Friday, 6 September 2024
Friday, 23 August 2024
जातिवाद : एक घनचक्करी
बाबा साहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर द्वारा रचित उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ”जाति प्रथा का विनाश“ में बहुत कुछ कहा गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य कब तक पूर्ण होगा, कहना किसी के वश की बात नहीं। कभी-कभी यह देखकर बड़ा ही आश्चर्य मालूम पड़ता है कि आखिर क्यों संताल लोग ही हूल के महानायक सिदो मुर्मू को मानते हैं? बाकी समुदाय के लोगों को इतनी महान हस्ती सिदो मुर्मू से कोई लेना-देना नहीं है। उसी तरह सिर्फ दलित लोग ही डॉ भीमराव आम्बेडकर की जयंती वगैरह मनाते हैं। बाबा साहब भारत के संविधान के रचयिता हैं, इसलिए मजबूरीवश अन्य समुदाय के लोग इन्हें याद करते हैं। वरना जाति प्रथा ने तो सबका नाश कर रखा है। सच कहा जाय, तो दलितों के महापुरुषों की पूजा दलित लोग ही करते हैं। अन्य समुदाय के लोग इन महापुरुषों के प्रति ईर्ष्या और घृणा का भाव रखते हैं। आखिर ऐसा क्यों?
सुना है; दुनिया के अन्य देशों में जहां जाति प्रथा नहीं है, वहां काले-गोरे का भेदभाव है। यह भी एक जटिल समस्या है। जाति प्रथा हो या काले-गोरे का भेदभाव, समाज के लिए यह एक बहुत बड़ा अभिशाप है। मालूम होता है, जिसने भी इस तरह के भेदभाव की सृष्टि की है, वह बड़ा ही चालाक और चतुर प्रवृति का रहा होगा। कुछ भी हो, हमारे देश में ऐसी कुप्रथा के जनक मनु महाराज को दोष देना कहां तक उचित है? जब तक वर्ण व्यवस्था जीवित है, तब तक जाति प्रथा का विनाश संभव नहीं लगता है।
देश में लोकसभा का चुनाव अंतिम पड़ाव पर है। सवाल इसलिए उठ रहा है; क्योंकि देखा जा रहा है कि इस चुनाव में जातीय समीकरण का भी बहुत बड़ा हाथ होता है। अनजाने में ही सही, जनता भी उम्मीदवार की जाति देखकर ही वोट देती है। उम्मीदवार कितना भी अयोग्य क्यों न हों जनता उसे ही वोट देने के लिए लालायित रहती है। यही कारण है कि दलित आज भी पूना एक्ट को याद करते हैं।
वर्ण व्यवस्था की स्थापना यूं ही चुटकियों में नहीं हुई है। इसके पीछे न जाने कितने रहस्य छिपे हुए हैं। इतिहास साक्षी है कि भारत में अंग्रेजों के आगमन तक उच्च जाति के लोगों ने शुद्रों का जी भरकर दोहन किया। यह तो ईश्वरीय वरदान ही समझो कि अंग्रेजों ने शूद्रों की आंखें खोल दीं एवं उनकी मुक्ति के लिए कई सारे मार्ग प्रशस्त किये। ब्रिटिश काल में ही डॉ भीमराव आम्बेडकर का जन्म हुआ। उस दलित भीमराव आम्बेडकर ने देश में छुआछूत को झेलते हुए उच्च शिक्षा ग्रहण किया। डॉ भीमराव आम्बेडकर दलितों के मसीहा बन गए। देश 1947 को आजाद हुआ। विडंबना देखिए कि डॉ भीमराव आम्बेडकर देश के प्रथम कानून एवं न्याय मंत्री बनाए गए एवं उन्हें भारत का संविधान लिखने की जिम्मेदारी दी गई। बाबा साहब की अगुवाई में दुनिया का सबसे बेहतरीन संविधान लिखा गया। इसी संविधान में सदियों से दबाये गए एससी, एसटी एवं ओबीसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसी संविधान के बदौलत ही आज दबे-कुचलों के लिए सरकारी संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था की गई। यह भी सच है कि इसी आरक्षण के तहत ही आज हम चुनाव-चुनाव का खेल खेल रहे हैं।
लोकसभा चुनाव 2024 के अंतिम एवं 7वें चरण का मतदान 1 जून 2024 को होना है। इसी चरण में ही दुमका एवं राजमहल (आरक्षित-अजजा) के लिए मतदान होना है। दोनों ही क्षेत्रों में इंडिया गठबंधन और भाजपा के बीच सीधी टक्कर है। मालूम हो कि भाजपा जहां संविधान एवं आरक्षण को समाप्त करना चाहती है, वहीं इंडिया गठबंधन-झामुमो इसे बचाने के लिए पूरे देश में जी तोड़ मेहनत कर रहा है। ध्यान रहे, राजमहल से कोई निर्दलीय उम्मीदवार भी है, जो जिसने जिस थाली में खाया है, उसी को ही छेद करने में जुटा हुआ है।
सवाल यही है कि अगर संविधान एवं आरक्षण समाप्त हो गया तो न हम घर के और न घाट के रहेंगे। समाज से फिलहाल जाति प्रथा का विनाश भी संभव नहीं है। यह एक घनचक्करी है। इस स्थिति में हमारा क्या दायित्व बनता है। आइए, हम सब मिलकर इस संबंध में सोचें एवं विचारें।
Thursday, 15 August 2024
Thursday, 16 May 2024
Tuesday, 2 April 2024
आज के गरभू देशमांझी ...
यह सोलह आना सही है कि कोई भी चीज हाथ में आ जाय, तो उसकी अहमियत तत्क्षण खत्म हो जाती है। वह चीज क्यों और कैसे मिली? उसके संघर्ष की गाथा शनैः-शनैः मलिन हो जाती है। इस रहस्य को आप ऐसे भी समझ सकते हैं। मान लो; कोई ऑरिजिनल (मूल) दस्तावेज है। उस ऑरिजिनल से एक फोटोकॉपी निकाली गई। फिर उस फोटोकॉपी से और कोई फोटोकॉपी निकाली गई। इस तरह फोटोकॉपी से फोटोकॉपी निकलती गई। यकीन मानो, कुछ वर्षों के बाद वह फोटोकॉपी धूमिल हो जाएगी। उस फोटोकॉपी में ऑरिजिनल जैसा अब कुछ भी नहीं दिखाई देगा। अब फोटोकॉपी करने से कागज सफेद ही निकलेगा। ठीक यही स्थिति संताल हूल, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और झारखण्ड आंदोलन के साथ भी घटित हो गई है।
आज से ठीक 169 वर्ष पूर्व की घटना है। तब लोगों के हाथ में न एंड्रोयड फोन उपलब्ध था, न चमचमाती कार थी और न ही उनके पास बड़े-बड़े मकान थै। उनके पास आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं। उनमें एक भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति मौजूद नहीं था। एक हाथ वस्त्र से पूरा शरीर ढंका जाता था। ऐसी हालत में करेला तो करेला, वह भी ऊपर से नीम चढ़ा। लोग सीधे और सरल थे। उनका सीधापन का अशुभ लाभ गैरों ने खूब उठाया। तब अत्याचार की बाढ़ सिर से ऊपर बहने लगी थी। पर जनता इस मुस्किलत से उबार पाने के लिए अंदर ही अंदर योजनाएं बनाने में व्यस्त थीं। वे अपने संघर्ष का रोड मैप बना रहे थे।
6 जुलाई 1855 की घटना। आज के संताल परगना के आमड़ापाड़ा-लिटीपाड़ा आसपास के गाँवों से चार लोगों को आज के ई.डी. ने गिरफ्तार कर लिया। उनका कसूर भी आपके सीटिंग मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के सीटिंग मुख्यमंत्री केजरीवाल के सदृश था। ई.डी. के अफसर उन गिरफ्तार हुए कैदी को आमड़ापाड़ा, बरहेट के रास्ते भागलपुर जेल पैदल ही ले जा रहे थे। कड़ाके की धूप थी। चारों कैदियों के हाथ-पैर बांधे हुए थे। कैदियों को खाना तो दूर, प्यास बुझाने के लिए एक बूंद पानी तक नसीब न था। ई.डी. के दो अफसर सफेद घोड़े पर शान के साथ सवार थे। दोनों अफसरों को धूप से बचाने के लिए सिपाहियों ने उनके सिर के ऊपर छतरी लिये हुए थे। उन कैदियों में से एक कदकाठी (हेमंत/केजरी) नौजवान भी था। वह भूख और प्यास से तड़प रहा था। वह चल सकने में भी असमर्थ था। ऐसी हालत में भी उसे घसीटा जा रहा था। उनकी हालत पर किसी ई.डी. अफसरों को तरस न आया। और वे आमड़ापाड़ा से चलकर पाडेरकोला पहुंच गए। पाडेरकोला में शाम परगना एक सज्जन व्यक्ति का वास था। वह व्यक्ति बहुत ईमानदार और बुद्धिमान था। उसने ई.डी. के अफसरों से नाक रगड़ते हुए गुहार लगाई - "ये लोग निर्दोष हैं। इन्हें कृपया रिहा कर दो।" पर आका का हुक्म था, ई.डी. के अफसरों ने उनकी एक न सुनी। और वे कैदियों के साथ अपने गंतब्य की ओर आगे बढ़ चले।
देश की जनता को अच्छी तरह मालूम था कि एक न एक दिन हमारे निर्दोष लोगों को गिरफ्तार कर लिया जायगा। ऐसी स्थिति को संभाल पाने के लिए वे साल भर पूर्व से तैयारी करने में जुटे हुए थे। कहा जाता है कि लोगों ने बन-जंगलों से तीर-धुनष बनाने के लिए बांस-बल्ली (बुरु-मात्) ले आये थे। उन्हें काट-झांटकर सूखने के लिए पत्थरों से दबा दिया था। राहुल का हुक्म था कि प्रत्येक घर से कम से कम एक बैलगाड़ी (मिमित् सागाड़काते) के बराबर तीर-धनुष तैयार हो जाना चाहिए। तलवार, टांगी, फरसा निर्माण हेतु लोहारों की मदद ली जाए। यह योजना साल भर में तब तक तैयार हो चुकी थी।
अपने निर्दाेष लोगों की गिरफ्तारी की खबर देश भर में दावानाल की तरह फैल गई। सिदो-कान्हू के नेतृत्व में रात भर में अस्त्र-शस्त्र से लैश 30 हजार लोगों की भीड़़ बरहेट के समीप पांचकठिया में एकत्रित हो गई। तड़के सुबह अर्थात् 7 जुलाई 1855 ई.डी. अफसरों की भिड़ंत सिदो-कान्हू से हुई। उनलोगों के बीच तू-तू, मैं-मैं होती रही और इधर गारभू ने का़पी (A battle axe) से दोनों अफसरों को मौत के घाट उतार दिया। हूल संपन्न हुआ। और उस हूल के बदौलत संताल परगना मिल गया। (रावण को मालूम था कि उसकी मौत राम के हाथों होगी। उसी तरह आज के रावण को भी मालूम है, उसकी मौत किसके हाथ होगी।)
Friday, 2 February 2024
Wednesday, 9 February 2022
Friday, 20 August 2021
पुस्तक प्रेमी समाज
एक निवेदन : संताल समाज पढ़ाकु समाज नहीं है। अर्थात् हमारा समाज पुस्तक प्रेमी समाज नहीं है। पुस्तक बोलती नहीं है, पर वह बहुत कुछ सिखाती है। परंतु हमारा समाज अब तक पुस्तक प्रेमी समाज क्यों नहीं बन पाया है? यह एक शोध का विषय हो सकता है। कहा जाता है कि जो समाज जितना पढ़ाकु होगा, वह समाज उतना ही उन्नत कहलाता है। पुस्तक पढ़ना समाज तौलने का एक पैमाना माना जाता है। या यूं कहें कि यह सीधा-सा तर्क है कि अगर पढ़ाकु समाज होगा, तो यह निश्चित है कि वह समाज उन्नत होगा। इसके उलट अगर समाज उन्नत है, तो वह समाज अवश्य ही पढ़ाकु समाज होगा। यह तथ्य निश्चित तौर पर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
इस संदर्भ में स्कूल-कॉलेजों की डिग्री से ही कोई शिक्षित कहलाएगा, ऐसा भी संभव नहीं है। शिक्षा में पैनापन लाने के लिए अनुभव एवं पुस्तक प्रेमी होना बहुत ही जरुरी विधा है। बहुत सारे ऐसे विषय हैं जो हमें कोर्स की किताबों में पढ़ने को नहीं मिलता है। जीवन में बहुत सारी ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, जो हमें दैनंदिनी के जीवन में बहुत प्रभावित करती हैं। ध्यान रहे; कोई कितना भी बड़ा डिग्रीधारी क्यों न हो, पर उसका बुनियादी ज्ञान मैट्रिक स्तर पर ही आधारित रहता है। हाँ, वह अपने ज्ञान का विस्तार आगे की पढ़ाई, पुस्तक प्रेमी बनकर एवं अनुभवी होकर ही कर सकता है।
आज मंगरु को इस संदर्भ में क्यों निवेदन करना पड़ रहा है? इसको इस तरह से समझा जा सकता है। आपने किसी फिल्म को थियेटर में अवश्य देखा होगा। उस फिल्म में क्या दिखाया जाता है? उस फिल्म में औसत 60 वर्ष की जिंदगी को सिर्फ 2 घंटे में दिखाया जाता है। कारण यही है कि इस भागमभाग की दौड़ में पूरी जिंदगी को समझ पाने के लिए 2 घंटे से ज्यादा वक्त किसी के पास उपलब्ध नहीं होता है। टी. व्ही. वगैरह में भी यही फार्मूला चलता है। ठीक ऐसे ही प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक मीडिया, इसी फार्मूला को ही अपनाया जाता है। साहित्य जगत में भी ऐसा ही होता है। यही कारण है कि महाग्रंथ, उपन्यास, कहानी-कविता को लिखा जाता है। साहित्य विधा में आपने देखा होगा कि लंबे-चौड़े विषय को भी एक ही वाक्य में कह दिया जाता है। ऐसे वाक्य को मुहावरा, कहावत, परिभाषा, नारा/स्लोगन कहा जाता है। उदाहरण - "लेल्हा गोडो, मोटा फुट", "आदो़ बाबोन बातावा, झारखण्ड राजबोन हातावा", "तुम मुझे खून दो, मैं तुझे आजादी दूंगा" आदि।
स्पष्ट रूप से कह दूं, तो आपका मंगरु भी इसी फार्मूले का मुरीद है। वह दुनिया भर की बातों को एक छोटा-सा लेख के द्वारा पाठको तक पहुंचाने की कोशिश करता है। ज्यादा वक्त किसी के पास नहीं होता है। यहाँ तक कि 2/3 पन्नों को पढ़ सकने का वक्त भी किसी के पास नसीब नहीं होता है। अतः उदाहरण के लिए शक्ति का वर्णन के लिए - "जिसकी लाठी उसकी भैंस" लिखा हो, तो उसी प्रसंग में ही उसके अर्थ को समझा जाय।
आदिवासी समाज अवनति के कई कारण हो सकते हैं, उनमें यह भी एक मूल कारण है कि समाज में पढ़ने-पढ़ाने की प्रवृति नगण्य है। अतः समाज को पुस्तक प्रेमी बनना ही होगा।
Wednesday, 20 January 2021
अदृश्य समस्याएं
मंगरु आज जितना उदास है, शायद ही वह पहले कभी हुआ हो। वह अत्यंत दुःखी है। दुःखी इसलिए कि अब तक जिस गति से उसके समाज को शिक्षित होना चाहिए था, वह नहीं हो सका है। क्योंकि शिक्षा को ही उन्नति की पहली कुंजी कहा जाता है। इस समय मंगरु के पास अपने समाज के बारे में मंथन करने के सिवा और कोई काम ही नहीं है। उसने बचपन से अब तक अपने समाज की संरचना को बहुत करीब से देखा है। जहां तक संभाव हो सका, उसने अपने समाज की भूत एवं वर्तमान परिस्थिति को समझने की भरपूर कोशिश की है। लेकिन उनके साथ ढाक के वही तीन पात वाली बात हो गई। उसका समाज शिक्षा के अभाव में अवनति के दलदल में धंसते ही जा रहा है।
मंगरु की उम्र छोटी थी, फिर भी माराङ गोमके के झारखण्ड आंदोलन को वह अपनी आँखों से देखा था। आदिवासियों की मांग पर झारखण्ड अलग प्रांत लेने के लिए सन् 1950 में झारखण्ड पार्टी नामक एक राजनैतिक दल का गठन हुआ था। झारखण्ड की जनता अलग प्रांत लेने के लिए मदहोश थी। यही वजह थी कि एकीकृत बिहार में झारखण्ड पार्टी प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभर कर सामने आई। तब कोई सुविधा उपलब्ध न थी, फिर भी लोग जयपाल सिंह मुण्डा को सुनने के लिए कोसों दूर पैदल ही चल पड़ते थे। कुछ वर्षों के बाद झारखण्ड पार्टी कांग्रेस पार्टी में विलय हो गई एवं उनका प्यारा चुनाव चिन्ह मुर्गा को भी ठंडे बक्से में डाल दिया गया।
संक्षेप में यही कि झारखण्ड का कांग्रेस में विलय के बाद हूल प्रदेश में एक सन्नाटा छा गया था। अल्प समय के लिए जस्टिन रिचार्ड सरीखे नेताओं का उदय हुआ। जिन्होंने हूल झारखण्ड पार्टी की स्थापना की एवं उनके कई विधायक भी बने। साथ ही 1960 के उतरार्ध में एक महान् सामाजिक कार्यकर्ता फा. अन्थोनी मुर्मू का उदय हुआ। इनका कार्यक्षेत्र मूलतः साहिबगंज-पाकुड़ जिले में दुर्तगति से फैलता चला गया। फिर 1970-80 के दशक में दिसोम गुरु शिबू सोरेन के नेतृत्व में अलग झारखण्ड प्रदेश का आंदोलन आरंभ हुआ। दिसोम गुरु ने झामुमो नामक एक राजनैतिक दल का गठन किया, और इसके बैनर तले अलग झारखण्ड प्रदेश की मांग की धार को और तेज कर दिया। स्मरण रहे कि सन् 1977 में जनता पार्टी की आंधी भी आई थी। जनता पार्टी जिस गति से आई थी उस गति से अस्त भी हो गई।
दिसोम गुरु का झारखण्ड आंदोलन काफी उतार-चढ़ाव के साथ चलते रहा। जनता की उन्नति की आस और अभिलाषा अलग प्रांत पर टिक गई थी। उन्होंने झारखण्ड अलग राज्य को किसी संजीवनी बूटी की तरह मान बैठा था। उनकी आशा थी कि अलग झारखण्ड राज्य मिलने के बाद उनकी सारी समस्याएं उड़नछू हो जाएंगी। काफी जद्दोजहद के बाद आखिरकार 15 नवंबर 2000 को अलग झारखण्ड राज्य मिल तो गया, पर अफसोस खोदा पहाड़ निकली चुहिया!
मंगरु अपने आप से पूछता है; क्या कारण है कि हमारा समाज आज भी जहां से चला था, फिर वहीं पहुंच गया है? समाज की ऐसी कौन-सी समस्याएं हैं जिनका समाधान नहीं हो सकता है? मंगरु के अनुसार; हो सकता है झारखण्ड चलाने के लिए हमारे पास कोई ब्लूप्रिंट उपलब्ध न था। और न ही किसी तरह का कोई रोडमैप ही तैयार था। हमने अंधेरे में ही तीर चलाने की कोशिश की है। हमारी छोटी-बड़ी सामाजिक संस्थाएं भी समाज की उन्नति के लिए नपुंसक सिद्ध हुई। इससे ऐसा भी कहा जा सकता है कि सभी तरह के सामाजिक कार्यों का ठेका राजनीतिज्ञों ने ले रखा है। परंतु नेताओं में भी दूरदर्शिता का अभाव है एवं उनकी नीयत में कोई न कोई खोट अवश्य है।
देश में आजकल लोकसभा चुनाव का महापर्व चल रहा है। नेताओं पर कई तरह के आरोप लगाए जाते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि नेताओं के चुनाव करने में हमसे ही कोई भूल हुई जा रही हो? चुनना था मीठा फल पर खाया तो पता चला फल खट्टा है।
हमारे समाज में समस्या एक हो तो उसका समाधान निकाला जाय। पर यहां तो समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। कहीं हमारा समाज कैंसर से पीड़ित तो नहीं हो गया है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि उसका शल्य चिकित्सा ही अंतिम उपाय हो? हमारे समाज में दृश्य-अदृश्य कई तरह की समस्याएं किसी राक्षसनी की तरह सामने खड़ी हैं। कुछ भी हो, गहराईपूर्वक चिंतन के बाद इसका समाधान होना जरुरी है।
आइए, आज हम अपने समाज उत्थान के लिए अंतःमन से प्रण लें।
Saturday, 7 February 2015
Tuesday, 3 February 2015
Thursday, 29 January 2015
बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी?
Wednesday, 17 August 1994
Sunday, 14 August 1994
संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...
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1932 खतियान: आदिवासी-मूलवासियों की पहचान (संताल परगना के संदर्भ में) यह विडंबना ही है कि युद्ध शांति के लिए अथवा शांति के लिए युद्ध किया जात...
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डूबता जहाज या नूह की नाव? सिदो-बिरसा के सपने को साकार करने हेतु आदिवासियों ने माराङ गोमके के नेतृत्व में जिस झारखण्ड पार्टी का गठन किया था, ...
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कैसी और किसकी आजादी? वाइरल हो रहे एक वीडियो "ईसावाद और औपनिवेशिक कानूनों के चक्रव्यूह में" को बड़े ध्यान से सुना। इस पर गहराई के स...
