बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी?
आज मंगरु बहुत उदास है। उसके मुखमंडल पर ग्रहण लगा हुआ है। चेहरे पर उदासी छाई हुई है। उसके मन में बेचैनी कुंडली मारकर बैठी हुई है। किसी भी काम में उसका जी नहीं लग रहा। कभी खेत की ओर जा रहा है, कभी नदी किनारे, तो कभी अपने गाँव की पश्चिम दिशा में स्थित टीले की ओर चल पड़ता है। सब तरफ चक्कर मारने के बावजूद भी, आज मंगरु का मन है कि वह एकाग्र होने का नाम ही नहीं ले रहा। घर वापस लौट आने पर वह कभी मेज पर रखे बासी अखबार को पढ़ने की कोशिश करता है, तो कभी दूरदर्शन पर विभिन्न चैनलों को छेड़ रहा है। फिर भी मंगरु का मन स्थिर नहीं हो पा रहा है। आज उसका जी ना खाने में, ना बैठने में और ना ही सोने में लग रहा है। वह अपने कमरे में एकांत बैठे किसी गहरी सोच में डूब गया है। वह गहराई के साथ मनन-चिंतन करने में व्यस्त हो गया है। चूँकि वह अपने समाज में वैचारिक क्रांति लाने का पक्षधर है; अतएव वह मारांङ गोमके से लेकर दिसोम गुरु तक की विभिन्न घटनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण कर रहा है। उसके मन में बारंबार यही सवाल कौंध रहा है; क्या कारण है कि अपना अलग प्रदेश मिलने के बावजूद भी हम आदिवासियों की हालत सुधरने के बजाय और भी बिगड़ती जा रही है? क्या वजह है कि आज हम आसमान से गिरे और खजूर पर अटक कर रह गए हैं? किन कारणों से हमारे सुनहरे सपने शीशे की तरह चकनाचूर हो गए हैं? विभिन्न संगठनों द्वारा अविराम जद्दोजहद करने के बाद भी, हमारा समाज अवनति की गर्त में चला जा रहा है। क्या कारण है कि लाख कोशिश करने के बावजूद भी, हमें सफलता हाथ नहीं लग रही है? समाज पिछड़ने का दोष किसके माथे मढ़ दिया जाए? इस तरह मंगरु के मन में ना जाने कितने प्रश्न उमड़-घुमड़ रहे हैं? चलचित्र की भाँति उनकी आँखों के सामने सारे दृश्य चमक रहे हैं। जब से मंगरु ने होश संभाला है; जब से मंगरु को अपने समाज के बारे थोड़ी-बहुत समझ आई है, वह विभिन्न सभा-सम्मेलनों में अवश्य हाजिर हुआ है। जब भी उसे मौका मिला है; वह सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक बैठकों में जरुर शामिल हुआ है। वह अधिकतम अपने सामाजिक, धार्मिक एवं राजनैतिक अगुओं के बारे अच्छी जानकारी भी रखता है। वह अपने समुदाय के बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा लिखी गई अधिकांश रचनाओं से वाकिफ है। वह अपने आदिवासी लेखकों द्वारा रचित उनकी मुख्य कहानियाँ एवं कविताओं के बारे अच्छा ज्ञान रखता है। अपने समुदाय के बीच प्रकाशित होने वाली ऐसी कोई पत्र-पत्रिका न बची है, जिसका वह ग्राहक न हो। किस धार्मिक पंडित ने कहाँ और क्या संदेश दिया, उसके बारे भी वह थोड़ी-बहुत समझदारी रखता है। इसके बाद तमाम तरह के राजनैतिक नेताओं की हरकतों को तो वह भली भाँति समझता ही है। वह उन नेताओं की हर नब्ज को अच्छी तरह पहचानता भी है। मंगरु को अच्छी तरह ज्ञात है कि समाज के एक निम्न प्राणी से लेकर दिसोम गुरु तक, सभी अपने-अपने हिसाब से समाज उत्थान के कार्य में लगे हुए हैं। फिर भी हमारा समाज आगे बढ़ने के बजाय पीछे की ओर ही सरकते जा रहा है। क्यों? इसका मुख्य कारण क्या है? समाज अवनति की जड़ कहाँ छिपी हुई है? आज इन्हीं सवालों को लेकर मंगरु बीच भँवर में फँस गया है। वह उस भँवर से उबरने की भरपूर चेष्टा कर रहा है; पर दूर-दूर तक आशा की कोई किरण उसे नहीं दिखाई दे रही। जितना वह उस भँवर से निकलने की कोशिश कर रहा है; वह उतना ही अधिक प्रवाह से उसकी गहराई में धँसते चला जा रहा है।
मंगरु अपने समाज का एक अनुभवी प्राणी है। वह एक श्रेष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं अपितु एक महान विचारक व चिंतक भी है। उसने ना जाने कितने घाटों का पानी पी रखा होगा। उसने जितना दूध पीया होगा, उतना तो शायद आपने पानी भी नहीं पीया होगा। अपने समाज के अंदर घट रही हर अच्छी-बुरी घटनाओं पर उसकी पैनी नजर रहती है। उन घटनाओं की बारीकी से छानबीन करना उसकी मजबूरी बन गई है। मंगरु ने अब तक जो जाना, देखा, सुना और सीखा; वह यही कि ग्वाला कभी अपने दही को खट्टा नहीं कहता है। ग्वाला अपने दही की बड़ाई करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता है। चाहे उस दही से सड़ांध की बू आ रही हो; फिर भी ग्वाला अंतिम क्षण तक अपने दही की प्रशंसा करते हुए नहीं थकता है। ग्वाला मर-मिट सकता है पर अपने दही का अपमान वह कभी सहन नहीं कर सकता। भला क्यों माने ग्वाला आपकी बात? ग्वाले के लिए दही ही है, उसका जीविका का एकमात्र साधन। इसी से ही होता है, उसके परिवार का भरण-पोषण। अतः ग्वाला यथार्थ से वाकिफ होते हुए भी, वह अपनी जिद पर अड़ा रहता है। इस तथ्य से आपको सहमत होने के सिवाय और कोई चारा ही नहीं रहता है। अतः आज मंगरु चीर-फाड़ कर अपने समाज की शल्य-चिकित्सा करने में जुट गया है। विगत दिनों की अपनी सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, ऐतिहासिक एवं राजनीतिक अवस्था का विश्लेषण करने में लीन हो गया है। वह सिदो-बिरसा के पश्चात् घटी घटनाओं का सविस्तार अध्ययन करने में तल्लीन हो गया है। ताकि मंगरु को अपने समाज पिछड़ने का सही कारण समझ में आ जाए; वह एक नहीं, पर अलग-अलग कोणों से अपने समाज का विश्लेषण कर रहा है। वह विभिन्न पहलूओं की ओर अपनी नजर दौड़ाता है। वह शोध करने के उपरांत अपने समाज अवनति का सही और सटीक कारणों का पता लगाना चाहता है। जाँच पड़ताल करने के बाद वह समाज में फैली बीमारी की असली जड़ को पकड़ना चाहता है; ताकि सुचारु रुप से उसका निदान किया जा सके। जिससे हमारा समाज खुशहाल और आनंदमय हो सके।
इतना महान चिंतक होते हुए भी आज मंगरु की सोच पटरी से नीचे उतर गई है। वह अपनी सोच को सिलसिलेवार तरीके से संपादन करने में असमर्थ हो रहा है। किन समस्याओं के बारे वह प्रमुखता से विचार करे, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा। किन विषयों का वह गहनपूर्वक अध्ययन करे; वह घनी असमंजस की स्थिति में है। लेकिन उसने तय कर लिया है कि कुछ भी हो जाए; आज वह अपने समाज को एक नई सोच और एक नई राह दिखाने में कामयाब होकर ही रहेगा। वह अच्छी तरह जानता है कि कोई भी सभा-सम्मेलन हो, किसी भी तरह की कोई भी सामाजिक बैठकें हों, समाज पिछड़ने के जिन कारणों के ऊपर विशेष रुप से चर्चाएँ होती रहती हैं; उनमें प्रमुख है - अशिक्षा, गरीबी, मद्यपान, अंधविश्वास, कृषि, सहभागिता, विस्थापन, पलायन, बेरोजगारी, हासा-भाषा, संस्कृति, आरक्षण, डोमिसाईल, पेसा, परिसीमन, एमओयू आदि। इन विषयों के अलावे और भी कई ऐसे विषय हैं, जिन पर बारंबार चर्चाएँ होती रहती हैं। रोज चर्चाएँ होनी चाहिए, इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन अफसोस है कि इतनी चर्चाएँ होने के बावजूद भी आज हमारा समाज जस का तस खड़ा है। अर्थात् ढाक के वही तीन पात। जिस रफ्तार से हमारा समाज उन्नति की ऊँचाई को लाँघने की कोशिश करता है, वह उसी वेग से नीचे की ओर खिसकते भी जा रहा है। अगर हमारा समाज दो कदम प्रगति के पथ पर आगे बढ़ता है, तो चार कदम पीछे की ओर सरकता भी है। हमारे शिक्षाविदों का मानना है कि जब तक हमारा समाज शिक्षा की ओर विशेष ध्यान नहीं देता, तब तक हमारे समाज का उत्थान होना संभव ही नहीं, असंभव है। अशिक्षा ही एकमात्र कारण है कि हम पिछड़ते ही जा रहे हैं। तर्क देते हुए उनका मत है कि शिक्षा के अभाव में हम दुनिया की आधुनिक प्रतियोगिता की दौड़ से बाहर हो जाते हैं। उनके मतानुसार हमारे समाज का अवनति की गर्त में जाने का एकमात्र कारण है; अशिक्षा। अगर हम शिक्षित हो जाएँ तो सौ बात की एक बात, हमारी उन्नति में किसी प्रकार की कोई बाधा न रह जाएगी। अर्थात् उन्नति हमारे कदमों को चूमने के लिए मजबूर हो जाएगी। अतः हमारे समाज में मौजूद सभी समस्याओं का एकमात्र समाधान है; शिक्षा। लेकिन हमारे शिक्षाविद् शिक्षा के सही मूल्यों का आकलन करने से चूक जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि किताबी कीड़ा बन जाने से ही कोई महान पंडित नहीं बन जाता। महान बनने के लिए शिक्षा के साथ-साथ ज्ञान, विवेक और विद्या की भी उतनी ही जरुरत होती है, जितना कि सब्जी में नमक। साक्षात उदाहरण के तौर पर अपने समाज को ही देख लो। आजकल हर गली में पढ़े-लिखे युवक-युवतियाँ मिल जाएंगे। लेकिन वे किन समस्याओं से जूझ रहे हैं; ज्यादा जानने के लिए आप उन्हीं से पूछिए। वे बेचारे रोेजगार के अभाव में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। पढ़-लिखकर न तो वे हल जोतने के काबिल रहते हैं और न ही वे कुली-मजदूरी करने के लायक रह जाते हैं। देश में जनसंख्या इतनी बढ़ गई है कि नौकरी मिलना दुर्लभ हो गया है। कहीं भी नौकरी की कतार में खड़े हो जाओ; एक अनार सौ बीमार वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। अतएव खाली दिमाग शैतान का घर होता है। ऐसी हालत में कोई अनहोनी घटना घटे, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। शिक्षकगण भी हमारे बच्चों को किस तरह की शिक्षा दे रहे हैं; अभी तक तो कुछ समझ में नहीं आया। वे हमारे बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, पदाधिकारी, शिक्षक, शिक्षिका, नर्स, क्लर्क वगैरह तो बना रहे हैं; पर वे एक भी बच्चे को मालिक बनाने में विफल रहे हैं। वे एक भी बच्चे को स्वावलंबी बनाने में असमर्थ रहे हैं। यह भी सौ फीसदी सत्य है कि आजकल नौकरी की तलाश में हमारे बच्चों का मतिपलायन हो रहा है। इसीलिए तो झारखंड जैसे अपने प्रांत में आग लग जाए, सुदूर बैठे नौकरी करने वालों को उससे कोई मतलब ही नहीं। झारखंड मरे-जीए उन्हें कोई सरोकार नहीं। वे अपने समाज से इस कदर गायब हो जाते हैं; जैसे कि गधे के सिर से सींग। मजबूरी में वे अपने वतन को भूल जाते हैं। वे जहाँ भी नौकरी करते हैं; वे वहीं के होकर रह जाते हैं। सरकारी नौकरी करने वालों के लिए तो आचरण नियमावली की शर्तें ही कुछ ऐसी हैं कि वे राजनीतिक गतिविधियों में लिप्त नहीं हो सकते। अतः जहाँ कहीं भी, जब किसी समस्या के समाधान हेतु राजनीतिक दांव.पेंच खेला जाता है; वहाँ हमारे नौकरी करने वालों की उपस्थिति नगण्य हो जाती है। इस तरह किसी राजनीतिक जलसे-जुलूस में शामिल होने के लिए रह जाते हैं; कुछ गंवार और बेरोजगार किस्म के लोग। किसी ने ठीक कहा है कि अभी तक की शिक्षा नीति ने स्कूल, कॉलेज में पढ़ रहे विद्यार्थियों को सिर्फ सरकारी और गैर-सरकारी कर्मचारी ही बनाए हैं। उन विद्यार्थियों को वे मालिक बनाने में असफल ही रहे हैं।
शिक्षा जिस तरह दिखाई देती है; वास्तव में वह वैसी है नहीं। पोथी पढ़-पढ़कर अब तक तो कोई पंडित नहीं हुआ है। अलबत्ता यह खुला सत्य है कि शिक्षा कभी भी निष्क्रिय नहीं रह सकती है; या तो यह दास बनाती है अथवा मुक्ति प्रदान करती है। यही कारण है कि अब तक हमारे समाज में शिक्षा ने अपना जलवा दिखाते हुए अधिकांश लोगों को दास बनाकर बीच बाज़ार में मरने के लिए छोड़ दिया है। अगर यह तथ्य सत्य से परे होता, अगर शिक्षा का रुप सिर्फ मुक्ति दिलाना ही होता, अगर शिक्षा ही सभी समस्याओं का समाधान होता, तो आज हम सभी तरह के बँधनों से मुक्त हो गए होते। किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं होती। किसी भी प्रकार की समस्या हमारे सामने नहीं आती। और हम मुक्ति का जश्न मनाते हुए हर्षोल्लास के साथ आनंदमय जीवन बिताते। मुक्ति का अर्थ न तो गरीबी रहेगी, न अत्याचार होगा और न ही कोई किसी तरह की गुलामी की जंजीरों से बँधा रहेगा। अतः स्पष्ट हो गया कि सही शिक्षा के अभाव में झारखंड गठन के आठ वर्ष बाद भी हमारी स्थिति बद से बदतर होती गई है। इस रहस्य को ऐसे भी समझा जा सकता है; शिक्षा ने दुनिया में बहुत सारे वैज्ञानिकों को पैदा किया और उस शिक्षा की बदौलत उन्होंने बहुत सारे विध्वंसकारी यंत्रों यथा एटम बम, हाईड्रोजन बम, धरती से आकाश तक मार करने वाली मिसाइलें आदि आविष्कार करने में सफलता भी प्राप्त कर ली। उन खतरनाक बमों की वर्तमान परिवेश में क्या उपयोगिता है? क्या उन बमों को चिड़िया मारने के लिए बनाया गया है? कदापि नहीं। अपितु उन बमों से निश्चित रुप से हम मनुष्यों का ही संहार होगा। अब आप बताइए, क्यों अरबों रुपए उन बमों को बनाने में खर्च हो रहे हैं? क्या उन रुपयों को किसी दबे-कुचलों के कल्याणार्थ व्यय नहीं हो सकता था? हो सकता है। पर जो शिक्षा हमें मिली, उस शिक्षा से हमारी आँखें चौंधिया गई हैं। और हम मनुष्य संहार के रास्ते पर चल पड़े हैं। वाह री शिक्षा!
शिक्षा और विवेक एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। पढ़-लिख लेने से ही कोई भी व्यक्ति बुद्धिमान नहीं कहलाता है। बुद्धिमान होने के लिए उसे विवेक की भी सख्त जरुरत होती है। आज की तारीख में हमारे बीच हजारों पढे़-लिखे लोग मौजूद हैं, फिर भी वे झारखंड बचाने में असफल ही रहे हैं। लेकिन हमारे महानतम शहीद सिदो-बिरसा की ओर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि वे कम पढ़े-लिखे थे। कितनी जमात तक की शिक्षा उन्हें हासिल हुई थी, इस बारे किसी को भी ठीक से ज्ञात नहीं। पर इतना सच है कि सिदो-बिरसा ने किसी विश्वविद्यालय का मुँह तक न देखा था। उनके पास किसी तरह की कोई डिग्री भी नहीं थी। लेकिन उन्होंने अपने विवेक का सही इस्तेमाल किया एवं अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने का बिगुल फूँक दिया। और उस संघर्ष के परिणामस्वरुप सिदो-बिरसा को क्रमशः संताल परगना और छोटानागपुर के जल, जंगल और जमीन बचाने में बहुत बड़ी सफलता मिली। सिदो-बिरसा के बलिदानस्वरुप ही हम अभी तक जीवित हैं; अन्यथा कब का हमारा राम नाम सत्य है हो गया होता। अतः सिद्ध हो गया कि न्याय पाने के लिए किसी तरह की कोई भी डिग्री की जरुरत नहीं होती। जरुरत है तो सही विवेक की।
हुल और उलगुलान घटित हुए कई वर्ष बीत चुके हैं। इस समय उनकी प्रासंगिकता से हम अनभिज्ञ हैं। लेकिन मारांग गोमके के बाद एक ऐसे मसीहा का उदय हुआ कि उसने समाज में हुल-सा वातावरण पैदा करने में सफलता प्राप्त कर ली। यह जीवंत उदाहरण है कि चालीस वर्षों से लोग उनकी जय जयकार करते आ रहे हैं। विधायक की तो बात ही छोड़ दीजिए, वह अपने बलबूते किसी समय छह सांसदों को दिल्ली दरबार तक भेजने में भी कामयाब हुए हैं। अकेले झारखंड में इस वक्त उनके पास चार सांसद और सत्रह विधायक हैं। और आप उनके मुखिया बने हुए हैं। यह मसीहा और कोई नहीं, उसे आप गुरु जी के नाम से खूब जानते हैं। गुरु जी पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना बुरी बात है। उनकी शान के खिलाफ बोलना, किसी को शोभा नहीं देता है। यह अलग बात है कि इतना बड़ा समर्थन मिलते रहने के बावजूद भी उन्होंने अपने लोगों के लिए कुछ नहीं किया है। लेकिन उनको व्यक्तिगत रुप से गाली देना, कतई उचित नहीं। हो सकता है, आपके पास विश्वविद्यालय की ढेर सारी डिग्रियों की भरमार होगी। आप अच्छे पढ़े-लिखे और उच्च शिक्षित नेता होंगे। लेकिन आप अभी तक एक भी विधायक को जीत दिलाने में असफल ही रहे होंगे। फिर आप महान हैं या गुरु जी? निश्चित रुप से गुरु जी महान हैं। यह कड़ुवा सच है कि गुरु जी के पास किसी विश्वविद्यालय की कोई डिग्री नहीं, पर उनके पास निश्चित रुप से अच्छे विवेक की बहुतायत है। जिसकी वजह से वह आज की तारीख में आदिवासियों के सर्वमान्य नेता के पद पर आसीन हैं। अब आप बताओ, फिर क्या शिक्षा ही हमारी समस्याओं का एकमात्र समाधान है? शिक्षाविदों के अनुसार हो सकता है, समाज उन्नति का शिक्षा ही एकमात्र उपाय हो। अतः शिक्षाविद् ग्वाले की भाँति अपने दही को खट्टा मानने से ही इनकार करे, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।
