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Friday, 6 September 2024

शिक्षा की अलख किसने जगाई?

यह आधुनिक युग है। इस युग में शिक्षा अनिवार्य हो गया है। अब अंगूठा टेक का जमाना लाद लिया। यह अलग विषय हो सकता है कि इस वक्त संताल परगना में खासकर संतालों में शिक्षा की क्या स्थिति है? यह सोलह आने सच है कि महान संताल विद्रोह अर्थात संताल हूल-1855 घटित होने तक एक भी संताल पढ़ा-लिखा नहीं था। हूल के परिणामस्वरूप अलग संताल परगना मिल तो गया पर शिक्षा के क्षेत्र में संताल परगना फिसड्डी ही रहा।

हूल के ठीक 5 वर्ष बाद 1860 को संताल परगना में ईसाई मिशनरियों का अगमन हुआ। उसने संतालों के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार आरंभ कर दिया। देखते ही देखते करीब तीन सौ छोटे-बड़े स्कूलों का उदय हुआ। इन स्कूलों में अमीर-गरीब बगैर किसी भेदभाव के सभी तरह के बच्चों को तालीम दी जाने लगी। मिशनरियों का नक्शा आपके सामने है कि आज भी इनके द्वारा प्रायोजित कई अच्छे-अच्छे स्कूल एवं कॉलेज चल रहे हैं।

कोई माने या न माने, लेकिन यह कड़ुवा सच है कि इन्हीं मिशन स्कूल से निकले बच्चों ने अपने हक और अधिकारों को पहचाना एवं संघर्ष के लिये सड़क पर उतर आए, चाहे वह अलग प्रांत की मांग हो अथवा किसी और तरह की मांग। इन्हीं की अगुवाई में कई आंदोलन हुए एवं आगे भी होते रहेंगे। एक ही कारण है कि अब इनकी आँखें खुल चुकी हैं। आदिवासियों को जहां भी प्रताड़ित किया जाएगा, ये शिक्षित बच्चे अग्रिम पंक्ति में अवश्य दिखाई देंगे। ऐसा इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि मिशनरियों ने आजतक शिक्षा की अलख को जगाए रखा है।

Friday, 23 August 2024

जातिवाद : एक घनचक्करी

बाबा साहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर द्वारा रचित उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ”जाति प्रथा का विनाश“ में बहुत कुछ कहा गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य कब तक पूर्ण होगा, कहना किसी के वश की बात नहीं। कभी-कभी यह देखकर बड़ा ही आश्चर्य मालूम पड़ता है कि आखिर क्यों संताल लोग ही हूल के महानायक सिदो मुर्मू को मानते हैं? बाकी समुदाय के लोगों को इतनी महान हस्ती सिदो मुर्मू से कोई लेना-देना नहीं है। उसी तरह सिर्फ दलित लोग ही डॉ भीमराव आम्बेडकर की जयंती वगैरह मनाते हैं। बाबा साहब भारत के संविधान के रचयिता हैं, इसलिए मजबूरीवश अन्य समुदाय के लोग इन्हें याद करते हैं। वरना जाति प्रथा ने तो सबका नाश कर रखा है। सच कहा जाय, तो दलितों के महापुरुषों की पूजा दलित लोग ही करते हैं। अन्य समुदाय के लोग इन महापुरुषों के प्रति ईर्ष्या और घृणा का भाव रखते हैं। आखिर ऐसा क्यों?

सुना है; दुनिया के अन्य देशों में जहां जाति प्रथा नहीं है, वहां काले-गोरे का भेदभाव है। यह भी एक जटिल समस्या है। जाति प्रथा हो या काले-गोरे का भेदभाव, समाज के लिए यह एक बहुत बड़ा अभिशाप है। मालूम होता है, जिसने भी इस तरह के भेदभाव की सृष्टि की है, वह बड़ा ही चालाक और चतुर प्रवृति का रहा होगा। कुछ भी हो, हमारे देश में ऐसी कुप्रथा के जनक मनु महाराज को दोष देना कहां तक उचित है? जब तक वर्ण व्यवस्था जीवित है, तब तक जाति प्रथा का विनाश संभव नहीं लगता है।

देश में लोकसभा का चुनाव अंतिम पड़ाव पर है। सवाल इसलिए उठ रहा है; क्योंकि देखा जा रहा है कि इस चुनाव में जातीय समीकरण का भी बहुत बड़ा हाथ होता है। अनजाने में ही सही, जनता भी उम्मीदवार की जाति देखकर ही वोट देती है। उम्मीदवार कितना भी अयोग्य क्यों न हों जनता उसे ही वोट देने के लिए लालायित रहती है। यही कारण है कि दलित आज भी पूना एक्ट को याद करते हैं।

वर्ण व्यवस्था की स्थापना यूं ही चुटकियों में नहीं हुई है। इसके पीछे न जाने कितने रहस्य छिपे हुए हैं। इतिहास साक्षी है कि भारत में अंग्रेजों के आगमन तक उच्च जाति के लोगों ने शुद्रों का जी भरकर दोहन किया। यह तो ईश्वरीय वरदान ही समझो कि अंग्रेजों ने शूद्रों की आंखें खोल दीं एवं उनकी मुक्ति के लिए कई सारे मार्ग प्रशस्त किये। ब्रिटिश काल में ही डॉ भीमराव आम्बेडकर का जन्म हुआ। उस दलित भीमराव आम्बेडकर ने देश में छुआछूत को झेलते हुए उच्च शिक्षा ग्रहण किया। डॉ भीमराव आम्बेडकर दलितों के मसीहा बन गए। देश 1947 को आजाद हुआ। विडंबना देखिए कि डॉ भीमराव आम्बेडकर देश के प्रथम कानून एवं न्याय मंत्री बनाए गए एवं उन्हें भारत का संविधान लिखने की जिम्मेदारी दी गई। बाबा साहब की अगुवाई में दुनिया का सबसे बेहतरीन संविधान लिखा गया। इसी संविधान में सदियों से दबाये गए एससी, एसटी एवं ओबीसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसी संविधान के बदौलत ही आज दबे-कुचलों के लिए सरकारी संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था की गई। यह भी सच है कि इसी आरक्षण के तहत ही आज हम चुनाव-चुनाव का खेल खेल रहे हैं।

लोकसभा चुनाव 2024 के अंतिम एवं 7वें चरण का मतदान 1 जून 2024 को होना है। इसी चरण में ही दुमका एवं राजमहल (आरक्षित-अजजा) के लिए मतदान होना है। दोनों ही क्षेत्रों में इंडिया गठबंधन और भाजपा के बीच सीधी टक्कर है। मालूम हो कि भाजपा जहां संविधान एवं आरक्षण को समाप्त करना चाहती है, वहीं इंडिया गठबंधन-झामुमो इसे बचाने के लिए पूरे देश में जी तोड़ मेहनत कर रहा है। ध्यान रहे, राजमहल से कोई निर्दलीय उम्मीदवार भी है, जो जिसने जिस थाली में खाया है, उसी को ही छेद करने में जुटा हुआ है।

सवाल यही है कि अगर संविधान एवं आरक्षण समाप्त हो गया तो न हम घर के और न घाट के रहेंगे। समाज से फिलहाल जाति प्रथा का विनाश भी संभव नहीं है। यह एक घनचक्करी है। इस स्थिति में हमारा क्या दायित्व बनता है। आइए, हम सब मिलकर इस संबंध में सोचें एवं विचारें।


Thursday, 15 August 2024

HO̱HO̱ET́AE BIṬLẠHA

“Hẽ̱ ya, un din do̱ okarepe tahẽ̱̱kana? Okaṭak̕ bhugạk̕repe huṛạt̕akan tahẽ̱kana? Bejãe un din do̱ mẽ̱t̕ge baṅ saṛok̕kantape tahẽ̱kan? Tinạk̕ din kho̱n miť lape̱ť sea mạṇḍ̕i hõ̱ aleak̕ lac̕re baṅ bo̱lo̱akana, ale re̱ṅge̱c̕tele jale-thale ńamakan tahẽ̱ mẽ̱ť do̱ ceka totkare tahẽ̱kantapea? Oṛak̕re cuṭĩạko do̱n gujuk̕kana, miť cupuť khode caole bạnuk̕talea. Un jo̱khe̱n ape susạriạko do̱ okarepe burumakan tahẽ̱kana? Nit nõ̱k̕õ̱e noa ạkrińkate jagele jo̱m lo̱lo̱k̕kanre, ạḍi jo̱lo̱npe ạikạuet̕a? Liṭạ Goḍet ạḍile sarhaoedea, e̱nte uni baṅkhan, ale do̱ re̱ṅge̱c̕tele go̱c̕ kuṛcuṅkok̕a. Uni oka rạnu capat̕e sorwa oṭoakať do̱ ṣamạni bhạlại reak̕ kạituk! Nit do̱ sạrige jug cetan jug hạbic̕ reak̕ mõ̱ńjo̱ko̱c̕ ạri! Dhar-udhạrkate jage mit̕bar puńjile lagaoeda. Onate rạnu emanle saoda ạguiyeda. Jage mit̕bar bo̱to̱l ạkrińok̕kantalea. Ona poesate nõ̱k̕õ̱ele jo̱m lo̱lo̱k̕kanre mẽ̱ť jolok̕kantapea? Khabe̱rdar, hạṇḍi ạkrińpe manaket̕le, ṭhik do̱ baṅ hoyok̕a.”

“Henda ya ṭõ̱ebak̕, noa hõ̱ disạkak̕pe. O̱ko̱e họṅgo̱reda hạṇḍi? Ceka alele ho̱ṅgo̱reda? Apege co̱ ya, bidhuạ! Alegepe cạrik baṛalea. Ale baṅkhan, dinge baṅ calak̕tapea. Apege co̱ haṭ kan, baṭ kan, mela kan, ṭhela kan ale ṭhengepe ńir hijuk̕a. Apege co̱ yape ce̱re̱c̕ baṛale. Apege co̱ yape je̱ńjle̱ baṛae. Hạṇḍi alope ńũia. Bale dokana. Apepe ńũiet̕tege tho̱rle ạkrińet̕a.” ...

“... Ar ape ko̱le̱j koṛa! Ce̱ť no̱le̱j hõ̱ co̱ ya, bạnuk̕tape. Po̱rko sãotele hihi-haha baṛaere mẽ̱ť jolok̕kantapea? Ceka ale hõ̱ mo̱ṭo̱r saekel reak̕ tayo̱m gaṇḍore de̱jo̱k̕ reak̕ sad do̱ bạnuk̕talea? Dinomge marak̕ lekale saj oḍokok̕ cintạ bạnuk̕talea? Ale hõ̱ sinạmaren kuṛi leka saj bajkatele haṭ baṛae, ceka baṅ mo̱ne̱alea? Mõ̱ńjge kạcni bande ar so̱ sunum-paoḍar jo̱ť baṛajo̱ṅ ceka managetalea? Coṇḍok̕ cạṭki ar luṭi jo̱roṅkak̕ do̱ ceka bato̱lgetalea? Ape ma ya laṅṭa, kulạuge bạnuk̕tape. Ape ma ḍiṅgrạ, bhạṅguạ re̱ṅge̱c̕tepe jale-thale baṛaekan. Cele kusik̕a ape odor poṭak̕ ṭhen do̱? Jạkiṭ tanak̕ kirińale reak̕ dhe̱j bạnuk̕tapea. Ale onko ṭhen kho̱n mõ̱ńj-mõ̱ńj sạṛi-saeale ńameťkhan, mẽ̱ť jolok̕kantapea? Ar e̱nte onko ṭhen menak̕lete nõ̱k̕õ̱e Mukhiạ, Sạmiti ar Jilạ Pạrisad emanre sạmạnile daṛe baṛawakana. Ape ma ya, sara din rạnu boṅga sãote phulpe patawakať. Mo̱ro̱ť arpe jokyoť cabawakana. Cele ya, ape ro̱ṅgo̱ muṇḍhạť ṭhen do̱ kusik̕a? Ape kho̱n ma sikṛĩc̕ hõ̱ jạnic̕ko bo̱lmange! Ape do̱ o̱ho̱pe ạsul daṛekelea. Calak̕geale, po̱re̱r culhạle o̱ṅgea. Bogele pạsien, bogeko go̱c̕ket̕le. Am babawak̕ do̱ baṅle jo̱jo̱mkana.”

“Ar ya, mo̱rdha jo̱kyo̱t̕! Aleak̕ lahanti ńe̱lte mẽ̱ť saṛok̕kantapea? Ape do̱ ya, cekate onko po̱rjạt do̱ baṅpe bulạu daṛeakokana? Ape hõ̱ ạgukope, o̱ko̱e manaet̕pea? Onko ạgu daṛeako reak̕ dhe̱j ma bạnuk̕tape, ar tãhã alepe duhmạt ńamakat̕lea.”

Cetanrekin rukhạt̕kan pạhilic̕ hạṇḍi akrińic̕ Jhabarạli ar dosaric̕ ko̱le̱j kuṛi Maenomạtitạkinak̕ ruhạť ańjo̱mte o̱no̱liạ do̱e tuṛi baha ńamena. Dhạrti do̱ ńutadea. Ạḍi hudisreye paṛaoena. Sạri kangea; Jhabarạlitako re̱ṅge̱c̕teko gujuk̕kan tahẽ̱re baṅ co̱le hiri baṛalet̕ko, baṅ co̱le go̱ṛoat̕ko tahẽ̱! O̱ko̱rtale onkan so̱maj susạr bạisi? O̱ko̱rtale sedae lekan mạńjhi-pargana be̱bo̱stha? Okate do̱ onkan re̱ṅge̱c̕ ar rạṇḍi-piṭạri ayojo̱nakole go̱ṛo daṛeako. Ale ma onkanko ḍạn uduk̕kate hakĩạle go̱c̕ giḍikako.

Ar no̱te̱ ko̱le̱j kuṛi Maenomạtiak̕ sad do̱ sạrige he̱ṛangea! Hạ̃sạk̕geae lo̱bo̱e-lo̱bo̱ye saj bajkok̕! Uṭi-uṭi sajok̕ reak̕ sad menak̕taea, je̱mo̱n baro̱ dolan gaṛreko bạnij idiye. Jãhã miť dhaoe bijli ruạṛkeť, ar bańcaok̕ upại do̱ o̱ko̱ran? Menak̕gea upại! Hapṛamko do̱ noa reak̕ko upại oṭoakat̕gea. Onko ma baro̱ jo̱ṛ sagaṛ miť likreko lagaleť. To̱be̱ “Kirtạ” do̱ dohṛaetege hoyok̕a? Hạni ńe̱le̱pe ạḍi tạpis aṛaṅate kạu mạue ho̱ho̱ dilạiyet̕kana - “Biṭlạha, Biṭlạha”. Okaenam Biṭlạha? Ale hõ̱ hirikaleme.

Thursday, 16 May 2024

हूल प्रदेश का भविष्य

कल इलाके में बारिस हुई थी, इस वजह से मौसम कुछ ठंढा है। फिर भी मंगरु अपनी पुरानी आदतन उसी पेड़ तले बैठे-बैठे कुछ सोच रहा था। मंगरु अच्छी तरह जानता है कि वह कोई ज्योतिष नहीं और न ही वह कोई भविष्यवक्ता है। लेकिन इतिहास के पन्नों को खंगालने के बाद कुछ कहा जाय, तो कोई गलत नहीं।

हूल घटित हुए आज 169 वर्ष बीत गए। आज वक्त ने अच्छी तरह अंगड़ाई ले ली है। तब की और आज की परिस्थिति में जमीन-आसमान का फर्क है। हूल तक लोग पाषाण युग में जी रहे थे। तब आज की आधुनिकता के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। उस वक्त कोई सांसद-विधायक नहीं, कोई चिंटु-पिंटु भी नहीं और ना ही कोई राजनीतिक चमचे-बेलचे ही मौजूद थे। और सबसे बड़ी बात कि उस वक्त आज के जैसा कोई लोकसभा का चुनाव वगैरह भी तो नहीं होता था। और ना ही जनता चुनाव के चक्कर में अपनी मित्रता खो बैठते थे। खैर, संतालों की परंपरागत मांझी-परगना व्यवस्था बहुत सुदृढ़ थी, जिसकी वजह से वे अपना एक अलग प्रदेश "संताल परगना" को हासिल करने में सफल हुए। इतना ही नहीं उन्होंने संताल परगना की शासन व्यवस्था को भी अपनी इच्छानुसार स्थापित करने में सफल हुए।

हूल के बाद संताल परगना में मिशनरियों का आगमन हुआ एवं उनकी देन आपके समक्ष है। इधर 1880 के दशक में हूल प्रदेश में संतालों के बीच हिंदुकरण का बीज बोया गया। इस धार्मिक आंदोलन को "खेरवाड़ आंदोलन" के नाम से भी जाना गया। इस आंदोलन के अगुवे बाबा भगीरथ, धुबिया गोसांई आदि बने। इस दौरान हूल प्रदेश में कुछ हुआ या नहीं पर खतियान का काम जरुर हुआ। स्मरण रहे कि संताली साहित्य का विकास रोमन संताली से आरंभ हुआ।

अंग्रेजों का भारत आगमन से पूर्व देश की सामाजिक अवस्था ठीक नहीं थी। यह अंग्रेजों की ही देन है कि इन्होंने दलितों के उत्थान के लिए बहुत सारे मार्ग प्रशस्त किए। उनमें शिक्षा की क्रांति सहित बहुत सारी सामाजिक कुरीतियों के नाश शामिल हैं।

सन् 1947 को भारत देश आजाद हुआ। तात्क्षण भारत का संविधान बना। संविधान बनते ही भारत में दबे-कुचलों के भविष्य का सूर्योदय हुआ। सीधा कहें, तो देश में सरकारी महकमों में दलितों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसी व्यवस्था के तहत ही आज हम चुनाव चुनाव का खेल खेल रहे हैं। जिस दिन यह व्यवस्था समाप्त हो जाएगी, उसी दिन हम दलित फिर वही गले में हांड़ी टांगते हुए नजर आएंगे।

अंग्रेजों की देन संताल परगना आज किस स्थिति में है? इस आधुनिक दौड़ में वह किस पायदान पर खड़ा है? इस दौरान उसने क्या खोया-क्या पाया? अगर इसका तुलनात्मक अध्ययन किया जाए, तो बहुत सारे राज परत दर परत खुलते जाएंगे। आज हूल प्रदेश की स्थिति ठीक नहीं है। हालांकि संविधान लागू होने के साथ ही यहां आदिवासियों के लिए अधिकांश सीटें आरक्षित की गई, फिर भी आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक अवस्थाएं ढाक के वही तीन पात हैं। हूल प्रदेश में चाहे वह दिसोम गोमके हों अथवा गुरुजी का दौर झारखण्ड नामधारी दलों का ही वर्चस्व रहा है। इतना कुछ होने के बावजूद भी आज हूल प्रदेश में आदिवासियों की जनसंख्या घटती जा रही हैं एवं इनकी आधी आबादी जीवकोपर्जन के लिए अन्य प्रदेशों की ओर पलायन के लिए मजबूर हैं। क्यों?

हूल प्रदेश के पतन के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है? क्या हमारे धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक पतन के लिए सिर्फ चिंटु-पिंटु को ही दोष दिया जाय? या और भी कोई अन्य कारण हैं? इन कारणों पर जब तक विश्लेषणात्मक अध्ययन नहीं किया जाएगा, जब तक हमारा ब्लूप्रिंट व रोड मैप तैयार नहीं होगा, जब तक हमारा प्रयास सामूहिक नहीं होगा, तब तक हमारा कृत्य अंधेरे में तीर मारना ही साबित होगा।

आइए, इस विषय पर गहनपूर्वक मंथन करें, सामूहिक प्रयास पर बल दें जिससे हम अपने हूल प्रदेश के भविष्य को संवार सकें।

Tuesday, 2 April 2024

 आज के गरभू देशमांझी ...

यह सोलह आना सही है कि कोई भी चीज हाथ में आ जाय, तो उसकी अहमियत तत्क्षण खत्म हो जाती है। वह चीज क्यों और कैसे मिली? उसके संघर्ष की गाथा शनैः-शनैः मलिन हो जाती है। इस रहस्य को आप ऐसे भी समझ सकते हैं। मान लो; कोई ऑरिजिनल (मूल) दस्तावेज है। उस ऑरिजिनल से एक फोटोकॉपी निकाली गई। फिर उस फोटोकॉपी से और कोई फोटोकॉपी निकाली गई। इस तरह फोटोकॉपी से फोटोकॉपी निकलती गई। यकीन मानो, कुछ वर्षों के बाद वह फोटोकॉपी धूमिल हो जाएगी। उस फोटोकॉपी में ऑरिजिनल जैसा अब कुछ भी नहीं दिखाई देगा। अब फोटोकॉपी करने से कागज सफेद ही निकलेगा। ठीक यही स्थिति संताल हूल, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और झारखण्ड आंदोलन के साथ भी घटित हो गई है। 

आज से ठीक 169 वर्ष पूर्व की घटना है। तब लोगों के हाथ में न एंड्रोयड फोन उपलब्ध था, न चमचमाती कार थी और न ही उनके पास बड़े-बड़े मकान थै। उनके पास आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं। उनमें एक भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति मौजूद नहीं था। एक हाथ वस्त्र से पूरा शरीर ढंका जाता था। ऐसी हालत में करेला तो करेला, वह भी ऊपर से नीम चढ़ा। लोग सीधे और सरल थे। उनका सीधापन का अशुभ लाभ गैरों ने खूब उठाया। तब अत्याचार की बाढ़ सिर से ऊपर बहने लगी थी। पर जनता इस मुस्किलत से उबार पाने के लिए अंदर ही अंदर योजनाएं बनाने में व्यस्त थीं। वे अपने संघर्ष का रोड मैप बना रहे थे।

6 जुलाई 1855 की घटना। आज के संताल परगना के आमड़ापाड़ा-लिटीपाड़ा आसपास के गाँवों से चार लोगों को आज के ई.डी. ने गिरफ्तार कर लिया। उनका कसूर भी आपके सीटिंग मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के सीटिंग मुख्यमंत्री केजरीवाल के सदृश था। ई.डी. के अफसर उन गिरफ्तार हुए कैदी को आमड़ापाड़ा, बरहेट के रास्ते भागलपुर जेल पैदल ही ले जा रहे थे। कड़ाके की धूप थी। चारों कैदियों के हाथ-पैर बांधे हुए थे। कैदियों को खाना तो दूर, प्यास बुझाने के लिए एक बूंद पानी तक नसीब न था। ई.डी. के दो अफसर सफेद घोड़े पर शान के साथ सवार थे। दोनों अफसरों को धूप से बचाने के लिए सिपाहियों ने उनके सिर के ऊपर छतरी लिये हुए थे। उन कैदियों में से एक कदकाठी (हेमंत/केजरी) नौजवान भी था। वह भूख और प्यास से तड़प रहा था। वह चल सकने में भी असमर्थ था। ऐसी हालत में भी उसे घसीटा जा रहा था। उनकी हालत पर किसी ई.डी. अफसरों को तरस न आया। और वे आमड़ापाड़ा से चलकर पाडेरकोला पहुंच गए। पाडेरकोला में शाम परगना एक सज्जन व्यक्ति का वास था। वह व्यक्ति बहुत ईमानदार और बुद्धिमान था। उसने ई.डी. के अफसरों से नाक रगड़ते हुए गुहार लगाई - "ये लोग निर्दोष हैं। इन्हें कृपया रिहा कर दो।" पर आका का हुक्म था, ई.डी. के अफसरों ने उनकी एक न सुनी। और वे कैदियों के साथ अपने गंतब्य की ओर आगे बढ़ चले। 

देश की जनता को अच्छी तरह मालूम था कि एक न एक दिन हमारे निर्दोष लोगों को गिरफ्तार कर लिया जायगा। ऐसी स्थिति को संभाल पाने के लिए वे साल भर पूर्व से तैयारी करने में जुटे हुए थे। कहा जाता है कि लोगों ने बन-जंगलों से तीर-धुनष बनाने के लिए बांस-बल्ली (बुरु-मात्) ले आये थे। उन्हें काट-झांटकर सूखने के लिए पत्थरों से दबा दिया था। राहुल का हुक्म था कि प्रत्येक घर से कम से कम एक बैलगाड़ी (मिमित् सागाड़काते) के बराबर तीर-धनुष तैयार हो जाना चाहिए। तलवार, टांगी, फरसा निर्माण हेतु लोहारों की मदद ली जाए। यह योजना साल भर में तब तक तैयार हो चुकी थी। 

अपने निर्दाेष लोगों की गिरफ्तारी की खबर देश भर में दावानाल की तरह फैल गई। सिदो-कान्हू के नेतृत्व में रात भर में अस्त्र-शस्त्र से लैश 30 हजार लोगों की भीड़़ बरहेट के समीप पांचकठिया में एकत्रित हो गई। तड़के सुबह अर्थात् 7 जुलाई 1855 ई.डी. अफसरों की भिड़ंत सिदो-कान्हू से हुई। उनलोगों के बीच तू-तू, मैं-मैं होती रही और इधर गारभू ने का़पी (A battle axe) से दोनों अफसरों को मौत के घाट उतार दिया। हूल संपन्न हुआ। और उस हूल के बदौलत संताल परगना मिल गया। (रावण को मालूम था कि उसकी मौत राम के हाथों होगी। उसी तरह आज के रावण को भी मालूम है, उसकी मौत किसके हाथ होगी।)

Friday, 2 February 2024

एकता में ही बल था ...

संताल इतिहास में दो सबसे बड़ी ऐसी घटना हुई है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। पहली घटना थी; जब "चाम्पा देश" में हमारा साम्राज्य था। संतालों के बारह गोत्रों के पास अलग-अलग किले थे; एवं उन सभी गोत्रों का व्यापार भी अलग-अलग था। यही कारण था कि हम दूध-दही की नदियों में नहाया करते थे। परंतु समय ने पलटा खाया। और समाज की इज्जत को बचाने हेतु “माधो सिञ” के डर से हम उस देश को सदा के लिए छोड़कर वहां से पलायन कर गए।

दूसरी घटना; आज से ठीक 168 वर्ष पूर्व, तब देश में अंग्रेजों का शासन था। हमने उनसे अत्याचार के विरुद्ध "हूल" किया और शेर के जबड़े से अपने संताल परगना को खींचकर बाहर निकाल लिया। ऐसा इसलिए संभव हो सका, क्योंकि तब हम एकता के सूत्र में बंधे हुए थे। उस समय संतालों के बीच न लिपि विवाद था, न धर्म की खेती होती थी और न ही तब संतालों में उत्तरी-दक्षिणी की कोई लउ़ाई थी। लेकिन आज? आज हम हजार टुकड़ों में बंट गए हैं। हमारा कोई माय-बाप नहीं। यही कारण है कि आज संताल समाज गर्त्त में जा रहा है। इसे शायद भगवान भी न बचा पाएगा।

हो सकता है संतालों के डीएनए में ही कोई खराबी हो। हो सकता है उनके खून में ही कोई खोट हो। नहीं तो क्या कारण है कि हम आपस में तो बेवजह खून के प्यासे हो जाते हैं, परंतु दुश्मनों के सामने हमारी घिग्घी बंध जाती है। उनके सामने हम शेर से चूहा बन जाते हैं।

यह शोध का विषय हो सकता है; क्यों उत्तरी-दक्षिणों के संतालों में इतना कहर बरपा है? क्यों इन दोनों के बीच लिपि के चक्कर में इतनी बड़ी दीवार खड़ी हो गई है? क्यों वे एक दूसरे के खून के प्यासे हो चले हैं? और तो और संताल समाज वर्तमान में कई समस्याओं से जूझ रहा है। पर लोग सभी समस्याओं को छोड़कर लिपि विवाद में ही उलझकर रह गए हैं। इससे अच्छी तरह समझने के लिए ब्रिटिश काल में हुए एक भाषाई सर्वेक्षण की ओर नजर दौड़ाते हैं।

तब देश में अंग्रेजों का शासन था। उसी दौरान सन् 1894 से लेकर 1928 तक भारत में जी. ए. ग्रियर्सन की अगुवाई में एक भाषाई सर्वेक्षण हुआ था। उस सर्वेक्षण में भाषाविदों ने स्पष्ट तौर पर अपनी रिपोर्ट मे लिख डाला; चूंकि संतालों के दक्षिण हिस्से में जो संताली बोली जाती है; वह मिश्रित व प्रदूषित हो चुकी है, जबकि उत्तर में बोली जाने वाली संताली अभी तक विशुद्ध है; अतएव उत्तरी संताली ही मानक (Standard) है। (Linguistic Survey of India, Vol-IV, Page No. 32).

ध्यान रहे; तब उत्तर में संताली साहित्य ने गति पकड़ ली थी। वगैर किसी रोक-टोक व बधित हुए कई पुस्तकें व पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगीं। यह भी संज्ञान लेने वाली बात है कि उत्तर संतालों का गढ़ मना जाने वाला संताल परगना के संतालों ने ब्रिटिश शासक के खिलाफ सन् 1855 में एक बहुत बड़ा “हूल” कर दिया था। इस हूल ने संतालों की महानता पर एक अमिट छाप छोड़ दी है। क्योंकि उस हूल के बदौलत ही संतालों के लिए एक अलग देश (जिला) संताल परगना का गठन हुआ है।

सन् 1947 में भारत देश आजाद हुआ। तब सरकारी स्तर पर शैक्षणिक क्षेत्रों पर बगैर रोमन लिपि की अवहेलना किए देननागरी लिपि से पुस्तकों का प्रकाशन होते रहा है। खसियत यही है कि रोमन हो या देवनागरी, दोनों लिपियों से शुद्ध-शूद्ध उत्तरी संताली लिखी व पढ़ी जाती है।

फिर क्या था? दक्षिण के संताल ईर्ष्या की बीमारी से पीड़ित तो थे ही, उन्होंने आनन-फानन में एक चोरी की हुई लिपि को जन्म दिया। और उस लिपि के प्रचार में रात-दिन एक कर दिया। उनके पास और कोई चारा तो था नहीं, अतएव उन्होंने लिपि को अपनी पहचान एवं अस्मिता के रूप में ढाल की तरह उपयोग करना शुरु कर दिया। जब लोगों ने इस लिपि को सिरे से खारिज कर दिया, तो इन्होंने इसे "आबोवाक्-आबोवाक्" कहा एवं इसे धर्म के साथ जोड़ दिया। मामला यहीं नहीं रुका, कुछ दिन पूर्व झारखण्ड सरकार देवनागरी लिपि से संताली पुस्तकों का प्रकाशन कर रही थी। फिर इन बुगड़ीधारियों ने जिनकी भाषा ही बिगड़ चुकी है, इन पर टांग अड़ा दी। इसके बाद सोशल मीडिया में इन्होंने जिस असंवैधानिक भाषा का उपयोग करते हुए देवनागरी समर्थकों को गाली-गलौच दिया है, यह किसी से छुपा नहीं है।

ओल चिकी समर्थक कितना भी जोर लगा लें, कोई भी राजनीतिज्ञ कितना भी ट्वीट कर लें, लेकिन यह सच है कि “कागज के फूलों से कभी खुशबू आ नहीं सकती है।” अतएव कभी एकता थी, अब वह कहीं गुम हो गई।

Wednesday, 9 February 2022

1932 खतियान: आदिवासी-मूलवासियों की पहचान
(संताल परगना के संदर्भ में)

यह विडंबना ही है कि युद्ध शांति के लिए अथवा शांति के लिए युद्ध किया जाता है? इसका जवाब ढूंढ़ पाना एक टेढ़ी खीर के समान है। फिर भी सृष्टि से लेकर अब तक अगर घर-परिवार के युद्धों को भी जोड़ दिया जाए, तो दुनिया में औसतन रोज दस युद्ध होते आए हैं। रामायण (राम-रावण) का युद्ध, महाभारत (कौरव-पाण्डवों) का युद्ध, तुर्क-मुगलों का आक्रमण, राजा-महाराजाओं (पानीपत, हल्दीघाटी आदि) का युद्ध, विष्व युद्ध (प्रथम व द्वितीय), भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, भारत-चीन, भारत-पाक, दुनिया की क्रांतियां एवं अब वर्तमान में रुस-युक्रेन का युद्ध। अगर संताल आदिवासी के संदर्भ में कहा जाए, तो छोटे-बड़े कई सामाजिक-राजनैतिक आंदोलनों के साथ सबसे बड़ा जो युद्ध हुआ, उसे हम - “संताल हूल 1855” के नाम से खूब जानते हैं। संताल हूल आखिर क्यों हुआ? अगर गहराई से इसकी जांच की जाए, तो हम पाएंगे कि यह हूल मिट्टी से जुड़ा हुआ है। बीहड़ जंगलों को साफ कर हमने रहने व खेती योग्य जमीन तैयार की और आज आप उसके मालिक बनोगे? यह हमें कतई मंजूर नहीं। हम इसके मालिक हैं। यहां हमारी मर्जी चलेगी, आपकी नहीं।

अंग्रेजों ने भारत पर करीब 200 वर्षों तक राज किया। सवाल उठता है; वाभनों ने उनको भगाने के लिए पूरे भारत में आजादी की जंग क्यों छेड़ दी? क्या कारण था कि इन वाभनों के झांसे में सभी दलित, पिछड़े, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक आ गए एवं उनकी अगुवाई में चल रहे हथियार बंद आंदोलन में शामिल हो गए?

अब सवाल यह उठता है कि इससे पहले भी तो कई मुगल शासकों ने भारत पर अपना अधिपत्य या यों कहें कि उन्होंने बड़ी शान के साथ राज किया था। फिर क्यों नहीं इन वाभनों ने उस दौरान कोई आजादी का आंदोलन चलाया? जबकि भारत पर सबसे पहला हमला मुस्लिम शासक मीर कासिम ने 712 ई. में किया। उसके बाद मानो मुसलमानों में भारत पर राज करने की होड़-सी लग गई। जिनमें प्रमुख रूप से - महमूद गजनबी, मुहम्मद गौरी, चंगेज खान, कुतुबुद्दिन ऐबक, गुलाम वंश, तुगलक वंश, खिलजी वंश, लोदी वंश, फिर मुसलमान (ये मुसलमान नहीं थे, मुगल एक रेस या वंश का नाम है।) आदि वंशों ने भारत पर राज किया एवं खूब अत्याचार किये। फिर भी वाभनों ने कोई क्रांति या आंदोलन नहीं चलाया। फिर अंग्रेजों के खिलाफ ही इन्होंने क्रांति क्यों कर दी? इसका स्पष्ट कारण यही था कि मुगलों ने भारत पर सदियों से चली आ रही “मनुस्मृति” के संविधान को यथावत बनाये रखा। मुगलों को इस संविधान पर कोई आपत्ति न थी। उन्होंने बीच का रास्ता अपना रखा था। पर अंग्रजों ने उस तथाकथित संविधान (मनुस्मृति) की धज्जियां उड़ाकर रख दी थी। वे मनुस्मृति के घोर विरोधी थे। उन्होंने दलित, पिछड़ों, आदिवासियों, मूलवासियों और अल्पसंख्यकों को समानाधिकार दिया। अर्थात् कानून के सामने सब बराबर हैं। महान चिंतक एवं संविधान निर्माता बाबा साहेब उपरोक्त सवाल का जवाब देते हुए आगे लिखते हैं - “चूँकि मुसलमानों ने सदियों से चली आ रही तथाकथित वाभनों की “मनुस्मृति” पर कोई उंगली न उठाई। उन्होंने चापलूसी की राजनीति अपनाई। उनको (वाभनों को) अपने “नवरत्नों” में जगह दी। अतः स्पष्ट तौर पर कहा जाय तो, मुगल शासकों ने “मनुस्मृति” की आत्मा को जिंदा बनाए रखा। यथा दलित, पिछड़े एवं जंगली आदिवासियों की औरतों को स्तन ढकने के लिए कर देना होता था। वे गले में हांडी, कमर में झाड़ू बंधकर चलने को मजबूर थे। कारण कुछ भी रहा हो, करीब 1600 ई. के आस पास अग्रेजों का भारत में पदार्पण हुआ। सर्वप्रथम अंग्रेजों ने तमाम मुगल शासकों के पर उखाड़ते गए। जब बादशाह बहादुरशाह जाफर के रूप में अंतिम पर उखाड़े गए तो, भारत में पूर्णरूपेण अंग्रेजी हुकुमत कायम हो गई। अंग्रेजों को मनुस्मृति की कुरीतियों को समझने में देर न लगी। उन्होंने छुआछूत, सती प्रथा, शिक्षा, राजनीति, प्रशासन एवं तमाम तरह के दलित, पिछड़े, आदिवासी की हकमारी को बहुत करीब से देखा। तात्पर्य यही कि भारतवर्ष में अंग्रेजी राज नहीं, अपितु देश मनु महाराज की “मनुस्मृति” के संविधान के अनुसार चल रहा है, जो मानवाधिकार की दृष्टि से अति निंदनीय एवं निहायत ही अमानवीय है। फिर क्या था; अंग्रेजों ने धीरे-धीरे लंकारूपी “मनुस्मृति” पर आग लगानी शुरू कर दी। इसके कुछ अंश उदाहरणार्थ दिए जा रहे हैं। ये अंश डॉ. हीरालाल यादब (पीएचडी इतिहास) के व्हाट्सअप वाल से उद्धृत हैं:-

1. अंग्रेजो ने 1795 में अधिनियम 11 द्वारा शूद्रों को भी संपत्ति रखने का कानून बनाया।

2. 1773 में ईस्ट इण्डिया कंपनी ने रेगुलेटिंग एक्ट पास किया जिसमें न्याय व्यवस्था समानता पर आधारित थी। 6 मई 1775 को इसी कानून के तहत बंगाल के सामंत ब्राह्मण नन्द कुमार देव को फांसी की सजा दी गई।

3. 1804 अधिनियम 3 द्वारा अंग्रेजों ने कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाई (लड़कियों के पैदा होते ही तालु में अफीम चिपका कर, मां के स्तन पर धतूरे का लेप लगाकर एवं गड्ढा बनाकर उसमें दूध भरकर डूबो कर मारा जाता था।)।

4. 1813 में ब्रिटिष सरकार ने कानून बनाकर षिक्षा ग्रहण करने का सभी जातियों और धर्मों के लोगों को अधिकार दे दिया।

5. 1813 में अंग्रेजों ने कानून बनाकर दास प्रथा का अंत कर दिया।

6. 1817 में अंग्रेजों ने समान नागरिक संहिता कानून बनाया (1817 के पहले सजा का प्रावधान वर्ण के आधार पर था। ब्राह्मण को कोई सजा नहीं होती थी, बल्कि शूद्र को कठोर दण्ड दिया जाता था। अंग्रेजों ने सजा प्रावधान समान कर दिया।)।

7. 1819 में अधिनियम 7 द्वारा ब्राह्मणो द्वारा शूद्रों के शुद्धिकरण पर रोक लगाई। (शूद्रों की शादी होने पर दुल्हन को अपने दूल्हे के घर न जाकर कम से कम तीन रात ब्राह्मण के घर शारीरिक सेवा देनी पड़ती थी।)

8. 1830 नरबलि प्रथा पर रोक लगा दिया। (देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए ब्राह्मण शूद्रों, स्त्री व पुरुष दोनों को मंदिर में सिर पटक-पटक कर चढ़ा देता था।)।

9. 1833 अधिनियम 87 द्वारा सरकारी सेवा में भेदभाव पर रोक अर्थात् योग्यता ही सेवा का आधार स्वीकार किया गया तथा कंपनी के अधीन किसी भारतीय नागरिक को जन्म स्थान, धर्म, जाति या रंग के आधार पर पद से वंचित नहीं रखा जा सकता है।

10. 1834 में पहला भारतीय विधि आयोग का गठन हुआ। कानून बनाने की व्यवस्था जाति, वर्ण, धर्म और क्षेत्र की भावना से ऊपर उठकर करना आयोग का प्रमुख उद्देश्य था।

11. 1835 प्रथम पुत्र को गंगा दान पर रोक लगा दिया। (ब्राह्मणों ने नियम बनाया कि शूद्रों के घर यदि पहला बच्चा लड़का पैदा हो, तो उसे गंगा में फेंक देना चाहिए। पहला पुत्र हृष्ट-पुष्ट ब्राह्मणों से लड़ न पाए, इसलिए उसे पैदा होते ही गंगा को दान करवा देते थे।)

12. 7 मार्च 1835 को लॉर्ड मैकाले ने शिक्षा नीति को राज्य का विषय बनाया और उच्च शिक्षा को अंग्रेजी भाषा का माध्यम बनाया।

13. 1835 को कानून बनाकर अंग्रेजों ने शूद्रों को कुर्सी पर बैठने का अधिकार दिया।

14. दिसम्बर 1829 के नियम 17 द्वारा विधवाओं को जलाना अवैध घोषित कर सती प्रथा का अंत किया।

15. देवदासी प्रथा पर रोक लगाई। ब्राह्मणों के कहने से शूद्र अपनी लड़कियों को मंदिर की सेवा के लिए दान देते थे। मंदिर के पुजारी उनका शारीरिक शोषण करते थे। बच्चा पैदा होने पर उसे फेंक देते थे और उस बच्चे को “हरिजन” नाम देते थे।

1921 को जातिवार जनगणना के आंकड़े के अनुसार अकेले मद्रास में कुल जनसंख्या 4 करोड़ 23 लाख थी, जिसमें 2 लाख देवदासियां मंदिरों में पड़ी थी। यह प्रथा अभी भी दक्षिण भारत के मंदिरों में चल रही है।

16. 1837 अधिनियम द्वारा ठगी प्रथा का अंत किया।

17. 1849 में कलकत्ता में एक बालिका विद्यालय जे. ई. डी. बेटन ने स्थापित किया।

18. 1854 में अंग्रेजों ने 3 विश्वविद्यालय कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे में स्थापित किया। और 1902 में विश्वविद्यालय आयोग नियुक्त किया।

19. 6 अक्टूबर 1860 को अंग्रेजों ने इण्डियन पैनल कोड-आईपीसी बनाया। लार्ड मैकाले ने सदियों से जकड़े शूद्रों की जंजीरों को काट दिया और भारत में जाति, वर्ण और धर्म के बिना एक समान क्रिमिनल लॉ लागू कर दिया।

20. 1863 में अंग्रेजों ने कानून बनाकर चरक पूजा पर रोक लगा दिया। (आलिशान भवन एवं पुल निर्माण पर शूद्रों को पकड़कर जिन्दा चुनवा दिया जाता था। इस पूजा में मान्यता थी कि भवन और पुल ज्यादा दिनों तक टिकाऊ रहेंगे।)

21. 1867 में बहुविवाह प्रथा पर पूरे देष में प्रतिबंध लगाने के उद्देष्य से बंगाल सकार ने एक कमिटि गठित किया।

22. 1871 में अंग्रेजों ने भारत में जातिवार गणना प्रारंभ की। यह जनगण्ना 1941 तक हुई। 1948 में पण्डित नेहरु ने कानून बनाकर जातिवार गणना पर रोक लगा दी।

23. 1872 में सिविल मैरिज एक्ट द्वारा 14 वर्ष से कम आयु की कन्याओं एवं 18 वर्ष से कम आयु के लड़कों का विवाह पर रोक लगाई।

24. अंग्रेजों ने महार और चमार रेजिमेंट बनाकर इन जातियों को सेना में भर्ती किया, लेकिन 1892 में ब्राह्मणों के दबाव के कारण सेना में अछूतों की भर्ती बन्द हो गई।

25. रैयत वाणी पद्धति अंग्रेजों ने बनाकर प्रत्येक पंजीकृत भूमिदार को भूमि का स्वामी स्वीकार किया।

26. 1918 में साऊथबरो कमेटी को भारत में अंग्रेजो ने भेजा। यह कमेटी भारत में सभी जातियों का विधि मण्डल (कानून बनाने की संस्था) में भागीदारी के लिए आया। शाहू जी महाराज के कहने पर पिछड़ों के नेता भाष्कर राव जाधव एवं अछूतों के नेता डॉ. अम्बेडकर ने अपने लोगों को विधि मण्डल में भागीदारी के लिए मेमोरेंडम/ज्ञापन दिया।

27. अंग्रेजों ने 1919 में भारत सरकार अधिनियम का गठन किया।

28. 1919 में अंग्रेजों ने ब्राह्मणों को जज बनने पर रोक लगा दी थी और कहा था कि इनके अंदर न्यायिक चरित्र नहीं होता है।

29. 25 दिसम्बर 1927 को डॉ. अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति का दहन किया गया। मनुस्मृति में शूद्रों और महिलाओं को गुलाम तथा भोग की वस्तु समझा जाता था, एक पुरुष को अनगिनत शादियां करने का धार्मिक अधिकार है, महिला अधिकार विहीन तथा दासी की स्थिति में थी। एक-एक औरत के अनगिनत सौतनें हुआ करती थीं। औरतों-शूद्रों के लिए सिर्फ और सिर्फ गुलामी लिखा है, जिसको ब्राह्मण मनु ने धर्म का नाम दिया है।

30. 1 मार्च 1930 को डॉ. अम्बेडकर द्वारा काला राम मंदिर (नासिक) प्रवेश का आंदोलन चलाया गया।

31. 1927 को अंग्रेजों ने कानून बनाकर शूद्रों के सार्वजनिक स्थानों पर जाने का अधिकार दिया।

32. 1927 में साईमन कमीशन की नियुक्ति की जो 1928 में भारत के अछूत लोगों की स्थिति का सर्वे करने और उनको अतिरिक्त अधिकार देने के लिए आया। भारत के लोगों को अंग्रेज अधिकार न दे सके, इसलिए इस कमीशन के भारत पहुंचते ही गांधी और लाला लाजपत राय ने इस कमीशन के विरोध में बहुत बड़ा आंदोलन चलाया। जिस कारण साईमन कमीशन अधूरी रिपोर्ट लेकर वापस चला गया। इस पर अंतिम फैसले के लिए अंग्रेजों ने भारतीय प्रतिनिधियों को 12 नवम्बर 1930 को लंदन गोलमेज सम्मेलन में बुलाया।

33. 24 सितम्बर 1932 को अंग्रेजों ने कम्ययुनल अवार्ड घोषित किया, जिसमें निम्न प्रमुख अधिकार दिये:-

i ) वयस्क मताधिकार

ii ) विधान मण्डलों और संघीय सरकार में जनसंख्या के अनुपात में अछूतों को आरक्षण का अधिकार

iii) बुद्ध, सिक्ख, ईसाई और मुसलमानों की तरह अछूतों ; (बौद्ध) को भी स्वतंत्र निर्वाचन के क्षेत्र का अधिकार मिला। जिन क्षेत्रों में अछूत प्रतिनिधि खड़े होंगे, उनका चुनाव केवल अछूत ही करेंगे।

iv) प्रतिनिधियों को चुनने के लिए दो बार वोट देने का अधिकार मिला, जिसमें एक बार सिर्फ अपने प्रतिनिधियों को वोट देंगे तो दूसरी बार सामान्य प्रतिनिधियों को वोट देंगे।

34. 19 मार्च 1928 को बेगारी प्रथा के विरुद्ध डॉ. अम्बेडकर ने मुम्बई विधान परिषद में आवाज उठाई, जिसके बाद अंग्रेजों ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया।

35. अंग्रेजो ने 1 जुलाई 1942 से लेकर 10 सितम्बर 1946 तक डॉ. अम्बेडकर को वायसराय की कार्य साधक कौंसिल में लेबर मेम्बर बनाया। लेबरों को डॉ. अम्बेडकर ने 8.3 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दिलवाया।

36. 1937 में अंग्रेजों ने भारत में प्रोविंशियल गवर्नमेंट का चुनाव करवाया।

37. 1942 में अंग्रेजों से डॉ. अम्बेडकर ने 50 हजार हेक्टेयर भूमि को अछूतों एवं पिछड़ों में बांट देने के लिए अपील किया। अंग्रेजों ने 20 वर्षों की समय सीमा तय किया था।

38. अंग्रेजों के शासन प्रशासन में ब्राह्मण की भागीदारी को 100 से 2.5 पर लाकर खड़ा कर दिया था।

इन्हीं सब कारणों से ब्राह्मणों ने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति शुरु कर दी। क्योंकि अंग्रेजों ने शूद्रों और महिलाओं को सारे अधिकार दे दिये थे और सब जातियों के लोगों को एक समान अधिकार देकर सबको बराबरी में लाकर खड़ा कर दिया था। 

संताल परगना का संक्षिप्त इतिहास

संताल एक खानाबदोश, घुमक्कड़ और कबीला प्रवृति का मानव है। वे अपने में ही मस्त रहने वाले प्राणी हैं। उन्हें अपने जीवन में परायों की दखलंदाजी कतई पसंद नहीं। उन्हें झूठ और फरेब से ज्यादा ही परहेज है। वे सत्यवादी हैं। जहां तक संभव हो, वे अत्याचार के घूंट पीने के आदी हैं। पर जब पानी सर के ऊपर बह जाए, तो वे अपना असली रंग दिखाने में कोई्र कसर नहीं छोड़ते हैं। संताल हूल 1855 इसका पक्का सबूत है।

तब भारतवर्ष में अंग्रेजों का राज स्थापित हो चुका था। उन्होंने देखा कि राजमहल की पहाड़ी घने वन-जंगलों से घिरी हुई एक ऐसी जगह है, जिसकी कटाई/सफाई उपरांत उस पर अच्छी खेती हो सकती है। तब पहाड़ों के ऊपरी हिस्से में पहाड़िया जनजाति का वास था, पर वे आलसी प्रवृति के थे। वे मेहनती नहीं थे। चोरी और राहगीरों की छिनतई से वे अपनी जीविका चलाते थे। अर्थात यही उनका मुख्य पेशा था। फिर अंग्रजों की नजर कटक, मानभूम, धालभूम, हजारीबाग, मिदनापुर आदि स्थानों पर निवास कर रहे संतालों पर पड़ी। संताल मेहनतकश के अलावे परम सत्यवादी भी थे। फिर अंग्रेजों ने संतालों को तात्कालीन संताल परगना में आने का आमंत्रण दे डाला। अंधे को और क्या चाहिए? उनके लिए तो एक आंख ही काफी थी। संताल झुण्ड के झुण्ड टिड्डी की तरह संताल परगना में प्रवेश कर गए। शुरु-शुरु में पहाड़ियों ने इसका विरोध किया। अंतोगत्वा अंग्रेज अफसर सुपरिण्टेण्डेण्ट जेम्स पोण्टेट की देखरेख में संताल-पहाड़िया के बीच उत्पन्न हुए झगड़े को सुलझा लिया गया। इसी कुटनीति के तहत ब्रिटिश शासकों ने पहाड़ियों को खुश रखने के लिए उनके लड़कों को फौज में भर्ती कर लिया (हिल रंजैर्स रेजिमेण्ट/बटालियन) एवं बस्ती के सभी सरदारों को मासिक वेतन के रूप में कुछ रुपये देना शुरु कर दिया। दूसरी ओर संतालों को बगैर खजना दिए खेती करने की आजादी दे डाली। जिससे अंग्रेजों के सांप भी मर गए एवं लाठी भी नहीं टूटी। दोनों जातियों को प्रसन्न रखने के लिए जेम्स पोण्टेट की अगुवाई में ही आदिवासियों के लिए 1832 में भागलपुर से राजमहल तक दामिन-इ-कोह का गठन किया गया, ताकि आदिवासी अपनी सुविधानुसार इस क्षेत्र को साफ कर उस पर अच्छी तरह खेती कर सके।

दामिन-इ-कोह के सीमांकन के बाद, संतालों की बस्तियां बड़ी तेजी से बढ़ीं, संतालों के गांवों की संख्या जो 1838 में 40 थी, तेजी से बढ़कर 1851 तक 1,473 तक पहुंच गई। इसी अवधि में संतालों की जनसंख्या जो केवल 3,000 थी, बढ़कर 82,000 से भी अधिक हो गई। संताल परगना डिस्ट्रिक्ट गजेटियर बताता है कि तब संताल परगना में आदिवासियों की जनसंख्या 90 प्रतिशत थी, जहां दिकूओं की जनसंख्या मात्र 10 प्रतिशत ही थी।

तभी संतालों के बीच एक अजीबो-गरीब घटना घट गई। संतालों का तात्कालीन संताल परगना प्रवेशोपरांत ही उनके पीछे-पीछे दिकू लोगों का आगमन शुरु हुआ। इन्होंने सर्वप्रथम भोले भाले संतालों को पल्थी मारने की जगह मांगी। संतालों के बीच दिकूओं का आने का एक ही मकसद था; उनके बीच महाजनी करोबार करना। किंतु, संतालों ने भी जल्दी ही यह समझ लिया कि उन्होंने जिस भूमि पर खेती करनी शुरु की थी, वह उनके हाथों से निकलती जा रही है। संतालों ने जिस जमीन को साफ करके खेती शुरु की थी, उस पर सरकार (राज्य) भारी कर लगा रही थी, साहूकार, दिकू लोग बहुत ऊंची दर पर ब्याज लगा रहे थे और कर्ज अदा न किए जाने की सूरत में जमीन पर ही कब्जा कर रहे थे और जमींदार लोग दामिन इलाके पर अपने नियंत्रण का दावा कर रहे थे।

1854 आते-आते संतालों के सिर के ऊपर से पानी बहने लगा। खेत-खलिहान तो संतालों के हाथों से जा ही रहा था। उनके मवेशी एवं स्त्री-बच्चे पर भी आफत का पहाड़ टूटने लगा था। संताल किंकर्त्तव्यविमूढ़ः की स्थिति में पहुंच गए थे। तब दामिन-इ-कोह इलाके में जेम्स पोण्टेट के अलावे और कोई अंग्रेज अफसर की बहाली भी न थी। यह भी विडंबना ही थी कि पोण्टेट के पास मजिस्ट्रेयल पावर भी नही था। भला एक अंग्रेज अफसर के लिए इतना बड़ा इलाके को संभाल पाना बड़ा ही दुरुह कार्य था। संतालों को उचित न्याय पाने हेतु दूर-दूर तक जाना पड़ता था। पर महाजन एवं दरोगा की मिलीभगत ने संतालों की आशाओं पर पानी फेर दिया था। कोर्ट-कचहरी में भी आमला-पियुन वगैरह महाजनों की ही दलाली करते थे।

संतालों ने सभी तरह के न्यायिक दरवाजे खटखटाये। पर उन्हें चारों ओर से मुंह की खानी पड़ी। उन्हें मुंह लटका कर लौटना पड़ा। आखिर, मरता क्या नहीं करता। गांव-गांव हूल के बारे में खबर पहुंचा दी गई। आम जनता को अच्छी तरह समझ में आ गया कि ये सूदखोर महाजन ही उनके असली अत्याचारी एवं दुश्मन हैं। अतएव उनको जड़ समेत उखाड़ फेंकने में ही उनकी भलाई है। अतः उनसे निजात पाने के लिए संतालों ने हूल का बिगुल फूँक दिया। “हूल” का शाब्दिक अर्थ है - क्रांति, विद्रोह, बलवा ...। परंतु संताली में इसका आंतरिक अर्थ - अत्याचार के विरुद्ध अंतिम अस्त्र उठाना। फिर क्या था? 07 जुलाई 1855 बरहेट के समीप पंचकठिया वट वृक्ष के नीचे से कुख्यात महेश लाल दरोगा एवं अत्याचारी महाजन केनाराम भगत सहित 14 सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिए जाने के बाद ही हूल का श्रीगणेश हुआ। उन्होंने आर-पार की लड़ाई छेड़ दी। दावानल की तरह हूल की आग जल उठी। चारों ओर हाहाकर मच गया। महाजनों को चुन चुनकर उनका भूरता बनाया जाने लगा। ब्रिटिश शासकों को जब इसकी खबर लगी, तो उन्होंने महाजनों के बचाव हेतु अपनी फौज को संताल इलाके में भेज दिया। संताल फौज और गोरे पल्टनों के बीच घमासन युद्ध हुआ। परंतु हूल थमने का नाम नहीं ले रहा था। आखिर 10 नवम्बर 1855 को मार्शल लॉ भी लागू किया गया। फिर भी हूल नहीं थमा। सर कटा सकते हैं, पर जमीन नहीं दे सकते के नारों से आसमान गूंज उठा था।

अंततः ब्रिटिश शासकों ने हूल के कारणों का गहराई पूर्वक विश्लेषण करने के लिए एक उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया। जांच समिति के निर्देशानुसार संतालों के लिए एक अलग राज्य संताल परगना का गठन किया गया। जहां संतालों को अपने विधि-विधान के अनुसार राज करने का प्रस्ताव पास किया गया। मालूम हो कि सर्वप्रथम 22 दिसम्बर 1855 को जिस संताल परगाना का गठन हुआ था, उसकी सीमा भागलपुर के साथ-साथ कटिहर-पुर्णिया भी शामिल थी। परंतु दिकूओं के विरोधस्वरुप 1857 में इसकी सीमांकन को घटा दी गई। अंग्रेजों को अच्छी तरह समझ में आ गया था कि आदिवासियों के लिए उनकी जमीन ही उनकी आत्मा है। मच्छली की तरह अगर उसे पानी से बाहर कर दिया जाय, तो वह एक पल भी जिंदा नहीं रह सकता है। अतः अंग्रेजों ने जमीन के महत्व को समझते हुए एक ऐसा कानून पास किया, जिसमें आदिवासी न तो अपनी जमीन दिकू को बेच सकता है और न ही कोई दिकू आदिवासी की जमीन को खरीद सकता है। साथ ही यह भी कानून पास किया कि इस कानून को भारत की कोई भी संस्था संशोधन नहीं कर सकती है। यह कानून आज भी संताल परगना काश्तकारी अधिनियम-1949 के तहत जस के तस रक्षा कवच के रूप में खड़ा है। फिर भी आज आदिवासियों की आधी जमीन दिकूओं के हाथों चली गई है।

अंग्रेजों द्वारा संताल परगना का गठन तो कर दिया गया, पर उनसे एक बहुत बड़ी बुनियादी भूल हो गई। अंग्रेज इसे चाहकर भी कुछ नहीं कर सके। वह बुनियादी भूल यही थी कि तब संतालों (आदिवासी) में एक भी शिक्षित व्यक्ति नहीं था। अर्थात् सभी आदिवासी अंगूठा टेक थे। जिसके कारण सरकारी दफ्तर हो या कोर्ट-कचहरी उनकी नियुक्ति नहीं हो सकती थी। इस तरह एक जीवंत एवं नई समस्या उत्पन्न हो गई। अंग्रेज चाहकर भी इस समस्या का समाधान नहीं कर सके। फिर भी उनसे जितना बन पड़ा, उन्होंने भरसक कोशिश की। जहां तक संभव हो सका, उन्होंने आदिवासियों को न्याय देने का अथक प्रयास किया।

वक्त के साथ समय का चक्र घुमता गया। स्वायत्तशासन के तहत परगनैत को दरोगा की शक्ति भी दी गई। हालांकि इस शक्ति को बाद में वापस लिया गया। फिर भी सूदखोर महाजनों का अत्याचार रुकने का नाम नहीं ले रहा था। एक अलग प्रदेश संताल परगना भी मिल गया था, पर लोगों की आर्थिक हालत बद से बदतर होती गई। ढाक के वही तीन पात वाली कहावत चरितार्थ हो गई। जमीन संतालों ने तैयार की थी पर उनकी जमीन तेजी के साथ महाजनों के हाथ जा रही थी। यही कारण था कि लोगों में पुनः द्वितीय हूल करने की भावना जाग उठी थी। लोगों का आक्रोश बढ़ते जा रहा था। इसी मूल उद्देश्य के तहत 1872 को मांझी-परगनाओं की अगुवाई में दुमका में एक महारैली का आयोजन हुआ। उस रैली में हजारों की संख्या में आदिवासी-मूलवासी एकत्र हुए। दुमका में पदस्थापित तात्कालीन डिस्ट्रिक्ट कमिशनर को एक सूत्रीय मांगपत्र सौंपा गया। जिसमें स्पष्ट रूप से भूमि बंदोबस्ती की मांग जोदार तरीके से रखी गई थी।

ब्रिटिश शासकों ने त्वरित कार्रवाई करते हुए तत्क्षण 1872 रेगुलेशन एक्ट पारित कर सर्वे सेटेलमैंट का काम आरंभ कर दिया। इस सेटेलमैंट की प्रकिया पर महाजनों ने कई तरह की अड़चनें पैदा करने की कोशिश की। अंग्रेजों को महाजनों का मजरा शीघ्र ही समझ में आ गया। “जमीन जिसकी, नाम उसका” पहल करते हुए सर्वे सेटेलमेण्ट का काम तीन चरणों में संपन्न हो गया। यथा - (i) प्रथम सर्वे - Browne Wood Settlement (1873-1879); (संताली में इसे ”हुंट“ सेटलमेंट के नाम से जाना गया; (ii) द्वितीय सर्वे - Mr H. McPherson Settlement (1898-1905); एवं (iii) तृतीय सर्वे - J. F. Gantzer Settlement (16.2.1932-8.7.1934)। यह अंतिम सर्वे था, जिसे लोग इन्हें 1932 खतियान के नाम से खूब जानते हैं।

अब सवाल उठता है; अंग्रेजों की वजह से अलग प्रदेश संताल परगना भी मिल गया, एसपीटी/सीएनट जैसे सख्त भूमि कानून भी पास हुए, 1932 का खतियान भी हाथ में आ गया, देश आजाद भी हो गया; फिर झारखण्ड अलग प्रांत की मांग क्यों उठी। अंग्रेज होते; तो शायद यह मांग भी कब की पूरी को गई होती। जिन महान क्रांतिकारियों ने अलग प्रांत की मांग जोरदार ढंग से उठाई, उनमें अग्रिम कतार में थे - सर्वश्री माराङ गोमके जयपाल सिंह मुण्डा, एनई होरो, बागुन सुम्बरुई, जस्टिन रिचार्ड, दिसोम गुरु शिबू सोरेन आदि। झारखण्ड आंदोलन की कहानी लंबी है। खैर, तात्कालीन कांग्रेस सरकार ने “मुर्गा” को ही चखना कर दिया। कोई साढ़े तीन करोड़ लेकर फरार हो गया। कारण कुछ भी रहा हो, अनवरत अलग झारखण्ड आंदोलन की वजह से 2000 में “शेर” के बदले “सांप” स्वरुप “वनांचल” पारित हुआ। बड़ी मशक्कत के बाद उसमें “झारखण्ड” नाम सुधारा गया।

झारखण्ड बने करीब 22 वर्ष गुजर गए। झारखण्ड सरकार भी आती-जाती रही। फिर भी पुरखों का सपना अधूरा ही रह गया। कहा गया कि जब अपनी सरकार होगी, तो अपने लोगो पर नौकरियों की बहार होगी। पुरखों की मनोकामना अवश्य पूरी होगी। अब वादा करने वालों की इच्छा तो पूरी हो गई। सरकार बने ढाई वर्ष भी बीतने को है। पर अब आदिवासी-मूलवासी को अपने ही घर में भोजपूरी बोलने के लिए मजबूर किया जा रहा है। साथ ही झारखण्ड सरकार की नौकरियों पर बाहरी लोगों की बहार हो रही है। जब अपनी सरकार में यह हाल है, तो आखिर आदिवासी-मूलवासी जाएं तो कहां जाएं? इस हालात में 1932 खतियान न करें तो क्या करें? आप बताओ। काश! आज अंग्रेज जीवित होते!

Friday, 20 August 2021

 पुस्तक प्रेमी समाज 

एक निवेदन : संताल समाज पढ़ाकु समाज नहीं है। अर्थात् हमारा समाज पुस्तक प्रेमी समाज नहीं है। पुस्तक बोलती नहीं है, पर वह बहुत कुछ सिखाती है। परंतु हमारा समाज अब तक पुस्तक प्रेमी समाज क्यों नहीं बन पाया है? यह एक शोध का विषय हो सकता है। कहा जाता है कि जो समाज जितना पढ़ाकु होगा, वह समाज उतना ही उन्नत कहलाता है। पुस्तक पढ़ना समाज तौलने का एक पैमाना माना जाता है। या यूं कहें कि यह सीधा-सा तर्क है कि अगर पढ़ाकु समाज होगा, तो यह निश्चित है कि वह समाज उन्नत होगा। इसके उलट अगर समाज उन्नत है, तो वह समाज अवश्य ही पढ़ाकु समाज होगा। यह तथ्य निश्चित तौर पर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

इस संदर्भ में स्कूल-कॉलेजों की डिग्री से ही कोई शिक्षित कहलाएगा, ऐसा भी संभव नहीं है। शिक्षा में पैनापन लाने के लिए अनुभव एवं पुस्तक प्रेमी होना बहुत ही जरुरी विधा है। बहुत सारे ऐसे विषय हैं जो हमें कोर्स की किताबों में पढ़ने को नहीं मिलता है। जीवन में बहुत सारी ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, जो हमें दैनंदिनी के जीवन में बहुत प्रभावित करती हैं। ध्यान रहे; कोई कितना भी बड़ा डिग्रीधारी क्यों न हो, पर उसका बुनियादी ज्ञान मैट्रिक स्तर पर ही आधारित रहता है। हाँ, वह अपने ज्ञान का विस्तार आगे की पढ़ाई, पुस्तक प्रेमी बनकर एवं अनुभवी होकर ही कर सकता है।

आज मंगरु को इस संदर्भ में क्यों निवेदन करना पड़ रहा है? इसको इस तरह से समझा जा सकता है। आपने किसी फिल्म को थियेटर में अवश्य देखा होगा। उस फिल्म में क्या दिखाया जाता है? उस फिल्म में औसत 60 वर्ष की जिंदगी को सिर्फ 2 घंटे में दिखाया जाता है। कारण यही है कि इस भागमभाग की दौड़ में पूरी जिंदगी को समझ पाने के लिए 2 घंटे से ज्यादा वक्त किसी के पास उपलब्ध नहीं होता है। टी. व्ही. वगैरह में भी यही फार्मूला चलता है। ठीक ऐसे ही प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक मीडिया, इसी फार्मूला को ही अपनाया जाता है। साहित्य जगत में भी ऐसा ही होता है। यही कारण है कि महाग्रंथ, उपन्यास, कहानी-कविता को लिखा जाता है। साहित्य विधा में आपने देखा होगा कि लंबे-चौड़े विषय को भी एक ही वाक्य में कह दिया जाता है। ऐसे वाक्य को मुहावरा, कहावत, परिभाषा, नारा/स्लोगन कहा जाता है। उदाहरण - "लेल्हा गोडो, मोटा फुट", "आदो़ बाबोन बातावा, झारखण्ड राजबोन हातावा", "तुम मुझे  खून दो, मैं तुझे आजादी दूंगा" आदि। 

स्पष्ट रूप से कह दूं, तो आपका मंगरु भी इसी फार्मूले का मुरीद है। वह दुनिया भर की बातों को एक छोटा-सा लेख के द्वारा पाठको तक पहुंचाने की कोशिश करता है। ज्यादा वक्त किसी के पास नहीं होता है। यहाँ तक कि 2/3 पन्नों को पढ़ सकने का वक्त भी किसी के पास नसीब नहीं होता है। अतः उदाहरण के लिए शक्ति का वर्णन के लिए - "जिसकी लाठी उसकी भैंस" लिखा हो, तो उसी प्रसंग में ही उसके अर्थ को समझा जाय।

आदिवासी समाज अवनति के कई कारण हो सकते हैं, उनमें यह भी एक मूल कारण है कि समाज में पढ़ने-पढ़ाने की प्रवृति नगण्य है। अतः समाज को पुस्तक प्रेमी बनना ही होगा। 

Wednesday, 20 January 2021

 अदृश्य समस्याएं

मंगरु आज जितना उदास है, शायद ही वह पहले कभी हुआ हो। वह अत्यंत दुःखी है। दुःखी इसलिए कि अब तक जिस गति से उसके समाज को शिक्षित होना चाहिए था, वह नहीं हो सका है। क्योंकि शिक्षा को ही उन्नति की पहली कुंजी कहा जाता है। इस समय मंगरु के पास अपने समाज के बारे में मंथन करने के सिवा और कोई काम ही नहीं है। उसने बचपन से अब तक अपने समाज की संरचना को बहुत करीब से देखा है। जहां तक संभाव हो सका, उसने अपने समाज की भूत एवं वर्तमान परिस्थिति को समझने की भरपूर कोशिश की है। लेकिन उनके साथ ढाक के वही तीन पात वाली बात हो गई। उसका समाज शिक्षा के अभाव में अवनति के दलदल में धंसते ही जा रहा है।

मंगरु की उम्र छोटी थी, फिर भी माराङ गोमके के झारखण्ड आंदोलन को वह अपनी आँखों से देखा था। आदिवासियों की मांग पर झारखण्ड अलग प्रांत लेने के लिए सन् 1950 में झारखण्ड पार्टी नामक एक राजनैतिक दल का गठन हुआ था। झारखण्ड की जनता अलग प्रांत लेने के लिए मदहोश थी। यही वजह थी कि एकीकृत बिहार में झारखण्ड पार्टी प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभर कर सामने आई। तब कोई सुविधा उपलब्ध न थी, फिर भी लोग जयपाल सिंह मुण्डा को सुनने के लिए कोसों दूर पैदल ही चल पड़ते थे। कुछ वर्षों के बाद झारखण्ड पार्टी कांग्रेस पार्टी में विलय हो गई एवं उनका प्यारा चुनाव चिन्ह मुर्गा को भी ठंडे बक्से में डाल दिया गया।

संक्षेप में यही कि झारखण्ड का कांग्रेस में विलय के बाद हूल प्रदेश में एक सन्नाटा छा गया था। अल्प समय के लिए जस्टिन रिचार्ड सरीखे नेताओं का उदय हुआ। जिन्होंने हूल झारखण्ड पार्टी की स्थापना की एवं उनके कई विधायक भी बने। साथ ही 1960 के उतरार्ध में एक महान् सामाजिक कार्यकर्ता फा. अन्थोनी मुर्मू का उदय हुआ। इनका कार्यक्षेत्र मूलतः साहिबगंज-पाकुड़ जिले में दुर्तगति से फैलता चला गया। फिर 1970-80 के दशक में दिसोम गुरु शिबू सोरेन के नेतृत्व में अलग झारखण्ड प्रदेश का आंदोलन आरंभ हुआ। दिसोम गुरु ने झामुमो नामक एक राजनैतिक दल का गठन किया, और इसके बैनर तले अलग झारखण्ड प्रदेश की मांग की धार को और तेज कर दिया। स्मरण रहे कि सन् 1977 में जनता पार्टी की आंधी भी आई थी। जनता पार्टी जिस गति से आई थी उस गति से अस्त भी हो गई।

दिसोम गुरु का झारखण्ड आंदोलन काफी उतार-चढ़ाव के साथ चलते रहा। जनता की उन्नति की आस और अभिलाषा अलग प्रांत पर टिक गई थी। उन्होंने झारखण्ड अलग राज्य को किसी संजीवनी बूटी की तरह मान बैठा था। उनकी आशा थी कि अलग झारखण्ड राज्य मिलने के बाद उनकी सारी समस्याएं उड़नछू हो जाएंगी। काफी जद्दोजहद के बाद आखिरकार 15 नवंबर 2000 को अलग झारखण्ड राज्य मिल तो गया, पर अफसोस खोदा पहाड़ निकली चुहिया!

मंगरु अपने आप से पूछता है; क्या कारण है कि हमारा समाज आज भी जहां से चला था, फिर वहीं पहुंच गया है? समाज की ऐसी कौन-सी समस्याएं हैं जिनका समाधान नहीं हो सकता है? मंगरु के अनुसार; हो सकता है झारखण्ड चलाने के लिए हमारे पास कोई ब्लूप्रिंट उपलब्ध न था। और न ही किसी तरह का कोई रोडमैप ही तैयार था। हमने अंधेरे में ही तीर चलाने की कोशिश की है। हमारी छोटी-बड़ी सामाजिक संस्थाएं भी समाज की उन्नति के लिए नपुंसक सिद्ध हुई। इससे ऐसा भी कहा जा सकता है कि सभी तरह के सामाजिक कार्यों का ठेका राजनीतिज्ञों ने ले रखा है। परंतु नेताओं में भी दूरदर्शिता का अभाव है एवं उनकी नीयत में कोई न कोई खोट अवश्य है।

देश में आजकल लोकसभा चुनाव का महापर्व चल रहा है। नेताओं पर कई तरह के आरोप लगाए जाते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि नेताओं के चुनाव करने में हमसे ही कोई भूल हुई जा रही हो? चुनना था मीठा फल पर खाया तो पता चला फल खट्टा है। 

हमारे समाज में समस्या एक हो तो उसका समाधान निकाला जाय। पर यहां तो समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। कहीं हमारा समाज कैंसर से पीड़ित तो नहीं हो गया है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि उसका शल्य चिकित्सा ही अंतिम उपाय हो? हमारे समाज में दृश्य-अदृश्य कई तरह की समस्याएं किसी राक्षसनी की तरह सामने खड़ी हैं। कुछ भी हो, गहराईपूर्वक चिंतन के बाद इसका समाधान होना जरुरी है। 

आइए, आज हम अपने समाज उत्थान के लिए अंतःमन से प्रण लें।

Saturday, 7 February 2015

पोते के नाम पत्र

मानव समाज में चिट्ठी लिखने की परंपरा बहुत पुरानी है। इस परंपरा से कोई अछूता नहीं। चिट्ठी की कई प्रजातियाँ हैं; यथा सरकारी, गैर-सरकारी एवं निजी। कई तरह से चिट्ठियाँ लिखने का प्रचलन है। बच्चों के चाचाजी ने भी अपनी पुत्री के नाम खत लिखा था। उसने यह पत्र किसी काल कोठरी से लिखा था। पर आपका परदादा फूस के नीचे खटिया पर पड़े-पड़े आपको यह अंतिम पत्र लिख रहा है, वह भी ठीक अपनी अंतिम श्वास लेने से पहले। यह कोई पत्र नहीं है, यह तो आपके परदादे के जीवन-दर्शन का अंतिम निचोड़ है। आपको यह पत्र लिखकर कोई गुनाह तो नहीं किया है? खैर, जिस काल में यह पत्र आपके नाम लिखा गया था, उस दौरान खत लिखने की परंपरा ही अपनी अंतिम साँस ले रही थी। दुनिया के वैज्ञानिकों ने द्रुतगामी से संदेश पहुँचाने के लिए तब नई विधि ईजाद कर ली थी, दूरभाष, घुमंतूभाष, एसएमएस और ई-मेल आदि। अब तो विज्ञान ने यहाँ तक प्रगति कर ली है कि बात करने वाले एक दूसरे का खोपड़ा भी आसानी से देख सकते हैं। आपका जमाना इस विधि को छोड़ वार्त्ताकार स्वयं एक दूसरे से ई-मेल से भी कम समय में मिल सकने की तरकीब निकाल लेंगे। कितनी बार मैंने आपके पिताजी को आगाह करते रहा कि सावधान! आपके गाँव-घर में आग लग चुकी है। इसे बुझाने का कोई उपाय ढूँढ़ों। पर उन्होंने मेरी सलाह को सिरे से ही खारिज कर दिया था। अब और पत्र लिखने की मेरी हिम्मत नहीं बची है। कब मैं भगवान का प्यारा बन जाऊँ, मुझे भी नहीं मालूम। अतः आपके नाम यह मेरा आखिरी पैगाम समझो। आप यह खत न समझना पर इसे तार समझना। चूँकि तार का उपयोग हमेशा दुःख की घड़ी में ही हुआ करता था। यह बहुत बड़ी विडंबना ही होगी कि इस पत्र को आप तक सुपुर्दगी होने में करीब पाँच सौ वर्ष तक का सफर तय करना होगा। आप इसे पढ़ पाओगे, मुझे संदेह है। दुनिया के किसी कोने में यह खत मिले या न मिले पर संपादक जी के पाँचवें गोदाम में यह आपके लिए सुरक्षित रखा रहेगा। रिवाजानुसार खत सिर्फ जीवित लोगों को ही लिखा जाता है। पर यह आठवाँ आश्चर्य ही होगा कि एक परदादे ने अपने भावी पोते के लिए एक दुःखभरी दास्तान लिख छोड़ी है।

यह जानकर आपको अति प्रसन्नता होगी कि मैं ही आपका एकमात्र बदनसीब परदादा हूँ; जिसने इस ममतामयी पत्र की माला को गूँथने की चेष्टा की है। दूध का दूध और पानी का पानी न्याय कर सको, अतः मैंने इस खत को लिखने का दुःसाहस किया हैै। बताते चलूँ कि पत्र लिखते वक्त यहाँ चंद्रग्रहण हो रहा है। आशा है आप लोग तब सूर्यग्रहण झेल रहे होंगे। आज मुझे मालूम नहीं क्योंकर खत लिखते समय मेरा हाथ काँप रहा है। गला सूखता जा रहा है। मस्तिष्क में अनगिनत अच्छे-बुरे विचार कौंध रहे हैं। आगे नाथ न पीछे पगहा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। फिर भी ताकि आपका शोध-पत्र तथ्य पर आधारित हो; अतएव मैंने सोचा कि इस पत्र के माध्यम से आपके लिए एक सत्य की गठरी छोड़ जाऊँ। इस खत में जो कुछ भी लिखा जा रहा है, वह सच्ची घटना पर आधारित है। मनगढ़ंत व कपोल कल्पना जैसी कोई भी चीज इस पत्र में वर्णित नहीं है। मुझे अच्छी तरह मालूम है कि आप मुझे एक बार नहीं हजारों बार दोषी ठहरा रहे होओगे। यहाँ तक कि मेरी अस्थियों को फाँसी के तख्ते पर लटकाने के लिए भी उतावले हो रहे होंगे। पर करुँ भी तो क्या करुँ? मैं भी वक्त का मारा हूँ। समय के थपेड़ों ने मुझे अधमरा कर दिया है। आपकी दशा का ख्याल आते ही मैं जी भरकर रो पड़ता था। और मेरे आँसूओं की बूँद स्याही बनकर मेरी लेखनी को ताउम्र मदद करती रही। लेकिन एक बात का ध्यान रखो। जिस दुःख से सिदो-बिरसा परेशान थे, जिन कारणों को लेकर मारांग गोमके व दिसोम गुरु ने आंदोलन किया, आज हम भी उन्हीं कारणों से पीड़ित हो रहे हैं। और आशा है आप भी उसी दुःख से ही दबे रहोगे। अर्थात् दुःख के अंतराल में कोई ज्यादा परिवर्तन नहीं होगा। आसमान से गिरे तो खजूर पर अटक गए।

कहा जाता है; पुरखे हमारे शहीद होते रहे हैं। किसी को घोड़े की चंवार से बाँधकर तब तक घसीटा गया जब तक कि उनके प्राणपखेरु उड़ नहीं गए, तो किसी को अपने ही जन्मस्थल में फाँसी दी गई और तो और किसी को तो जहर का प्याला पीने के लिए भी मजबूर किया गया। जिस किसी ने भी अन्याय के विरुद्ध मुँह खोला, उसकी बोलती सदा-सदा के लिए बंद कर दी गई। पुरखों के बलिदानस्वरुप हमने कुछ दिन सीएनटी और एसपीटी एक्ट का लुत्फ उठाने का असफल प्रयास किया। पर यह वही साबित हुआ, जिसे हाथी के दाँत दिखाने के कुछ और खाने को कुछ कहते हैं। बलि का बकरा कब तक खैर मनाता? जगह-जगह उनकी बपौती जमीन पर कल-कारखाने बैठा दिए गए। बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण हुआ। वे कुशल कारीगर तो थे नहीं; अतः उन्हें चतुर्थ श्रेणी की नौकरी से भी वंचित कर दिया गया। वे बेचारे भूमिपुत्र विस्थापन के जाल में फँसते चले गए थे। वे रोजगार की तलाश में असम, अंडमान और महानगरों की ओर कूच कर गए। आरक्षण मिलने लायक आबादी न रही। सरल, सीधे और सत्यवादी भूमिपुत्र अपने ऊपर हो रहे अत्याचार का सामना करने में विफल रहे। हमेशा उनके मुखवृंद से भगवान देखता है का सुवचन निकलता था। किन्तु कोई भी भगवान उसे बचाने नहीं आया। क्यों आता? यहाँ तो यह उक्ति चरितार्थ हो रही थी; भगवान भी उसी की मदद करता है, जो अपनी मदद स्वयं करता है।

मुगलों के बाद दो सौ वर्षों तक देश अंग्रेजों का गुलाम रहा। आजादी की लड़ाई छेड़ दी गई और अंततः सन् 1947 ई. में अंग्रेज देश छोड़कर चले गए। पर झाड़ जंगल में काले अंग्रेजों का साम्राज्य बढ़ता गया। उनके फन कुचलने के लिए आँधी-तूफान की तरह झाड़ जंगल में मारांग गोमके का उदय हुआ। सदियों से दबाए गए लोगों ने अपने बीच एक ऐसा गरीबों का मसीहा पाकर बहुत आनंदित हो उठे। गरीबों ने कुछ हद तक राहत की साँस ली। लोग उनसे जुड़ते गए एवं कारवां बनते गया। मारांङ गोमके जहाँ भी जाते, उन्हें सुनने के लिए ऐसी भीड़ जमा होती, जो न अब तक इकट्ठी हुई थी और न ही भविष्य में ऐसी भीड़ कभी इकट्ठा होने की उम्मीद है। उनकी सभा में शामिल होने के लिए लोग भूखे-प्यासे कई सौ मील तक का सफर पैदल ही तय करते। मुर्गे की बांग ने लोगों को गहरी नींद से जगा दिया था। लोगों में जागरुकता नाम का जीव प्रवेश कर गया था। फिर क्या था? जहाँ देखो मुर्गा छाप, वहीं लगाओ मोहर आप चरितार्थ हो गया। इस तरह मारांङ गोमके ने तैंतीस विधायकों को बिहार विधान सभा में भेज दिया। इस प्रकरण से कुछ हुआ कि नहीं यह तो ज्ञात नहीं पर यह सर्वविदित है कि लोगों के मन मंदिर में एक ऐसी ममतामयी भावना जाग उठी, जिससे लोग इस कदर ग्रसित हो गए कि यह भावना भुलाए न भूली। अपने लिए अलग झाड़ जंगल प्रदेश की माँग ने लोगों की नींद हराम कर रखी थी। उठते, बैठते, सोते आँखों के सामने सिर्फ और सिर्फ अलग प्रदेश ही दिखाई दे रहा था; क्योंकि अलग प्रदेश मूर्छितों की एकमात्र संजीवनी बूटी थी। मुर्गे की कुकड़ुकूं से सारी जनता अति प्रसन्नचित्त थी। पर हाय री अभागिन जनता! एक दिन उन्हें पता चला कि मारांग गोमके और उनके सहयोगियों ने उस मुर्गे को ही चखना कर दिया था। और इस तरह मारांङ गोमके देश के प्रथम प्रधानमंत्री की गोद में जा बैठे। मारांङ गोमके राजनीति छोड़ एक किसान बन गए। जिसे वह हल में जोतने हेतु जोड़ा बैल बन गए। मारांग गोमके द्वारा खरीद-फरोख्त की यह एक ऐसी बेसुरी परंपरा स्थापित की गई कि बाद के नेता भी इनके पदचिह्नों का अनुसरण करते नहीं अघाते थे।

मारांङ गोमके के अस्त होने के बाद झाड़ जंगल में एक बहुत बड़ी रिक्तता पैदा हो गई। लगा, मानो लोगों को साँप सूँघ गया हो। कहीं से कोई चूँ तक की आवाज न आई। इस रिक्तता की पूर्ति हेतु फिर आया तेज हवा का एक झोंका। एक मुट्ठी चावल और एक रुपया का कमाल देखिए कि वह कुछ ही दिनों में साढ़े तीन करोड़ में परिणत हो गया। लोगों ने उन्हें सिर आँखों पर बैठा लिया था। लोगों ने अपनी ममतामयी भावना को गिरवी रख दिया। तीस वर्षों तक उन्हें राज करने का मौका दिया गया। इस दौरान कुछ हासिल हुआ कि नहीं यह तो मालूम नहीं। लेकिन उन्हीं की सहमति से एक देश लूटा गया। हुल में शहीदों के खून से लिखा गया उपझारखण्ड नीलाम हो गया। एक के बदले अब वह छह टुकड़ों में विभाजित हो गया। प्रशासनिक दृष्टिकोण से चाहे वह सौ टुकड़ों में बाँट दिया होता पर उनका नामकरण तो अपनी संस्कृति की पहचान पर आधारित होता। पर ऐसा संभव न हो सका। इस तरह खून की नदी से सिंची गई धरती भी परायी हो गई। वह सदैव तारे तोड़ने का वादा करने वाले, लोगों की आँखों में धूल झोंकने में कामयाब हो गया। मारांग गोमके और दिसोम गुरु दलितों के सर्वमान्य नेता रहे हैं। दोनों ही महान क्रांतिकारी थे; इसमें कोई दो राय नहीं। पर क्यों कांग्रेस में विलय और साढ़े तीन में बिकने की घटना घटी? इस प्रश्न का उत्तर अब तक कोई दे न सका। निश्चित तौर पर लगता है; दोनों नेताओं के पास दूरदृष्टि, स्पष्ट विचारधारा और अच्छे दर्शन की कमी थी। और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि रातोंरात एक झाड़ जंगल प्रदेश का सृजन भी हो गया था। इस प्रदेश सृजन के पीछे भी एक बहुत बड़ा रहस्य छिपा हुआ है। दो की लड़ाई में तीसरे का फायदा हुआ। तीसरा असहाय और दरिद्र था। संक्षेप में आपको बता दूँ कि यह तो वही बात हो गई कि रातोंरात एक भिखारी को मर्सीडिज कार की भेंट दी गई। अब भिखारी कार को सुबह-शाम देखे, चाटे या सूँघे? कुछ भी करे, यह तो वो जाने और उसका काम जाने। पर भिखारी अब दूर से ही टुकुर-टुकुर उस मर्सीडिज कार को निहारने में तल्लीन है। मर्सीडिज को चलाने के लिए उस भिखारी के पास न तो तेल है और न ही तेल लेने के लिए जेब में पैसे। पानी से आखिर गाड़ी भी तो नहीं चल सकती। रखे-रखे मर्सीडिज अब सड़ने के कगार पर खड़ी है।

मेरे प्रिय पोते! कहीं धोखे में न रहना कि आपके परदादे अनपढ़ और गंवार थे। यह सच है कि देश आजाद होने तक गाँव में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या नगण्य थी। पर इसके पूर्व अंग्रेजों से लोहा लेने वाले तिलका मुर्मू, सिदो मुर्मू एवं बिरसा मुंडा ने कौन से विश्वविद्यालय से कौन-सी डिग्रियां ली थी, जिसे अंग्रेजों को लोहे का चना चबवाया था? ये महान नेता अंगूठा टेक थे। इन्होंने किसी स्कूल का दरवाजा न देखा था। फिर भी इन्होंने अंग्रेजों को छठी का दूध पिलाया था। और इनके आंदोलन के फलस्वरुप संताल परगना एवं छोटानागपुर का जन्म हुआ था। जहाँ कहीं भी समाज उन्नति की बात होती, लोगों ने सर्वसम्मति से मान लिया था कि शिक्षा ही विकास की एकमात्र कुंजी है। बगैर शिक्षा उन्नति करना कोरी कल्पना ही होगी। अतएव प्रदेश में सरकारी, गैर-सरकारी एवं अर्द्धसरकारी विद्यालयों की बाढ़ आ गई। देश आजाद होने के साठ वर्ष में कोई ऐसा गाँव न रहा, जहाँ कोई स्नातक न हुआ हो। बालक-बालिकाएँ ओले की तरह पढ़ लिखकर बादलों से बारिश के रुप में दनादन गिर रहे थे। लेकिन यह क्या? विद्यार्थियों के मस्तिष्क में मीठे फल के बीज बोए जा रहे थे, लेकिन फल आ रहे थे कड़ुवे। बच्चों को अमीर बनने की सिखावन दी जा रही थी; पर बन रहे थे रंक। स्वर्ग जाने का रास्ता बताया जा रहा था; पर जी रहे थे नरक में। ऐसा क्यों? समाज की माली हालत अब बद से बदतर होती जा रही थी। कोई ऐसी समस्या न बची; जिससे लोग पीड़ित न हों। उन्नति के बारे समाज के ठेकेदारों की अलग-अलग दलीलें थीं। राजनीतिज्ञ अपने लिए वोट को ही समाज प्रगति का एकमात्र नुस्खा बताते। धर्मगुरु इस दुनिया के बारे न बताकर परलोक की बात करते। समाज सेवक गाँव का आँकड़ा लेकर सिर्फ कागजी घोड़ा दौड़ा रहे थे। और तो और सरकारी संपत्ति, किसी की संपत्ति नहीं चरितार्थ हो रहा था। सरकारी तंत्र लूट-खसोट का अड्डा बन गया था। सरकार का मतलब मूर्खों का, मूर्खों द्वारा, मूर्खों के लिए।

किसी दार्शनिक ने बिल्कुल सही कहा है कि कोई भी शिक्षा कभी निष्क्रिय नहीं रह सकती। या तो यह मुक्त करती है अथवा दास बनाती है। दबंग समाज द्वारा शिक्षा का पाठ्यक्रम इस तरह तैयार किया जाता है कि हम दास व गुलामी खटने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

मेरे प्रिय पोते! अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि हम और आप चाहे लाख यत्न कर लें। हमें रेड इंडियन बनने से कोई रोक नहीं सकता। इसमें दोष उनका नहीं, सौ फीसदी गलती हमारी ही है। पत्र मिलने तक आप "लाल भारतीय" के रुप में परिणत हो चुके होंगे। ढेर सारे आशीर्वाद सहित पत्रांत करता हूँ।

Tuesday, 3 February 2015

बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी?

कहा जाता है कि चिंता चिता समान है। अत्याधिक चिंता करने से अच्छी-भली सेहत भी बिगड़ सकती है। जो व्यक्ति ज्यादा चिंतित रहता है, वह उस चिंता रुपी चिता में जलकर भस्म हो जाता है। लेकिन आज मंगरु तो केवल सोच ही रहा है। सबसे पहले वह अपनी सोच में बदलाव लाना चाहता है। चूँकि सोच बदलना ही उन्नति की पहली सीढ़ी है। वह अपने समाज का गहराई से विश्लेषण कर रहा है। वह कोई अपनी व्यक्तिगत समस्या से थोडे़ ही न चिंतित है। अगर वह चिंतित भी है, तो वह अपने सुनहरे समाज को देखकर चिंतित है! वाह रे आदिवासी समाज! मंगरु देख रहा है; किस तरह आदिवासी लोग आत्महत्या कर रहे हैं। ठीक उसी तरह; जैसे पहली बरसात के समय बिजली के खंभे पर जल रहे बल्ब की रोशनी की ओर आकर्षित होकर कीड़े-मकोड़े अपने आप जलकर मर-मिटते हैं। इस भूमंडलीकरण के युग में आदिवासी आधुनिकता के बहाव में बह गए। वे अपने आदिवासी मूल्यों को त्याग कर किस तरह चमगादड़ बनने की कोशिश में जुट गए हैं। और जैसे कि आपको मालूम है; चमगादड़ न तो जानवर है और न ही पक्षी। उसी तरह मंगरु को डर है, कहीं आदिवासी भी धोबी के कुत्ते की तरह न घर का और न ही घाट का रह जाएगा। घड़ी के पेंडुलम की तरह वह झूलता ही रह जाएगा। मंगरु सोच रहा है; आखिर लोग दुःखी क्यों होते हैं? अनुभव के आधार पर मंगरु का मानना है कि लोगों को अपने आप से संतुष्ट होना सीखना चाहिए। क्योंकि अक्सर लोग, जो कुछ अपने पास उपलब्ध है, उससे खुश नहीं होते; पर जो दूसरों के पास है, उसे देखकर दुःखी होते हैं। उसी तरह दूसरों के पास जब कोई चीज नहीं होती है अर्थात् जब दूसरे लोग दुःखी होते हैं, तो वह खुश होता है। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहोगे?

आज मंगरु सोचने में कुछ ज्यादा ही व्यस्त हो गया है। कब दिन निकला, कब दोपहर हुई और कब शाम ढल गई, कुछ पता भी न चला। वह अच्छी तरह जानता है; उसकी सोच के फलस्वरुप निकली छोटी सी रश्मि भी अगर समाज को थोड़ी दूर तक ही सही, कोई रास्ता दिखाने में कामयाब हो सके, तो वह अपने मनुष्य जन्म को सफल मानकर, इस दुनिया से विदाई लेने में उसे थोड़ी-सी वेदना भी नहीं होगी। उसे किसी तरह का कोई गिला शिकवा भी नहीं रहेगा; परंतु उसे आनंदपूर्वक परलोक सिधार जाने में परम संतुष्टी होगी।

हमने पिछले अंक में राजनीति के बारे मंगरु की थोड़ी-सी सोच को जाना। हमारे कुछ मित्रगण, राजनीति को ही सभी समस्याओं का एकमात्र समाधान मानते हैं। वे भी उस ग्वाले की भाँति अपने दही को खट्टा मानने से ही इनकार करते हैं। कुछ भी हो, मंगरु के अनुसार राजनीति का अखाड़ा एक मंदिर के समान है। जहाँ सिर्फ स्वर्ग की ही बातें होती हैं। वहाँ दूध का दूध और पानी का पानी न्याय होता है। लेकिन जरा देश-दुनिया की राजनीति को देख लो; वह हमें कहाँ ले जाना चाहती है, भगवान ही मालिक है। खैर, मंगरु की सोच का दायरा सिर्फ झारखण्ड तक ही सीमित है। अतएव मंगरु आगे सोचता ही चला जा रहा है। राजनीति के अखाड़े में अंदर क्या होता है; मंगरु को इस बारे कुछ भी नहीं मालूम। पर उस राजनीति के फलस्वरुप जो फल उग आते हैं, उसे चखकर वह बता सकने में जरुर काबिल है कि फल मीठा है कि खट्टा। मारांङ गोमके से लेकर दिसोम गुरु तक की राजनीतिक घटनाओं को वह माइक्रोस्कॉप के जरिए देखकर, उसकी जाँच पड़ताल करने में जुटा हुआ है। इस दौरान हमने क्या पाया, क्या खोया विश्लेषण कर रहा है। राजनीतिक मंदिर के पुजारियों ने हमें कौन से गुल खिलाए हैं, मंगरु जानने की कोशिश कर रहा है। पर मंगरु को खाक कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। मस्तिष्क पर जोर देते हुए, वह राजनीतिक उठा-पटक को गहराई से खंगालने की चेष्टा कर रहा है। पर हवा की तरह कुछ पकड़ में ही नहीं आ रहा। काफी देर मंथन करने के बाद, उसे लगा कि देश आजाद होने के बाद से अभी तक झारखंड की राजनीति में काफी उथल-पुथल हुआ है। झारखण्ड की राजनीति आदिवासियों को केन्द्रबिन्दु मानकर ही संपन्न होती रही है। पर बेचारे आदिवासी! अभी तक वे प्रयोगशाला की सामग्री बनकर ही रह गए हैं। झारखंडी राजनीति को कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है। फुटबॉल या हॉकी खेल से आप अच्छी तरह परिचित होंगे। इस मैच में टीम कप्तान चाहे मारांग गोमके, लालबाबू, मुंडा, कोड़ा, हो या गुरु जी; सभी ने अब तक एक बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया है। पर उस उत्कृष्ट खेल का क्या फायदा, जब उनकी टीमें एक भी गोल करने में विफल रही हों। अतएव स्पष्ट रुप से कहा जा सकता है कि किसी मैच में विजयी घोषित होने के लिए गोल नितांत जरुरी है। मैच देखकर लगता है; कहीं हमारी टीम ही गोल खाकर मुँह लटकाए तो नहीं बैठी है? कुछ भी हो। इतना निश्चित है कि हमारी टीम ने कभी गोल नहीं दागा है। हो सकता है प्रतिद्वंदी टीम ने हमारे ऊपर ही दनादन गोल किए हों? इसके बारे आप ही ज्यादा जानकार हैं। इतने दिनों से इतना बढ़िया मैच खेलने के बावजूद भी गोल न कर सकना ही साबित करता है कि राजनीति भी एकमात्र समाधान नहीं है।

मंगरु सोच-सोचकर अत्यंत दुःखी हुआ जा रहा है। फिर क्या हो समस्या का सही समाधान? वह गहरी चिंता में डूब गया है। मंगरु नास्तिक तो नहीं पर असली आस्तिक भी नहीं बन पाया है। वह भगवान को ढूँढ़े जा रहा है; पर अब तक तो उसके साथ मुलाकात संभव नहीं हो पाई है। कब होगी उसकी भेंट, उसे कुछ नहीं मालूम। सोचता है; जो कुछ भी उसके साथ हो रहा है, कभी वह इसके लिए उसे ही जिम्मेवार ठहरा रहा है। वह अपने दिमाग पर जोर देते हुए भगवान पर ही लांछन लगा देता है। वह पूछना चाहता है; हे भगवान, तूने क्या हमारी सृष्टि यही दिन देखने के लिए ही की है? क्या हमारे भाग्य में सारी उम्र गुलामी की जिंदगी जीने के लिए ही लिख दी गई है? क्या हमारे नसीब में दर-दर की ठोकरें खाना ही दर्ज है? हे परमपिता परमेश्वर! तू तो दयासागर है। तू तो दयानिधि है। कहाँ गई आपकी वह दयालुता? कहाँ गई आपकी वह स्नेह और दयामयी ममता? तुम तो चालाकों के चालाक ठहरे! आकाश, पाताल और धरती का सृजन करने के बाद ऐसा छूमंतर हो गया कि आपको ढूँढ़ने के लिए हमें चर्च, मंदिर, गुरुद्वारा, मस्जिद आदि के निर्माण करने पड़े। फिर भी न तो आप दिखते हो और न ही सुनते हो। कोई भी दुखियारा कितना भी रोए-पीटे, गिड़गिड़ाए; न तो तू उसे सुनता है, न तो दर्शन देता है और न ही उसे सांत्वना भरी कुछ बातें ही करता है। कैसा भगवान है तू? किस मिट्टी का बना है तू? इतना कुछ भगवान पर इल्जाम लगाने के बाद, मंगरु ठंडे दिमाग से सोचने के लिए मजबूर हो गया। अत्यधिक पीड़ा के कारण उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। वह ओछेपन पर उतार आया। गुस्से से आदमी पागल भी हो सकता है। खैर, इस दौरान सोची गई बातों पर उसे पछतावा हो रहा है। उसे अब समझ में आ गया है कि कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली। कहाँ भगवान और कहाँ मंगरु? उसे अपने किए पर पछतावा हो रहा है। उसे यकीन हो चला था कि इस संसार को चलाने वाला कोई न कोई तो होगा ही। ईश्वर, अल्लाह कुछ भी कह लो; कोई तो इस जग का मालिक होगा ही। संसार को चलाने के पीछे कोई न कोई ताकत, कोई शक्ति तो अवश्य होगी ही। एक तुच्छ प्राणी की यह कैसी हिम्मत की वह ब्रह्मांड के सृष्टिकर्ता पर ही उँगली उठाए; जिसने पूरे मानव समुदाय के साथ-साथ जग के सारे सजीव और निर्जीव पदार्थों की रचना की है। जिसने आकाश में चाँद, तारे और सूर्य को टाँग दिया है; इनका कोई न कोई सृष्टिकर्ता तो होगा ही। उसके अंतःमन में ज्ञान की एक छोटी सी ज्योति जल उठी थी। उसके मन में एक छोटा सा दिव्यप्रकाश जल उठा था। वह समझ गया था कि भगवान इतना बेवकूफ नहीं। भगवान ने सृष्टि के द्वारा अपने सारे रहस्य को बताने की पूरी चेष्टा की है। बस, उसे समझने की देर है। जो उसकी लीला को समझ सकता है, वही ज्ञानी है। धीरे-धीरे वह भगवान की अपरंपार महिमा को समझने की कोशिश कर रहा है। अंत में वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि कहीं हमारा समाज शरीर की तरह तो नहीं है? हमारे समाजशास्त्री ही किसी धोखे में अवश्य होंगे। महान दार्शनिक अरस्तु कुछ भी कहता रहे कि व्यक्ति के समूह को ही समाज कहा जाता है। फूल व्यक्ति है, तो माला समाज। और जो व्यक्ति समाज के अंदर नहीं रहता; वह या तो देवता है और नहीं तो भूत। ऐसी परिभाषा मंगरु तो क्या बड़े-बड़े समाजशास्त्रियों की समझ से परे की बात है। समाज क्या है; कुछ समझ में नहीं आ रहा। अतएव काफी गहन चिंतन के पश्चात् मंगरु अपने समाज की तुलना किसी शरीर के साथ कर रहा है। मानव देह से उसकी तुलना कर रहा है। समाज एक शरीर की तरह है। जिस तरह शरीर का हरेक अंग महत्वपूर्ण है; उसी तरह समाज का हरेक प्राणी महत्वपूर्ण है। शरीर के किसी भी अंग की अहमियत तुच्छ नहीं गिनी जा सकती। शरीर की एड़ी से लेकर चोटी तक के संपूर्ण हिस्से महत्वपूर्ण हैं। नाखून से लेकर बाल तक सभी जरुरी अंग हैं। अगर कोई भी अंग बीमार हो जाए, तो पूरा शरीर ही चरमरा जाता है। शरीर के किसी भी अंग पर छोटी सी चुभन लग जाए, तो पूरा शरीर ही सिहर उठता है। हो सकता है हाथ, पैर, आँख, कान, नाक, दाँत, दिमाग आदि शरीर के महत्वपूर्ण हिस्से हों; पर अगर सिर में एक भी बाल न हों तो मनुष्य की सुंदरता में बट्टा ही लग जाता है। कहने का तात्पर्य यही कि शरीर के किसी भी अंग को कम नहीं आँका जा सकता है। सारे अंग ही महत्वपूर्ण हैं और वे अपने-अपने तरीके से ही अपने सारे काम को अंजाम देते रहते हैं। अतः मंगरु से लेकर दिसोम गुरु तक सभी समाज के अभिन्न अंग हैं। अपनी-अपनी जगह वे सारे महत्वपूर्ण हैं। हो सकता है; समाज में कोई किसान, मजदूर, रेजाकूली, विद्यार्थी, नौकर, व्यापारी, बुद्धिजीवी, लेखक, समाज सेवक, याजक, राजनीतिज्ञ आदि हों; वे सारे ही एक दूसरे के पूरक हैं। जिस तरह पूरा शरीर स्वस्थ हो पर आँख ही न हो, तो वह व्यक्ति अंधा कहलाता है। उस अंधे को चलने-फिरने में किस तरह की तकलीफ होती होगी, उसे आप अच्छी तरह समझते हो। उसी तरह कोई समाज ठीक-ठाक हो, पर उस समाज में कोई लेखक ही न हो, तो वह समाज भी अंधा ही कहलाता है। शरीर के हाथ-पैर समाज के किसान-मजदूर तुल्य हैं। और अगर दिमाग की तुलना राजनीतिज्ञ से की जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। अतः स्पष्ट हो गया कि हमारे समाज की बनावट भी किसी शरीर की तरह ही है। शरीर के किसी भी अंग में दर्द हो, तो पूरा शरीर ही बीमार हो जाता है। उसी तरह समाज में किसी भी वर्ग को चोट लग जाए, तो पूरा समाज ही बीमार हो जाता है। अतः शरीर के सारे अंग सही, तो शरीर स्वस्थ। उसी तरह समाज के सारे वर्ग ठीक, तो पूरा समाज ही स्वस्थ समाज कहलाता है।

मंगरु को समाज का इस तरह विश्लेषण करते हुए काफी देर हो चली थी। गहन विश्लेषण के उपरांत जो निष्कर्ष निकला; काफी मंथन करने के बाद जो निचोड़ निकला, वह यही कि समाज की समस्याएँ कुछ और हैं और समाधान के रुप में कुछ और दवाएँ सुझाई जा रही हैं। अब तक समाज के रोग और औषधि में कोई मिलान नहीं हो पाया है। यही कारण है कि हमारा समाज स्वस्थ होने का नाम ही नहीं ले रहा। हमारे समाज सेवक भी उस ग्वाले की तरह अपने दही को खट्टा मानने से ही इनकार करते रहे हैं। उनकी दलील यही कि शरीर के हाथ-पैर ठीक तो पूरा शरीर ही ठीक। दिमाग सही तो पूरा शरीर ही सही। लेकिन ऐसा नहीं है। अगर शरीर के किसी भी अंग पर दर्द हो, तो पूरा शरीर ही बीमार हो जाता है; इस कड़ुवे सच को कोई नकार नहीं सकता है।

अतः हमारे समाज के शुभचिंतकों की हालत भी उन अंधों जैसी तो नहीं, जिन्होंने हाथी के किसी एक भाग को छू लेने भर से ही हाथी के वास्तविक हुलिया के बारे ऊटपटांग घोषणा कर दी। जिस अंधे ने हाथी की पूँछ पकड़ ली, उसने कह दिया कि हाथी रस्सी जैसा है। जिसने पैर छू लिया, उसका दावा था कि हाथी किसी खंभे जैसा है। जिसने हाथी के कान पकड़ लिया, उसका कहना था कि हाथी का आकार सूप जैसा है। जिसने हाथी का पेट छू लिया, उसने सभी की दलील को धता बताते हुए ढिंढोरा पीट दिया कि हाथी किसी दीवार जैसा है। इस तरह जिस अंधे को हाथी के जो भी अंग छूने का मौका मिला, वह उसी अनुरुप हाथी के बारे अपनी गलत दलील देते गया। पर किसी भी अंधे ने हाथी के पूरे आकार को न तो ठीक से छू सका था और न ही वे हाथी के सही आकार को ही समझ पाने में सफल हुए थे। अतः कहीं हमारे समाज के शुभचिंतकों की स्थिति भी ऐसी तो नहीं, जो स्थिति उन बेचारे अंधों की बन गई है। मंगरु की यह अंतिम सोच ने उसे आसमान से लाकर पथरीली जमीन पर पटक दिया है। उसके चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगी थीं। और यह प्रश्न उसके मस्तिष्क पर हथौड़े की तरह बारंबार चोट किए जा रहा था कि उन बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी है?

Thursday, 29 January 2015


बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी?

आज मंगरु बहुत उदास है। उसके मुखमंडल पर ग्रहण लगा हुआ है। चेहरे पर उदासी छाई हुई है। उसके मन में बेचैनी कुंडली मारकर बैठी हुई है। किसी भी काम में उसका जी नहीं लग रहा। कभी खेत की ओर जा रहा है, कभी नदी किनारे, तो कभी अपने गाँव की पश्चिम दिशा में स्थित टीले की ओर चल पड़ता है। सब तरफ चक्कर मारने के बावजूद भी, आज मंगरु का मन है कि वह एकाग्र होने का नाम ही नहीं ले रहा। घर वापस लौट आने पर वह कभी मेज पर रखे बासी अखबार को पढ़ने की कोशिश करता है, तो कभी दूरदर्शन पर विभिन्न चैनलों को छेड़ रहा है। फिर भी मंगरु का मन स्थिर नहीं हो पा रहा है। आज उसका जी ना खाने में, ना बैठने में और ना ही सोने में लग रहा है। वह अपने कमरे में एकांत बैठे किसी गहरी सोच में डूब गया है। वह गहराई के साथ मनन-चिंतन करने में व्यस्त हो गया है। चूँकि वह अपने समाज में वैचारिक क्रांति लाने का पक्षधर है; अतएव वह मारांङ गोमके से लेकर दिसोम गुरु तक की विभिन्न घटनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण कर रहा है। उसके मन में बारंबार यही सवाल कौंध रहा है; क्या कारण है कि अपना अलग प्रदेश मिलने के बावजूद भी हम आदिवासियों की हालत सुधरने के बजाय और भी बिगड़ती जा रही है? क्या वजह है कि आज हम आसमान से गिरे और खजूर पर अटक कर रह गए हैं? किन कारणों से हमारे सुनहरे सपने शीशे की तरह चकनाचूर हो गए हैं? विभिन्न संगठनों द्वारा अविराम जद्दोजहद करने के बाद भी, हमारा समाज अवनति की गर्त में चला जा रहा है। क्या कारण है कि लाख कोशिश करने के बावजूद भी, हमें सफलता हाथ नहीं लग रही है? समाज पिछड़ने का दोष किसके माथे मढ़ दिया जाए? इस तरह मंगरु के मन में ना जाने कितने प्रश्न उमड़-घुमड़ रहे हैं? चलचित्र की भाँति उनकी आँखों के सामने सारे दृश्य चमक रहे हैं। जब से मंगरु ने होश संभाला है; जब से मंगरु को अपने समाज के बारे थोड़ी-बहुत समझ आई है, वह विभिन्न सभा-सम्मेलनों में अवश्य हाजिर हुआ है। जब भी उसे मौका मिला है; वह सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक बैठकों में जरुर शामिल हुआ है। वह अधिकतम अपने सामाजिक, धार्मिक एवं राजनैतिक अगुओं के बारे अच्छी जानकारी भी रखता है। वह अपने समुदाय के बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा लिखी गई अधिकांश रचनाओं से वाकिफ है। वह अपने आदिवासी लेखकों द्वारा रचित उनकी मुख्य कहानियाँ एवं कविताओं के बारे अच्छा ज्ञान रखता है। अपने समुदाय के बीच प्रकाशित होने वाली ऐसी कोई पत्र-पत्रिका न बची है, जिसका वह ग्राहक न हो। किस धार्मिक पंडित ने कहाँ और क्या संदेश दिया, उसके बारे भी वह थोड़ी-बहुत समझदारी रखता है। इसके बाद तमाम तरह के राजनैतिक नेताओं की हरकतों को तो वह भली भाँति समझता ही है। वह उन नेताओं की हर नब्ज को अच्छी तरह पहचानता भी है। मंगरु को अच्छी तरह ज्ञात है कि समाज के एक निम्न प्राणी से लेकर दिसोम गुरु तक, सभी अपने-अपने हिसाब से समाज उत्थान के कार्य में लगे हुए हैं। फिर भी हमारा समाज आगे बढ़ने के बजाय पीछे की ओर ही सरकते जा रहा है। क्यों? इसका मुख्य कारण क्या है? समाज अवनति की जड़ कहाँ छिपी हुई है? आज इन्हीं सवालों को लेकर मंगरु बीच भँवर में फँस गया है। वह उस भँवर से उबरने की भरपूर चेष्टा कर रहा है; पर दूर-दूर तक आशा की कोई किरण उसे नहीं दिखाई दे रही। जितना वह उस भँवर से निकलने की कोशिश कर रहा है; वह उतना ही अधिक प्रवाह से उसकी गहराई में धँसते चला जा रहा है।

मंगरु अपने समाज का एक अनुभवी प्राणी है। वह एक श्रेष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं अपितु एक महान विचारक व चिंतक भी है। उसने ना जाने कितने घाटों का पानी पी रखा होगा। उसने जितना दूध पीया होगा, उतना तो शायद आपने पानी भी नहीं पीया होगा। अपने समाज के अंदर घट रही हर अच्छी-बुरी घटनाओं पर उसकी पैनी नजर रहती है। उन घटनाओं की बारीकी से छानबीन करना उसकी मजबूरी बन गई है। मंगरु ने अब तक जो जाना, देखा, सुना और सीखा; वह यही कि ग्वाला कभी अपने दही को खट्टा नहीं कहता है। ग्वाला अपने दही की बड़ाई करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता है। चाहे उस दही से सड़ांध की बू आ रही हो; फिर भी ग्वाला अंतिम क्षण तक अपने दही की प्रशंसा करते हुए नहीं थकता है। ग्वाला मर-मिट सकता है पर अपने दही का अपमान वह कभी सहन नहीं कर सकता। भला क्यों माने ग्वाला आपकी बात? ग्वाले के लिए दही ही है, उसका जीविका का एकमात्र साधन। इसी से ही होता है, उसके परिवार का भरण-पोषण। अतः ग्वाला यथार्थ से वाकिफ होते हुए भी, वह अपनी जिद पर अड़ा रहता है। इस तथ्य से आपको सहमत होने के सिवाय और कोई चारा ही नहीं रहता है। अतः आज मंगरु चीर-फाड़ कर अपने समाज की शल्य-चिकित्सा करने में जुट गया है। विगत दिनों की अपनी सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, ऐतिहासिक एवं राजनीतिक अवस्था का विश्लेषण करने में लीन हो गया है। वह सिदो-बिरसा के पश्चात् घटी घटनाओं का सविस्तार अध्ययन करने में तल्लीन हो गया है। ताकि मंगरु को अपने समाज पिछड़ने का सही कारण समझ में आ जाए; वह एक नहीं, पर अलग-अलग कोणों से अपने समाज का विश्लेषण कर रहा है। वह विभिन्न पहलूओं की ओर अपनी नजर दौड़ाता है। वह शोध करने के उपरांत अपने समाज अवनति का सही और सटीक कारणों का पता लगाना चाहता है। जाँच पड़ताल करने के बाद वह समाज में फैली बीमारी की असली जड़ को पकड़ना चाहता है; ताकि सुचारु रुप से उसका निदान किया जा सके। जिससे हमारा समाज खुशहाल और आनंदमय हो सके।

इतना महान चिंतक होते हुए भी आज मंगरु की सोच पटरी से नीचे उतर गई है। वह अपनी सोच को सिलसिलेवार तरीके से संपादन करने में असमर्थ हो रहा है। किन समस्याओं के बारे वह प्रमुखता से विचार करे, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा। किन विषयों का वह गहनपूर्वक अध्ययन करे; वह घनी असमंजस की स्थिति में है। लेकिन उसने तय कर लिया है कि कुछ भी हो जाए; आज वह अपने समाज को एक नई सोच और एक नई राह दिखाने में कामयाब होकर ही रहेगा। वह अच्छी तरह जानता है कि कोई भी सभा-सम्मेलन हो, किसी भी तरह की कोई भी सामाजिक बैठकें हों, समाज पिछड़ने के जिन कारणों के ऊपर विशेष रुप से चर्चाएँ होती रहती हैं; उनमें प्रमुख है - अशिक्षा, गरीबी, मद्यपान, अंधविश्वास, कृषि, सहभागिता, विस्थापन, पलायन, बेरोजगारी, हासा-भाषा, संस्कृति, आरक्षण, डोमिसाईल, पेसा, परिसीमन, एमओयू आदि। इन विषयों के अलावे और भी कई ऐसे विषय हैं, जिन पर बारंबार चर्चाएँ होती रहती हैं। रोज चर्चाएँ होनी चाहिए, इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन अफसोस है कि इतनी चर्चाएँ होने के बावजूद भी आज हमारा समाज जस का तस खड़ा है। अर्थात् ढाक के वही तीन पात। जिस रफ्तार से हमारा समाज उन्नति की ऊँचाई को लाँघने की कोशिश करता है, वह उसी वेग से नीचे की ओर खिसकते भी जा रहा है। अगर हमारा समाज दो कदम प्रगति के पथ पर आगे बढ़ता है, तो चार कदम पीछे की ओर सरकता भी है। हमारे शिक्षाविदों का मानना है कि जब तक हमारा समाज शिक्षा की ओर विशेष ध्यान नहीं देता, तब तक हमारे समाज का उत्थान होना संभव ही नहीं, असंभव है। अशिक्षा ही एकमात्र कारण है कि हम पिछड़ते ही जा रहे हैं। तर्क देते हुए उनका मत है कि शिक्षा के अभाव में हम दुनिया की आधुनिक प्रतियोगिता की दौड़ से बाहर हो जाते हैं। उनके मतानुसार हमारे समाज का अवनति की गर्त में जाने का एकमात्र कारण है; अशिक्षा। अगर हम शिक्षित हो जाएँ तो सौ बात की एक बात, हमारी उन्नति में किसी प्रकार की कोई बाधा न रह जाएगी। अर्थात् उन्नति हमारे कदमों को चूमने के लिए मजबूर हो जाएगी। अतः हमारे समाज में मौजूद सभी समस्याओं का एकमात्र समाधान है; शिक्षा। लेकिन हमारे शिक्षाविद् शिक्षा के सही मूल्यों का आकलन करने से चूक जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि किताबी कीड़ा बन जाने से ही कोई महान पंडित नहीं बन जाता। महान बनने के लिए शिक्षा के साथ-साथ ज्ञान, विवेक और विद्या की भी उतनी ही जरुरत होती है, जितना कि सब्जी में नमक। साक्षात उदाहरण के तौर पर अपने समाज को ही देख लो। आजकल हर गली में पढ़े-लिखे युवक-युवतियाँ मिल जाएंगे। लेकिन वे किन समस्याओं से जूझ रहे हैं; ज्यादा जानने के लिए आप उन्हीं से पूछिए। वे बेचारे रोेजगार के अभाव में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। पढ़-लिखकर न तो वे हल जोतने के काबिल रहते हैं और न ही वे कुली-मजदूरी करने के लायक रह जाते हैं। देश में जनसंख्या इतनी बढ़ गई है कि नौकरी मिलना दुर्लभ हो गया है। कहीं भी नौकरी की कतार में खड़े हो जाओ; एक अनार सौ बीमार वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। अतएव खाली दिमाग शैतान का घर होता है। ऐसी हालत में कोई अनहोनी घटना घटे, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। शिक्षकगण भी हमारे बच्चों को किस तरह की शिक्षा दे रहे हैं; अभी तक तो कुछ समझ में नहीं आया। वे हमारे बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, पदाधिकारी, शिक्षक, शिक्षिका, नर्स, क्लर्क वगैरह तो बना रहे हैं; पर वे एक भी बच्चे को मालिक बनाने में विफल रहे हैं। वे एक भी बच्चे को स्वावलंबी बनाने में असमर्थ रहे हैं। यह भी सौ फीसदी सत्य है कि आजकल नौकरी की तलाश में हमारे बच्चों का मतिपलायन हो रहा है। इसीलिए तो झारखंड जैसे अपने प्रांत में आग लग जाए, सुदूर बैठे नौकरी करने वालों को उससे कोई मतलब ही नहीं। झारखंड मरे-जीए उन्हें कोई सरोकार नहीं। वे अपने समाज से इस कदर गायब हो जाते हैं; जैसे कि गधे के सिर से सींग। मजबूरी में वे अपने वतन को भूल जाते हैं। वे जहाँ भी नौकरी करते हैं; वे वहीं के होकर रह जाते हैं। सरकारी नौकरी करने वालों के लिए तो आचरण नियमावली की शर्तें ही कुछ ऐसी हैं कि वे राजनीतिक गतिविधियों में लिप्त नहीं हो सकते। अतः जहाँ कहीं भी, जब किसी समस्या के समाधान हेतु राजनीतिक दांव.पेंच खेला जाता है; वहाँ हमारे नौकरी करने वालों की उपस्थिति नगण्य हो जाती है। इस तरह किसी राजनीतिक जलसे-जुलूस में शामिल होने के लिए रह जाते हैं; कुछ गंवार और बेरोजगार किस्म के लोग। किसी ने ठीक कहा है कि अभी तक की शिक्षा नीति ने स्कूल, कॉलेज में पढ़ रहे विद्यार्थियों को सिर्फ सरकारी और गैर-सरकारी कर्मचारी ही बनाए हैं। उन विद्यार्थियों को वे मालिक बनाने में असफल ही रहे हैं।

शिक्षा जिस तरह दिखाई देती है; वास्तव में वह वैसी है नहीं। पोथी पढ़-पढ़कर अब तक तो कोई पंडित नहीं हुआ है। अलबत्ता यह खुला सत्य है कि शिक्षा कभी भी निष्क्रिय नहीं रह सकती है; या तो यह दास बनाती है अथवा मुक्ति प्रदान करती है। यही कारण है कि अब तक हमारे समाज में शिक्षा ने अपना जलवा दिखाते हुए अधिकांश लोगों को दास बनाकर बीच बाज़ार में मरने के लिए छोड़ दिया है। अगर यह तथ्य सत्य से परे होता, अगर शिक्षा का रुप सिर्फ मुक्ति दिलाना ही होता, अगर शिक्षा ही सभी समस्याओं का समाधान होता, तो आज हम सभी तरह के बँधनों से मुक्त हो गए होते। किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं होती। किसी भी प्रकार की समस्या हमारे सामने नहीं आती। और हम मुक्ति का जश्न मनाते हुए हर्षोल्लास के साथ आनंदमय जीवन बिताते। मुक्ति का अर्थ न तो गरीबी रहेगी, न अत्याचार होगा और न ही कोई किसी तरह की गुलामी की जंजीरों से बँधा रहेगा। अतः स्पष्ट हो गया कि सही शिक्षा के अभाव में झारखंड गठन के आठ वर्ष बाद भी हमारी स्थिति बद से बदतर होती गई है। इस रहस्य को ऐसे भी समझा जा सकता है; शिक्षा ने दुनिया में बहुत सारे वैज्ञानिकों को पैदा किया और उस शिक्षा की बदौलत उन्होंने बहुत सारे विध्वंसकारी यंत्रों यथा एटम बम, हाईड्रोजन बम, धरती से आकाश तक मार करने वाली मिसाइलें आदि आविष्कार करने में सफलता भी प्राप्त कर ली। उन खतरनाक बमों की वर्तमान परिवेश में क्या उपयोगिता है? क्या उन बमों को चिड़िया मारने के लिए बनाया गया है? कदापि नहीं। अपितु उन बमों से निश्चित रुप से हम मनुष्यों का ही संहार होगा। अब आप बताइए, क्यों अरबों रुपए उन बमों को बनाने में खर्च हो रहे हैं? क्या उन रुपयों को किसी दबे-कुचलों के कल्याणार्थ व्यय नहीं हो सकता था? हो सकता है। पर जो शिक्षा हमें मिली, उस शिक्षा से हमारी आँखें चौंधिया गई हैं। और हम मनुष्य संहार के रास्ते पर चल पड़े हैं। वाह री शिक्षा!

शिक्षा और विवेक एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। पढ़-लिख लेने से ही कोई भी व्यक्ति बुद्धिमान नहीं कहलाता है। बुद्धिमान होने के लिए उसे विवेक की भी सख्त जरुरत होती है। आज की तारीख में हमारे बीच हजारों पढे़-लिखे लोग मौजूद हैं, फिर भी वे झारखंड बचाने में असफल ही रहे हैं। लेकिन हमारे महानतम शहीद सिदो-बिरसा की ओर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि वे कम पढ़े-लिखे थे। कितनी जमात तक की शिक्षा उन्हें हासिल हुई थी, इस बारे किसी को भी ठीक से ज्ञात नहीं। पर इतना सच है कि सिदो-बिरसा ने किसी विश्वविद्यालय का मुँह तक न देखा था। उनके पास किसी तरह की कोई डिग्री भी नहीं थी। लेकिन उन्होंने अपने विवेक का सही इस्तेमाल किया एवं अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने का बिगुल फूँक दिया। और उस संघर्ष के परिणामस्वरुप सिदो-बिरसा को क्रमशः संताल परगना और छोटानागपुर के जल, जंगल और जमीन बचाने में बहुत बड़ी सफलता मिली। सिदो-बिरसा के बलिदानस्वरुप ही हम अभी तक जीवित हैं; अन्यथा कब का हमारा राम नाम सत्य है हो गया होता। अतः सिद्ध हो गया कि न्याय पाने के लिए किसी तरह की कोई भी डिग्री की जरुरत नहीं होती। जरुरत है तो सही विवेक की।

हुल और उलगुलान घटित हुए कई वर्ष बीत चुके हैं। इस समय उनकी प्रासंगिकता से हम अनभिज्ञ हैं। लेकिन मारांग गोमके के बाद एक ऐसे मसीहा का उदय हुआ कि उसने समाज में हुल-सा वातावरण पैदा करने में सफलता प्राप्त कर ली। यह जीवंत उदाहरण है कि चालीस वर्षों से लोग उनकी जय जयकार करते आ रहे हैं। विधायक की तो बात ही छोड़ दीजिए, वह अपने बलबूते किसी समय छह सांसदों को दिल्ली दरबार तक भेजने में भी कामयाब हुए हैं। अकेले झारखंड में इस वक्त उनके पास चार सांसद और सत्रह विधायक हैं। और आप उनके मुखिया बने हुए हैं। यह मसीहा और कोई नहीं, उसे आप गुरु जी के नाम से खूब जानते हैं। गुरु जी पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना बुरी बात है। उनकी शान के खिलाफ बोलना, किसी को शोभा नहीं देता है। यह अलग बात है कि इतना बड़ा समर्थन मिलते रहने के बावजूद भी उन्होंने अपने लोगों के लिए कुछ नहीं किया है। लेकिन उनको व्यक्तिगत रुप से गाली देना, कतई उचित नहीं। हो सकता है, आपके पास विश्वविद्यालय की ढेर सारी डिग्रियों की भरमार होगी। आप अच्छे पढ़े-लिखे और उच्च शिक्षित नेता होंगे। लेकिन आप अभी तक एक भी विधायक को जीत दिलाने में असफल ही रहे होंगे। फिर आप महान हैं या गुरु जी? निश्चित रुप से गुरु जी महान हैं। यह कड़ुवा सच है कि गुरु जी के पास किसी विश्वविद्यालय की कोई डिग्री नहीं, पर उनके पास निश्चित रुप से अच्छे विवेक की बहुतायत है। जिसकी वजह से वह आज की तारीख में आदिवासियों के सर्वमान्य नेता के पद पर आसीन हैं। अब आप बताओ, फिर क्या शिक्षा ही हमारी समस्याओं का एकमात्र समाधान है? शिक्षाविदों के अनुसार हो सकता है, समाज उन्नति का शिक्षा ही एकमात्र उपाय हो। अतः शिक्षाविद् ग्वाले की भाँति अपने दही को खट्टा मानने से ही इनकार करे, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

Wednesday, 17 August 1994

ग्वाला कभी अपने दही को खट्टा नहीं कहता है

एक जमाना था। जिनके पास घड़ी, रेडियो और साईकिल हुआ करता था; उन्हें आज के लाखपति से कम नहीं आंका जाता था। यह घटना करीब 50 वर्ष पुरानी है। आँखों देखी और भुगती हुई घटना है। लेकिन तब उतनी समझ न थी। पर आज वह दृष्टांत साफ-साफ समझ में आ गया। आखिर ऐसा क्यों हो रहा था?

संतोष रेडियो - सस्ता और टिकाऊ । यह भी तब बहुत कम लोगों के पास हुआ करता था। गाँव हो या शहर, खासकर संतालों को शाम 6.00 बजे का बड़े ही बेसब्री के साथ इंतजार रहता था। सबों के लिए यह शाम 6.00 बजे का समय बड़ा ही माफिक था। गाँव के किसान हों या शहर के बाबू, सभी अपने काम से घर को लौट आते। सभी के पास फुर्सत ही फुर्सत था। शाम 6 बजते ही बिन बुलाए गाँव के छोटे-बड़े सभी मास्टर जी के “पिण्डा़” (घर का बाहरी हिस्से में बैठने की जगह) में एकट्ठे होते थे, क्योंकि उनके पास संतोष रेडिया था। मास्टर जी भी रेडियो को टनाटन रखता थे। बैटरी खत्म होते ही उसमें नई बैटरी डाल दिया करते थे। अरे, 6 बज गया! रेडियो फुल साउंड। “... आकाशबा़नी कोलकाता। खा़ेबो़र ... खो़बो़र पाड़हावेत्आ़ञ हो़रो़ प्रसाद मुर्मू ... तेहेञ मालदो़ रेयाक् ... डा़हीरे सिरा़मंत्री  ...तेकिनकिन ला़ईकेत्आ जे तिरला़ हो़पो़नको ... उनकिन दो़ आ़किनाक् गालोचरे ... । खो़बो़र पाड़हाव दो़ नो़ण्डेगे मुचा़त्एना ...।”

“खो़बो़र मुचा़त्एना” सुनते ही बच्चे तो बच्चे बड़े बुड्ढों की मानो सांस में सांस आ गई हो। खबर की गाथा तो उनके पल्ले कुछ न पड़ी। पर जिस घड़ी की इंजतार में सारा गाँव इकट्ठा था, वह आखिर आ ही गई। “... नितोक् दो़ मित्टेन सेरेञबोन आञजो़मा। सेरेञत्आको राम किस्कू आर साँवतेनको ... ।”

पिन ड्रोप साइलेंस! सुनने वालों की दो तो क्या चार-चार कानें खुली हुई हैं। सभी सांस थामकर महान गायक राम किस्कू के गाने का आनंद ले रहे हैं। मानो, वे जन्नत का सैर कर रहे हों। राम किस्कू का गाना खत्म। अब रेडियो पर जैसे ही ... “हें हों... हें ... हों ...” शुरु, धीरे-धीरे भीड़ छंटनी शुरु। एक पल भी नहीं गुजरा कि अब मास्टरजी अकेले अपने संतोष रेडियो को निहार रहा है। मानो, किसी की मैयत में बैठे हों!

मास्टरजी क्या करते? 6 बजने से पहले तो बच्चे वगैरह बड़े बुजुर्गों के लिए घर से दो-चार कुर्सी बाहर उठा लाते थे। अब वहाँ कोई भी नहीं। मास्टरजी अब खुद ही उन कुर्सियों को घर के अंदर ले जाते।

यह घटना आज से करीब 50 वर्ष पुरानी है। यह घटना क्यों हो रही थी? घटना क्या बताना चाह रही थी? आज जिनकी उम्र 55 वर्ष पार कर रही होगी, उन्होंने इस घटना को न सुना हो, ऐसा कदापि नहीं हो सकता है। बल्कि उन्होंने इस घटना को भुगता जरुर होगा। उनसे तो अपेक्षा है ही; बाकी आप जो भी इस सवाल को पढ़ रहे हों, कृपया इस सवाल का जवाब शेयर करने की चेष्टा करें। वरना, समझा यही जाएगा कि भैंस के आगे बीन बजावे, भैंस रही पगुराई।

सवाल टेढ़ा जरुर है, पर इसी में ही वर्तमान परिस्थिति का जवाब छिपा हुआ है। 

Sunday, 14 August 1994

ग्वाला कभी अपने दही को खट्टा नहीं कहता है

सच पूछो, तो उस कहानी का माजरा आज इस बुढ़ापे में समझ में आया। हो सकता है; समझने में कोई गलती हुई हौ। क्योंकि दृष्टि, सोच, समझ, नजर सबकी अलग-अलग होती है। किसी विद्वान ने सही कहा है कि सत्यवादी हमेशा सच ही बोलता है, पर सुनने वाले इसे गलत समझें, तो इसमें सत्यवादी का क्या कसूर? हर मानव प्राणी सोचता कुछ है, और होता कुछ है। उस दृष्टांत की व्याख्या अलग-अलग हो सकती है। उस समय संताली रेडिया सुनने का क्या ही क्रेज था! अब चूँकि पूरी दुनिया आपके हाथ में सिमटी हुई है; इसलिए आप उस क्रेज की बात को समझ नहीं सकते हो। जिस तरह हम हूल की घटनाओं को समझ पाने में असमर्थ हो रहे हैं; उसी तरह आज के बच्चे उस कथित घटना के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं। लेकिन यह आँखों देखी घटना है, कोई कपोल कल्पना वाली बात नहीं है। आहा! क्या क्रेज था! मानना पड़ेगा! उस दृष्टांत के बारे में जरा सोचो; मास्टरजी, उसका संतोष रेडियो (“हार की जीत” वाला बाबा भारती का घोड़ा सुल्तान से कम न था), गाँव के श्रोतागणों का हुजुम; राम किस्कू का गायन, फिर हें...हों...शुरु होते ही श्रोताओं का पतली गली से खिसक जाना, आज भी प्रासंगिक है। हाँ, इसमें काल, दृश्य, पात्र, पटकथा समय के हिसाब से अवश्य बदले गए हैं। कहानी वही है। सिर्फ हमारी समझ का फेर है।

उपरोक्त दृष्टांत को एक सेेकेंड में समझा जा सकता है। उत्तरी संतालीभाषियों (खासकर संताल परगना निवासियों) से एक निवेदन है; हाथ में एक एण्ड्रोयड फोन लिया जाए। युट्यूब में किसी भी एक बुगड़ी गाने को सुना जाए। अगर शुद्ध संताल परगनावासी होगा, तो वही मास्टरजी की संतोष रेडियो वाली कहानी हो जाएगी। “हें...हो़ं ...” शुरु और युट्यूब निश्चित रूप से बंद हो जाएगा एवं श्रोता पतली गली से खिसक लेगा। इसी कहानी को समझाने हेतु आप एक काम करना। भावी साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता “सिपाहीजी” को बुगड़ी भाषा में लिखित कोई एक अच्छी-सी पुस्तक थमा दो। फिर उससे पढ़ने के लिए निवेदन करना। एक सेकेंड के लिए तो उसकी सांस फुल जाएगी। वह निश्चित रूप से धाराप्रवाह पढ़ने में असमर्थ होगा। सिपाहीजी जरुर सोचेगा - “कहाँ किस दलदल में फंस गया रे बाबा?” लेकिन समस्या वहीं अटक जाती है। हिदुत्व का अफीम खाए व्यक्ति - सरना-इसाई तो उसको करना ही है। संताल परगना के इसाई-सरना एक ही भाषा - संताली बोलते हैं। कितने उत्तर के लोग ट्राइब टी.बी, कलिंगा-फलिंगा बुगड़ी टी.बी चैनल देखते-सुनते हैं, मालूम नहीं। अपना तो उसका कोई क्रेज नहीं है। बाकी चीज छोड़ दो। कल ही दुमका गाँधी मैदान में उड़ीसा और संताल परगना के बीच एक लागड़ें नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन करना। लिख लो, उड़ीसा की टीम शून्य में आउट हो जाएगी। हो सकता है, शायद जीरो देने की नौबत ही न आए, कारण संताल परगना के दर्शक वही हें...हों के चक्कर में नदारद ही रहे।

बुगड़ियों का रहन-सहन, बोली-चाली, भाषा-संस्कृति, धर्म-कर्म सबकुछ बदल चुका है। उनलोगों ने आर्यों के चक्कर में एक नई भाषा-संस्कृति को अपना लिया है, जिसका नाम है - संताड़ी। संताल परगना और उड़ीसा के संताल एक नहीं, बल्कि दो अलग-अलग समुदाय (संताल) हैं। लिपि विवाद पर दोनों कभी एक नहीं हो सकते हैं। दोनों को एक दूसरे का तर्क-वितर्क कतई मंजूर नहीं है। दोनों ग्वाला अपने दही को कभी खट्टा नहीं कहेगा। इस सच्चाई को और कोई नहीं बल्कि भारतीय भाषाई सर्वेक्षण के तात्कालीन महानिदेशक जी. ए. ग्रियर्सन ने अपनी रिपोर्ट में पहले ही लिख दिया है (Ref ; Linguistic Survey of India, Vol-IV page no. 32)। निष्कर्ष यही है कि मास्टरजी का संतोष रेडियो इस वक्त हर संताल प्रदेश में घुमाया जा रहा है। पर उत्तरी संताल उसे सुनने से ही इंकार कर रहे हैं। सच्चाई यही है। पर मास्टरजी का वह संतोष रेडियो उनलोगों के गले में जबरन टांगा जा रहा है। कुछ लोग अफीम के नशे में धुत हैं।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...