Sunday, 1 September 2024

राजनीतिज्ञ और डाकू

ओशो ने कहीं कहा है - "राजनीति...! क्या ही सुंदर शब्द गढ़ा है लोगों ने ”राजनीति!“ जिसमें नीति बिलकुल भी नहीं है, उसको कहते हैं राजनीति। सिर्फ चालबाजी है, धोखा-धड़ी है, बेईमानी है। हालांकि ईमानदारी के नकाब ओढ़ने पड़ते हैं, मुखौटे ओढ़ने पड़ते हैं, अपने को छिपा-छिपा कर चलना पड़ता है। राजनीतिक नेताओं के पास जितने चेहरे होते हैं, उतने किसी के पास नहीं होते। उनको खुद ही पता नहीं होता कि उसका असली चेहरा कौन-सा है। मुखौटे ही बदलते रहते हैं, गिरगिट की तरह।

राजनीति डकैती है। दिन-दहाड़े! जिनको लूटो, वे भी समझते हैं कि उनकी बड़ी सेवा की जा रही है! यह बड़ी अदभुत डकैती है। डाकू भी इससे मात खा गए। डाकू भी पिछड़ गए। सब तिथि-बाह्य हो गए "आउट ऑफ डेट।" इसलिए तो बेचारे डाकू समर्पण करने लगे कि क्या सार है! चुनाव लड़ेंगे, उसमें ज्यादा सार है। तो राजनीतिज्ञों के सामने डाकू समर्पण कर रहे हैं, क्योंकि देख लिया डाकुओं ने, इतनी समझ तो उनमें भी है, कि मारे-मारे फिरो जंगल-जंगल और हाथ क्या खाक लगता है कुछ! और हमेशा जीवन खतरे में। इससे तो राजनीति बेहतर, राजनीति डकैती की आधुनिक व्यवस्था है, प्रक्रिया है। 

एक मिनिस्टर जनसंपर्क दौरे पर बाहर निकले। मंजिल पर पहुंचने से पहले डाकुओं द्वारा पकड़े गए। रस्सियों से जकड़े गए कार से उतार कर पेश किए गए। सामने सरकार के बुरी तरह हांफ रहे थे मारे डर के कांप रहे थे। तभी बोल उठा सरदार डरो मत यार हम तुम एक हैं। दोनों के इरादे नेक हैं। तुम्हारे हाथ सत्ता ... हमारे हाथ बंदूक, दोनों के निशाने अचूक। हम बच रहे हैं अड्डे बदल और तुम दल बदल कर दोनों ही एक-दूसरे के प्रचंड फ्रेंड जनता को लूटने में दोनों ट्रेंड। या यों कह लो सगे भैया, रास्ते अलग-अलग लक्ष्य दोनों का रुपैया। दोनों के साथ पुलिस हमारे पीछे, तुम्हारे आगे। यहां आए हो तो एक काम कर जाओ, अपनों के बीच आराम कर जाओ। बैंक लूटने के उपलक्ष में, हमारे पक्ष में आज की रात ठीक आठ बजे तुम्हारा भाषण है और तुम्हारे ही हाथों नए अड्डे का कल उदघाटन है। राजनीति एक संगठित लूट-तंत्र है। पूरे देश में राजनीति की आड़ में भ्रष्टखोरों की नूरा-कुश्ती-कबड्डी जारी है और रैफरी भी कोई नहीं।

”राजनीति”... यह खेल ठीक वैसा ही है जैसे सब चोर मिल कर विचार करें कि देश में चोरी कैसे बंद हो? भ्रष्टाचार कैसे बंद हो? अपराध कैसे बंद हो? सब एक-दूसरे की तरफ देखें, हंसें, मुस्कराएं, सभाएं करें, लंबे-लंबे भाषण करें और फिर अपने-अपने उसी काम-धंधे पर निकल जाएं। जैसे छिपकलियां रातभर हजारों कीड़े-मकौड़े खाकर सुबह होते ही दीवारों पर टंगी हुई देवी-देवताओं - संतों-महापुरुषों की तस्वीरों के पीछे जाकर छुप जाती हैं। ठीक यही चरित्र राजनैतिक दलों और राजनेताओं का है।   

राजनीति तो विध्वंस है, शोषण है, हिंसा है; शुद्ध डकैती है। डाकुओं के दल हैं। और उन्होंने बड़ा जाल रच लिया है। एक डाकुओं का दल हार जाता है, दूसरों का जीत जाता है; दूसरों का हार जाता है, पहलों का जीत जाता है। और जनता एक डाकुओं के दल से दूसरे डाकुओं के दल के हाथ में डोलती रहती है। यहां भी लुटोगे, वहां भी लुटोगे। यहां भी पिटोगे, वहां भी पिटोगे। राजनैतिक पार्टियां सिर्फ शोषण करती हैं। पांच साल एक पार्टी शोषण करती है, तब तक लोग दूसरी पार्टी के संबंध में भूल जाते हैं। फिर दूसरी पार्टी सत्ता में आ जाती है, पांच साल तक वह शोषण करती है, तब तक लोग पहली पार्टी के संबंध में भूल जाते हैं। यह एक बहुत मजेदार खेल है। होश पता नहीं तुम्हें कब आए! जिस दिन तुम्हें होश आएगा, उस दिन राजनीति दुनिया से उठ जाएगी; उस दिन राजनीति पर कफन ओढ़ा दिया जाएगा; राजनीति की कब्र बन जाएगी। 

मैंने सुना है कि जंगल के जानवरों को आदमियों का एक दफे रोग लग गया। जंगल में दौड़ती जीपें और झंडे और चुनाव! जानवरों ने कहा, हमको भी चुनाव करना चाहिए। लोकतंत्र हमें भी चाहिए। बड़ी अशांति फैल गई जंगल में। सिंह ने भी देखा कि अगर लोकतंत्र का साथ न दे तो उसका सिंहासन डंवाडोल हो जाएगा। तो उसने कहा, भई, हम तो पहले ही से लोकतंत्री हैं। खतम करो इमरजेंसी, चुनाव होगा। चुनाव होने लगा। अब बिचारे सिंह को घर-घर, द्वार-द्वार हाथ जोड़कर खड़ा होना पड़ा। गधों से बाप कहना पड़ा। एक लोमड़ी उसके साथ चलती थी, सलाहकार, जैसे दिल्ली में होते हैं। उस लोमड़ी ने कहा, एक बात बड़ी कठिन है। आप अभी-अभी भेड़ों से मिलकर आए और आपने भेड़ों से कहा कि तुम्हारे हित के लिए ही खड़ा हुआ हूं। तुम्हारा विकास हो। सदा से तुम्हारा शोषण किया गया है, प्यारी भेड़ो, तुम्हारे ही लिए मैं खड़ा हुआ हूं। आपने भेड़ों से यह कह दिया है। और आप भेड़ों के दुश्मन भेड़ियों के पास भी कल गए थे और उनसे भी आप कह रहे थे कि प्यारे भेडियो, तुम्हारे हित के लिए मैं खड़ा हूं। तुम्हारा हित हो, तुम्हें रोज-रोज नयी-नयी जवान-जवान भेड़ें खाने को मिलें, यही तो हमारा लक्ष्य है। तो लोमड़ी ने कहा, यह तो ठीक है कि इधर तुमने भेड़ों को भी समझा दिया है, भेड़ियों को भी समझा दिया है। और अगर अब दोनों कभी साथ-साथ मिल जाएं, फिर क्या करोगे? उसने कहा, तुम गांधी बाबा का नाम सुने कि नहीं? सुने, उस लोमड़ी ने कहा, गांधी बाबा का नाम सुने। तो उसने कहा, गांधी बाबा हर तरकीब छोड़ गए हैं। जब दोनों साथ मिल जाते हैं तब मैं कहता हूं, मैं सर्वाेदयी हूं? सबका उदय चाहता हूं। भेड़ों का भी उदय हो, भेड़ियों का भी उदय हो, सबका उदय चाहता हूं। जब अकेले-अकेले मिलता हूं तो उनको बता देता हूं, जब सबको मिलता हूं तो सर्वाेदयी की बात कर देता हूं। तुम अपने मन को जांचो। तुम बड़ी राजनीति मन में पाओगे। तुम चकित होओगे देखकर कि तुम्हारा मन कितना अवसरवादी है लेकिन तुम एक मजे की बात देखोगे, पार्टी कोई भी हो, कांग्रेस हों, भारतीय जनता पार्टी हो, पार्टी कोई भी हो, लेकिन सब कहेंगे कि महात्मा गांधी के अनुयायी हैं हम। कुछ बात है गांधी बाबा में। समय पर काम पड़ते हैं। कुछ तरकीब है। तरकीब है - अवसरवादिता के लिए सुविधा है। तो है। जब जो तुम्हारे अनुकूल पड़ जाता है, उसी को तुम स्वीकार कर लेते हो। जब जिस चीज से जिस तरह शोषण हो सके, तुम वैसा ही शोषण कर लेते हो। जब जैसा स्वांग रचना पड़े, वैसा ही स्वांग रच लेते हो।" 

सत्ता का खेल अजीबोगरीब है

आपका यह मंगरु कोई राजनीतिज्ञ नहीं है और न ही उसे राजनीति के बारे में a, b, c मालूम है। हाँ, इतना जरूर है कि उसके पास कच्चा-पक्का ढेर सारा अनुभव है। उसने अपनी निरीह आँखों से इन चिन्हों के उगते-डूबते सूरज को बहुत करीब से देखा है; यथा - मुर्गा, जोड़ा पत्ता और अब तीर-धनुष; जोड़ा बैल, गाय-बछड़ा और अब पंजा। इसके अलावे उसने टिमटिमाती दीये की लौ को भी बहुत करीब से देखा है। अब वह दीया फूल बनकर एक से तीन सौ पार करेगा, उसे विश्वास ही नहीं हो रहा है। उसे घोर आश्चर्य तो तब हुआ जब उसकी नींद खुली तो देखा कि केंद्र में तीन टर्म से उसकी सरकार चल रही है। बाकी कई राज्यों में भी उसकी सरकार है।

मंगरु झाखण्ड की कल-परसों की घटना को देखकर अत्यधिक विचलित हुआ जा रहा है। सुना है कि तथाकथित डूबते जहाज से कुछ कप्तान कूद गए हैं और वे अपना बेड़ा पार करने हेतु दूसरे जहाज पर सवार हो गए हैं। उनकी यात्रा मंगलमय हो! यह भी सुना है कि सत्ता का नशा अपरंपार है। यह नशा मरते दम तक उतरने का नाम ही नहीं लेता है। राजनीति के सामने नीतिविज्ञान फेल है। यह भी सच है कि अब मुर्गे का दौर समाप्त हो चुका है। मीटिंगों में कोई स्वयं जाता नहीं है बल्कि उन्हें ले जाना पड़ता है। जनता भी पैसे की भाषा को ही समझती है। हाय पैसा! चुनावी खर्चा हद से ज्यादा हो गया है। सत्ता पैसामय हो चुका है। और उस पैसे का जुगाड़ जनता को सूली पर टाँग कर ही प्राप्त किया जा सकता है। सोचो फिर दोनों विभीषणों ने कितने पैसों का डील किया होगा? इसीलिए कहा जाता है कि सत्ता का खेल जैसा दीखता है, वैसा वह है नहीं।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...