मान लो; संविधान बदल गया?
तर्क विज्ञान के कई नियमों में यह भी एक नियम है कि जहां धुआँ उठे, समझो वहां आग है। इसका मतलब अगर वहां धुआँ हो, तो वहां आग होने की पूरी-पूरी संभावना से कोई नहीं इंकार कर सकता है। धुआँ और आग में चोली-दामन का साथ है। बगैर धुआँ आग की कल्पना हो ही नहीं सकती है। इसका अर्थ यही हुआ कि भाजपा एवं उसके सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक गाहे-बगाहे यह जो संविधान बदलने की बात उठाते हैं, यह सत्य प्रतीत होता है। इसी चुनाव में भाजपा के कुछ उम्मीदवारों ने साफ तौर पर कह दिया है कि उन्हें 400 पार करा दो, वे संविधान अवश्य बदल देंगे। और तो और वे खुलेआम संविधान को जलाते हैं। उनके समर्थक एससी/एसटी/ओबीसी मुर्दाबाद के नारे लगाते हैं। यह सब धुआँ क्यों उठ रहा है? इसका मतलब साफ है कि वहां आग लगी हुई। वे संविधान बदलने को उतारु हैं।
भारत देश सन् 1947 को आजाद हुआ। बाबा साहब डॉ भीमराव आम्बेडकर की अगुवाई में लिखे हुए इस संविधान को 1949 में हम भारत के लोगों ने उसे अंगीकृत किया। और इसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया। कुछ संशोधनों के साथ फिलहाल इसमें 25 भाग और 448 अनुच्छेद हैं। भारत का संविधान दुनिया के सर्वोत्तम संविधानों में से एक है। परंतु इतना उच्च कोटि का संविधान रहते हुए भी कुछेक घटनाओं को देखकर मन बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर हो जाता है। संविधान के अनुसार भारत का हर नागरिक बराबरी का हक रखता है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है। इस देश में छुआछूत के लिए कोई जगह नहीं, उसे सदा के लिए मिटा दिया गया है। हर नागरिक को मौलिक अधिकारों से सुसज्जित किया गया है। फिर भी हमारे वर्तमान महामहिम राष्ट्रपति के साथ ऐसा तुच्छ भेदभाव क्यों? इसके पूर्व में भी कई दलित नेताओं के साथ ऐसा ही भेदभाव किया गया है। ऐसा क्यों? इसके अलावे भी दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने पर मनाही क्यों? इस तरह के कई उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं।
अब सवाल उठता है मान लो; संविधान को बदल दिया गया, फिर क्या होगा? क्या होगा? ये जो चुनाव-चुनाव हमलोग खेल रहे हैं, सब खत्म। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। न तुम्हारे विधायक होंगे और न कोई सांसद। पंचायत चुनाव में भी आपकी कोई भागीदारी नहीं होगी। सरकारी आरक्षण खत्म हो जायगा। राजनैतिक हो अथवा सरकारी नौकरी, सब समाप्त। याद रखना, सदियों से दबाए गए दलित फिर वहीं पहुंच जाएंगे, जहां से वे आये थे। सभी दलित गले में हांड़ी और कमर में झाड़ू टांगते हुए नजर आएंगे। महिलाओं को स्तन ढांकने की आजादी नहीं होगी। जिस दलित को शिक्षा ग्रहण करने का भूत सवार हो, उनके कानों में पिघलते हुए शीशे डाले जाएंगे। दलित गुलामगीरी करने के लिए मजबूर हो जाएंगे। पक्का सबूत के तौर पर अभी देख लेना। लोकसभा सामान्य सीट से उम्मीदवारी करके देख लेना। वहां से बाहरी जीत सकता है, पर आपकी पूछ नहीं के बराबर होगी।
सवाल यह नहीं है कि जब संविधान बदलने की घड़ी आएगी, फिर देखा जाएगा। आग लगने पर कुआँ खोदना कहां की बुद्धिमानी होगी? आदिवासी विरोधी मानसिकता वाले को कौन नहीं जानता है? 1977 से पहले वे ”दीया“ दिखाया करते थे। इसके बाद उनके हाथ में "कमल फूल" उग आया। तब से वे धीरे-धीरे सत्तासीन होते गए। और अब तो वे 10 वर्षों से हमारे सिर पर सवार हो गये हैं। उनके काले करतूतों के बारे में इतना ही काफी है कि वे आपको "वनवासी" के नाम से पुकारते हैं एवं धर्म की घूंट पिलाते हैं।
एसपीटी एक्ट इतना सख्त कानून रहते हुए भी किसने मनुवादियों को अपने इलाके में प्रवेश करने की अनुमति दी? उन्हें किसने आमंत्रण दिया? सिर्फ राजनीतिज्ञों को दोष देने मात्र से आपकी समस्या नहीं सुलझ सकती है। इसके जिम्मेवार आप स्वयं हो। यहां "मियां बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी" वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। आपके इलाके में इतने सारे पत्थर एवं कोयला खदान के स्वामी कौन लोग हैं। सारे के सारे मालिक मनुवादी हैं।
चालू लोकसभा चुनाव में वे किस तरह की चाल चल रहे हैं, आप पूर्णतः अनभिज्ञ मालूम पड़ते हो। पूरे देश में एक ओर संविधान बचाने वाले खड़े हैं, तो दूसरी ओर इसको बदलने वाले 400 पार का नारा दे रहे हैं। साफ शब्दों में कहा जाय, तो राजमहल की सीट किसकी झोली में जाती है, देखना बड़ा दिलचस्प होगा। आपकी सावधानी हटी, तो दुर्घटना घट सकती है। पछताने से कोई लाभ नहीं, जब चिड़िया चुग गई खेत।