शिक्षा की अलख किसने जगाई?
यह आधुनिक युग है। इस युग में शिक्षा अनिवार्य हो गया है। अब अंगूठा टेक का जमाना लाद लिया। यह अलग विषय हो सकता है कि इस वक्त संताल परगना में खासकर संतालों में शिक्षा की क्या स्थिति है? यह सोलह आने सच है कि महान संताल विद्रोह अर्थात संताल हूल-1855 घटित होने तक एक भी संताल पढ़ा-लिखा नहीं था। हूल के परिणामस्वरूप अलग संताल परगना मिल तो गया पर शिक्षा के क्षेत्र में संताल परगना फिसड्डी ही रहा।
हूल के ठीक 5 वर्ष बाद 1860 को संताल परगना में ईसाई मिशनरियों का अगमन हुआ। उसने संतालों के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार आरंभ कर दिया। देखते ही देखते करीब तीन सौ छोटे-बड़े स्कूलों का उदय हुआ। इन स्कूलों में अमीर-गरीब बगैर किसी भेदभाव के सभी तरह के बच्चों को तालीम दी जाने लगी। मिशनरियों का नक्शा आपके सामने है कि आज भी इनके द्वारा प्रायोजित कई अच्छे-अच्छे स्कूल एवं कॉलेज चल रहे हैं।
कोई माने या न माने, लेकिन यह कड़ुवा सच है कि इन्हीं मिशन स्कूल से निकले बच्चों ने अपने हक और अधिकारों को पहचाना एवं संघर्ष के लिये सड़क पर उतर आए, चाहे वह अलग प्रांत की मांग हो अथवा किसी और तरह की मांग। इन्हीं की अगुवाई में कई आंदोलन हुए एवं आगे भी होते रहेंगे। एक ही कारण है कि अब इनकी आँखें खुल चुकी हैं। आदिवासियों को जहां भी प्रताड़ित किया जाएगा, ये शिक्षित बच्चे अग्रिम पंक्ति में अवश्य दिखाई देंगे। ऐसा इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि मिशनरियों ने आजतक शिक्षा की अलख को जगाए रखा है।