Wednesday, 20 January 2021

 अदृश्य समस्याएं

मंगरु आज जितना उदास है, शायद ही वह पहले कभी हुआ हो। वह अत्यंत दुःखी है। दुःखी इसलिए कि अब तक जिस गति से उसके समाज को शिक्षित होना चाहिए था, वह नहीं हो सका है। क्योंकि शिक्षा को ही उन्नति की पहली कुंजी कहा जाता है। इस समय मंगरु के पास अपने समाज के बारे में मंथन करने के सिवा और कोई काम ही नहीं है। उसने बचपन से अब तक अपने समाज की संरचना को बहुत करीब से देखा है। जहां तक संभाव हो सका, उसने अपने समाज की भूत एवं वर्तमान परिस्थिति को समझने की भरपूर कोशिश की है। लेकिन उनके साथ ढाक के वही तीन पात वाली बात हो गई। उसका समाज शिक्षा के अभाव में अवनति के दलदल में धंसते ही जा रहा है।

मंगरु की उम्र छोटी थी, फिर भी माराङ गोमके के झारखण्ड आंदोलन को वह अपनी आँखों से देखा था। आदिवासियों की मांग पर झारखण्ड अलग प्रांत लेने के लिए सन् 1950 में झारखण्ड पार्टी नामक एक राजनैतिक दल का गठन हुआ था। झारखण्ड की जनता अलग प्रांत लेने के लिए मदहोश थी। यही वजह थी कि एकीकृत बिहार में झारखण्ड पार्टी प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभर कर सामने आई। तब कोई सुविधा उपलब्ध न थी, फिर भी लोग जयपाल सिंह मुण्डा को सुनने के लिए कोसों दूर पैदल ही चल पड़ते थे। कुछ वर्षों के बाद झारखण्ड पार्टी कांग्रेस पार्टी में विलय हो गई एवं उनका प्यारा चुनाव चिन्ह मुर्गा को भी ठंडे बक्से में डाल दिया गया।

संक्षेप में यही कि झारखण्ड का कांग्रेस में विलय के बाद हूल प्रदेश में एक सन्नाटा छा गया था। अल्प समय के लिए जस्टिन रिचार्ड सरीखे नेताओं का उदय हुआ। जिन्होंने हूल झारखण्ड पार्टी की स्थापना की एवं उनके कई विधायक भी बने। साथ ही 1960 के उतरार्ध में एक महान् सामाजिक कार्यकर्ता फा. अन्थोनी मुर्मू का उदय हुआ। इनका कार्यक्षेत्र मूलतः साहिबगंज-पाकुड़ जिले में दुर्तगति से फैलता चला गया। फिर 1970-80 के दशक में दिसोम गुरु शिबू सोरेन के नेतृत्व में अलग झारखण्ड प्रदेश का आंदोलन आरंभ हुआ। दिसोम गुरु ने झामुमो नामक एक राजनैतिक दल का गठन किया, और इसके बैनर तले अलग झारखण्ड प्रदेश की मांग की धार को और तेज कर दिया। स्मरण रहे कि सन् 1977 में जनता पार्टी की आंधी भी आई थी। जनता पार्टी जिस गति से आई थी उस गति से अस्त भी हो गई।

दिसोम गुरु का झारखण्ड आंदोलन काफी उतार-चढ़ाव के साथ चलते रहा। जनता की उन्नति की आस और अभिलाषा अलग प्रांत पर टिक गई थी। उन्होंने झारखण्ड अलग राज्य को किसी संजीवनी बूटी की तरह मान बैठा था। उनकी आशा थी कि अलग झारखण्ड राज्य मिलने के बाद उनकी सारी समस्याएं उड़नछू हो जाएंगी। काफी जद्दोजहद के बाद आखिरकार 15 नवंबर 2000 को अलग झारखण्ड राज्य मिल तो गया, पर अफसोस खोदा पहाड़ निकली चुहिया!

मंगरु अपने आप से पूछता है; क्या कारण है कि हमारा समाज आज भी जहां से चला था, फिर वहीं पहुंच गया है? समाज की ऐसी कौन-सी समस्याएं हैं जिनका समाधान नहीं हो सकता है? मंगरु के अनुसार; हो सकता है झारखण्ड चलाने के लिए हमारे पास कोई ब्लूप्रिंट उपलब्ध न था। और न ही किसी तरह का कोई रोडमैप ही तैयार था। हमने अंधेरे में ही तीर चलाने की कोशिश की है। हमारी छोटी-बड़ी सामाजिक संस्थाएं भी समाज की उन्नति के लिए नपुंसक सिद्ध हुई। इससे ऐसा भी कहा जा सकता है कि सभी तरह के सामाजिक कार्यों का ठेका राजनीतिज्ञों ने ले रखा है। परंतु नेताओं में भी दूरदर्शिता का अभाव है एवं उनकी नीयत में कोई न कोई खोट अवश्य है।

देश में आजकल लोकसभा चुनाव का महापर्व चल रहा है। नेताओं पर कई तरह के आरोप लगाए जाते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि नेताओं के चुनाव करने में हमसे ही कोई भूल हुई जा रही हो? चुनना था मीठा फल पर खाया तो पता चला फल खट्टा है। 

हमारे समाज में समस्या एक हो तो उसका समाधान निकाला जाय। पर यहां तो समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। कहीं हमारा समाज कैंसर से पीड़ित तो नहीं हो गया है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि उसका शल्य चिकित्सा ही अंतिम उपाय हो? हमारे समाज में दृश्य-अदृश्य कई तरह की समस्याएं किसी राक्षसनी की तरह सामने खड़ी हैं। कुछ भी हो, गहराईपूर्वक चिंतन के बाद इसका समाधान होना जरुरी है। 

आइए, आज हम अपने समाज उत्थान के लिए अंतःमन से प्रण लें।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...