आखिर दो-दो सृष्टि क्यों?
भगवान भी बड़ा अजीब है! उसने ब्रह्माण्ड की सृष्टि कर दी और कहाँ गायब हो गया? आजतक किसी को कुछ पता न चल पाया। न वह बोलता है, न सुनता है और न ही वह किसी के सामने प्रकट होता है। सबकुछ सृष्टि करने के बाद उसने प्रथम नर-नारी को बनाया होगा। जहां से मानव सृष्टि की शुरुआत हुई। उसी का ही परिणाम है कि आज हम हिन्दू-मुस्लिम करने में सक्षम हैं। यह परंपरा आगे भी बढ़ती जाएगी।
बेशक भगवान न दीखते हों। परंतु उसने अपनी सृष्टि के माध्यम से सबकुछ बताने की चेष्टा की है। इसके लिए समझने की दिव्यदृष्टि होनी चाहिए। आश्चर्य तो तब होता है, जब हम पाते हैं कि उसने एक अकेला नहीं बल्कि जोड़े में ही किसी सजीव-निर्जीव की सृष्टि कर रखी है। जैसे - नर-नारी, सूरज-चंद्रमा, दिन-रात, सूख-दुख वगैरह। अपने शरीरांग को ही देख लो। कोई भी अंग अकेला नहीं बल्कि जोड़े में हैं - हाथ, पैर, नाक, कान .. सभी डबल हैं। यहाँ तक कि दांत की भी ऊपर-नीचे दो पंक्तियाँ हैं। सोचो, अगर एक ही पंक्ति होती, तो क्या हम खाने को सक्षम होते? नहीं। ऐसा इसलिए; वे एक दूसरे के पूरक हैं। वे आपस में एक दूसरे के अच्छे दोस्त एवं सहायक हैं। वे एक दूसरे के मददगार हैं। वे आपसी दुश्मन तो कतई नहीं हैं। ठीक यही स्थिति सबके साथ है। देखो न; देश सन् 1947 को आजाद हुआ। संविधान बना। और देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए एक राष्ट्र एवं कई राज्यों का निर्माण हुआ। राष्ट्र व देश को चलाने के लिए सांसदों एवं राज्य को चलाने के लिए विधायकों की जरूरत होती है। इन सांसदों/विधायकों का चुनाव जनता करती है। अतः स्पष्ट हो गया कि सांसद-विधायक एवं जनता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक दूसरे की अनुपस्थिति में न तो राष्ट्र और न ही राज्य चल सकता है। अर्थात नेता और जनता एक दूसरे के पूरक हैं।
जब जनता और नेता का इतना घनिष्ठ संबंध हो, फिर भी दोनों एक दूसरे के घोर शत्रु बने हुए हैं। क्यों? क्योंकि दोनों के बीच आपसी तालमेल नहीं है। बल्कि नेता जनता का शोषण करना अपना धर्म समझता है। यही कारण है कि नेताओं की हार-जीत होती रहती है। अतः जब तक नेता-जनता के बीच शरीरांग माफिक सामंजस्य स्थापित नहीं होगा, तब तक देश की उन्नति के बारे में सोचना फिजूल की बातें होंगी।