Monday, 9 September 2024

पी. ओ. बोडिंग साहब की अनमोल भेंट

तब संतालों में एक भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति नहीं था, फिर भी वे शेर के जबड़े से संताल परगना को खींच निकालने में सफल रहे। इसके विपरीत, आज हर घर में पढे-लिखे लोग मौजूद हैं। संतालों के अत्याचारियों ने जुल्म करने की सीमा को लांघ दिया है। फिर भी हम भिंगी बिल्ली बनकर किसी एक कोने में दुबके हुए हैं। हूल बीते मात्र 5 वर्ष ही बीते थे। हूल एवं हूल के परिणामों से मनुवादी अत्यधिक बौखला उठे थे। उनकी बौखलाहट स्वाभाविक थी। कारण, हूल में महाजनों को अपने किये का फल मिल चुका था। जहां भी दा॑व लगा, वे मौत के घाट उतारे गए थे। हूल तत्कालीन अंग्रेज साम्राज्य के विरुद्ध नहीं बल्कि अत्याचारी महाजनों के विरुद्ध था। अतः मनुवादियों का जख्मी शेर में परिणत होना स्वाभाविक था। हुआ यूं कि अब महाजन दुगुना रफ्तार से संतालों पर अत्याचार करने लगे थे। ऐसी हालत में मिशनरियों का संताल परगना में आगमन और निरीह संतालों की मदद करना; इन सूदखोर महाजनों को फूटी कौड़ी नहीं सुहाया।

तब बेनगड़िया मिशन पापा-केराप की भलमनसाहत के कारण अपनी प्रसिद्धि पाने में सफल हो चुका था। पापा-केराप साहब ने संतालों की भलाई हेतु कोई कोर कसर न छोड़ रखी थी। कुछ वर्षों बाद उसी स्थान पर पी. ओ. बोडिंग का भी आगमन हुआ। कुछ ही वर्षों के बाद दोनों संतालों के मसीहा पापा-केराप साहब इस दुनिया से चल बसे। अब संतालों की देखरेख का सारा भार बोडिंग साहब पर आ गिरा था।

पी. ओ. बोडिंग साहब एक महान भाषावैज्ञानिक थे। वे संताली के अलावे अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मनी, नॉर्वेजियन आदि भाषाओं के भी अच्छे जानकार थे। उन्हें संताली भाषा-साहित्य से बेहद लगाव था। उन्होंने 44 वर्षों तक संतालों के बीच रहकर संताली साहित्य की सेवा की है।

भारत प्रवास के दौरान उन्होंने देखा कि संतालों की आर्थिक स्थिति बहुत ही नाजुक अवस्था में पड़ी हुई थी। और इधर महाजनों ने भी संतालों का जीना हराम कर रखा था। मिशन स्कूल के भरोसे एकाध संताल जरूर अपना नाम व कुछ पढ़-लिख सकने में कामयाब तो हो चुके थे। परंतु वे इतने योग्य नहीं थे कि वे अपनी भाषा की समृद्धि एवं शब्द संचयन के मामले में कुछ कर सकें। बोडिंग साहब को डर सता रहा था, अगर समय रहते संताली शब्दावली को संजोकर नहीं रखा गया, तो वह दिन दूर नहीं जब संताली भी एक न एक दिन विलुप्त होने के कगार पर पहुँच जाएगी। यही एकमात्र कारण था कि बोडिंग साहब की 20 वर्षों की कड़ी मेहनत ने रंग लाई। जिसके फलस्वरूप उनके द्वारा संग्रहित, लिखित, संपादित एवं प्रकाशित A Santal Dictionary (5 Vol) हमारे लिये छोड़ गए। इस डिक्शनरी की उपयोगिता तब तक होती रहेगी, जब तक एक भी संताल इस धरा पर विचरण करता रहेगा। पी. ओ. बोडिंग का नाम सदा-सदा के लिये स्वर्ण अक्षरों में चमकता रहेगा! संताली साहित्य के मसीहा पी. ओ. बोडिंग साहब को शत-शत नमन!

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...