कथनी और करनी ...
"कोशिश करने पर भी अगर सफलता न मिलती हो, तो समझो कोशिश करने में कोई खोट अवश्य है।" यह सिद्धांत हम संतालों के विकास में अक्षरशः लागू होता है, नहीं तो क्या कारण हे कि तीन-तीन बार अलग प्रदेश मिलने के बावजूद भी मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक ही सीमित रही। संताल हूल के परिणामस्वरुप संताल परगना मिला, भारत देश गुलामी से आजाद हुआ और आज से ठीक 24 वर्ष पूर्व अलग झारखण्ड राज्य भी मिला। फिर भी खोदा पहाड़ निकली चुहिया, वह भी मरी हुई। इसका मतलब हमारी कोशिश में कोई न कोई खोट अवश्य रहा होगा।
चुनावी मौसम है, अतः सोशल मीडिया में राजनीति पर बरसाती मेढ़कों का टर्र-टर्र होना स्वाभाविक है। राजनीति एवं राजनीतिज्ञों पर चर्चा करना लाजिमी हो जाता है। घर बैठे सोशल मीडिया पर राजनीति के बारे सुतर्क-कुतर्क करना अंतःमन की खुजली को अवश्य मिटा देता है। लेकिन, ध्यान रहे, उन्हें इंगित करने पर तीनों उंगलियां अपनी ही ओर इशारा कर रही हैं।
इस चुनावी मौसम में राष्ट्र के बड़े-बड़े नेता इधर से उधर पल्टी मार रहे हैं। हम झारखण्डी नेता उनके सामने किस खेत की मूली हैं? उनकी आंच हम पर भी पड़ेगी, निश्चित है। लोबिन हेम्बरो़म, सीता सोरेन सरीखे नेताओं की उनकी अपनी मजबूरी होगी। वे गये, तो कौन-सा पहाड़ टूट गया? हमारे मतदाताओं को किस श्रेणी में रखा जाय? यह एक अति विचारणीय तथ्य है। क्या वे देश-दुनिया की समस्याओं से वाकिफ हैं? क्या उन्हें आपनी खुद की समस्या के बारे में कुछ पता है? शायद नहीं। जिस एसपीटी एक्ट के बारे में हम दहाड़ मार रहे हैं, क्या हमारे मतदाताओं को उससे कोई सरोकार है? उस एक्ट के बारे में अगर उन्हें खाक भी पता न हो, पर उन्हें यह तो अच्छी तरह पता है कि संतालों की जमीन न तो वे (संताल) बेच सकते हैं और न ही कोई गैर संताल उनकी जमीन को खरीद सकता है। फिर भी संतालों ने अब तक अपनी आधी जमीन को बेच चुका है। क्यों? लैण्ड पुलिंग से मतदाता वाकिफ हैं अथवा नहीं, क्या पता। सार यही है कि हम संताल सिर्फ एक समस्या से जूझ रहे हैं, ऐसी बात नहीं है। हमारी हजार तरह की समस्याएं हैं। सर्वप्रथम किस समस्या को सुलझाया जाय, इसकी प्राथमिकता निर्धारित करना अति कठिन कार्य है। तीर-धनुष चले या कमल फूल खिले हमारे नादान वोटर्स को क्या फर्क पड़ता है। उन्हें तो "खायेंगे-पीयेंगे और मस्तपूर्वक जीयेंगे" से फुर्सत ही कहाँ?
समय के साथ बहुत कुछ बदल चुका है। सिर्फ व्हाट्सअप पर उंगली फेर देने मात्र से कुछ नहीं होने वाला है। राजनीति पर बहस जरुरी है। पर इस पर मनमुटाव गलत है। कहने के लिए बड़ी-बड़ी बातें कही जा सकती हैं, पर उसे धरातल पर ला सकना उससे भी और कठिन कार्य है। कहा गया है कि कथनी और करनी में जमीन-आसमान का फर्क है। हेल्दी बहस जारी रहे, इससे सुदूर बैठे मंगरुओं का ज्ञानवर्धन होते रहता है।