Monday, 29 January 2024

 कैसी और किसकी आजादी (6)?

पिछले अंक में हमने जान लिया था कि भारत में अंग्रेज आगमन से पूर्व शूद्रों की क्या स्थिति थी। शूद्रों की धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक एवं ऐतिहासिक परिस्थिति के बारे में अच्छी तरह जान लिया। उनकी क्या ही अमानवीय व विभत्स स्थिति थी। शूद्रों की नवविवाहिता को पंडित जी को सुपुर्द करना, पहले बेटे को गंगा में दान करना, नरबलि के लिए अपने को सुपुर्द करना, उन्हें किसी तरह की कोई चल-अचल संपत्ति रखने का अधिकार नहीं, आदि। और तो और उनको कुर्सी तक में बैठने की इजाजत नहीं थी। खैर, अंग्रेजों ने शूद्रों के विरुद्ध ब्राह्मणों की ऐसी ही तमाम अमानवीय परंपराओं को तोड़ दिया था। अगर अंग्रेज न आये होते, तो अब तक शूद्रों की क्या हालत होती? इस बारे में आप सोच भी नहीं सकते। सन् 1947 को देश आजाद हुआ और एक शूद्र ने देश का संविधान लिख डाला। भारत का संविधान विश्व का सर्वश्रेष्ठ संविधान माना जाता है। फिर भी इतना बढ़िया संविधान होते हुए भी ये ब्राह्मण रोज ही इनकी आलोचना करते रहते हैं। इतना ही नहीं वाभन सरेआम इसकी प्रतियों को जलाते हैं। संविधान में प्रदत्त आरक्षण के विरुद्ध धरना-प्रदर्शन करते रहते हैं। शूद्रों को सदियों से प्रताड़ित करते हुए भी अब तक इनका पेट नहीं भरा है। अब वह घड़ी फिर आ चुकी है, जिसमें शूद्रों को अंग्रेज भारत आगमन से पूर्व की भाँति प्रताड़ित किया जाएगा। शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। अगर यही स्थिति रही, तो इस खेल में शूद्रों का पराजित होना निश्चित है।

 सुर-असुर का खेल बहुत ही पुराना खेल है। यह अनादि काल से चला आ रहा है। इस खेल को समझ पाना उतना आसान नहीं है, जितना हम समझ रहे हैं। इस खेल में दीखता कुछ है और होता कुछ है। इस खेल की विडंबना यही है कि जब शेर को एक बार मानव खून का चस्का लग जाए, तो यह छुटाये नहीं छुटता है। खासकर बरसात के दिनों में आपने किसी जलते हुए बल्ब की रोशनी को अवश्य देखा होगा। यह भी जरुर देखा होगा; किस तरह छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़े उस रोशनी की तरफ अपने आप दौड़े चले आते हैं और थोड़ी देर तक उस जलते बल्ब की परिक्रमा करने के बाद भस्म हो जाते हैं। इस दृश्य में आपने नोट किया होगा कि कीड़े-मकोड़े को छोड़ कोई हाथी-घोड़े नहीं आते हैं। तत्पर्य यही है कि वे छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़े अपने अंतःमन से ”मनुस्मृति“ को स्वीकार कर ले, तो कौन क्या कर सकता है। इसे ही कहा जाता है; मियां-बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी।

देश बदल रहा है। 2024 का चुनावी बिगुल बज चुका है। सियासी दांव-पेंच का खेल चरम पर है। कल (28.1.2024) को बिहार का तख्ता पलट चुका है। अब दो दिन के अंदर झारखण्ड में भी बड़ा खेला होने वाला है। क्योंकि कहा जाता है कि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...