Thursday, 16 May 2024

हूल प्रदेश का भविष्य

कल इलाके में बारिस हुई थी, इस वजह से मौसम कुछ ठंढा है। फिर भी मंगरु अपनी पुरानी आदतन उसी पेड़ तले बैठे-बैठे कुछ सोच रहा था। मंगरु अच्छी तरह जानता है कि वह कोई ज्योतिष नहीं और न ही वह कोई भविष्यवक्ता है। लेकिन इतिहास के पन्नों को खंगालने के बाद कुछ कहा जाय, तो कोई गलत नहीं।

हूल घटित हुए आज 169 वर्ष बीत गए। आज वक्त ने अच्छी तरह अंगड़ाई ले ली है। तब की और आज की परिस्थिति में जमीन-आसमान का फर्क है। हूल तक लोग पाषाण युग में जी रहे थे। तब आज की आधुनिकता के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। उस वक्त कोई सांसद-विधायक नहीं, कोई चिंटु-पिंटु भी नहीं और ना ही कोई राजनीतिक चमचे-बेलचे ही मौजूद थे। और सबसे बड़ी बात कि उस वक्त आज के जैसा कोई लोकसभा का चुनाव वगैरह भी तो नहीं होता था। और ना ही जनता चुनाव के चक्कर में अपनी मित्रता खो बैठते थे। खैर, संतालों की परंपरागत मांझी-परगना व्यवस्था बहुत सुदृढ़ थी, जिसकी वजह से वे अपना एक अलग प्रदेश "संताल परगना" को हासिल करने में सफल हुए। इतना ही नहीं उन्होंने संताल परगना की शासन व्यवस्था को भी अपनी इच्छानुसार स्थापित करने में सफल हुए।

हूल के बाद संताल परगना में मिशनरियों का आगमन हुआ एवं उनकी देन आपके समक्ष है। इधर 1880 के दशक में हूल प्रदेश में संतालों के बीच हिंदुकरण का बीज बोया गया। इस धार्मिक आंदोलन को "खेरवाड़ आंदोलन" के नाम से भी जाना गया। इस आंदोलन के अगुवे बाबा भगीरथ, धुबिया गोसांई आदि बने। इस दौरान हूल प्रदेश में कुछ हुआ या नहीं पर खतियान का काम जरुर हुआ। स्मरण रहे कि संताली साहित्य का विकास रोमन संताली से आरंभ हुआ।

अंग्रेजों का भारत आगमन से पूर्व देश की सामाजिक अवस्था ठीक नहीं थी। यह अंग्रेजों की ही देन है कि इन्होंने दलितों के उत्थान के लिए बहुत सारे मार्ग प्रशस्त किए। उनमें शिक्षा की क्रांति सहित बहुत सारी सामाजिक कुरीतियों के नाश शामिल हैं।

सन् 1947 को भारत देश आजाद हुआ। तात्क्षण भारत का संविधान बना। संविधान बनते ही भारत में दबे-कुचलों के भविष्य का सूर्योदय हुआ। सीधा कहें, तो देश में सरकारी महकमों में दलितों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसी व्यवस्था के तहत ही आज हम चुनाव चुनाव का खेल खेल रहे हैं। जिस दिन यह व्यवस्था समाप्त हो जाएगी, उसी दिन हम दलित फिर वही गले में हांड़ी टांगते हुए नजर आएंगे।

अंग्रेजों की देन संताल परगना आज किस स्थिति में है? इस आधुनिक दौड़ में वह किस पायदान पर खड़ा है? इस दौरान उसने क्या खोया-क्या पाया? अगर इसका तुलनात्मक अध्ययन किया जाए, तो बहुत सारे राज परत दर परत खुलते जाएंगे। आज हूल प्रदेश की स्थिति ठीक नहीं है। हालांकि संविधान लागू होने के साथ ही यहां आदिवासियों के लिए अधिकांश सीटें आरक्षित की गई, फिर भी आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक अवस्थाएं ढाक के वही तीन पात हैं। हूल प्रदेश में चाहे वह दिसोम गोमके हों अथवा गुरुजी का दौर झारखण्ड नामधारी दलों का ही वर्चस्व रहा है। इतना कुछ होने के बावजूद भी आज हूल प्रदेश में आदिवासियों की जनसंख्या घटती जा रही हैं एवं इनकी आधी आबादी जीवकोपर्जन के लिए अन्य प्रदेशों की ओर पलायन के लिए मजबूर हैं। क्यों?

हूल प्रदेश के पतन के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है? क्या हमारे धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक पतन के लिए सिर्फ चिंटु-पिंटु को ही दोष दिया जाय? या और भी कोई अन्य कारण हैं? इन कारणों पर जब तक विश्लेषणात्मक अध्ययन नहीं किया जाएगा, जब तक हमारा ब्लूप्रिंट व रोड मैप तैयार नहीं होगा, जब तक हमारा प्रयास सामूहिक नहीं होगा, तब तक हमारा कृत्य अंधेरे में तीर मारना ही साबित होगा।

आइए, इस विषय पर गहनपूर्वक मंथन करें, सामूहिक प्रयास पर बल दें जिससे हम अपने हूल प्रदेश के भविष्य को संवार सकें।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...