Wednesday, 30 August 2023

 कैसी और किसकी आजादी (4)?

(इस लेख की शृंखला को अच्दी तरह समझ पाने के लिए निश्चित रूप से हमें 65000 वर्ष पीछे जाने की जरुरत है। इतना न भी जा पाएं, तो कम से कम इस देश में अंग्रेजों के आगमन काल के दृश्यों को तो समझना ही होगा। ब्रिटिश आगमन काल अर्थात् 1600 ई. तक देश मनुस्मृति के अनुसार चल रहा था। अंग्रेजों ने इसे धीरे-धीरे ध्वंस करना प्रारंभ किया। जब भारत देश आजाद हुआ, तब अंग्रेजों के दिखाए मार्ग पर चलते हुए बाबा साहेब डॉ भीम राव अम्बेडकर की आगुवाई में भारत का संविधान बना, जिसे 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया। बताते चलें कि अब वर्तमान हुक्मरानों द्वारा इस संविधान को अमान्य करार देने की योजना चल रही है एवं इसके बदले फिर से देश में मनुस्मृति लागू किए जाने की संभावना ज्यादा नजर आ रही है।)

सर्वप्रथम अंग्रेजों ने तमाम मुगल शासकों के पर उखाड़ते गए। जब बादशाह बहादुरशाह जाफर के रूप में अंतिम पर उखाड़े गए तो, भारत में पूर्णरूपेण अंग्रेजी हुकुमत कायम हो गई। अंग्रेजों को मनुस्मृति की कुरीतियों को समझने में देर न लगी। उन्होंने छुआछूत, संपत्ति का अधिकार, सती प्रथा, शिक्षा, राजनीति, प्रशासन एवं तमाम तरह के दलित, पिछड़े, आदिवासियों की हकमारी को बहुत करीब से देखा। तात्पर्य यही कि भारतवर्ष में अंग्रेजी राज नहीं, अपितु देश मनु महाराज की “मनुस्मृति” के संविधान के अनुसार चल रहा था, जो मानवाधिकार की दृष्टि से अति निंदनीय एवं निहायत ही अमानवीय था। फिर क्या था; अंग्रेजों ने धीरे-धीरे लंकारूपी “मनुस्मृति” पर आग लगानी शुरु कर दी। 

 चूंकि इस लेख का लेखक महोदय मूल रूप से संताल परगना का है एवं पाठकगण भी  बड़ी संख्या में यहीं के हैं, अतएव ब्रिटिश काल के दौरान संतालों के साथ घटी घटनाओं का वर्णन करना ही उचित होगा। मालूम हो कि तब आज के संताल परगना में संतालों का आगमन ब्रिटिश काल के दौरान हुआ। हालांकि उस समय पहाड़ों के ऊपरी हिस्से में आदिम पहाड़ियों का वास जरुर था, पर वे निचले हिस्से में उतरने को कतई मंजूर नहीं थे। इतना ही नहीं आदिम पहाड़िया बड़े ही आलसी प्रवृति के थे, जहाँ संताल बहुत ही मेहनतकश प्राणी थे। यही कारण था कि अंग्रेजों ने संतालों को संताल परगना आने का आमंत्रण दे डाला। संताल आदिवासी टिड्डी की भाँति संताल परगना में प्रवेश कर गए। यहाँ संतालों ने जंगली जानवरों का सामना करते हुए अपने लिए खेती योग्य जमीन तैयार की। यहाँ बताते चलें कि शुरुआती दौर में पहाड़ियों ने संतालों के आगमन पर बेशक आपत्ति जरुर जताई थी, पर अंग्रेजों के हस्तक्षेप से सारा मामला सुलट लिया गया था। 

तब संतालों की जीवन शैली किस तरह की रही होगी, आप इसके बारे में आसानी से कल्पना कर सकते हैं। संतालों की रहन-सहन व अन्य गतिविधि ब्रिटिश काल के दौरान भी आदि मानव की तरह ही थी। संताल लोग दुनिया से एकदम कटे हुए थे।

(... अगले अंक में जारी।)

कैसी और किसकी आजादी (2)?

इस विषय पर आगे बढ़ने से पहले यह जानना बहुत जारुरी है कि भारत के मूल निवासी कौन हैं? निःसंदेह भारत के मूल निवासी आदिवासी हैं। मानवशास्त्री बताते हैं कि आदिवासी आज से 65000 वर्ष पूर्व भारत आए। कल्पना करें, तब देश की क्या स्थिति रही होगी। भारत देश में तब कश्मीर से कन्याकुमारी तक किसी मानव प्राणी का कोई वास नहीं था। चूंकि वन-जंगलों में जीविका के लिए सबकुछ उपलब्ध था, अतः आदिवासियों ने अपने रहने के लिए वन-जंगलों को चुना। और वे वहीं के होकर रह गए। इस संबंध में दलित चिंतक बताते हैं कि आज से मात्र 4000 वर्ष पूर्व यूरेशिया महाद्वीप से कुछ लोग भारत आए। उन्होंने अपने ठिकाने के लिए मैदानी इलाके को चुना। ये यूरेशिया के लोग बड़े ही चालक एवं चतुर प्रवृति के प्राणी थे। उन्हें छल-कपट में महारथ हासिल था। भारत में आते ही उनका सामना आदिवासियों के साथ हुआ। आदिवासी सरल एवं मृदुल प्रवुति के थे। परंतु वे वीर और साहसी थे। स्वाभाविक था कि आदिवासी और यूरेशिया से आये हुए लोगों के बीच कई बार घमासन युद्ध हुआ। और इस भयंकर युद्ध में यूरेशिया के लोगों को हमेशा मुँह की खानी पड़ी थी। संक्षेप में यही कि फिर इन यूरेशियावासियों ने सुनियोचित तरीके से एक चाल चली। उन्होंने कपोल कल्पित ग्रंथ बेद, पुराण, उपनिषद, महाभारत, रामायण आदि की रचना कर डाली। जिनमें उन्होंने अपने आपको को देव एवं आदिवासियों को दानव के रूप में पेश किया। देव और दानव को क्रमशः सुर-असूर के नाम से भी जाना जाता है। इन्होंने भोले-भाले आदिवासियों को अपना मानसिक गुलाम बनाने हेतु कोई कसर न छोड़ी। जैसे कि आप अच्छी तरह जानते हैं कि इनके कपोल कल्पित ग्रंथ महाभारत और रामायण में तीर-धनुष की खूब बौछार हुई थी। पर सोचने वाली बात है; जिसने इन ग्रथों की रचना की, क्या उनके पास आज की तारीख में कोई छोटा-सा तीर-धनुष का टुकड़ा भी है? नहीं है। फिर यह तीर-धनुष आज किनके पास मौजूद है? इसका उत्तर आप स्वयं अच्छी तरह जानते हैं। 

दलित चिंतकों के अनुसार; डीएनए जाँच से यह सिद्ध हो चुका है कि जो लोग यूरेशिया से भारत आए, वही आज के ब्राह्मण हैं। इन ब्राह्मणों ने छल-कपट के सहारेआदिवासियों के किन्हीं राजाओं की हत्या कर दी, तो किन्हीं राजाओं को येनकेन प्रकारेण अपने कब्जे में कर लिया। ऐसा भी कहा जाता है कि जब भी ब्राह्मणों ने आदिवासी राजाओं को पराजित किया था, तब वे खुशी से झूम उठते थे। कालान्तर में यही विजय दिवस हिन्दुओं के पर्व-त्योहार के रूप में परिणत हो गया। मानवशास्त्री आगे बताते हैं कि इन ब्राह्मणों ने अपना वर्चस्व कायम करने हेतु एवं SC/ST/OBC को अपना गुलाम बनाने के लिए कई ग्रंथों की रचना कर डाली। मनु महाराज की मनुस्मृति ने तो हद ही कर दी। इन्होंने वर्ण व्यवस्था की स्थापना कर दलितों को सदा के लिए नरक की जिंदगी जीने के लिए मजबूर कर दिया।      (... अगले अंक में जारी।)

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...