Friday, 10 August 2018

संताली साहित्य का भविष्य

यह सौ प्रतिशत सच है कि संतालों में संताल हूल-1855 तक एक भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति मौजूद नहीं था। तात्पर्य यही है कि किसी संताल को कोई आक्षरिक ज्ञान नहीं था। इतना कुछ होते हुए भी संतालों ने न सिर्फ अपनी भाषा का सृजन किया, बल्कि उसे पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से अच्छी तरह संजोकर रखा। यह तो गनीमत है उन मिशनरियों का जिन्होंने सर्वप्रथम संतालों के ऊपर न सिर्फ अनेकों प्रकार से दया दृष्टि की बल्कि उनकी भाषा की उन्नति हेतु भी कई महत्वपूर्ण कार्य किये। विदित हो कि सर्वप्रथम उड़िसा, जेलासोर में मिशनरी कार्य में जुटे जेरेमिया फिलिप्स ने ही अपनी पुस्तक An Introduction to the Santal Language (प्रकाशित 1852) में पहली बार संताली व्याकरण की पुस्तक प्रकाशित की। इसके बाद सन् 1860 में जब संताल परगना में कुछ मिशनरियों का आगमन हुआ, तब संक्षेप में यही कि उन्होंने संताली साहित्य के विकास हेतु दुमका के नजदीक बेनागाड़िया में एक मुद्राणालय की स्थापना की और संताली साहित्य के विकास के लिए अनेकों तरह के कार्य किये। यह भी विदित हो कि संताल परगना से सटे मानभूम, पोखुरिया में संताल मिशन प्रेस की स्थापना की और यहां से भी संताली साहित्य के विकास हेतु अनेकों कार्य हुए। यह भी ज्ञात हो कि बेनागाड़िया से "हो़ड़ हो़पो़नरेन पेड़ा" (बाद में "पेड़ा हो़ड़") एवं पोखुरिया से ”ढा़रवा़क्“ नामक संताली पत्रिकाओं का भी प्रकाशन होता था। इसके बाद 1946 से अभी तक ”मारसालताबोन“ नामक पत्रिका दुधानी, दुमका से अविराम प्रकाशित होती आई है।

शुरुआती दौर में मिशनरियों ने देखा कि संताली को देश में उपलब्ध किस लिपि से लिखा जाय, यह उनके लिए एक बहुत ही चुनौतिपूर्ण कार्य था। मालूम हो कि जेरेमिया फिलिप्स ने अपनी उपरोक्त पुस्तक में संताली के लिए बंगला लिपि का उपयोग किया था। लेकिन बाद में संताल परगना के मिशनरियों ने वैज्ञानिक तरीके से रोमन लिपि को संताली के लिए परिवर्धित/संशोधित किया एवं उपयोग में लाया। मिशनरियों ने न सिर्फ संताली लिखने के लिए रोमन लिपि को भाषाविज्ञान की दृष्टि से संशोधित व संतुलित किया बल्कि उन्होंने संताली साहित्य के विकास में चार चांद भी लगा दिये। इस लिपि से संताली विश्व शब्दकोश की रचना हुई एवं कई उच्च कोटि की पुस्तकों की रचना भी हुई। संताली के लिए मिशनरी युग को संताली का स्वर्ण युग कहा जाय तो यह कोई अतिश्योक्ति न होगी।

ध्यान रहे, ब्रिटिश काल के दौरान भारत में एक भाषाई सर्वेक्षण हुआ था, उस सर्वेक्षण में भाषावैज्ञानिकों ने संताली को दो वर्गों में बांट दिया - दक्षिणी संताली एवं उत्तरी संताली। उड़िसा एवं उससे सटे इलाकों में बोली जाने वाली संताली को दक्षिणी संताली का नाम दिया गया। सर्वेक्षण के दौरान भाषावैज्ञानिकों ने पाया कि उड़िसा की संताली आर्यों की भाषा के साथ मिश्रित एवं उसके साथ घुलमिल जाने के कारण अत्यधिक प्रदूषित हो गई। तात्पर्य यही है कि यहां की संताली ने अपनी गरिमा खो दी और यह एक बोली मात्र ही रह गई है। जबकि उत्तरी संताली जिसे संताल परगना, गिरिडीह, हजारीबाग एवं बिहार, असम, उत्तरी बंगाल यहां तक की पड़ोसी देश नेपाल, भूटान एवं बंग्लादेश में बोली जाती है, उसे विशुद्ध एवं निष्कलंक पाई गई। अतः भाषावैज्ञानिकों ने उत्तरी संताली अर्थात् संताल परगना की संताली को ही अपनी रिपोर्ट में मानक (standard) संताली घोषित कर डाला। (Ref. Linguistic Survey of India, Vol-IV, page No 32, Director General G. A. Grierson).

लिपि विवाद की जड़ यहीं सर्वे रिपोर्ट में ही छिपी हुई है। जब उपरोक्त सर्वे में भाषावैज्ञानिकों ने दक्षिणी संताली को भाषा मानने से ही इंकार कर दिया, तो यहां के संतालों के पास खंभा नोचने के अलावे और कोई रास्ता ही नहीं बचा। उन्हें अपनी गलती समझ ही नहीं आ रहा है। वे उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत पर उतारु हैं। वे किसी ग्वाले की तरह अपने दही को खट्टा मानने से ही इंकार कर रहे हैं। यही कारण है कि कुछ समय तक दक्षिणी संतालों ने क्, च्, त् एवं प् के मामले में भी खूब होहल्ला मचाया था, पर प्रो. स्टेन कनो एवं बोडिंग साहब ने उनकी बखिया उधेड़कर रख दी थी। तब संताल परगना में रोमन हो या देवनागरी लिपि संताली साहित्य अपनी चरम स्थिति को छू रहा था। यह सब देखकर दक्षिणी संताल अत्यधिक जलन, ईर्ष्या एवं द्वेष से जल-भून हो उठे। (लिपि विवाद के पीछे और भी कई कारण छुपे हुए हैं।) फिर मरता क्या नहीं करता? दक्षिणी संताल भाईयों को अभी तक समझ ही नहीं आ रहा है कि किसी भी साहित्य सृजन के लिए उसकी भाषा बड़ी है ना कि उसकी लिपि। पर वे चट्टान पर दूब उगाने को डटे हुए हैं।


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