Friday, 3 May 2024

 अब कौन होगा दलितों का तारणहार?

जिन्हें हम भगवान मानते हैं, जब वे अपने आपको बचा न पाये, तो हम किस खेत की मूली हैं। कोई मानव प्राणी इस दुनिया में सदा रहने के लिए नहीं आया है। इस धरा पर आने का कुछ पता नहीं, पर जाना निश्चित है। हम-तुम बस इस लेख पर विचार-मंथन करते रहेंगे। और एक दिन हम भी चल बसेंगे। बापू नहीं रहे, बाबा नहीं रहे, सिदो-कान्हू भी नहीं रहे। बाबा साहब जिन्होंने इतना अच्छा संविधान दिया, सब चले गए। पर उनकी कृति हमें बहुत कुछ बता रही है। 

जिन अंग्रेजों ने दलितों को जीवनदान दिया, उन अंग्रेजों को मनुवादियों द्वारा जी भरकर गाली देना कहाँ की इंसानियत है? यह समझने वाली बात है। मनुवादी अंग्रेजों को गाली क्यों दे रहे हैं? वे इसलिए गाली दे रहे हैं क्योंकि अंग्रेजों ने मनुवादियों के गुलामों को मुक्ति दिलाई है। इसके सिवा और कोई कारण ही नहीं है। इस मसले को आप इस तरह भी समझ सकते हैं। कानून की भाषा में या यों कहें उचित निर्णय देने हेतु जज को निष्पक्ष होना अति आवश्यक है। यह सौ फीसदी सच है कि निष्पक्ष हुए बगैर कहीं भी और किसी भी मामले में उचित फैसला हो ही नहीं सकता है। जिस देश में सदियों से दलितों को सताया जा रहा हो, उन्हें गुलाम बनाया जा रहा हो, उनपर बेतहाशा अत्याचार किये जा रहे हों और तो और उन्हें तमाम तरह के मानवाधिकार के अंतर्गत मिलने वाली सुविधाओं से भी वंचित किये जा रहे हों, तो इनका न्यायाधीश किसे नियुक्त किया जाय, ताकि पीड़ितों को प्राकृतिक न्याय मिल सके? इस भारत देश के साथ यही हुआ है। यहाँ मनुवादियों का साम्राज्य था। ये सदियों से शूद्रों को प्रताड़ित करते आ रहे थे। भगवान ने शूद्रों की सुनी। और उसने अपने प्रतिनिधि के रूप में अंग्रेजों को भारत भेजा। अंग्रेजी काल में भारत में क्या हुआ? इसे आप अच्छी तरह परिचित हैं। सार यही है कि अंग्रेजों ने मनुवादी साम्राज्य को ध्वंस कर दिया। जज बनकर शूद्रों को उचित निर्णय दिया। अंतोगत्वा भगवान द्वारा आवंटित काम को अंजाम देने के पश्चात् वे सन् 1947 को अपना घर वापस लौट चले। साथ ही वे अपने होनहार छात्र डॉ भीम राव अम्बेडकर को भारत का संविधान लिखने के लिए तमाम तरह के नोट्स देकर इस देश से बिदा हो लिए।

भगवान द्वारा प्रेषित निष्पक्ष जज अंग्रेज पुनः मनुवादी को भारत की सत्ता सौंपकर अपने वतन को लौट चले। अब शूद्रों का क्या होगा? शूद्रों का वही होगा जो मंजूरे खुदा। यही सच है कि भारत के हर नागरिक को संविधान के अनुसार चलना चाहिए। लेकिन बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस वक्त मनुवादियों के फन उठने लगे हैं। मनुवादियों द्वारा गाहे-बगाहे इसकी आलोचना करना एक बहुत बड़ा अशुभ संदेश है। जिस तरह संविधान की धज्जियां उड़ रही हैं, वह आपके सामने है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। अब यहाँ के सत्ताधीश किसी एक धर्म विशेष को ही बढ़ावे दे, यह कहीं से भी शोभा नहीं देता है। पूरी सरकारी मशीनरी प्राण प्रतिष्ठा में लग जाय, तो इसे क्या धर्मनिरपेक्ष कहा जा सकता है? इसी तरह आरक्षण को समाप्त करने हेतु सभी सरकारी संस्थाओं को ही बेच देना, कहाँ तक उचित है? ईडी, चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट जैसी स्वतंत्र निकाय, अब सरकार के दिशा निर्देश पर काम करे, तो दाल में कुछ काला जरुर नजर आता है। इस हालात में अब कौन होगा दलितों का तारणहार? मामला सोचनीय है।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...