताल

बेशक पी. ओ. बोडिंग किसी संताल की कोख से पैदा नहीं हुए थे। वे अवश्य ही मूल रूप से एक विदेशी एवं ईसाई धर्म प्रचारक थे। पर उनकी सारी रचनाएं बेहद उम्दी, बेहतरीन, उत्कृष्ट एवं अव्वल दर्जे की हैं। उनकी किसी भी रचनाओं से किसी भी ऐंगल से विदेशी एवं ईसाई धर्म प्रचारक होने की बू नहीं आती है। उनकी ”ए संताल डिक्शनरी” को ही देख लिया जाए। उन्होंने इसमें हर शब्द की व्याख्या बड़े ही उत्कृष्ट तरीके से किया हुआ है। उन्होंने इस शब्दकोश में भाषाविज्ञान के सिद्धांतों का अक्षरश: अनुपालन करते हुए अपनी विद्वत्ता का परिचय दिया है; जो कि इस तरह का कृत्य किसी साधारण संताल द्वारा संभव नहीं है।
 
अतः उपरोक्त कारणों को मद्देनजर रखते हुए डंके की चोट पर कहा जा रहा है कि रेव्ह. पी. ओ. बोडिंग संतालों में महान संताल थे!
पी. ओ. बोडिंग : मानक संताली के महान रक्षक
(2 नवंबर 1865 - 25 सितंबर 1938)
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पी. ओ. बोडिंग का आगमन यूरोप के नॉर्वे देश से भारत में 1890 के उतरार्द्ध में हुआ। उनका कार्यक्षेत्र था - संताल परगना के बेनागाड़िया, मुहलपहाड़ी एवं दुमका। उन्होंने बहुत ही कम समय में संताली भाषा को न सिर्फ सीखा, बल्कि वह अपने को संताली का महान विचारक, मानवशास्त्री, दार्शनिक एवं भाषावैज्ञानिक के रूप में स्थापित कर दिया। इनके जैसा संताली के महान विद्वान न कभी थे और न ही निकट भविष्य में होने की संभावना नजर आ रही है। वह संताली को जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखने का प्रबल, कठोर, सशक्त एवं घोर समर्थक था। इसीलिए तो उसने अपने पूर्व मिशनरियों के द्वारा ईजाद की गई रोमन संताली लिपि को परिवर्धित कर संताली लिपि में परिवर्तित कर दिया।

पी. ओ. बोडिंग को अपने ही काल में अच्छी तरह पता चल गया था कि संताल परगना के संतालों को अपनी मानक संताली को बचाने के लिए भविष्य में अपने ही बिरादरी के लोगों के साथ गृहयुद्ध करना पड़ेगा। वे लोग संताल परगना पर हावी होंगे। अर्थात दक्षिणी संताली जो तब तक आर्यों की भाषा के साथ मिश्रित एवं प्रदूषित हो चुकी है को उत्तरी संतालों पर जबरन लागू करने की कोशिश की जाएगी। अतः इस भयंकर मुस्किलत से बचने हेतु पी. ओ. बोडिंग ने इसका बेड़ा उठा लिया था। इस महान कार्य के लिए उसने दिन-रात एक कर दिया। उन्होंने अपने खून-पसीने एक कर दिए। उन्होंने करीब 22 वर्षों तक कड़ी मेहनत की। और अंततः अपने अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप उन्होंने इन पुस्तकों की रचना कर डाली। पी. ओ. बोडिंग ने इन पुस्तकों को मानक संताली के किसी भी तरह के दुश्मनों को मार गिराने के लिए हैड्रोजन बम तुल्य आविष्कार किया है :- 1. Materials for a Santali Grammar, Part-I (Mostly Phonetics); 2. Materials for a Santali Grammar, Part-II (Mostly Morphology) एवं 3. A Santal Dictionary (V Vols). अतः यह अब हमारी ड्यूटी बनती है कि हम उपरोक्त हैड्रोजन बमों का प्रयोग कब, कहाँ और किस तरह के दुश्मनों पर करें?

Thursday, 5 September 2024

भाषाविज्ञान क्या है?

जिसने लिपि को ही भाषा मान बैठा हो, उनसे भाषा के बारे में ज्यादा बहस करना बेवकूफी है। उनके पास मिशन-2024 के अलावे भी कई ऐसे कार्यक्रम हैं, जिनसे संतालों की सामाजिक समरसता तो बिगड़ेगी ही साथ ही उनकी लिपि भी थक हारकर अपनी कोख में पुनः प्रवेश कर जाएगी। अर्थात् उन्हें कुछ ही दिनों के पश्चात् स्वाभाविक मौत की प्राप्ती हो जाएगी। काश! वे अपनी भाषाई शुद्धता एवं भाषा के मानकीकारण पर ज्यादा ध्यान देते तो क्या ही अच्छा होता। लेकिन उन्हें कौन समझाए? जो अपनी बड़ी-बड़ी रैलियों में “आदिमकोवाग मेंद दो छेद काना” का बेसिर-पैर वाला नारा लगा रहा हो, उनसे और ज्यादा क्या उम्मीद की जा सकती है?

तमाम भाषाविज्ञानिकों ने उनकी भाषा को सदियों पूर्व ही प्रदूषित एवं मिश्रित घोषित कर रखा है। वास्तव में उनकी भाषा में आर्यं भाषाओं का मिश्रण अथवा प्रभाव है। अतः संताली भाषा वैज्ञानिकों की दृष्टि से उत्तरी संताली को ही मानक संताली कहा गया है।

भाषाविज्ञान एक निःरस विषय है। फिर भी आइए, आज हम इस विषय पर कुछ चर्चा कर लें।

भाषा-विज्ञान की शाखाएँ - भाषा की परिभाषा रेखांकित करते हुए हमने जाना है कि भाषा-विज्ञान विज्ञान की वह शाखा है जिसमें भाषा का (विशिष्ट और सामान्य, समकालिक और ऐतिहासिक, तुलनात्मक और प्रायोगिक) दृष्टि से अध्ययन किया जाता है, जिसके अध्ययन के द्वारा भाषा की उत्पत्ति, गठन, प्रकृति एवं विकास आदि की सम्यक व्याख्या करते हुए इन सभी प्रकरणों के विषय में वैज्ञानिक सिद्धांतों का निर्धारण किया जाता है। स्पष्ट है भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन हेतु भाषा से संबंधित प्रायः सभी प्रश्नों पर विचार किया जाता है। इन सारे प्रश्नों में कुछ प्रश्न तो अपने आप में आधारभूत महत्त्व रखते हैं और कुछ आनुषंगिक। स्पष्ट है इसी कारण भाषा की अनेक शाखाएँ निर्मित की गयी हैं। इनमें कुछ शाखाएँ तो प्रमुख या प्रधान हैं और कुछ शाखाएँ गौण हैं।

(क) प्रधान शाखाएँ:

1. वाक्य-विज्ञान - भाषा का एकमात्र प्रमुख प्रकार्य भावों और विचारों का आदान-प्रदान है। विचारों का आदान-प्रदान वाक्यों द्वारा ही संभव हो पाता है। अतः निश्चय ही वाक्य, भाषा की सर्वाधिक स्वाभाविक और महत्त्वपूर्ण शाखा के रूप में जाना जाता है। भाषा विज्ञान की जिस शाखा में वाक्य के विषय में अध्ययन-विश्लेषण किया जाता है उसे वाक्य-विज्ञान कहा जाता है। वाक्य-विज्ञान के तीन रूप होते हैं:

(क) समकालिक

(ख) ऐतिहासिक, और

(ग) तुलनात्मक।

वाक्य-रचना का प्रत्यक्ष संबंध पदक्रम, अन्वय, निकटस्थ अवयव केन्द्रिकता, परिवर्तन के कारण, परिवर्तन की दिशाएँ आदि दृष्टियों से किया जाता है। भाषा-विज्ञान की यह शाखा अपेक्षया कठिन मानी जाती है। इस दिशा में कार्य तो काफी हुए हैं परंतु अभी भी इस क्षेत्र में काफी कार्य की जरूरत है।

2. पद-विज्ञान (रूप-विज्ञान) - वाक्य का निर्माण पदों (रूपों) से होता है। यही कारण है कि भाषा वैज्ञानिक अध्ययन क्रम में वाक्य के बाद पदों (रूपों) पर विचार किया जाना समीचीन माना गया है। पद-विज्ञान को ‘रूप-विज्ञान’ या ‘पद-रचनाशास्त्र’ भी कहा गया है। पद-विज्ञान के अंतर्गत संबंध तत्व, उसके प्रकार और रूप भाषा के वैयाकरणिक रूपों के विकास, उसके कारण तथा धातु, उपसर्ग, प्रत्यय आदि उन तमाम उपकरणों पर विचार किया जाता है जिनसे पद या रूप बनते हैं। पद-निर्माण या रूप निर्माण की प्रक्रिया भी इसके अंतर्गत आती है। इसका अध्ययन भी समकालिक, तुलनात्मक तथा ऐतिहासिक-इन तीनों रूपों में किया जाता है।

3. ध्वनि-विज्ञान - शब्दों का आधार ध्वनियाँ हैं। ध्वनि-विज्ञान के अंतर्गत भाषा की ध्वनियों पर अनेक दृष्टियों से विचार किया जाता है। इस शाखा के अंतर्गत ध्वनि-शास्त्र (फोनेटिक्स) एक विभाग है, जिसमें ध्वनि से संबंध रखने वाले अवयवों (मुख-विवर, नासिका-विवर, स्वर-तंत्री और ध्वनि यंत्र आदि) ध्वनि उत्पन्न होने की क्रिया तथा ध्वनि-लहर और उसके सुने जाने आदि का भी अध्ययन किया जाता है। किसी भाषा में प्रयुक्त ध्वनियों का वर्णन और विवेचन आदि भी इसी शाखा के अंतर्गत आता है। ध्वनि-प्रक्रिया पर उसके कारणों एवं दिशाओं के विश्लेषण के साथ विचार होता है। इस विज्ञान के अध्ययन के भी पूर्व की ही तरह समकालिक, ऐतिहासिक और तुलनात्मक-तीन रूप होते हैं। इसमें एक ही भाषा-परिवार की भाषाओं को लेकर ध्वनि-विकास पर विचार करके नियमों का निर्धारण किया जाता है। प्रसिद्ध ‘ग्रिम’ नियम का संबंध ध्वनि-विज्ञान से ही है। इसमें भाषिक इतिहास का अध्ययन भी ध्वनि की दृष्टि से किया जाता है। ध्वनि-विज्ञान के अंतर्गत ध्वनि-ग्राम विज्ञान जैसे कुछ नये उपविभाग भी बनाए गये हैं। ये ध्वनि के सूक्ष्म अध्ययन की गरज से किये गये हैं।

4. अर्थ-विज्ञान - भाषा की शरीर-यष्टि वाक्य से चलकर ध्वनि की इकाई पर समाप्त होती है। इसके बाद उसकी आत्मा पर विचार करना पड़ता है। आत्मा से तात्पर्य ‘अर्थ’ से है। शब्दों का अर्थ-विवेचन काफी बाद में शुरू हुआ है, क्योंकि काफी समय तक आधुनिक भाषा वैज्ञानिक इस प्रकरण को भाषा-विज्ञान के क्षेत्र का मानते ही नहीं थे। वे इसे दर्शन का क्षेत्र मानते थे। हालाँकि अब यह तय हो चुका है कि अर्थ का भाषा से अत्यंत गहरा संबंध होता है। ‘अर्थ’ का अध्ययन भी समकालिक, ऐतिहासिक और तुलनात्मक-तीनों ही रूपों में होता है। अर्थ-विज्ञान में प्रमुख रूप से शब्दों के अर्थ का निर्धारण, उसके स्तर, उसके विकास और कारणों आदि पर विचार किया जाता है। इसके साथ ही अर्थ और ध्वनि के संबंध, पर्याय, विलोम आदि के विवेचन भी उसमें सम्मिलित होते हैं। भाषा-विज्ञान में इस प्रकरण को ‘अर्थ-विचार’ कहकर भी अभिहित किया जाता रहा है। भाषा-विज्ञान की ये सभी शाखाएँ अत्यंत प्रमुख तथा महत्त्वपूर्ण मानी गयी हैं। इसके अलावा भाषा-विज्ञान की कुछ गौण शाखाएँ भी विकसित हुई हैं। भाषा को गहरे, अति गहरे रूप में जानने-समझने के लिये ही भाषा वैज्ञानिक नित्य उपक्रम में लगे रहते हैं।

उपर्युक्त चार प्रमुख शाखाओं के अलावा एक और प्रमुख शाखा की उद्भावना हिंदी के ख्यात भाषा-वैज्ञानिक डॉ० भोला नाथ तिवारी ने की है। जिसका नाम है ‘शब्द-विज्ञान’ । वे कहते हैं कि पद-विज्ञान में शब्दों की रचना पर तो विचार होता है परंतु शब्दों का वर्गीकरण, नाम-विज्ञान, व्यक्ति या भाषा के शब्द-समूह में परिवर्तन के कारण और दिशाओं आदि का विचार शब्द-विज्ञान के अंतर्गत आएगा। कोश-विज्ञान एवं व्युत्पति का विज्ञान भी शब्द-विज्ञान के ही अंग है। इस शाखा में शब्दों का तुलनात्मक अध्ययन भी किया जाता है। यह अध्ययन प्रमुख रूप से व्युत्पत्तियों के संदर्भ में किया जाता है।

भाषा-विज्ञान की कुछ गौण शाखाएँ:

1. भाषा की उत्पत्ति-भाषा - विज्ञान का सर्वाधिक स्वाभाविक एवं आवश्यक प्रश्न भाषा की उत्पत्ति का है। इस प्रश्न पर विद्वानों ने तरह-तरह से विचार कर अनेक सिद्धांतों का प्रदिपादन किया है। आधुनिक काल के अधिकांश विद्वान तो एक सीमा में ही इसे भाषा-विज्ञान की शाखा के रूप में मानते हैं, परंतु सच तो यह है कि यह भी उसकी एक शाखा ही है। जब भाषा का पूरा जीवन हमारे अध्ययन का विषय है, तो इसके जन्म से जुड़े प्रश्नों को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। इसमें कोई संदेह नहीं कि इसका अध्ययन कठिन जरूर है। परंतु इस पर अनुसंधान और विचार तो चलते ही रहेंगे ।

2. भाषाओं का वर्गीकरण-भाषा - विज्ञान की शब्द-विज्ञान को लेकर पाँच प्रधान शाखाओं (वाक्य, पद, शब्द, ध्वनि और अर्थ) के आधार पर संसार की भाषाओं का तुलनात्मक और ऐतिहासिक अध्ययन कर उनका वर्गीकरण इस शाखा के अंतर्गत किया गया है। इसी आधार पर यह तय किया गया है कि कौन-कौन भाषाएँ एक परिवार की हैं। इसके साथ ही इससे अर्थ या ध्वनि संबंधी अनेक गुत्थियों पर भी प्रकाश पड़ता है। तात्विक दृष्टि से यह क्षेत्र प्रधान पाँचों शाखाओं को मिलाकर अध्ययन की एक स्वतंत्र शाखा बनाई गयी है।

3. भाषा काल-क्रम-विज्ञान - भाषा-विज्ञान में सांख्यकीय पद्धति से काम करने या सांख्यिकी की सहायता से अध्ययन का सिलसिला 19वीं शताब्दी में ही प्रारंभ हो चुका था। ह्विटनी जैसे विद्वानों ने 1874 ई० में अंग्रेजी की ध्वनियों पर इस पद्धति से कुछ कार्य किया था।

भाषा काल-क्रम - विज्ञान में वर्णनात्मक भाषा-विज्ञान के आधार पर एक भाषा-परिवार की दो या अधिक भाषाओं के शब्द-समूह को एकत्र किया जाता है और फिर उसका तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। इस तुलनात्मक अध्ययन में पुराने शब्दों के लोप और नये के आगम के आधार पर भाषाओं के एक मूल. भाषा से अलग होने के काल तक का पता लगाया जाता है। साथ ही, कभी-कभी ऐसी भाषाओं में जिनमें कुछ समानता हो और कुछ भिन्नता हो जिसके कारण उनके एक परिवार के होने के संबंध में निश्चयात्मक रूप से कुछ भी कहना कठिन हो, भाषा काल-क्रम-विज्ञान के आधार पर उनके एक परिवार के होने या न होने के संबंध में अपेक्षया अधिक निश्चय के साथ कहा जा सकता है। एक ही भाषा के दो कालों का शब्द-समूह ज्ञात हो तो उनके बीच के समय के संबंध में भी इसके आधार पर कुछ कहा जा सकता है। इस प्रकार वर्णनात्मक और तुलनात्मक भाषा-विज्ञान पर आधारित भाषा-विज्ञान की इस शाखा के आधार पर ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान की बहुत सी गुत्थियों को सुलझाने की संभावना बढ़ गयी है।

4. भाषिक भूगोल-शाखा - भौगोलिक विस्तार में स्थानीय वैशिष्ट्य की दृष्टि से किसी क्षेत्र की भाषा का अध्ययन ही भाषिक भूगोल शाखा का विषय है। इसे ही ब्याज से भाषा या बोली आदि में ध्वनि, सुर, शब्द-समूह, रूप (पद), वाक्य-संरचना एवं मुहावरे आदि की दृष्टि से कहाँ और क्या अंतर है या उसकी क्या विशेषताएँ हैं, इन्हीं सभी पक्षों का अध्ययन भाषिक भूगोल नामक शाखा का मुख्य विषय है।

भाषा-भूगोल में सर्वप्रथम क्षेत्र विशेष के भिन्न-भिन्न स्थानों की भाषा का वर्णनात्मक अध्ययन किया जाता है और फिर उन विभिन्न स्थानों की भाषा विषयक विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन कर यह निश्चय किया जाता है कि कितने स्थानों की भाषा में लगभग साम्य है। इतना ही नहीं स्थानीय अंतर कहाँ कम है और कहाँ अधिक-इस पर भी विचार किया जाता है। साथ ही कहाँ से भाषा में इतना परिवर्तन आरंभ हो गया है कि एक क्षेत्र का व्यक्ति दूसरे क्षेत्र की भाषा को समझ सके, इस पर भी विचार किया जाता है। इन बातों का निर्धारण हो जाने पर यह सुनिश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र में इतनी भाषाएँ हैं और उनके क्षेत्र की सीमा अमुक जगह तक है। साथ ही, प्रत्येक भाषा के अंतर्गत आने वाली बोलियों और प्रत्येक बोली की उपबोलियों एवं उनके क्षेत्रों तथा एक-दूसरे की अलग करनेवाली विशेषताओं का भी निर्धारण किया जाता है।

5. भाषा (प्रागैतिहासिक खोजद्) - भाषा-विज्ञान की यह शाखा इतिहास, सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसमें इतिहास के उस अंधे युग पर, जिसके संबंध में कोई भी सामग्री उपलब्ध नहीं होती, भाषा के सहारे प्रकाश डाला जा सकता है। प्रसिद्ध जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने भाषा-विज्ञान की इस शाखा की नींव डाली थी। इस तरह की खोज के लिये पहले किसी भाषा के प्राचीन शब्दों को लिया जाता है, तत्पश्चात् उस परिवार की अन्य भाषाओं के प्राचीन शब्दों की तुलना के आधार पर यह निश्चित किया जाता है कि प्राचीनतम काल के शब्द कौन-कौन थे। इन शब्दों को इकट्ठा करके उनका विश्लेषण कई दृष्टियों से किया जाता है। सामाजिक, धार्मिक आदि वर्गों में शब्दों को अलग-अलग करके अनुमान लगाया जाता है कि उस समय की सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक दशा क्या थी। जानवरों के नामों से यह पता चलता है कि उनके पास कौन-कौन से जानवर थे। ‘क्रियापरक’ शब्दों से उनके सामाजिक जीवन पर प्रकाश पड़ता है। इस तरह यथासाध्य उन शब्दों के आधार पर जीवन के प्रत्येक अंग की छानबीन की जाती है और एक पूरा नक्शा तैयार करने की कोशिश की जाती है। साथ ही प्रकृति, पर्वत, नदी, पेड़-पौधे तथा ऋतु से संबंधित शब्दों के आधार पर यह अनुमान भी लगाया जाता है कि किस स्थान पर इन सबका इस रूप में पाया जाना संभव है। इससे उसके आदिम स्थान का अनुमान लगाना सहज हो जाता है।

6. मनोभाषा-विज्ञान - इस शाखा में भाषा के मनोवैज्ञानिक संदर्भो एवं पक्षों पर विचार किया जाता है। वास्तव में, भाषा हमारे मनोभावों एवं विचारों को ही तो व्यक्त करती है। इसी कारण शब्दों के प्रयोग में हम बहुत सतर्क रहते हैं। हम सदा ही शब्दों के चयन की प्रक्रिया से जुड़े रहते हैं। जाहिर है चयन की यह प्रक्रिया हमारे मन की विशिष्ट स्थिति की संकेतिका है। इसी कारण इस शाखा में मानसिकता एवं मन की गुह्यता के अध्ययन के आधार पर भाषा का अध्ययन करते हैं।

7. समाज भाषा-विज्ञान - भाषा पूर्णतया सामाजिक वस्तु है। व्यक्ति समाज में ही उसे सीखता है। समाज में ही वह उसका प्रयोग करता है। स्पष्ट है भाषा और समाज अन्योन्याश्रित हैं। इस संबंध का ही परिणाम है कि भाषा अपनी व्यवस्था में समाज के अनुरूप होती है। साथ ही उसका विकास भी सामाजिक विकास के समानांतर चलता है। किसी समाज के विषय में उसके द्वारा प्रयुक्त भाषा के आधार पर बहुत कुछ कहा जा सकता है। भारतीय भाषाओं में चाचा, ताऊ, मामा, मौसा जैसे संबंध द्योतक शब्दों का अभाव है। जाहिर है भारतीय समाज में इन मानवीय संबंधों का वहाँ की अपेक्षा अधिक महत्व रहा है। फारसी में बड़े लोगों के लिये समानार्थ क्रिया के बहुवचन रूप का प्रयोग इस तथ्य का प्रमाण है कि वहाँ की सामंती व्यवस्था में अमीर या बड़े आदमी एक से अधिक सामान्य या निम्न श्रेणी के व्यक्ति के बराबर माने जाते थे। जापान में राजा तथा राजघराने के लोगों के लिये सामान्य भाषा से अलग शब्दों एवं रूपों के प्रयोग इस बात के संकेत हैं कि वहाँ के समाज में राज्य का स्थान बहुत ही विशिष्ट हुआ करता रहा है। संभवतः भाषा और समाज के इस अभिन्नत्व के कारण ही इस शाखा का जन्म हुआ है। भाषा के इस सामाजिक संदर्भ को व्याख्यायित करने वाली इस शाखा का संबंध वास्तव में सामाजिक विज्ञान से भी बनता है।

8. लिपि-विज्ञान - वैसे लिपि भाषा का प्रत्यक्ष अंग नहीं है। तभी कुछ विद्वान इसे भाषा-विज्ञान की शाखा के रूप में स्वीकार करना नहीं चाहते किंतु फिर भी प्रत्यक्षतया भाषा-विज्ञान के अंतर्गत न आने पर भी भाषा-विज्ञान के अंतर्गत इसका अध्ययन असंबंद्ध नहीं माना जा सकता। हमें पता है कि लिखित भाषा में लिपि का सहारा नितांत अपरिहार्य है। जाहिर है इसी कारण भाषा-विज्ञान के अंतर्गत यदि इसके अध्ययन को भी भाषा वैज्ञानिक कुछ ही सीमा तक सही मानते हैं तो इसके पीछे एक तर्क है। लिपि की उत्पत्ति विकास शक्ति तथा उपयोगितायें पर कुछ ऐसे प्रकरण हैं जिनपर भाषा-विज्ञान की इस शाखा में विचार किया जाता है। ध्वनि-विज्ञान की सहायता से लिपि

के सुधार आदि पर भी इस शाखा में विचार किया जाता है।

9. शैली-विज्ञान-भाषा - विज्ञान की यह शाखा वस्तुतः बहुत नई नहीं है। बहुत पूर्व में ही भाषा-शास्त्रियों का ध्यान इस पर गया था। सच तो यह है कि हर व्यक्ति की शैली ही उसके व्यक्तित्व के अनुरूप होती है।

प्रश्न है, शैली है क्या? वास्तव में भाषा के संदर्भ में शैली का प्रत्यक्ष संबंध अभिव्यक्ति से जुड़ा हुआ है। हर भाषा में ध्वनि, शब्द-समूह, रूप-रचना तथा वाक्य-संरचना की दृष्टि से अभिव्यक्ति का एक सर्व स्वीकृत मानक या परिनिष्ठित रूप होता है, जिसे उस भाषा में अभिव्यक्ति का एक सामान्य ढंग कह सकते हैं। जो लेखन में या बोलने में इसी सामान्य रूप का प्रयोग करते हैं, उनकी अपनी कोई शैली नहीं होती। शैली मानी जाती है उनकी जो इस सामान्य रूप से ध्वनि, शब्द-समूह, रूप-संरचना और वाक्य-संरचना आदि की दृष्टि से हटकर भाषा का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार शैली विशेष के लिये आवश्यक है कि चुनकर भाषिक ईकाइयों का ऐसा प्रयोग हो जो सामान्य की तुलना में विशेष या अलग हो। भाषा की सामान्य अभिव्यक्ति पूरे भाषा-समाज की होती है, किन्तु शैली व्यक्ति की या वैयक्तिक होती है। इसका मुख्य आधार है चयन। व्यक्ति अपनी आवश्यकता और रुचि के अनुकूल चयन कर अपनी अभिव्यक्ति करता है। महाकवि निराला या पंत को उनके चयन की इसी प्रक्रिया के आधार पर पाठक पहचान लेता है। यह आधार है उनकी शैली । वास्तव में भाषा-विज्ञान में शैली का अध्ययन ही शैली-विज्ञान है।

10. भू-भाषा विज्ञान - इसके अंतर्गत विश्व में भाषाओं का वितरण, उनके राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्त्व का आकलन, कैसे एक-दूसरे पर अंतरूक्रिया करती हैं, राष्ट्रों की संस्कृति भाषा को कैसे प्रभावित करती है, यहाँ तक कि राष्ट्रभाषा और राजभाषा जैसे प्रकरणों का अध्ययन भी इस शाखा के अंतर्गत किया जाता है। यह शाखा वास्तव में भाषा-विज्ञान की अपेक्षाकृत नयी शाखा है।

11. व्यक्ति-बोली विकास-शाखा - वस्तुतः अंग्रेजी का ‘आटोजेनी’ शब्द मूलतः जीव-विज्ञान का है

जिसका प्रयोग 1870 के आस-पास किसी एक व्यक्ति के विकास के अर्थ में किया गया था । आधुनिक काल में भाषा वैज्ञानिकों ने इसके साथ भाषिक शब्द जोड़कर उसे भाषा-विज्ञान की एक शाखा के रूप में स्वीकार कर लिया है। इसमें व्यक्ति विशेष की बोली या व्यक्ति विशेष की भाषा के, जन्म से लेकर मृत्यु तक के विकास की प्रक्रिया का विस्तृत और गहन अध्ययन किया जाता है। कह सकते हैं कि इसमें एक व्यक्ति की भाषा के विकास (जन्म से मृत्यु तक) का अध्ययन-विश्लेषण वैज्ञानिक पद्धति पर किया जाता है। सैद्धांतिक दृष्टि से इस विषय पर हॉकेट जैसे भाषाविद् ने काफी विचार किया है।

सब जानते हैं कि छोटे बच्चों में भाषा जैसी कोई चीज नहीं होती, किंतु भूखा रहने पर या दर्द होने पर पीड़ित होकर वह रोकर या अंगों को पीटकर अपनी बात व्यक्त करना चाहता है। यही प्रतिक्रिया बच्चों के लिये भाषा की मनिंद है। हर माँ समय और स्थिति के आधार पर इन प्रतिक्रियाओं से उसकी भूख और दर्द होने की स्थिति का अनुमान कर लेती है। बच्चा धीरे-धीरे यह जान लेता है कि भूखा रहने पर रोने की क्रिया द्वारा वह खाना खा सकता है। फिर तो रोने की क्रिया का वह भाषा के रूप में प्रयोग करने लगता है। इतना ही नहीं, माँ अनेक संदर्भो को उसे अनेक संकेतों या इशारों से ही समझा देती है। बच्चा समझ भी लेता है। इस तरह अपने विचारों का आदान-प्रदान बच्चे छोटी अवस्था से ही करने लगते हैं। इस शाखा में इसी का अध्ययन किया जाता है।

12. सर्वेक्षण-पद्धति शाखा - यदि हमें किसी ऐसी भाषा का सर्वेक्षण करना हो, जिसकी सामग्री लिखित रूप में हमें उपलब्ध नहीं है और वह भाषा किसी खास क्षेत्र में प्रयोग में आ रही है, तो क्षेत्र में जाकर उस भाषा के प्रयोग करने वालों को सुनकर, अध्ययन के लिये अपेक्षित सामग्री संकलित करने की स्थिति बनाते हैं। वस्तुतः अध्ययनार्थ अपेक्षित सामग्री संकलित करने की पद्धति ही सर्वेक्षण-पद्धति कहलाती है। इसके लिये सामग्री संकलन की दो पद्धतियाँ होती हैं रू 1. स्वयं उस क्षेत्र में जाकर यह संकलन तैयार करना, और 2. उस भाषा को मातृभाषा के रूप में बोलने वाले अर्थात् मातृभाषा भाषी को अपने यहाँ बुलाकर । इस संदर्भ में सूचना देने वाला व्यक्ति अर्थात्

सूचक एक महत्त्वपूर्ण इकाई है। स्वयं सर्वेक्षण करनेवाला व्यक्ति योग्य एवं प्रशिक्षित होना चाहिये । सर्वेक्षक इस हेतु एक प्रश्नावली पूर्व से तैयार कर लेता है । सूचक से हुई बातों की रिकार्डिंग तैयार की जाती है। उपलब्ध सामग्री को सर्वेक्षक साथ-साथ लिखता जाता है। साथ ही उसके विशेष अर्थ भी वह लिखता जाता है। जाहिर है, इसमें सूचक कैसा चुनें, सर्वेक्षक कैसा हो, प्रश्नावली कैसे बनाएँ, सामग्रियों को किस तरह लिखें, यह सब अत्यंत महत्त्व की बातें हैं।

13. सांख्यिकीय भाषा-विज्ञान - भाषा-विज्ञान की इस शाखा में सांख्यिकी के आधार पर भाषा के विभिन्न पक्षों पर गहनता से विचार किया जाता है। यह गणितीय भाषा-विज्ञान के अंतर्गत आता है। सांख्यिकी गणित की ही एक शाखा है। यह जान-समझकर विस्मय होता है कि भाषा-विज्ञान के क्षेत्र की अपेक्षाकृत यह नयी शाखा भारतवर्ष के लिये सर्वथा नयी नहीं है। सच तो यह है कि इस दिशा में पहला कार्य करने का श्रेय भी भारत को ही जाता है। ईसा की तीसरी-चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व में बनायी गयी वैदिक अनुक्रमणियाँ वास्तव में और कुछ नहीं सांख्यिकी भाषा-विज्ञान की ही पृष्ठभूमि है। सारे संसार के भाषाविदों ने इसे अपने ढंग का अनूठा प्रयास माना है।

14. तुलनात्मक पद्धति या पुनर्निर्माण शाखा - तुलनात्मक पद्धति भाषा-विज्ञान में पूर्व से ही अध्ययन की पद्धति के रूप तुलनात्मक भाषा-विज्ञान के ही अंग की तरह है, परंतु इसकी विशेषता यह है कि इसमें दो या दो से अधिक भाषाओं या बोलियों के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर पहले से ही निश्चय किया जाता है कि वे एक ही परिवार की है या नहीं, और फिर सूक्षम तुलना के आधार पर उन भाषाओं या बोलियों की पूर्वजा भाषा-(जिनसे उनकी उत्पत्ति हुई है, जैसे हिन्दी के लिये अप्रभंश या फिर संस्कृत) का पुनर्निर्माण किया जाता है, अर्थात् उसकी ध्वनियों तथा उसके व्याकरणिक रूपों एवं अन्य नियमों आदि को ज्ञात किया जाता है।

17वीं सदी से लेकर अब तक भाषा के पारिवारिक वर्गीकरण एवं पारिवारिक अध्ययन के क्षेत्र में जो कार्य हुए हैं उसका आधार तुलनात्मक पद्धति ही है। इस पद्धति में पहले दो भाषाओं के शब्दों को एकत्र कर उनका तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। शब्दों के तुलनात्मक अध्ययन के फलस्वरूप देखा गया है कि दोनों भाषाओं के बहुत-से शब्दों में ध्वनि (या रूप) और अर्थ की दृष्टि से बहुत साम्य है। स्पष्ट ही यह एक वैज्ञानिक पद्धति है।

ऊपर जिस सांख्यिकीय शाखा की चर्चा की गयी है, अपने यहाँ की संहिताओं पर इस दृष्टि से कार्य हुआ है। इनमें से एक के अनुसार ऋग्वेद में 1017 मंत्र, 10580.5 छंद, 153826 शब्द तथा 432002 अक्षर हैं।

यों आधुनिक काल के सांख्यिकीय भाषा-विज्ञान का प्राचीन भारतीय कार्य से कोई तालमेल नहीं है। कहा जाता है कि सर्वप्रथम रूसी भाषाविद् बुंजकोपस्की ने 1847 ई० में भाषा-विज्ञान में गणित के प्रभाग के प्रयोग की संभावना जताई थी। सांख्यिकी भाषा-विज्ञान में ध्वनि, ध्वनि ग्राम, अक्षर, शब्द, रूप, मुहावरे, लोकोक्तियाँ तथा वाक्यों की पद्धति आदि सभी भाषिक इकाइयों की गणना की जाती है और उनके आधार पर अनेक दृष्टियों से उपयोगी परिणाम निकाले जा सकते हैं। इसके द्वारा किसी रचनाकर के बारे में किसी कवि या लेखक की विभिन्न रचनाओं के कालक्रम के बारे में, किसी भाषा से दूसरी या कई भाषाएँ कब निकली, किसी भाषा की आधारभूत शब्दावली कितनी है, आधारभूत व्याकरणिक ढांचा क्या है, ये सब जाने या बताए जा सकते हैं।

इन सभी शाखाओं के अलावा कुछ अन्य दृष्टियों एवं आधारों पर भी अध्ययन किया जाता है। इनमें कुछ का भाषा-विज्ञान के विभागों-उपविभागों के रूप में उल्लेख किया जाता है। जैसे ‘सुर-विज्ञान’ जिसमें भाषा के सुरों का अध्ययन होता है। इसमें से लघुतम सार्थक भाषिक इकाई का अध्ययन संभव होता है। ऐसे ही भाषा-विकास में भाषा में परिवर्तनशीलता तथा उसके कारणों की खोज की जाती है। ‘रूपांतरण’ नामक शाखा में भाषा के व्याकरण एवं ध्वनियों के रूपांतरण की दृष्टि से अध्ययन किया जाता है। ‘व्यतिरेकी विश्लेषण’ भाषा-विज्ञान की ऐसी शाखा है जिसमें दो भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन करके उनकी समानताओं का विश्लेषण किया जाता है।

बोली-विज्ञान भी भाषा-विज्ञान की एक उप शाखा है जिसमें उनकी ध्वनियों तथा रूप विषयक विशेषताओं के आधार पर ही वर्गीकरण किया जाता है। जाहिर है यह भाषाओं के रूपात्मक या आकृतिमूलक वर्गीकरण के अधिक समीप की शाखा प्रतीत होती है।

इधर एक नयी शाखा भी प्रकाश में आई है जिसे ‘जाति-विज्ञान’ के नाम से अभिहित किया जाता है। इस शाखा में जाति-विज्ञान और भाषा-विज्ञान इन दोनों विज्ञानों के संबंधों और आपसी प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। भाषा की प्रकृति और भाषा-विज्ञान के इतिहास आदि का अध्ययन भाषा-विज्ञान की विशिष्ट शाखा के अंतर्गत किया जाता है। 

(सौजन्य: गुगल)
धर्म, भाषा और लिपि

1. धर्म - यह एक व्यक्तिगत और बहुत ही संवेदनशील विषय है। सबसे पहले तो आस्तिक-नास्तिक का सवाल उठ खड़ा होता है। साथ ही ईश्वर है-नहीं है का सवाल है। अगर ईश्वर है, तो कितने तरह के ईश्वर हैं, वगैरह-वगैरह। इस बहस में नास्तिकों ने हमेशा आस्तिकों से बाजी मारी है। किसी धर्म विशेष का ठेकेदार जो धर्म पर बहस करने को राजी हो, तो समझ लेना उससे महा अधार्मिक व्यक्ति इस जगत में और कोई हो नहीं सकता है। चूंकि यह व्यक्तिगत है, अतएव इसका भाषा और लिपि से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है।

2. भाषा - भाषा वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि भाषा कोई दैवीय देन नहीं है। इसकी उत्पत्ति मानव समाज में बहुत बाद में हुई होगी। मानव जाति के पास जन्म लेते ही ध्वनि तो है पर भाषा नहीं। यह स्वाभाविक है कि मानव समुदाय कई वर्षों तक इशारों में ही अपना काम चलाते रहे। लेकिन पास रहे तो इशारों में काम चल सकता है। पर त्वरित एवं दूर-दराज तक संप्रेषण कर पाना असंभव है। अतः इसके लिए प्रतीकों का सृजन अवश्यंभावी था।

ध्वनि का निकलना मानव मुख से ही संभव है। ध्वनि मुख के किस कोण से निकलती है, समाज ने उसपर चिंतन किया और उस ध्वनि के अर्थ को सामाजिक मान्यता दी। बगैर सामाजिक मान्यता दिये वह ध्वनि भाषा कदापि नहीं बन सकती है। इससे एक दूसरे के साथ संप्रेषण करने में सुविधा होती है। अतः मुख से निकलने वाले प्रतीक चिन्हों को भाषा कहा जाता है। भाषा की प्रकार दो तरह की होती है - मौखिक (oral) और लिखित (written)।

3. लिपि - जो ध्वनि/वर्ण भाषा को लिखित रूप प्रदान करे, उसे लिपि कहा जाता है। अतः सिद्ध हो गया कि :

· भाषा ध्वनि संकेतों से मिलकर बनी होती है, जबकि लिपि वर्ण संकेतों से मिलकर बनी होती है।

· भाषा मौखिक होती है, जबकि लिपि को लिखने के लिए भौतिक साधनों की ज़रूरत होती है।

· भाषा का संबंध कानों से होता है, जबकि लिपि समय-स्थान की सीमाओं से मुक्त होती है।

· भाषा में अस्थायित्व होता है, जबकि लिपि ज़्यादा स्थायी होती है।
सार यही है कि धर्म, भाषा और लिपि में कोई आपसी संबंध नहीं है। अगर कोई संबंध है, तो उसे सामाजिक मान्यता देने वाली संस्था है। उस संस्था को किसी समाज विशेष का नाम भी दिया जा सकता है।

Tuesday, 8 August 2023

आदिवासियों को आपस में लड़ा दो

इस आधुनिक युग में किसी समुदाय के ऊपर विजय पाने के लिये सम, दम, दण्ड और भेद की नीति को उपयोग में लाया जाता है। हूल के समय दुश्मनों के साथ आमने-सामने लड़ने की तरकीब, अब मूर्खता की श्रेणी में आ गई है। हाँ, रुस-युक्रेन हो या गाजा-इजराइल, इस घटना में "दण्ड" की नीति का उपयोग हो रहा हो, तो कोई बड़ी बात नहीं है।

किसी के सामुदायिक विकास में उस समुदाय की एकता बहुत मायने रखती है। वरना एकता टूटी, दुर्घटना घटी वात हो जाती है। हमारे पूर्वजों में आपसी एकता कूट-कूटकर भरी हुई थी। संताल इतिहास के पन्नों में इनके जीते-जागते मिसालें हैं - "माधो सिंह बिडरा़उ" और ”संताल हूल-1855“। तब संतालों में गजब की एकता थी! हजारों वर्ष पूर्व की घटना है। उन्होंने अपने समाज की पवित्रता को कायम रखने हेतु दूध-दही की नदियाँ बहने वाला देश "चाय-चाम्पा" को भी दुष्ट माधो सिंह के डर से परित्याग कर दिया था। इसके बाद संतालों ने आज से ठीक 168 वर्ष पूर्व "संताल हूल-1855" के दौेरान बेमिसाल एकता का परिचय दिया था। अब वक्त के साथ संतालों में बहुत बड़ा बदलाव आ गया है। इस पर विश्लेषणनात्मक अध्ययन की जरुरत है।

संताल एक संत प्रवृति के समुदाय हैं। वे कठिन परिश्रमी के साथ-साथ सत्यवादी हैं। उनमें आपसी भाई-चारा और उनका आपसी प्यार देखते ही बनता है। पर उनके साथ विडंबना ही है कि उनके मृदुभाषी एवं सत्यवादी होने के कारण, उन्हें बड़ी आसानी के साथ अपनी गिरफ़्त में लेकर उसका मनमाफिक दोहन किया जा सकता है।

जब भारत देश गुलामी की जंजीरों से जकड़ा हुआ था, तब ऐसी विषम परिस्थिति में भी संताल अपनी एकता का परिचय देते हुए, तात्कालीन हुक्मरानों के साथ युद्ध करके, उनके जबड़े से अपना अलग संताल परगना छिन लिया था। क्या यह कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है? ध्यान रहेऋ ऐसा इसलिए हो पाया, क्योंकि संतालों में एकता रूपी ताकत कूट-कूटकर भरी हुई थी। दूसरी बात, जिनके विरु( हूल का बिगुल फूंका गया था, वे आज की मनुवादी ताकतें हैं। यही मनुवादी ताकतें अब संतालों को नेस्तानाबूद व उनकी एकता को तोड़ने के लिए उनके विरु( हजार तरह के षडयंत्र रचे जा रहे हैं। उन षडयंत्रों के तहत संतालों के बीच धर्म, लिपि, राजनीति एवं क्षेत्रवाद का विषैला जहर फैलाया जा रहा है। अर्थात् इन्हीं विषयों पर इनके बीच विभेद व फूट पैदा करने की साजिश रची जा रही है।

इस समय रोटी के लिए लड़ रही दो बिल्लियों का फैसला अगर कोई बंदर सुनाए, तो अजीब लगता है। जैसे झारखण्ड के तात्कालीन सीएम साहब ने लिटीपाड़ा में सरकारी फरमान जारी कर दिया कि कल सूरज उगने से पहले, सभी सरकारी दफ्तरों में ओल चिकी से लिखे साईन बोर्ड दीखना चाहिए। जो हुक्म जहाँपनाह! और इस तरह चमड़े का सिक्का चल पड़ा। भोर होते ही वह अवैज्ञानिक लिपि दांत फाड़कर हंस रही थी। मानो, सं. प. वालों का मजाक उड़ा रही हो। यही वह बंदर जज है, जो दो बिल्ली की लड़ाई पर अपना फैसला दे रहा था। आप बताओ, क्या पूर्व सीएम साहब ने जो कदम उठाया, क्या वह उसका मात्र जबानी आदेश था? क्या इस तरह कानून को जमीन पर उतारने के लिए किसी सरकारी नियमों का पालन किया गया? शायद नहीं। कुछ भी हो। क्या पूर्व सीएम साहब को संताली के बारे में कुछ पता है? क्या उन्हें मालूम है कि जिस लिपि का वे पैरवी कर रहे हैं, वह पूर्णतः अवैज्ञानिक है? पूर्व सीएम साहब को संताली के बारे में खाक पता है।

मनुवादियों ने भेद की नीति के तहत ही इस लिपि विवाद को बढ़ावा दिया है। सं. प. की जनता किसी सख्त दीवार की तरह अपनी कौम की रक्षार्थ अडिग खड़ी है। सं. प. संतालों का एक अभेद्य किला माना जाता है। लिपि विवाद इस किले को तोड़ने का एक षडयंत्र है। यही वजह है कि इस अवैज्ञानिक लिपि को उड़िसा से मंगाया गया है। झारखण्ड में अच्छा-भला संताली का पठन-पाठन का कार्य सदियों से देवनागरी लिपि से हो रहा था। अब इस लिपि विवाद ने न सिर्फ संताली साहित्य को आगे बढ़ने से रोक दिया है, बल्कि स्कूल-कॉलेजों में संताली की पढ़ाई भी अवरुद्ध हो गई है। और एक दिन ऐसा आयेगा कि इस धरा से संताली जड़समूल नष्ट हो जाएगी।

लिपि एक अति संवेदनशील मामला है। लिपि को पहचान के नाम पर लोगों को बरगलाया जा रहा है। यह जग जाहिर है, दुनिया में लिपि किसी देश, समुदाय एवं भाषा की पहचान नहीं बन सकी है। यह कुतर्क है कि लिपि कोई पहचान देती है।

मनुवादियों का यह एक बहुत बड़ा षडयंत्र है। नहीं तो क्या कारण है कि साहित्य अकादमी जैसी संस्था किसी उत्कृष्ट रचना की पहचान व चयन हेतु सिर्फ किसी एक लिपि विशेष को ही दी जाती है। उस भाषा की अन्य रचनाएं जिसे अन्य लिपियों में लिखी गईं हैं, उसे कोई महत्व नहीं दिया जाता है। स्पष्ट शब्दों में कहा जाय तो यह साफ है कि संताली के लिए सिर्फ ओल चिकी लिपि में लिखित रचनाओं को ही पुरस्कृत किया जाता है। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए ताकि संताल समुदाय लिपि के लिए आपस में लड़ता रहे। मनुवादियों की यह बहुत बड़ी साजिश है कि संतालों को लिपि, धर्म, राजनीति एवं क्षेत्रवाद को लेकर आपस में लड़ाते रहो। इससे मनुवादियों की हर मनोकामना पूरी हो जाती है।

Tuesday, 2 August 2022

आखिर इसकी जड़ कहां है?

कोई भी घटना घटित होने के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण अवश्य होता है। अपने आप कोई भी घटना घटित नहीं होती है। इसके पीछे कोई कारण अवश्य रहा होगा कि यह घटना घट गई। लेकिन हम अक्सर उन वैज्ञानिक कारणों को नहीं जान या पहचान पाते हैं, बल्कि मान जाते हैं और उस पर विश्वास करने लग जाते हैं। इसी को कहा जाता है - अंधभक्ति और इसकी पूजा करने वाले को अंधभक्त। एक छोटा-सा उदाहरण लेते हैं। अभी-अभी इसी सड़क से एक नौजवान सरपट दौड़ा जा रहा था। इसके ठीक दो सेकंड पहले ही एक बस भी चली गई। लोगों ने देखा कि उस नौजवान के पीछे एक कुत्ता भी भागा जा रहा था। आस-पास के लोगों से पूछा गया कि आखिर वह नौजवान क्यों दौड़ रहा था? इस पर लोगों की अलग-अलग राय थी। किसी ने कहा कि बेचारा नौजवान! उसको कहीं जाना था। इसलिए वह बस पकड़ने के लिए दौड़ रहा था। परंतु उसकी बस छूट गई। किसी और ने बताया - गलत। देखते नहीं हो, उस नौजवान के पीछे एक कुत्ता दौड़ रहा था। वह नौजवान कुत्ते के डर से भागा जा रहा था। जितने मुँह, उतनी बातें। जब इस मसले पर अच्छी तरह शोध किया गया, तो पता चला कि वह नौजवान न तो बस पकड़ने और न ही कुत्ते के डर से भाग रहा था। बल्कि यह तो उनका दैनिक जीवन की एक दिनचर्या थी। वह कसरत/व्यायाम कर रहा था।

इस वक्त संताल जगत में लिपि की चर्चा ने सबकी नींद हराम कर रखी है। सभी बेगाने की शादी में अब्दुल्ला दीवाना बने फिर रहे हैं। सभी अपने आपको महान भाषावैज्ञानिक साबित करने में लगे हुए हैं। एक पक्ष का दावा है कि इस लिपि विशेष से दुनिया की तमाम भाषाएँ शुद्ध-शुद्ध लिखी जा सकती हैं, यहाँ तक कि चाइनीज भाषा को भी लिखा जा सकता है। इस पक्ष का कोई ... पति नामक महापण्डित विदेश भ्रमण पर निकला था। उसके अनुसार इस लिपि को जल्द ही दुनिया के तमाम राष्ट्र अपनाने जा रहे हैं। अरे भई, आपको अग्रिम मुबारक हो, आपकी लिपि यथाशीघ्र दुनिया की लिपि बन जाए। लेकिन इतना तो बता जा कि आपकी लिपि कहीं चोरी की हुई लिपि तो नहीं है? यह वर्णमाला नहीं अपितु यह शब्दमाला है। 

संयोग ही कहा जाएगा कि जब दक्षिण में ओ़ल चिकी लिपि का आविष्कार हो रहा था, तब उत्तर (संताल परगना) में 7 खण्डों में संताल विश्वशब्दकोश बनकर तैयार हो चुका था। इतना ही नहीं, उसी समय जब भारतीय भाषाई सर्वेक्षण की रिपोर्ट उसके महानिदेशक जी. ए. ग्रियर्सन द्वारा लिखी जा रही थी, तो उसने साफ-साफ शब्दों में लिख दिया कि उड़ीसा की संताली आर्यों की भाषा के साथ घुलमिल गई है, इसलिए यह एक बोली है और अमानक भी है। जबकि उत्तर (संताल परगना) की संताली निष्कलंक है, इसलिए संताल परगना की संताली ही विशुद्ध और मानक है।

इस लिपि विवाद पर एक शोधार्थी ने अपने शोधपत्रा में बड़े ही दिलचस्प तथ्यों को उजागर किया है। वह लिखता है कि यह विवाद ओल चिकी बनाम देवनागरी कतई नहीं है। बल्कि इसके सूत्राधार और कहीं बैठे हुए हैं। बल्कि यह लड़ाई वर्षों पुरानी है। अपने शोध में उसने यहाँ तक लिख दिया है कि यह सुर-असुर के जमाने की लड़ाई है। दिन-समय और घटना के हिसाब से इसके पात्र बदले गए हैं। पटकथा वही पुरानी है।

उस शोधार्थी का शोधपत्र बहुत लंबा है। अतएव यहाँ उसका सार बताना ही उचित होगा। वह आगे लिखता है कि अगर भारत में अंग्रेज न आये होते, तो भारत में विशेषकर अ.ज,अ.ज.ज, ओ.बी.सी एवं अल्पसंख्यों की स्थिति आज बद से बदतर हुई होती। आप यकीन करोगे कि दबे-कुचलों को अंग्रेज आगमन से पहले पढ़ने-लिखने भी नहीं दिया जाता था। अगर किसी ने चोरी-छिपे शैक्षिक बातें सुनने की चेष्टा की, तो उसके कान में गरम शीशा डाला जाता था। और जिसने भी शिक्षा की बात की, उसकी जीभ काट दी जाती थी। छुआछूत किस कदर अभी भी जिंदा है, वह आपके सामने है। अगर डॉ भीमराव अम्बेडकर साहब भारत का संविधान न लिखे होते, तो हम यह सब सोचने के काबिल भी न होते। अंग्रेजों की देन विस्मरणीय है।

उस शोधपत्र के पृष्ठ संख्या 540 पर शोधार्थी दलील के साथ लिखता है कि संताल हूल-1855 दिकू महाजनों के विरुद्ध हुआ था न कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ। उन दिकू महाजनों का अत्याचार संतालों के प्रति इतना बढ़ गया था कि संतालों के पास हूल के सिवा और कोई चारा न था। शोधार्थी आगे डंके की चोट पर लिखता है कि उस समय संताल परगना में एक ही तो अंग्रेज साहब-जेम्स पोण्टेट था। क्या एक अंग्रेज अफसर के विरुद्ध हूल किया जाता है? क्या एक व्यक्ति के खिलाफ हूल किया जा सकता है? कदापि नहीं। 

शोधार्थी लिखता है; असली कहानी हूल के बाद घटती है। सूर-असूर की लड़ाई रहते हुए भी असुरों ने मिशनरियों के भरोसे शिक्षा ग्रहण की। असुरों की आँखें खुलीं। वे दूध का दूध और पानी का पानी के न्याय को जानते हैं।

लिपि विवाद की असली जड़ संताल हूल में छिपी हुई है। हूल का मुख्य कारण; दिकू महाजनों ने संतालों को जीभर कर लूटा। दिकूओं ने दमन व अत्याचार की सारी हदें पार कर दी थीं। महाजनों के उत्पीड़न से मानवता तार-तार हो गई थी। यह सच है कि संताल लोग महाजनों से ऋण लेते थे। इनका ब्याज दर 500 गुना से भी ज्यादा होता था। इूसरा सच यह भी है कि जो ऋण नहीं लेते थे, उनको भी बेवजह ऋण के जाल में फंसा दिया जाता था। वैसे तो महाजन खलिहान से ही धान के रूप में ऋण वसूली कर लिया करते थे। लेकिन अदायगी न कर पाने की स्थिति में महाजन संतालों की जमीन-जयदाद, मवेशी यहाँ तक की उनके बीबी-बच्चे को उम्र भर जीभर कर दोहन करते एवं बेगारी के रूप में अपने यहाँ नौकर रख लेते थे।

दंतकथाओं के अनुसार सूर-असूर के युद्ध में छल-कपट के सहारे असूर हमेशा पराजित होते रहे हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण “दिबी दासाँय” है, जिसमें संतालों के राजा हुदुड़ दुर्गा़ को छल-कपट के सहारे किसी वेश्या के द्वारा मारा जाता है। इस त्योहार में दिकू उस वेश्या की पूजा-अर्चना करते हैं, तो संताल इसके विरोध में दासाँय करते हैं एवं अपने राजा की हत्या होने पर हाय-हाय करते हैं।

मालूम हो कि संतालों ने हूल में सूद सहित दिकुओं से बदला ले लिया था। जितने भी महाजनी का करोबारी करते थे, उनको चुन-चुनकर मौत के घाट उतारा। ऐसा नरसंहार दुनिया के इतिहास में नहीं मिलता है। ऐसा नहीं है कि संतालों ने हूल के बारे में ब्रिटिश शासक को आगाह नहीं किया था। आगाह किया था, पर अंग्रेजों ने मजाक समझकर इसे धता बता दिया था। अंग्रेज कभी सोच भी नहीं सकते थे कि जिनके तन-बदन में कपड़ा तक नहीं, जिनको कोई भी आक्षरिक ज्ञान नहीं। क्या वे कभी हूल को अंजाम दे सकते हैं? इसलिए अंग्रेज हूल की संभावना से कोसों दूर थे।

हूल का श्रीगणेश 7 जुलाई, 1855 को पंचकठिया वट वृक्ष के नीचे से हुआ। इसी दिन कुख्यात महाजन केनाराम भगत एवं दबंग दरोगा महेशलाल दत्ता की हत्या कर दी गई। करीब सप्ताह भर तक महाजनों को मौत के घाट उतारा गया। किसी तरह ब्रिटिश शासकों को इस खबर की भनक लगी। पहले तो इन्होंने इस कत्लेआम को रोकने के लिए “हिल रेन्जर्स” को भेजा। पर “हिल रेन्जर्स” संताल सेनानियों के सामने टिक न पाए। बाद में कोलकाता-दानापुर से सेना बुला लिए गए। संताल सेनानी एवं अंग्रेज सैनिकों के बीच घमासान युद्ध हुआ। युद्ध इतना भयंकार था कि ब्रिटिश शासकों को मार्शल लॉ लागू करना पड़ा। विडंबना यही है कि संतालों को हार की जीत मिली। अंग्रेजों को मजबूरन संतालों के लिए एक अलग प्रदेश - संताल परगना देना पड़ा। यहाँ तक कि उस नये प्रदेश में संतालों को अपनी परंपरा के अनुसार राज करने का अधिकार भी मिल गया। 

हूल के ठीक 5 वर्ष के बाद संताल परगना में मिशनरियों को आगमन हुआ। उन्हें संतालों की आर्थिक स्थिति को देखकर तरस आया। संतालों को गरीबी के दलदल से उठाने के लिए उन मिशनरियों ने शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया। संताल परगना में जगह-जगह स्कूल खोल दिए गए। उस शिक्षा के बदौलत ही संतालों की आँखें खुली। उनमें अच्छे-बुरे को पहचानने की शक्ति बढ़ती गई। स्वाभाविक है कि शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने अपनी साहित्यिक गति-विधि को भी बढ़ा दी थी।

हूल के परिणाम से बौखलाए महाजन संतालों की इस तरह की प्रगति को देखकर ईर्ष्या से जल उठे। इन्होंने संतालों की प्रगति में बाधा डालने के लिए भेद की नीति के तहत सबसे संवेदनशील मुद्दा धर्म को इनके बीच लाया। वे प्रत्यक्ष रूप से इनके बीच नहीं आये, परंतु इन्होंने अपने चेलों को उनके बीच भेजा। इस कड़ी के प्रथम चेलों में खेरवाड़ (साफा हो़ड़) आंदोलन के अगुआ बाबा भगीरथ का नाम आता है।

शोधार्थी प्रमाण के साथ लिखता है कि संताल परगना के लोगों ने हमेशा ही झारखण्ड आंदोलनकारियों का साथ दिया है। लेकिन दिकू लोगों ने हमेशा ही अपनी कूटनीति के तहत धर्म को बीच में लाकर संतालों की उन्नति को अवरुद्ध करने का काम किया है। लिपि विवाद कोई विवाद ही नहीं है। उड़ीसा में जन्मी इस लिपि के समर्थक सभी हिंदु हो चुके हैं। हिंदुवादी संगठनों की दाल संताल परगना में नहीं गल रही है। इसीलिए इन्होंने संताल परगना के कट्टर हिंदु समर्थक संतालों का चयन किया हुआ है; जिन्हें लिपि का रत्ती भर ज्ञान नहीं। इसीलिए तो वे हर हमेशा लिपि के तर्क में हार जाने के बाद धर्म-धर्म चिल्ला उठते हैं। इस आलेख का सार यही है कि ओल चिकी एक ऐसा हथियार है जिससे संताल समाज का नाश निश्चित है।

संताली साहित्य का भविष्य

जब संताली के लिए रोमन, देवनागरी एवं बंगला लिपि चलन में थी, तो चौथी अवैज्ञानिक लिपि बनाने की क्या जरुरत थी? सुना है, 1900 के दशक में उड़िसा के मयुरभंज इलाके में किसी लिपि चोर का उदय हुआ। उस लिपि चोर को भाषाविज्ञान के बारे में क, ख, ग ... भी मालूम नहीं। उसके साथ भाषा के मामले में एक तो करेला और दूजा ऊपर से नीम चढ़ा वाली बात हो गई। उसने आव देखा न ताव, इधर-उधर से लिपियों की चोरी कर ली। और इस तरह कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा उस भानुमति भाई ने कुनबा जोड़ दिया। यह भी कहा जाता है कि मूलतः वह लिपि मुण्डारी भाषा समूह के लिए बनाई गई थी। पर संताल छोड़ अन्यों ने अवैज्ञानिक होने के कारण उसे अस्वीकार कर दिया। फिर भागते चोर को लंगोटा ही सही, उसने अपनी लिपि के प्रचार हेतु एक संस्था की स्थापना कर डाली। तब से यह संस्था अपने खट्टे दही का प्रचार-प्रसार में जुटी हुई है। उस प्रचार की कड़ी में सबसे अहम मुद्दा बना "पहचान"। यह किस तरह की पहचान हुई? जबकि वे चौबीसों घंटे विदेशी वस्तुओं का उपयोग करने में तल्लीन हैं, और जब पढ़ाई-लिखाई के लिए लिपि की बात आती है, तो वे "आबुआक्-आबुआक्" करने लग जाते हैं। ज्ञात हो कि "मोंज दान्देर आंक" भी आबोआक् है, और यह इससे पहले और इससे भी अच्छी लिपि बन पड़ी है। फिर भी, क्यों नहीं उसे "आबुआक्-आबुआक्" करते हैं? अब जब "आबुआक्-आबुआक्" करने वाले चारों खाने चित हो गए, तो इन्होंने लिपि के साथ धर्म को भी जोड़ दिया है। जबकि धर्म के साथ भाषा व लिपि का कोई संबंध नहीं है। दुनिया में कई ऐसे देश हैं, जिनका रोम की जात-पात और धर्म के साथ कोई मेल नहीं, फिर भी इन्होंने रोमन लिपि को अपना रखा है। अंग्रेज को ही देख लो, उनकी अपनी कोई लिपि नहीं है। अंग्रेजी रोमन लिपि में लिखी जाती है, और इस वक्त अंग्रेजी दुनिया में अपना डंका बजा रही है। और तो और अपने पड़ोसी देश बंग्लादेश को ही देख लो। यह एक मुस्लिम बाहुल देश है। फिर भी यहां की जनता ने उर्दू-फारसी को छोड़कर बंगला लिपि को अपना रखा है। एक बात समझ में नहीं आती है, जब वे अंग्रेजों की पोशाक पैंट को बड़ी शान के साथ पहनते हैं, तो उनकी पहचान कहां चली जाती है? है न यह अजीब बात! इसे ही कहा जाता है - "गुड़ खाये, गुलगुले से परहेज।"

जब से उस नई लिपि का सृजन हुआ है, तब से उसके अंधभक्त उसके प्रचार कार्य में लगे हुए हैं। शुरुआती दौर में इसका खूब प्रचार-प्रसार हुआ। उनके लिए भाषा भाड़ में जाय, उनके लिए लिपि ही महत्वपूर्ण हो गई। यही कारण है कि 100 वर्ष की जयंती पर उन्होंने अब ओल चिकी मिशन - 2025  चला रखा है। लेकिन इनके सभी प्रचारक कंबल ओढ़कर घी पीने में मस्त निकले। न अभिावक, न मां-बाप और न ही कोई बच्चा, उस नई अवैज्ञानिक लिपि को सीख रहा है। कारण, पैंट के सामने सारी संताली पोशाक बेकार साबित हो गई।

स्पष्ट रूप से कहा जाय, तो हम तो डूबे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे वाली कहावत चरितार्थ हो गई। उन्होंने कोई ऐसी जगह न छोड़ी है, जहां उनका कब्जा न हो। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से लेकर हर जगह उनकी तूती बोल रही है। पाटाबिन्दा हो या लालपनिया धा़ेरो़म गढ़ हर जगह उनके परचम लहरा रहे हैं। लेकिन यह सच है, उनका यह खोटा सिक्का अब तक तो कामयाब होते दीख रहा है। इसका एकमात्र कारण यही है कि अच्छे लोग बुराई पर अपनी जुबान बंद रखे हुए हैं। जौहरी अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभा रहे हैं। तभी तो सोना के बदले लोहा हर जगह फुदक रहा है। "आबुआक्-आबुआक्" सिर्फ भावुकता पर अटकी हुई है। अंदर से यह पूरी तरह खोखली है। इसका साक्षात प्रमाण आपने हाल में संपन्न हुए जमशेदपुर पुस्तक मेले का नजारा देख ही लिया। उस मेले में ओल चिकी से मुद्रित संताली पुस्तकों का स्टॉल भी लगा हुआ था। परंतु कितनी अफसोस की बात है कि उस मेले में एक भी ओल चिकी संताली पुस्तक की बिक्री न हो सकी। हां, संताली पुस्तक प्रेमी देवनागरी/रोमन में प्रकाशित पुस्तकों के बारे में जानकारी अवश्य ले रहे थे। जमशेदपुर के उस पुस्तक मेले ने ओल चिकी के अंधभक्तों को अपना आईना दिखा ही दिया।

सत्य को परेशान किया जा सकता है। पर उसकी जीत अवश्यंभावी है। ओल चिकी एक मरा हुआ हाथी साबित हो रहा है। फिर भी कुछ अंधभक्त उसे जीवित होने की सूई भोंकने में जुटे हुए हैं। झारखण्ड के मुखिया धो़रो़म गढ़ से ओल चिकी की पैरवी करे, तो दाल में कुछ काला नजर आना स्वाभाविक है।

Tuesday, 2 November 2021

BOḌIṄ MÃHÃ DINISẠ
(02 No̱be̱mbo̱r, 1865)


Cando Babawak̕ ạḍi hahaṛa sirjo̱n! Pilcu Haṛam-Buḍhi kho̱n nit hạbic̕te ạḍi lekan manwa, noa dhuṛi dhạrtire he̱c̕ arko dukạn lahaena. Onko modre ado̱mko do̱ ḍig-ḍig noa dhạrtipuriko marsal oṭokada. Onkan mamarsalkoak̕ thạrre Pạul Olaph Boḍiṅak̕ ńutum do̱ sona akho̱rte o̱l tahe̱na. Cedak̕ hale baṅ! Pạul Olaph Boḍiṅ (Paul Olaf Bodding) Santali lạgiť okae kạmi oṭokať, ona do̱ tire juge jiạṛge tahẽ̱ idik̕a. Jo̱s do̱ niạge je uni leka Santali lạgiť baṅ do̱ bitạuen dinkore jãhãeko hoyakan, ar baṅ do̱ darakan dinkore jãhãeko upe̱lok̕ reak̕ as dhoraok̕kan.

P. O. Boḍiṅ do̱ abo disạm kho̱n sat sạmud o̱n paro̱m Norway disạm reak̕ miť ạḍi kạṭic̕ so̱ho̱r Gajobhikre 02 Nobe̱mbo̱r, 1865 hilok̕ noa dhuṛi dhạrti reak̕ pạhil marsale ńe̱lleda. Boḍiṅ̇ sahebren do̱ miť kuṛi boehae tahẽ̱kana. Boḍiṅ ac̕ baba do̱ puthi to̱to̱lic̕e (Book Binder) tahẽ̱kana.

Boḍiṅ saheb do̱ ac̕e paṛhaok̕ bidạlrege, Santalko talareko kạmikan ako disạmren dho̱ro̱m gurukoak̕ moca kho̱n Ho̱ṛ ho̱po̱nko babo̱tre do̱e ańjo̱makať tahẽ̱gea. Cando Babawak̕ oka co̱ me̱njo̱ṅ, uni do̱ Ho̱ṛ ho̱po̱n oarko lạgiť Boḍiṅ sahebe bachaokedea. Lạiako; kathae, miť dhao Kerap saheb (L. O. Skrefsrud) o̱ko̱e do̱ abo disạmre Ho̱ṛko talareye kạmikan tahẽ̱, ako disạm, metak̕me Norwayte chuṭi bitạu lạgiťe se̱nakan tahẽ̱kana. Unre uni do̱ Boḍiṅ saheb sanamak̕ lạiade tayo̱me kuliledea, “Henda ya Pạul, e̱ṇḍe̱khan ceka Ho̱ṛko talare kạmie lạgiťem re̱be̱nkok̕a?” Unre Boḍiṅ sahebe jobableda, “Hẽ̱ da, apekoak̕ katha ańjo̱mte, ceka co̱ mo̱n-o̱nto̱r sanam do̱ Ho̱ṛko talare maṇḍrao baṛaekantińạ. Ho̱ṛmo̱te̱ťge no̱ṇḍe̱ menak̕a, bakhan iń do̱ onko talarege minạńa.” Kerap saheb uniak̕ ro̱ṛ ruạṛ ańjo̱mte ạḍie kusiena. Khaṭianae je darakan dinre unige nãhãk̕ ac̕ak̕ kạmi do̱e sambṛaotaea. Noṅka hudis baṛakate, uni do̱ Boḍiṅ saheb Bharo̱t disạm Ho̱ṛko talare kạmie lạgiť ho̱r-ḍahar sapṛao lạgiťe dhurạuena.

Ar miť dinok̕ 1889 sal reak̕ mucạť cando se̱c̕ sajen-sapṛaoen miť chaelak̕ koṛa, ume̱rtae do̱ 24 bo̱cho̱r, ac̕ak̕ jhola-jhampa go̱k̕kate dak̕ jahajrey sawarena. Uni koṛage baṅ ḍaṭ mo̱ṭ, e̱se̱l sapha, sõ̱ṛõ̱ko̱c̕ Boḍiṅ bạbu do̱! Timina din co̱ dak̕ jahajre sapho̱rkeť tayo̱m Iṅgle̱ṇḍ se̱c̕ lekate Bharo̱t disạm Kolkataye sẹṭe̱rena. o̱ṇḍe̱ kho̱n do̱ relgạḍi sap̕kate Rampurhaṭ tisạne phe̱ḍena. Ar Rampurhaṭ kho̱n 16 Jạnuạri, 1890 hilok̕ do̱ sagaṛte Benagaḍiại tiok̕keda. Lạiako kathae; daramdage jo̱khe̱n kạṭic̕-kạṭic̕ kuṛi gidrạ oka Ho̱ṛteko õ̱ṛhẽ̱-sereńade tahẽ̱ do̱ saname buj ńamkeda. Ar kathae; he̱c̕en dosar hilok̕ kho̱nge Ho̱ṛte galmak̕rao hõ̱e sạrdi se̱ṅge̱llena. 

Ạjgut hahaṛa! Din-mãhãko do̱ hud-hudạu paro̱mo̱k̕kan tahẽ̱kana. Kerap saheb do̱ Boḍiṅ lekan jhukạl koṛae ńamkedete tulede-do̱ho̱yede lekae aṭkarkeda. Ce̱ť baṅ se̱ Kerap saheb do̱ jo̱to̱ lekan Ho̱ṛ (Santali) kạmiko do̱ Boḍiṅ cetanre lade go̱ťkak̕ lạgiť ạḍie ạkutena. Ar ńe̱lme se̱ sạrige, Kerap saheb do̱ jo̱to̱ lekan kạmi Boḍiṅ cetanreye lade go̱ťkada. E̱n sermage Boḍiṅ bạbu do̱ “Ho̱ṛ Ho̱po̱nren Peṛa” namjạdi sãohe̱ť sakamren são-saspṛaoic̕ko do̱ho̱kedea.

Boḍiṅ bạbu do̱ miť dhaote ạḍi lekan kạmie e̱ho̱p̕keda. Mo̱ṭ kathatem me̱nlekhan; uniak̕ mul kạmi do̱ pạrsi ar ona hõ̱ Santali babo̱t do̱ maraṅ kạmi tahẽ̱kantaea. Dinek dinte Santali pạrsire do̱ liṇḍạr are gạkhuṛ idiyena. Dho̱ro̱m guru lekate uni do̱ Santali pạrsite dho̱ro̱m puthikoe to̱rjo̱makeda. São so̱ṅge̱te Ho̱ṛ ho̱po̱nak̕ jo̱to̱ lekan le̱gcar-ạricạliko hõ̱ hạr samṭao lạgiť ho̱ṛkoe go̱ṛo̱ ocokeťkoa.

Lạiako kathae; Boḍiṅ saheb do̱ mimiť kạhni o̱no̱liạko lek leka ona reak̕ be̱rho̱n hõ̱e e̱maťko tahẽ̱kana. Aso̱kaete 13 hajar Santali sabad oka do̱ Kerap sahebe tumạlleť, ona do̱ Boḍiṅ sahebak̕ tire he̱c̕ena. Boḍiṅ saheb ṭhen kạmi do̱ aema tahẽ̱kana, me̱nkhan, o̱kte̱ reak̕ do̱ ạḍi anaṭ. E̱ntere hõ̱ Boḍiṅ saheb do̱ jo̱to̱ak̕ sahaokate pạrsi lahanti kạmire do̱e laha idiena.

Namjạdi Santal Hul tambhaoakan, un do̱ e̱ke̱n kichu sermage paro̱makan tahẽ̱kana. Ạḍi gạhir satalak̕ un o̱kte̱ reak̕ mạli halo̱t babo̱tbon kho̱nd ro̱nd lekhan, ekal noa do̱ sạrigea je un hạbic̕ hõ̱ Ho̱ṛ ho̱po̱nko do̱ purub-pạchimgebon tahẽ̱kana. Pạchmạ, Ḍhạuạ ar se̱ Moera Baṅgaliko do̱ Ho̱ṛ ho̱po̱nko e̱ṛe̱ lipuk̕leťkoa. Jạt reak̕ hewa do̱m okatekak̕a? Un hõ̱ nit lekage jage jo̱m-ńũ ar ḍuḍuk-ḍuḍuk e̱ne̱c̕-sereń chaḍa ar eṭak̕ khạṭuạge baṅ. Ho̱ṛ ho̱po̱n do̱ kuń ro̱ṭe̱ baragge. Noṅkan o̱kte̱re noko miso̱nạriko Ho̱ṛ talareko hijuk̕ do̱ Candoak̕ bho̱rdange. Hul dhara-dhạrige noko miso̱nạriko do̱ matko̱m ńũruk̕ leka Ho̱ṛ talareko ńũr ńamena.

Piọ Cẽ̱ṛẽ̱ do̱ Ho̱ṛ ho̱po̱nkoak̕ chaṭkare uḍạu mae uḍạu he̱c̕enge, me̱nkhan, oka rạṛtey sereń do̱ ạḍi maraṅ maha muskilrey paṛaoena. Santalko babo̱t reak̕ pạhil puthi - “An Introduction to the Santal Language” - Jeremia Philips o̱lak̕re Santali lạgiť do̱ Baṇgla haro̱p beoharakan tahẽ̱kana. No̱te̱ Deonạgri haro̱p hõ̱ hạtṛạu baṛalengea. Me̱nkhan, banar haro̱pge, metak̕me, Baṅgla ar Deonạgri haro̱p do̱ Santali lạgiť mungạ kaṭ sạbitena. Santali o̱l lạgiť miť ạḍi maraṅ muskilak̕ge hoyena. Cekaeam, ado̱m miso̱nạriko do̱ kathae, Santali o̱l lạgiť miť nirạ nãwã haro̱p hõ̱ sirjạu lạgiťko uṭu-cuṭu baṛalengea. Me̱nkhan, onkan pontha do̱ lelha reak̕ mucạťte̱ťko metawaťte, ona huṛmusti, bo̱be̱, lelha ar o̱bigyanik kạmi do̱ko tak dhamkada.

Un ma Ho̱ṛ ho̱po̱nko miť ho̱ṛ hõ̱ poṇḍ goḍare he̱nde̱ ho̱ṛe̱c̕ casok̕ko ma baṅko tahẽ̱kan. Cekaeam, miso̱nạriko do̱ se̱santire ona Roman/Lạṭin haro̱ptege Santali o̱l lạgiť jo̱to̱ ho̱ṛteko gulạṇḍ uric̕keda. Piọ Cẽ̱ṛẽ̱ abo tala dara hạbic̕ miso̱nạriko noa kạmi do̱ko laga lahawakať tahẽ̱gea. Me̱nkhan, lạikak̕ do̱ niạge je Boḍiṅ saheb do̱ Santali lạgiť oka Roman/Lạṭin haro̱p beoharok̕kan tahẽ̱, ona do̱ ạḍi batrao lak̕ are hulsiń sapha go̱ťkada.

Boḍiṅ babo̱tre hahaṛa do̱ niạge je Boḍiṅ saheb oka hilok̕ noa Ho̱ṛ disome le̱be̱ťkeť, e̱nhilok̕ kho̱n dhạrti bạgiak̕ dhạbic̕, uni do̱ Ho̱ṛ lạgiť tãhã Santali pạrsi lạgiťge ac̕ak̕ jibo̱ne atar giḍi go̱ťkada. Jãhãtinạk̕ge Kerap saheb do̱ Boḍiṅren gurui tahẽ̱kan, me̱nkhan ko̱ dintege unkin talare do̱ “Guru guṛ, cela cini” reak̕ sạgại so̱mpo̱k joṛaoena. Boḍiṅ saheb do̱ nase dintege Santaliren maraṅ gạkhuṛiại benaoena, me̱nkhan, ạḍi lekan digdhạko do̱ mo̱n-o̱nto̱rre he̱ḍe̱jo̱k̕tege tahẽ̱kana. Khange, subita baṅte, uni do̱ thoṛa ho̱ṛkoante Kolkata so̱ho̱re riṅgạuena. O̱ṇḍe̱ uni do̱ aṛaṅ (phonem) jãc lạgiť mimiť ho̱ṛkoak̕ ro̱ro̱ṛ jo̱khe̱nak̕ mocae phoṭo (x-ray) ocokeda. Noṅkate Boḍiṅ saheb do̱e khạṭi utạrana je moca kho̱n Santali reak̕ oka aṛaṅ do̱ oka ṭhen kho̱n bahe̱rok̕kana.

Lạikak̕ do̱ niạge je Boḍiṅ saheb do̱ e̱ke̱n 10 (ge̱l) serma bhitạrtege Santali pạrsiren e̱ke̱n masṭo̱ mo̱to̱ do̱ baṅ, bicko̱m, maha pạṇḍite benaoena. Sạbut me̱nte do̱ niạge je Boḍiṅ saheb do̱ 1899 salrege Ho̱ṛte o̱lak̕ pạhil puthie chapa so̱do̱rkeda - “KUKLI.” Inạkate dho̱ro̱m puthiko me̱nte “Mare Niạm”, “Nãwã Niạm” eman do̱ sanam Santaliteye to̱rjo̱ma cabakeda.

No̱ṇḍe̱ ạ̃ṛtiak̕ do̱ niạge je Boḍiṅ saheb do̱ oka leka ro̱ṛ, onkage o̱lo̱k̕ren ạḍi maraṅ turphidare tahẽ̱kana. Onatege lahateko beohareťkan tahẽ̱ Santali Roman/Lạṭin haro̱pre do̱ miť bar nãwã ṭuḍạk̕/ṭo̱yo̱ť cinhạkoe juṭic̕ada, ar ona reak̕ man ar mạhima sanamko bujhạu ocoko reak̕e kurumuṭukeda. Noa hõ̱ baḍaekak̕ do̱ jạruṛgea je ac̕ bidạlrege Bharo̱t disomre Linguistic Survey of India - George A Grierson ho̱te̱te lahkaoakan tahẽ̱kana. Unre onko Dạkhnạhi boehako aso̱kaete ona checked consonants (ke̱ce̱ť/tạpuk̕ aṛaṅ - k̕, c̕, ť ar p̕ ) babo̱tre ạḍiko do̱n baṛaleťgea, me̱nkhan, okage bae bataoleťtakoa ar sanamko bhugạk̕reye dal ade̱rleťkoa. São so̱ṅge̱te open vowel (e̱, o̱) ar resultant vowel (ạ, ẹ ar ọ) reak̕ mo̱ho̱t hõ̱ ruti-rutiye chiṇḍạuaťkoa. Uni do̱ ạḍi saphateye bujhạuleda je ul bili do̱ baṅ ul bele, ciṭhi kul do̱ baṅ ciṭhi kol ar solo ana do̱ baṅ bicko̱m sọlọ ana ro̱ṛ ar o̱lge sạhia. Me̱nkhan, bhabna reak̕ katha, Boḍiṅ sahebak̕ sikhạuna do̱ ke̱ na puche̱yente, abo do̱ nit hạbic̕ hõ̱ o̱l giḍi ar paṛhao sojheren ạḍi maraṅ lelha ho̱ṛbon sạbit hijuk̕kana. Ar pase̱c̕ nõ̱k̕õ̱e noa karo̱n kangea je ne̱ hạli abo disomre goṭa ṭạṇḍi, ona jilạpi akho̱rko aka pe̱re̱c̕ idieťre, oka hõ̱ babon to̱tho̱c̕ daṛeak̕kana.

O̱ne̱bon baḍaekeť leka Boḍiṅ saheb do̱ oka lekabon ro̱ṛ, onkage o̱lren ạḍi maraṅ turphidare tahẽ̱kana. Me̱nkhan, un bidalren ḍher ho̱ṛ, nunak̕ hạbic̕ je ado̱m miso̱nạriko hõ̱ Boḍiṅak̕ ona Santali Pạrsi reak̕ Aṛaṅ ar Urgạn Go̱ṛho̱n (Santali Phonetics and Morphology) ạn-ạri bujhạu lạgiť do̱ o̱ko̱ege baṅko re̱be̱nlena. Boḍiṅ do̱ bujhạuako lạgiť ạḍie kurumuṭukeda je ro̱ṛ ar o̱lre do̱ noa leka begar menak̕a - ul bele : hoṛo ge̱le̱; sereń kuṛi : re̱re̱ń rak̕; se̱ṅge̱l ṭhen jorok̕ : dak̕ jo̱ro̱k̕; iń do̱ baṅ : do calak̕me; dak̕ lo : se̱ṅge̱lte lo̱ ar emanteak̕.

Boḍiṅ baṅko bujhạu tiok̕ daṛeaekanre uni do̱ ạḍie bhabnaena. Unrege uniye nạbileťa; judi Ho̱ṛ ho̱po̱nkoak̕ sạri Santali (standard Santali) baṅe nạthi oṭokak̕kana, to̱be̱khan, uni do̱ Cando hõ̱ bae ikạyea. Dạkhnạhi Santalko o̱ko̱eak̕ Santali do̱ bagaṛge, miť din hilok̕ noko do̱ nãhãk̕, ona bagaṛ Santali goṭa ṭạṇḍi chạplạu reak̕ko kurumuṭuia. Ona karo̱n kangea je uni do̱ ac̕ak̕ sanam lekan Santali puthiko do̱ oka lekabon ro̱ṛ, onkage o̱lkateye chapa so̱do̱r oṭokada. Inạkate pea Santali Beako̱ro̱n (Materials for A Santali Grammar) puthie chapa so̱do̱r oṭokada. Ninak̕te hõ̱ Boḍiṅ saheb do̱ bae tirpitlena. Unie hudisana; ũhũk̕ dhora baṅ dhora, noko sạri Santal do̱ nãhãk̕, oka baṅ oka hilok̕ co̱, khạṭigeko e̱ṛe̱ ocok̕a. Onate uni do̱ muc̕ lekae khaṭaoente jugero jug hạbic̕ rạkhi jogaok̕ lekan Santali Sabad Murại (A Santal Dictionary) puthie sapṛaokeda ar ona do̱ ako disom Norway (Oslo) kho̱ngeye chapa so̱do̱rkada. Kathae; noa Sabad Murại sapṛaore Boḍiṅ saheb do̱ 22 bo̱cho̱r din lagaoade tahẽ̱kana. Ạḍi khạṭi utạr katha kana je Boḍiṅ saheb do̱ un o̱kte̱ Ho̱ṛ ho̱po̱nko, okako sabadko laṛcaṛeťkan tahẽ̱, onako do̱ miť miťteye to̱l do̱ho̱, o̱l samṭao oṭokada. No̱ṇḍe̱ so̱geak̕ do̱  niạge je mimiť sabadko do̱ Beako̱ro̱n reak̕ niạm lekate ce̱ťko metak̕a, ar ona sabad reak̕ laṛcaṛ oka leka kana, ona do̱ Iṅgrạji ar Santaliteye o̱l oṭokada. Baḍaekak̕ mabon je Boḍiṅ sahebak̕ sãohe̱ťkore, dho̱ro̱m reak̕ kathako do̱ pusri in maraṅ hõ̱ bạnuk̕a.

O̱ko̱e Ho̱ṛ Santali reak̕ “S” hõ̱ bae baḍae; onkan Ho̱ṛge siṛạgateko ro̱ṛa - “Bidesi kanae; dho̱ro̱m guru kanae; jạti-dho̱ro̱m no̱nosṭo̱ic̕ kanae … ar onkage emantek̕.” Inạkateko to̱ṛahẽ̱ťak̕ge; “O̱l Ciki do̱ ce̱ť kana? Ạdimkoak̕ mẽ̱ť kana.” Ar onkage laṭ balaṅko hukạ-paskaea. Me̱nkhan, onko bako bhạbite̱ťa je onko do̱ “siń cando divhe̱ko uduk̕aekana.” Onkoak̕ noa hõ̱ jãhãn disạ paesa do̱ bạnuk̕a je siń cando do̱ onkoe lo̱ to̱ro̱c̕koa. Onko do̱ miť talao pạrsi bạgikate oprom ar dho̱ro̱m sãote pạrsiko suṛe̱ go̱ťkak̕a. Boḍiṅ sahebak̕ sãohe̱ťre, jãhãtinạk̕ uni do̱ dho̱ro̱m gurui tahẽ̱kan, me̱nkhan onare dho̱ro̱m reak̕ katha do̱ nasenak̕ hõ̱ bạnuk̕a, bicko̱m, uniak̕ o̱no̱lkore do̱ sapha-sạphi, rilạmala phạriạphạṭi dak̕ leka e̱ke̱n ar e̱ke̱n do̱ Santal Le̱gcar reak̕ kathakoge menak̕a se̱ o̱lakana.

02 No̱be̱mbo̱r do̱ Boḍiṅ Sahebak̕ Jo̱no̱m Mãhã. Nagamre nuige onkan miť ho̱ṛ, o̱ko̱e do̱ Santali lạgiťe janamen, jive̱ťen are Boṅga talaen. Boḍiṅ do̱ Santali lạgiť Boṅga lekan ho̱ṛ! Boḍiṅe danaṅen 81 serma tap̕ calaoena. Me̱nkhan, Boḍiṅ Saheb do̱ Santali pạrsi lạgiť ce̱ťe ceka oṭoakať, baḍae lạgiť do̱ o̱ko̱e ṭhen hõ̱ phursạt do̱ bạnuk̕a. Judi baḍae tahe̱nkhan, Santali pạrsi reak̕ unạk̕ bạṛic̕ do̱sa do̱ o̱ho̱ hoelena. Onatege celec̕ miť dukhạli gaenaha do̱e relaleťa :-
(Rạṛ - Ho̱mo̱r)
Pạrsi Baba họ lilạmok̕kan, Boḍiṅ Baba!
Pạrsi Baba họ mo̱ho̱r meṭaok̕kan.
Namge co̱ Boḍiṅ Baba,
Dho̱ro̱m-dho̱ro̱mem bicạrkatale.
Nalo manewape rag manewa,
Nalo manewape ho̱mo̱r manewa.
Nińge co̱ Boḍiṅ Baba,
Dho̱ro̱m-dho̱ro̱miń bicạrkatape.

Kathae; manwa do̱ calak̕ lạgiťgebon hijuk̕kana. Dhạrtire niạge sạri je jo̱to̱ ho̱ṛge calak̕tege hoyok̕tabona. Ar e̱nte o̱ko̱e sanam daṛeanbon metakokan, onko hõ̱ co̱ko dukạn lahaen do̱! 02 No̱be̱mbo̱r do̱ Boḍiṅ sahebak̕ Jo̱no̱m Mãhã! Uni do̱ noa dhuṛi dhạrtire 73 bo̱cho̱r hạbic̕e dãṛãleda, onare 44 bo̱cho̱r do̱ Santali lạgiťe jive̱ťena. Lại reak̕ do̱ niage je uni do̱ janamte̱ťge bidesreye janamlena, me̱nkhan, uni do̱ Ho̱ṛ ho̱po̱n kho̱n hõ̱ jạstiye Ho̱ṛlena. Bhabna reak̕ do̱ niạge je Boḍiṅ saheb oka lekae Ho̱ṛlen do̱ abo hõ̱ Ho̱ṛ hũiạkatere hõ̱ uniak̕ Ho̱ṛte̱ť do̱ baṅbon bujhạu daṛeak̕kana. Me̱nkhan, rạskạ reak̕ katha je hẽ̱ nase-nase, polok̕-polsoge sạhi, abo talare nit miť onkan ho̱ṛ menaea, o̱ko̱e do̱ Boḍiṅ saheb chiṇḍạue reak̕ ạḍi kurumuṭure menaea. Uni babo̱t lại labaṛ do̱ niạge je uni do̱ Boḍiṅ sahebak̕ pạrsi ạri do̱ gitic̕-duṛup̕ ar jãhãtegey calak̕ jaogeye ho̱bo̱r baṛaea. Onkan mano̱tạnic̕ak̕ dulạṛ ńutum do̱ hoyok̕kana Man Rạghunath Hãsdak̕, Pako̱ṛ (S. P.).

02 No̱be̱mbo̱r do̱ ạḍi jagakore Boḍiṅ Mãhãbon manao baṛaea. Onkan dupṛup̕kore Boḍiṅ Babae kạmi oṭoakať, ạḍi lekan baḍaejo̱ṅteak̕ko hõ̱bon ce̱pe̱c̕-re̱pe̱c̕ hạṭińjo̱ṅa. Me̱nkhan, niạ do̱ ro̱ṛkak̕tege hoyok̕kana je judi nasenak̕ hõ̱ Boḍiṅ saheb Santali reak̕ oka majte̱ťe lạiakať, ona judibon suṭik ńamkeda, e̱ṇḍe̱khantege Boḍiṅ Mãhã manao reak̕ jo̱ste̱ť do̱ khạṭige purạuk̕tabona.

Boḍiṅ saheb nit abo talare bạnuia. Me̱nkhan, uni do̱ Santali reak̕ jo̱to̱ kho̱n daṛean bo̱m do̱ abo talareye do̱ho̱ oṭoakada. Noṅkan bo̱m je dusmạnko talare ona bo̱mbon ńũrhạlekhan do̱ sanamko go̱c̕ lo̱ho̱m utạrok̕a. Bhabna do̱ niạge je ạikhạ ona bo̱m beoharge tho̱ baṅ dhe̱jabonkana.
Boḍiṅ Janam Mãhã reak̕ noa o̱no̱l do̱ no̱ṇḍe̱gebon durumjak̕eťkana. As ar pạtiạu menak̕a je Boḍiṅak̕ Santali cetan banaḍaebon hạtṛạu ńamtaema. To̱be̱ khange Boḍiṅ sahebak̕ Janam Mãhã do̱ sarkok̕a-sạgunkok̕a!

Friday, 10 August 2018

संताली साहित्य का भविष्य

यह सौ प्रतिशत सच है कि संतालों में संताल हूल-1855 तक एक भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति मौजूद नहीं था। तात्पर्य यही है कि किसी संताल को कोई आक्षरिक ज्ञान नहीं था। इतना कुछ होते हुए भी संतालों ने न सिर्फ अपनी भाषा का सृजन किया, बल्कि उसे पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से अच्छी तरह संजोकर रखा। यह तो गनीमत है उन मिशनरियों का जिन्होंने सर्वप्रथम संतालों के ऊपर न सिर्फ अनेकों प्रकार से दया दृष्टि की बल्कि उनकी भाषा की उन्नति हेतु भी कई महत्वपूर्ण कार्य किये। विदित हो कि सर्वप्रथम उड़िसा, जेलासोर में मिशनरी कार्य में जुटे जेरेमिया फिलिप्स ने ही अपनी पुस्तक An Introduction to the Santal Language (प्रकाशित 1852) में पहली बार संताली व्याकरण की पुस्तक प्रकाशित की। इसके बाद सन् 1860 में जब संताल परगना में कुछ मिशनरियों का आगमन हुआ, तब संक्षेप में यही कि उन्होंने संताली साहित्य के विकास हेतु दुमका के नजदीक बेनागाड़िया में एक मुद्राणालय की स्थापना की और संताली साहित्य के विकास के लिए अनेकों तरह के कार्य किये। यह भी विदित हो कि संताल परगना से सटे मानभूम, पोखुरिया में संताल मिशन प्रेस की स्थापना की और यहां से भी संताली साहित्य के विकास हेतु अनेकों कार्य हुए। यह भी ज्ञात हो कि बेनागाड़िया से "हो़ड़ हो़पो़नरेन पेड़ा" (बाद में "पेड़ा हो़ड़") एवं पोखुरिया से ”ढा़रवा़क्“ नामक संताली पत्रिकाओं का भी प्रकाशन होता था। इसके बाद 1946 से अभी तक ”मारसालताबोन“ नामक पत्रिका दुधानी, दुमका से अविराम प्रकाशित होती आई है।

शुरुआती दौर में मिशनरियों ने देखा कि संताली को देश में उपलब्ध किस लिपि से लिखा जाय, यह उनके लिए एक बहुत ही चुनौतिपूर्ण कार्य था। मालूम हो कि जेरेमिया फिलिप्स ने अपनी उपरोक्त पुस्तक में संताली के लिए बंगला लिपि का उपयोग किया था। लेकिन बाद में संताल परगना के मिशनरियों ने वैज्ञानिक तरीके से रोमन लिपि को संताली के लिए परिवर्धित/संशोधित किया एवं उपयोग में लाया। मिशनरियों ने न सिर्फ संताली लिखने के लिए रोमन लिपि को भाषाविज्ञान की दृष्टि से संशोधित व संतुलित किया बल्कि उन्होंने संताली साहित्य के विकास में चार चांद भी लगा दिये। इस लिपि से संताली विश्व शब्दकोश की रचना हुई एवं कई उच्च कोटि की पुस्तकों की रचना भी हुई। संताली के लिए मिशनरी युग को संताली का स्वर्ण युग कहा जाय तो यह कोई अतिश्योक्ति न होगी।

ध्यान रहे, ब्रिटिश काल के दौरान भारत में एक भाषाई सर्वेक्षण हुआ था, उस सर्वेक्षण में भाषावैज्ञानिकों ने संताली को दो वर्गों में बांट दिया - दक्षिणी संताली एवं उत्तरी संताली। उड़िसा एवं उससे सटे इलाकों में बोली जाने वाली संताली को दक्षिणी संताली का नाम दिया गया। सर्वेक्षण के दौरान भाषावैज्ञानिकों ने पाया कि उड़िसा की संताली आर्यों की भाषा के साथ मिश्रित एवं उसके साथ घुलमिल जाने के कारण अत्यधिक प्रदूषित हो गई। तात्पर्य यही है कि यहां की संताली ने अपनी गरिमा खो दी और यह एक बोली मात्र ही रह गई है। जबकि उत्तरी संताली जिसे संताल परगना, गिरिडीह, हजारीबाग एवं बिहार, असम, उत्तरी बंगाल यहां तक की पड़ोसी देश नेपाल, भूटान एवं बंग्लादेश में बोली जाती है, उसे विशुद्ध एवं निष्कलंक पाई गई। अतः भाषावैज्ञानिकों ने उत्तरी संताली अर्थात् संताल परगना की संताली को ही अपनी रिपोर्ट में मानक (standard) संताली घोषित कर डाला। (Ref. Linguistic Survey of India, Vol-IV, page No 32, Director General G. A. Grierson).

लिपि विवाद की जड़ यहीं सर्वे रिपोर्ट में ही छिपी हुई है। जब उपरोक्त सर्वे में भाषावैज्ञानिकों ने दक्षिणी संताली को भाषा मानने से ही इंकार कर दिया, तो यहां के संतालों के पास खंभा नोचने के अलावे और कोई रास्ता ही नहीं बचा। उन्हें अपनी गलती समझ ही नहीं आ रहा है। वे उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत पर उतारु हैं। वे किसी ग्वाले की तरह अपने दही को खट्टा मानने से ही इंकार कर रहे हैं। यही कारण है कि कुछ समय तक दक्षिणी संतालों ने क्, च्, त् एवं प् के मामले में भी खूब होहल्ला मचाया था, पर प्रो. स्टेन कनो एवं बोडिंग साहब ने उनकी बखिया उधेड़कर रख दी थी। तब संताल परगना में रोमन हो या देवनागरी लिपि संताली साहित्य अपनी चरम स्थिति को छू रहा था। यह सब देखकर दक्षिणी संताल अत्यधिक जलन, ईर्ष्या एवं द्वेष से जल-भून हो उठे। (लिपि विवाद के पीछे और भी कई कारण छुपे हुए हैं।) फिर मरता क्या नहीं करता? दक्षिणी संताल भाईयों को अभी तक समझ ही नहीं आ रहा है कि किसी भी साहित्य सृजन के लिए उसकी भाषा बड़ी है ना कि उसकी लिपि। पर वे चट्टान पर दूब उगाने को डटे हुए हैं।


Monday, 18 August 2014

“A B O A K̕”

Oka do̱ “aboak̕” ar oka do̱ “onkoak̕”? Noa beoṛa sạri-sạrite bujhạu, unạk̕ alga katha do̱ baṅ kana. Onko do̱ ic̕ uru leka ṭhelaok̕tege menak̕koa je noa do̱ “aboak̕” kana, onate noage beohar jạruṛa. Himạl buru lekan kukli do̱ niạge je ce̱ť lekate ona do̱ “aboak̕” hoyena ar cedak̕ “aboak̕ge” beohar jạruṛa? Mẽ̱t̕te ńe̱lo̱k̕ lekate aṅga puṭạk̕ kho̱n ńindạ gitic̕ hạbic̕ sui kho̱n e̱ho̱p̕kate haḍga jahaj hạbic̕ sanamak̕ ma “onkoak̕ge” beoharok̕kan, ar tãhã no̱ṇḍe̱ do̱ “aboak̕” beohar reak̕re cedak̕ unạk̕ jo̱bo̱rjạsti do̱?

Sạriak̕tem me̱nlekhan noa “aboak̕” ar “onkoak̕” reak̕ lạpạṛhại calak̕kan reak̕ karo̱n (re̱he̱ť) do̱ ar eṭak̕re menak̕a. Ar ona karo̱n noa sadharo̱n mẽ̱t̕kinte do̱ baṅge ńe̱l oromok̕a, bicko̱m, ona do̱ ńe̱l oromok̕a sạri ạkil reak̕ mạli marsalte. Mit̕ nạmuna lạikate ona beoṛa do̱ bujhạu reak̕bon kurumuṭuia. Ar ona nạmuna do̱ noa leka - Mit̕ṭe̱n Ho̱ṛ oṛak̕ kana. Ona oṛak̕re bar boeha menak̕kinạ. Unkin boeha koṛa do̱ ạḍi jumit̕re menak̕kinạ. Onate jãhãe bạirige unkin do̱ ce̱t̕ge baṅko to̱tho̱c̕ daṛeạkinkana.

So̱mo̱e ạcurok̕ sãote unkin modre mit̕ boeha do̱ o̱lo̱k̕-paṛhaok̕e cet̕ idikeda. O̱ko̱e boeha o̱lo̱k̕ ạkile hame̱ṭkeť, uni do̱ cạkrire hõ̱e bo̱lo̱ena. Cạkri me̱nte uni do̱ oṛak̕ kho̱n oḍokok̕ hoyentaea. Ar oṛak̕re do̱ ac̕ huḍiń boehae bạgi oṭoadea. Me̱nkhan, o̱ko̱e boeha oṛak̕re menae dukre-bipo̱tre, re̱ṅge̱c̕re-tetaṅre jaogeye go̱ṛo̱ idiaekana. Unkinak̕ jibo̱n lạukạ do̱ ạḍi suk ar mulukte calao idik̕kan tahẽ̱kana.

Khan bạirikoak̕ mẽ̱t̕ do̱ unkin Ho̱ṛ boehawak̕ jumi-hasare kiṛbit̕ena. Ạḍi lekate onko bạiri do̱ unkin boeha koṛawak̕ jumi hatme reak̕ko kuṛpaṛkeda. Me̱nkhan, cạkrikan boeha mẽ̱t̕ marsale tahẽ̱kan iạte kạnun lekate ạkinak̕ jumi-hasa bạiri kho̱n rạkhi jogaore ac̕ boehae go̱ṛo̱ idiaekan tahẽ̱kana.

Bạiriko do̱ unkin boeha koṛawak̕ ranajo̱ṭ ńe̱lte ạḍi thar-thrao arko bo̱to̱rena. Bujkedako, je tin hạbic̕ nukin boeha koṛawak̕ ranajo̱ṭ baṅ rạpudok̕a, un hạbic̕ nukinak̕ jumi-hasa hatme do̱ muskil hataṛgea.

Nukin boeha koṛaren bạiri akoak̕ buddhiko lagaokeda. Buddhi me̱nte do̱ niạge je nukin boehawak̕ jumit̕te̱t̕gebon rạput̕lege. Ar ona buddhi do̱ sidhạ kathate - Divide and rule (फूट डालो और राज करो, Hạṭińem ar Rajok̕me) reak̕ phạrmulako apnarkeda.

Ona phạrmula lekate onko bạiriko do̱ o̱ko̱e oṛak̕rege menae boehawak̕ luturre ạḍi lekan ạuṛi-sạuṛi kathako lại pe̱re̱c̕adea. Uni cạkrire menae boeha birudre ạḍi lekan sea-sĩṛĩc̕ kathate uniak̕ luturko tube̱t̕ pe̱re̱c̕keda. Uniko lạiaekana je nõ̱k̕õ̱e am do̱ jumi-hasarege odoe-balbalem khaṭaok̕kana, ar uni do̱ ho̱e-batas bijli marsalreye tahe̱nkana. Uni do̱ Iṅgrạjite hõ̱e ro̱ṛ daṛeak̕kana, mõ̱ńj-mõ̱ńj kicric̕-khạṇḍuạk̕e ladeyet̕kana ar onkage oka lekate cạkri boeha cetan hirkhạ janamae, onkan kathate uni raṅgaok̕ lạgit̕ko uskur idiyedea. Nunạk̕ hạbic̕ko lạiaekana je uni mae cạkrikan, onate amak̕ jumi-hasare uniak̕ do̱ cc̱t̕ ho̱kge bạnuk̕taea. Onkage ar emanteak̕.

Oka “aboak̕” reak̕ katha ro̱ṛogo̱k̕kan, ona ma maṛaṅre Santali lipire lagao lahalen. Nit cedak̕ eṭak̕ko hõ̱ akoak̕ o̱lo̱k̕ dharakore resultant vowelre (gạhlạ ṭuḍạk̕ - akho̱r latarre ṭuḍạk̕ - .) ko lagaoet̕kana? Nạmuna - ạ, आ़ eman. ...

Mucạt̕re niạge je namjạdi Santal Hul o̱kte̱re Ho̱ṛ ho̱po̱nre oka jumit̕te̱t̕ tahẽ̱kan, ona jumit̕te̱t̕ (ranajo̱ṭ) rạput̕ giḍikak̕ lạgit̕, noko Ho̱ṛren bạiri do̱ tinạk̕ hạbic̕ko calao daṛeak̕a, unạk̕ hạbic̕ko calak̕a, je̱mo̱nko gulạm daṛeako.

Nạmuna pase̱c̕ unạk̕ do̱ baṅ jothatlen, me̱nkhan, oka “Hạṭińem ar Rajok̕me” reak̕ phạrmula kan, ona do̱ sạrigea.

Nạbi katha do̱ niạge je judi Ho̱ṛ ho̱po̱nko o̱kte̱ tahe̱nre baṅbon ạkilok̕a, to̱be̱ aboak̕ mo̱ro̱n do̱ khạṭi utạrgea.

Friday, 20 August 1982

सूरज को दीया दिखाना

इतिहास में हमने पढ़ा है कि तेरहवीं सदी में एक मुगल बादशाह हुआ था। उसका नाम था मोहम्मद बिन तुगलक। बादशाह विद्वान तो था ही, पर कभी-कभी उसकी बुद्धि घास चरने चली जाती थी। वह कई भाषाओं का ज्ञाता भी था। एक दिन ना जाने उसे क्या सूझा, उसने दिल्ली में बनी-बनाई राजधानी को नजदीक के एक छोटा-सा कस्बानुमा तुगलाकाबाद में स्थानांतरण करने का फरमान दे डाला। इस फरमान से उसके राज-दरबारी एवं लाव-लश्कर को मानो सांप सूंघ गया। तमाम राजधानीवासी इस फरमान से नाराज हो उठे। बादशाह की इस बु़िद्धमत्ता पर प्रजा भी नाखुश थी। लेकिन बादशाह का हुक्म सिर आंखों पर। और एक दिन सुनहरी राजधानी दिल्ली से तुगलाकाबाद को उठ चली गई।

समय का चक्र घुमता गया। मोहम्मद बिन तुगलक ने नई राजधानी में अपने राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में चमड़े का सिक्का भी चलवा दिया। शायद नीयति को यह नई राजधानी पसंद न आई। तुगलाकाबाद में पानी की किल्लत होने लगी। साथ ही भयंकार अकाल भी पड़ गया। फिर क्या था? सुबह का भूला बादशाह शाम को वापस दिल्ली लौट चला।

कहीं ऐसा ही तो नहीं? कहीं हमारे आंगने में चमड़े का सिक्का तो जबरन नहीं चलवाया जा रहा है? जब सोने का सुनहरा सिक्का हमारे पास पहले से ही मौजूद है, तो फिर इस खोटे सिक्के का हमारे यहां क्या काम?

उनकी तरफ से लिपि के बारे में रटे-रटाए ये दो-तीन तर्क दिए जाते रहे हैं:- 1. यह ”आबोवाक्“ है; 2. रोमन इसाईयों की लिपि है; 3. रोमन से संताली नहीं लिखी जा सकती है; आदि।

इस संबंध में इतना ही कहना है कि उनके तर्क बेतुके हैं। उनके तर्क को सिरे से खारिज किया जाता है। उनके तर्क में कोई सिर-पैर नहीं है। विदित हो कि भाषाविज्ञान में लिपि एक गौण विषय है। अर्थात् भाषाविज्ञान में कई शाखाएं होती हैं, जिनके विष्वविद्यालयों में अध्ययन किए जाते हैं। उदाहरणार्थ - ध्वनिविज्ञान; पदविज्ञान; वाक्यविज्ञान; अर्थविज्ञान; प्रोक्तिविज्ञान; मनोविज्ञान-भाषाविज्ञान; इतिहास-भाषाविज्ञान; भूगोल-भाषाविज्ञान; समाजविज्ञान-भाषाविज्ञान। इन समस्त कार्यों में ध्वनिविज्ञान, रूपग्रामविज्ञान, अर्थविज्ञान एवं ऐतिहासिक-विज्ञान उसकी प्रत्येक पग पर सहायता करते हैं। वस्तुतः भाषा विज्ञान एवं कोश (निघण्टु एवं निरूक्त) एक दूसरे के पूरक हैं।

आइए, अब उनके बेतुके तर्क को ही देख लेते हैं:-

1. यह ”आबोवाक्“ है - किस संदर्भ में यह ”आबोवाक्“ है? रोजमर्रा के काम में आने वाली समस्त वस्तुएं तो उनकी हैं। सुबह से लेकर शाम तक उपयोग में आने वाली तमाम चीजें तो उनकी हैं। तुम्हारी कौन-सी चीज है? शायद तुम्हारी ईजाद की हुई एक भी चीज नहीं मिल सकती है। यह तुम्हारा कोरा बकवास है। यह लोगों को बरगलाने के सिवा कुछ नहीं है। अपनी लिपि को ”आबोवाक्“ कहना छोड़ दो, क्योंकि यह चोरी की हुई लिपि है।

2. रोमन इसाईयों की लिपि है - जब लिपि संबंधी तुम्हारे सारे तर्क निष्क्रिय कर दिए गए, तो अब धर्म-धर्म के खेल में उतर आए हो। किसी भी निर्जीव वस्तुओं का कोई धार्मिक रंग नहीं होता है। मनुष्यों में भी किसी का कोई धार्मिक रंग नहीं होता है, बल्कि हर मनुष्य इंसान होता है। याद रहे; भाषा और लिपि का कोई आंतरिक संबंध नहीं है। वाणी बोलने में लिपि की कोई आवश्यकता नहीं होती है। कितना ही हस्यास्पद है कि आपने तो अपनी लिपि को ही भाषा मान बैठे हो - ऑल चिकी भाषा। पहले भाषा इसके बाद ही लिपि का आविष्कार होता है। ऐसा कतई संभव नहीं है कि पहले लिपि, तत्पश्चात् भाषा की उत्पत्ति होती है।

3. रोमन से संताली नहीं लिखी जा सकती है - ध्यान से सुन लो। आप जिस रोमन लिपि का जिक्र कर रहे हो, उस लिपि का उसी वक्त संतालीकरण कर दिया गया था, जिस वक्त यह संताली के लिए उपयुक्त घोषित किया गया था। अब यह लिपि लैटिन, रोमन, अंग्रेजी वगैरह कहना भूल जाओ। अब यह लिपि संताली लिपि बन गई है। ठीक उसी तरह जिस तरह आप अपने हर काम में बाहरियों के चीजों का इस्तेमाल करते हो। ध्वनिविज्ञान के अनुसार संताली के लिए 59 वर्णों की जरुरत है। जबकि आपके पास सिर्फ 30 वर्ण हैं। आप बताओ, संताली के लिए बाकी वर्ण कहां से लाओगे? अतः सिद्ध हो गया कि आपकी लिपि ही संताली लिखने के लिए नपुंसक है।

लिपि के साथ-साथ आपने धर्म को भी जोड़ दिया है, जिससे आपकी मानसिक दिवालियापन की बदबू आने का संकेत देता है।

अंत में यही कि आपकी भाषा, भाषा नहीं है, बल्कि यह एक बोली की श्रेणी में आती है। क्योंकि संताली व्याकरण के अनुसार आपकी भाषा में अनेकों त्रुटियां हैं। अतः सूरज को दीया दिखाने की चेष्टा कभी मत करना।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...