Thursday, 23 May 2024

जिसकी लाठी उसकी भैंस

न चाहते हुए भी मंगरु को अपना मुंह खोलना पड़ रहा है कि इस वक्त संतालों की आधी जमीन परायों के हाथों चली गई है। क्यों? कानून तो कहता है कि एसपीटी एक्ट के तहत संतालों की जमीन की खरीद-बिक्री नहीं हो सकती है। फिर भी क्यों संतालों की जमीन को हड़पा जा रहा है? इसके कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण तो यही है - ”मियां-बीबी राजी तो क्या करेगा काजी।“ अब दुनिया बदल चुकी है। हर परिवार में एक चमकता हुआ एंड्रोयड फोन की जरुरत है। समय को देखते हुए घर में मोटर साईकिल की मांग भी बढ़ती गई है। आमदनी आठन्नी, खर्चा रुपैया वाली बात हो गई है। समय की मांग को देखते हुए आधुनिक आवश्यकताओं की पूर्ति किस तरह हो, एक बहुत बड़ी समस्या मुंह बांयें खड़ी है। कोई और उपाय न देख, चलो अपनी अचल संपत्ति पर ही अपना हाथ साफ कर लें। मना करने पर, नोट कर लो आपकी एक भी दलील चलने वाली नहीं है। अब इसमें किसी भी राजनीतिक दल का क्या कसूर? इस समस्या से आपका भगवान भी आपको नहीं बचा पाएगा।

चुनाव का माहौल है। मतदान की तारिख नजदीक आ रही है। दुमका-राजमहल से खड़े उम्मीदवारों की सांसे फूली हुई हैं। सभी अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। हर गली-कूचों की जनता के बीच राजनीतिक बहस छिड़ी हुई है। हर किसी उम्मीदवार पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। हर व्यक्ति अपनी पीड़ा का ठीकरा अपने विधायक/सांसदों पर फोड़ रहा है। सच देखा जाय, तो जितनी गलियां राजनीतिज्ञों को दिया जाता है, शायद ही किसी और को दिया जाता हो।

सत्ता का नशा बादशाहों को मतवाला बना देता है। वे सत्ता वापसी के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाते हैं। वे सरकारी मशीनरियों का दुरुपयोग करने से बाज नहीं आते। कभी-कभी वे अपने ही बुने हुए जाल में फंस जाते हैं। उदाहारणार्थ - इलेक्ट्रोल बॉण्ड। सुना है; सत्ताधारियों ने कोई धुलाई मशीन की ईजाद की हुई है। इस मशीन की हैसियत बहुत अनोखी है! लोग कहते हैं, जितना भी बड़ा भ्रष्टाचारी क्यों न हो, इस मशीन में धुलाई के उपरांत वह दूध-सा उज्जवल चमकने लगता है। वाह री, मोती धुलाई मशीन!

आपने सुना होगा। सत्ता में आसीन बादशाह का हुक्म हुआ - "जाओ, विपक्ष के सभी सदस्यों को अपने खेमे में शामिल कर लो। इससे हमारी शक्ति मजबूत होगी।"

"हुजूर अनार्थ हो जाएगा। वे सभी महा भ्रष्टाचारी हैं।"

"कोई बात नहीं। उन्हें हमारी धुलाई मशीन में नहला दो। जाओ, हमारा मुंह क्या ताक रहे हो?"

"हुजूर उनका क्या करें, जो उस मशीन में नहाने से मना कर दे?"

"उन्हें सलाखों के पीछे धकेल दो। कितनी बार समझाया? समझ में नहीं आता है क्या?"

थानेदार मुंह लटकाये चला गया। उसने आव देखा न ताव, एक आदिवासी मुख्यमंत्री को अकारण ही पकड़ कर जेल में ठूंस दिया। बेचारा शरीफ आदिवासी चुपचाप त्यागपत्र देकर जेल चला गया।

इसके बाद बादशाह का हुक्म हुआ - "दिल्ली का मुख्यमंत्री बहुत फड़फड़ा रहा है। चुनाव में वह हमारा मटियामेट कर देगा। अतः उसे भी जेल में ठूंस दो।" और इस तरह थानेदार ने बादशाह की आज्ञा का पालन किया। लेकिन दिल्ली के सीएम ने हुंकार भरी - "तू डाल-डाल, तो हम पात-पात। हम रिजाईन नहीं करेंगे।"

देशभर में विपक्षी दलों को परेशान करने का सिलसिला जारी है। बादशाह की इच्छा जो चाहे वह कर रहा है। देश की संपत्ति को बेच दो और वह बेच रहा है। वह संविधान, आरक्षण, लोकतंत्र सबकुछ बेच देना चाहता है। वह जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली कहावत को चरितार्थ करने पर उतारु हो गया है। इंडिया गठबंधन उस बादशाह का जोरदार विरोध कर रहा है। चुनाव विश्लेषकों की मानें, तो बादशाह 400 नहीं 140 सीट पर अटक रहा है।

दुमका-राजमहल से भी इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार कमर कस कर मैदान में आ डटे हैं। बादशाह के चेले भी रणक्षेत्र में है। इसमें आश्चर्य की बात यही है कि कुछ निर्दलीय उम्मीदवार बदलाव चाहते हैं। उनका मनिफेस्टो क्या कहता है, यह तो राम जाने। पर वे अकेले ही संविधान एवं आरक्षण को बचा लेने का दंभ भर रहे हैं। आइए, 4 जून 2024 का इंतजार करें।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...