Friday, 6 September 2024

शिक्षा की अलख किसने जगाई?

यह आधुनिक युग है। इस युग में शिक्षा अनिवार्य हो गया है। अब अंगूठा टेक का जमाना लाद लिया। यह अलग विषय हो सकता है कि इस वक्त संताल परगना में खासकर संतालों में शिक्षा की क्या स्थिति है? यह सोलह आने सच है कि महान संताल विद्रोह अर्थात संताल हूल-1855 घटित होने तक एक भी संताल पढ़ा-लिखा नहीं था। हूल के परिणामस्वरूप अलग संताल परगना मिल तो गया पर शिक्षा के क्षेत्र में संताल परगना फिसड्डी ही रहा।

हूल के ठीक 5 वर्ष बाद 1860 को संताल परगना में ईसाई मिशनरियों का अगमन हुआ। उसने संतालों के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार आरंभ कर दिया। देखते ही देखते करीब तीन सौ छोटे-बड़े स्कूलों का उदय हुआ। इन स्कूलों में अमीर-गरीब बगैर किसी भेदभाव के सभी तरह के बच्चों को तालीम दी जाने लगी। मिशनरियों का नक्शा आपके सामने है कि आज भी इनके द्वारा प्रायोजित कई अच्छे-अच्छे स्कूल एवं कॉलेज चल रहे हैं।

कोई माने या न माने, लेकिन यह कड़ुवा सच है कि इन्हीं मिशन स्कूल से निकले बच्चों ने अपने हक और अधिकारों को पहचाना एवं संघर्ष के लिये सड़क पर उतर आए, चाहे वह अलग प्रांत की मांग हो अथवा किसी और तरह की मांग। इन्हीं की अगुवाई में कई आंदोलन हुए एवं आगे भी होते रहेंगे। एक ही कारण है कि अब इनकी आँखें खुल चुकी हैं। आदिवासियों को जहां भी प्रताड़ित किया जाएगा, ये शिक्षित बच्चे अग्रिम पंक्ति में अवश्य दिखाई देंगे। ऐसा इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि मिशनरियों ने आजतक शिक्षा की अलख को जगाए रखा है।

 रोमन लिपि : परिवर्धित संताली लिपि

आखिर कोट-टाई-पैन्ट किसकी पोशाक है? नि:संदेह यह अंग्रेजों की पोशाक है। पर इस वक्त इसे दुनिया तो छोड़ो हर संताल द्वारा इसका उपयोग बड़े ही गर्व के साथ किया जाता है। इसे पहनने में किसी भी संताल को कोई गुरेज व एतराज नहीं और न ही कोई इसके विरोध में चूँ तक कर रहा है। सभी संताल इसे पहनने में अपना गौरव महसूस करते हैं। लेकिन रोमन संताली लिपि के साथ ठीक इसके विपरीत हो गया। अक्सर इनपर आरोप मढ़ दिया जाता है कि यह तो ईसाईयों द्वारा ईजाद की हुई लिपि है। अतः यह संतालों की लिपि कतई नहीं हो सकती है। यह लिपि हमें किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। हमें तो किसी संताल द्वारा ईजाद की हुई अपनी लिपि चाहिए, जिससे हम अपनी पहचान को बरकरार रखते हुए गौरव महसूस कर सकें। बेशक वह लिपि चोरी की हुई, अवैज्ञानिक एवं मानक संताली के लिये अनुपयुक्त ही क्यों न हों।

मालूम हो कि रेव्ह. पी. ओ. बोडिंग ने जिस रोमन लिपि को संताली के लिये परिवर्धित कर संताली लिखने के लिये ईजाद किया, इससे श्रेष्ठ, उत्कृष्ट एवं बेहत्तर संताली लिपि और कोई दूसरी नहीं हो सकती है। अतः इस संताली लिपि को कोई अन्य माने या न माने, अपनाए या न अपनाए, इसका विरोध करे; हमें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। हमें इस संताली लिपि की उन्नति के लिये हर संभव प्रयास करते रहना चाहिए। यह लिपि संताली के लिये सर्वश्रेष्ठ लिपि है।
बोडिंग साहब : एक महान संताल

बेशक पी. ओ. बोडिंग किसी संताल की कोख से पैदा नहीं हुए थे। वे अवश्य ही मूल रूप से एक विदेशी एवं ईसाई धर्म प्रचारक थे। पर उनकी सारी रचनाएं बेहद उम्दी, बेहतरीन, उत्कृष्ट एवं अव्वल दर्जे की हैं। उनकी किसी भी रचनाओं से किसी भी ऐंगल से विदेशी एवं ईसाई धर्म प्रचारक होने की बू नहीं आती है। उनकी ”ए संताल डिक्शनरी” को ही देख लिया जाए। उन्होंने इसमें हर शब्द की व्याख्या बड़े ही उत्कृष्ट तरीके से किया हुआ है। उन्होंने इस शब्दकोश में भाषाविज्ञान के सिद्धांतों का अक्षरश: अनुपालन करते हुए अपनी विद्वत्ता का परिचय दिया है; जो कि इस तरह का कृत्य किसी साधारण संताल द्वारा संभव नहीं है।
 
अतः उपरोक्त कारणों को मद्देनजर रखते हुए डंके की चोट पर कहा जा रहा है कि रेव्ह. पी. ओ. बोडिंग संतालों में महान संताल थे!
पी. ओ. बोडिंग : मानक संताली के महान रक्षक
(2 नवंबर 1865 - 25 सितंबर 1938)
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पी. ओ. बोडिंग का आगमन यूरोप के नॉर्वे देश से भारत में 1890 के उतरार्द्ध में हुआ। उनका कार्यक्षेत्र था - संताल परगना के बेनागाड़िया, मुहलपहाड़ी एवं दुमका। उन्होंने बहुत ही कम समय में संताली भाषा को न सिर्फ सीखा, बल्कि वह अपने को संताली का महान विचारक, मानवशास्त्री, दार्शनिक एवं भाषावैज्ञानिक के रूप में स्थापित कर दिया। इनके जैसा संताली के महान विद्वान न कभी थे और न ही निकट भविष्य में होने की संभावना नजर आ रही है। वह संताली को जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखने का प्रबल, कठोर, सशक्त एवं घोर समर्थक था। इसीलिए तो उसने अपने पूर्व मिशनरियों के द्वारा ईजाद की गई रोमन संताली लिपि को परिवर्धित कर संताली लिपि में परिवर्तित कर दिया।

पी. ओ. बोडिंग को अपने ही काल में अच्छी तरह पता चल गया था कि संताल परगना के संतालों को अपनी मानक संताली को बचाने के लिए भविष्य में अपने ही बिरादरी के लोगों के साथ गृहयुद्ध करना पड़ेगा। वे लोग संताल परगना पर हावी होंगे। अर्थात दक्षिणी संताली जो तब तक आर्यों की भाषा के साथ मिश्रित एवं प्रदूषित हो चुकी है को उत्तरी संतालों पर जबरन लागू करने की कोशिश की जाएगी। अतः इस भयंकर मुस्किलत से बचने हेतु पी. ओ. बोडिंग ने इसका बेड़ा उठा लिया था। इस महान कार्य के लिए उसने दिन-रात एक कर दिया। उन्होंने अपने खून-पसीने एक कर दिए। उन्होंने करीब 22 वर्षों तक कड़ी मेहनत की। और अंततः अपने अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप उन्होंने इन पुस्तकों की रचना कर डाली। पी. ओ. बोडिंग ने इन पुस्तकों को मानक संताली के किसी भी तरह के दुश्मनों को मार गिराने के लिए हैड्रोजन बम तुल्य आविष्कार किया है :- 1. Materials for a Santali Grammar, Part-I (Mostly Phonetics); 2. Materials for a Santali Grammar, Part-II (Mostly Morphology) एवं 3. A Santal Dictionary (V Vols). अतः यह अब हमारी ड्यूटी बनती है कि हम उपरोक्त हैड्रोजन बमों का प्रयोग कब, कहाँ और किस तरह के दुश्मनों पर करें?

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...