हमारी पहचान है या विनाश की फाँस?
अगर दुनिया में लिपि ही किसी समुदाय विशेष की पहचान होती, तो आज अंग्रेज ही दुनिया के महामूर्ख कहलाते। यही वे महामूर्ख अंग्रेज हैं, जिनके पास अपनी कोई लिपि नहीं है। मालूम हो; अंग्रेजी की लिपि उधारी है। फिर भी अंग्रेजों ने आज किसी सौतेली लिपि के भरोसे दुनिया को अपनी मुट्ठी में कैदकर रखा है। क्या यह झूठ है कि अंग्रेजों ने अपने ही देश भारत में करीब तीन सौ साल तक डंके की चोट पर राज किया है? क्या यह भी असत्य है कि उन्होंने दुनिया के अन्य करीब ढाई सौ देशों में अपना परचम लहराते रहा है? फिर तो यह भी अविश्वासनीय ही होगा कि आज भी अंग्रेज पचास देशों में राज कर रहे हैं? क्या आपको मालूम है कि उन देशों में उनके बगैर हुक्म सूर्यास्त भी नहीं होता है? उन देशों में अंग्रेजों की तूती बोलती है। एक बार अपने गिरेबां में झांककर कह दो कि यह सब बकवास है, झूठ है और फरेब है। हे कंबल ओढ़कर घी पीने वालो अंग्रेजों की औलाद! हे अंग्रेजों के पैंट पहनने वालो! छोड़ दो हम जैसे गरीब और असहाय संतालों को। खुद के बच्चे अंग्रेजी मिडियम में और हमारे बच्चे वही झोल चिकी का झोल पिलाते रहो? यह सब गोरखधंधा अब और चलने वाला नहीं है। हमें बेवकूफ बनाना बंद करो। और बंद करो अपनी वाहियात चिकी मिशन-2025। तुम्हारा पाप का घड़ा अब भर चुका है। देखते नहीं हो, तुम्हारे आका मुख्यमंत्री मांझी साहब ने उस घड़े को फोड़ दिया है। और तुम्हें क्या चाहिए? दूर हो जा हमारी नजरों से, नहीं तो बेमौत मरने के लिए तैयार रहना।
अंग्रेजों को लाख गाली दो, पर सच्चाई छुप नहीं सकती है। यह सच है कि यही वह शख्स है जिसने सिर्फ आपको ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम नंग-धड़ंगों को अपनी आबरु बचाने हेतु अपनी पैंट पहना रखी है। न सिर्फ उसने अपनी पैंट ही पहना रखी है बल्कि यह बताओ कि उनका हस्तक्षेप कहाँ नहीं है? तुम्हारे उठते-बैठते, सोते-जागते, रोना-धोना और तमाम तरह के क्रिया-क्लापों में सिर्फ अंग्रेजों का ही भूत सवार रहता है। बगैर अंग्रेजियत आपकी सांस एक सेकेण्ड भी नहीं चल सकती है। समय रहते चेत जाओ। तुम्हारी यह गंदी हरकत ने हमें सौ साल तक बेवकूफ बनाती रही है। तुम्हारी यह बुझी रोशनी, अब किसी काम की नहीं है। छोटे बच्चे ज्यादा गुस्सा नहीं कलते, अब सो जाओ!
पहचान ... पहचान ... पहचान! पहचान कौन? पहचान झोल चिकी! सब जगह पहचान! अरे महामूर्खो! आपने तो हद ही कर दी है। तुम्हारी हर सांस में ही अंग्रेजियत है। फिर किस बात की पहचान? अंग्रेजी की अपनी लिपि नहीं है। फिर भी अंग्रेजी दुनिया की सबसे बड़ी भाषा बन गई है। सिर्फ अंग्रेजी ही नहीं बल्कि दुनिया की कई अन्य भाषाएं भी हैं, जिनकी अपनी लिपि नहीं है, पर उन्होंने अपनी भाषा की समृद्धि के लिए रोमन लिपि को ही अपना रखा है। जरा गहराई से सोचो। आखिर ऐसा क्यों? आपकी लिपि संतालों की फाँस बन गई है।
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