Wednesday, 25 September 2024



संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त 
होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है

यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्य हो जाती है। विडंबना है कि जबतक उस चीज की प्राप्ती नहीं हो जाती, तबतक उसकी प्राप्ती हेतु जान तक की बाजी भी लगाई जाती है। यह कड़ुवा सच है; हमारे पूर्वजों ने 1855 में अन्याय के विरुद्ध हूल किया। और उस हूल की एवज में उन्हें एक बड़ा-सा भूखण्ड मिल गया। पर हम उस भूखण्ड को संभाल पाने में विफल रहे। सोचने वाली बात है; इतना सख्त कानून रहने के बावजूद भी उस नये भूखण्ड में बाहरियों की बाढ़ आ गई और उसने हमारी ”डेमोग्राफी“ ही बदलकर रख दी है। अब उसमें हिन्दु आये या मुसलमां; यह शोध का विषय हो सकता है। संताल परगना गजेटियर्स बताता है कि अलग संताल परगना गठन होने के समय देवघर एवं राजमहल में मात्र 10% ही बाहरी आबादी थी। लेकिन इस आबादी के साथ जादुई करिश्मा हो गई, जिससे आज सच में संताल परगना की डेमोग्राफी बदली हुई है। संताल परगना के छोटे-बड़े शहरों की बात ही छोड़ दीजिए। अब तो गांव-देहातों में भी बाहरी घुसपैठियों की बाढ़ आ गई है। आश्चर्य करने वाली बात तो यह है कि एसपीटी एक्ट के तहत जमीन की खरीद-बिक्री नहीं हो सकती है। फिर भी हो सकता है; शायद ये बाहरी घुसपैठिये आसमान से टपक पड़े हों!

देश 1947 को आजाद हुआ। हम अपने हूल के परिणामस्वरुप मिले भूखण्ड को संभालने में विफल रहे। महानायक सिदो-कान्हू एवं हूल में शहीदों के सपने अधूरे रह गए। फिर हम झारखण्ड अलग प्रांत के आंदोलन में कूद पड़े। इस आंदोलन के परिणामस्वरुप भी हमें 50 वर्षों के बाद 2000 को अलग झारखण्ड राज्य तो मिल गया, पर उसे भी संभाल न पाए। तब बाहरी आबादी अपना बोरिया-बिस्तार समेट ही चुकी थे कि हमने उसे अग्रज मानकर उन्हें अपने पास ही पनाह दे डाली। अब डेमोग्राफी ... डेमोग्राफी चुनावी झुनझुना बजाते रहो। इससे कुछ होना-जाना नहीं है। परिणाम यह हुआ कि हमारे लोग अपनी मातृभूमि से पलायन कर रहे हैं, जबकि बाहरी आबादी टिड्डी की भांति उसकी भरपाई हेतु घुसपैठ कर रहे हैं। दोनों ही परिस्थितियों में हमारी हालत पतली हुई जा रही है।

आदिवासी संतालों की सुरक्षा हेतु क्या नहीं है? उनके पास सभी तरह के कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। फिर भी वे लुप्त होने की कगार पर खड़े हैं। अब उनकी जनसंख्या झारखण्ड में 2011 के अनुसार मात्र 26% रह गई है।

झारखण्ड में चुनावी शंखनाद हो चुका है। इस चुनाव के दौरान काले-पीले सभी तरह के राजनैतिक दल आयेंगे। और वे भूतकाल की तरह संतालों को किसी दुधारी गाय की तरह दुहकर अंतर्धान हो जाएंगे। और हम मूरख संताल भाषा को छोड़ धर्म और लिपि का घूंट पीने में मस्त हो जाएंगे। वाह रे आदिम जाति संताड़ खेरवाल!

Tuesday, 24 September 2024

हमारी पहचान है या विनाश की फाँस?

अगर दुनिया में लिपि ही किसी समुदाय विशेष की पहचान होती, तो आज अंग्रेज ही दुनिया के महामूर्ख कहलाते। यही वे महामूर्ख अंग्रेज हैं, जिनके पास अपनी कोई लिपि नहीं है। मालूम हो; अंग्रेजी की लिपि उधारी है। फिर भी अंग्रेजों ने आज किसी सौतेली लिपि के भरोसे दुनिया को अपनी मुट्ठी में कैदकर रखा है। क्या यह झूठ है कि अंग्रेजों ने अपने ही देश भारत में करीब तीन सौ साल तक डंके की चोट पर राज किया है? क्या यह भी असत्य है कि उन्होंने दुनिया के अन्य करीब ढाई सौ देशों में अपना परचम लहराते रहा है? फिर तो यह भी अविश्वासनीय ही होगा कि आज भी अंग्रेज पचास देशों में राज कर रहे हैं? क्या आपको मालूम है कि उन देशों में उनके बगैर हुक्म सूर्यास्त भी नहीं होता है? उन देशों में अंग्रेजों की तूती बोलती है। एक बार अपने गिरेबां में झांककर कह दो कि यह सब बकवास है, झूठ है और फरेब है। हे कंबल ओढ़कर घी पीने वालो अंग्रेजों की औलाद! हे अंग्रेजों के पैंट पहनने वालो! छोड़ दो हम जैसे गरीब और असहाय संतालों को। खुद के बच्चे अंग्रेजी मिडियम में और हमारे बच्चे वही झोल चिकी का झोल पिलाते रहो? यह सब गोरखधंधा अब और चलने वाला नहीं है। हमें बेवकूफ बनाना बंद करो। और बंद करो अपनी वाहियात चिकी मिशन-2025। तुम्हारा पाप का घड़ा  अब भर चुका है। देखते नहीं हो, तुम्हारे आका मुख्यमंत्री मांझी साहब ने उस घड़े को फोड़ दिया है। और तुम्हें क्या चाहिए? दूर हो जा हमारी नजरों से, नहीं तो बेमौत मरने के लिए तैयार रहना।

अंग्रेजों को लाख गाली दो, पर सच्चाई छुप नहीं सकती है। यह सच है कि यही वह शख्स है जिसने सिर्फ आपको ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम नंग-धड़ंगों को अपनी आबरु बचाने हेतु अपनी पैंट पहना रखी है। न सिर्फ उसने अपनी पैंट ही पहना रखी है बल्कि यह बताओ कि उनका हस्तक्षेप कहाँ नहीं है? तुम्हारे उठते-बैठते, सोते-जागते, रोना-धोना और तमाम तरह के क्रिया-क्लापों में सिर्फ अंग्रेजों का ही भूत सवार रहता है। बगैर अंग्रेजियत आपकी सांस एक सेकेण्ड भी नहीं चल सकती है। समय रहते चेत जाओ। तुम्हारी यह गंदी हरकत ने हमें सौ साल तक बेवकूफ बनाती रही है। तुम्हारी यह बुझी रोशनी, अब किसी काम की नहीं है। छोटे बच्चे ज्यादा गुस्सा नहीं कलते, अब सो जाओ!

पहचान ... पहचान ... पहचान! पहचान कौन? पहचान झोल चिकी! सब जगह पहचान! अरे महामूर्खो! आपने तो हद ही कर दी है। तुम्हारी हर सांस में ही अंग्रेजियत है। फिर किस बात की पहचान? अंग्रेजी की अपनी लिपि नहीं है। फिर भी अंग्रेजी दुनिया की सबसे बड़ी भाषा बन गई है। सिर्फ अंग्रेजी ही नहीं बल्कि दुनिया की कई अन्य भाषाएं भी हैं, जिनकी अपनी लिपि नहीं है, पर उन्होंने अपनी भाषा की समृद्धि  के लिए रोमन लिपि को ही अपना रखा है। जरा गहराई से सोचो। आखिर ऐसा क्यों? आपकी लिपि संतालों की फाँस बन गई है।

Monday, 9 September 2024

पी. ओ. बोडिंग साहब की अनमोल भेंट

तब संतालों में एक भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति नहीं था, फिर भी वे शेर के जबड़े से संताल परगना को खींच निकालने में सफल रहे। इसके विपरीत, आज हर घर में पढे-लिखे लोग मौजूद हैं। संतालों के अत्याचारियों ने जुल्म करने की सीमा को लांघ दिया है। फिर भी हम भिंगी बिल्ली बनकर किसी एक कोने में दुबके हुए हैं। हूल बीते मात्र 5 वर्ष ही बीते थे। हूल एवं हूल के परिणामों से मनुवादी अत्यधिक बौखला उठे थे। उनकी बौखलाहट स्वाभाविक थी। कारण, हूल में महाजनों को अपने किये का फल मिल चुका था। जहां भी दा॑व लगा, वे मौत के घाट उतारे गए थे। हूल तत्कालीन अंग्रेज साम्राज्य के विरुद्ध नहीं बल्कि अत्याचारी महाजनों के विरुद्ध था। अतः मनुवादियों का जख्मी शेर में परिणत होना स्वाभाविक था। हुआ यूं कि अब महाजन दुगुना रफ्तार से संतालों पर अत्याचार करने लगे थे। ऐसी हालत में मिशनरियों का संताल परगना में आगमन और निरीह संतालों की मदद करना; इन सूदखोर महाजनों को फूटी कौड़ी नहीं सुहाया।

तब बेनगड़िया मिशन पापा-केराप की भलमनसाहत के कारण अपनी प्रसिद्धि पाने में सफल हो चुका था। पापा-केराप साहब ने संतालों की भलाई हेतु कोई कोर कसर न छोड़ रखी थी। कुछ वर्षों बाद उसी स्थान पर पी. ओ. बोडिंग का भी आगमन हुआ। कुछ ही वर्षों के बाद दोनों संतालों के मसीहा पापा-केराप साहब इस दुनिया से चल बसे। अब संतालों की देखरेख का सारा भार बोडिंग साहब पर आ गिरा था।

पी. ओ. बोडिंग साहब एक महान भाषावैज्ञानिक थे। वे संताली के अलावे अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मनी, नॉर्वेजियन आदि भाषाओं के भी अच्छे जानकार थे। उन्हें संताली भाषा-साहित्य से बेहद लगाव था। उन्होंने 44 वर्षों तक संतालों के बीच रहकर संताली साहित्य की सेवा की है।

भारत प्रवास के दौरान उन्होंने देखा कि संतालों की आर्थिक स्थिति बहुत ही नाजुक अवस्था में पड़ी हुई थी। और इधर महाजनों ने भी संतालों का जीना हराम कर रखा था। मिशन स्कूल के भरोसे एकाध संताल जरूर अपना नाम व कुछ पढ़-लिख सकने में कामयाब तो हो चुके थे। परंतु वे इतने योग्य नहीं थे कि वे अपनी भाषा की समृद्धि एवं शब्द संचयन के मामले में कुछ कर सकें। बोडिंग साहब को डर सता रहा था, अगर समय रहते संताली शब्दावली को संजोकर नहीं रखा गया, तो वह दिन दूर नहीं जब संताली भी एक न एक दिन विलुप्त होने के कगार पर पहुँच जाएगी। यही एकमात्र कारण था कि बोडिंग साहब की 20 वर्षों की कड़ी मेहनत ने रंग लाई। जिसके फलस्वरूप उनके द्वारा संग्रहित, लिखित, संपादित एवं प्रकाशित A Santal Dictionary (5 Vol) हमारे लिये छोड़ गए। इस डिक्शनरी की उपयोगिता तब तक होती रहेगी, जब तक एक भी संताल इस धरा पर विचरण करता रहेगा। पी. ओ. बोडिंग का नाम सदा-सदा के लिये स्वर्ण अक्षरों में चमकता रहेगा! संताली साहित्य के मसीहा पी. ओ. बोडिंग साहब को शत-शत नमन!

Friday, 6 September 2024

शिक्षा की अलख किसने जगाई?

यह आधुनिक युग है। इस युग में शिक्षा अनिवार्य हो गया है। अब अंगूठा टेक का जमाना लाद लिया। यह अलग विषय हो सकता है कि इस वक्त संताल परगना में खासकर संतालों में शिक्षा की क्या स्थिति है? यह सोलह आने सच है कि महान संताल विद्रोह अर्थात संताल हूल-1855 घटित होने तक एक भी संताल पढ़ा-लिखा नहीं था। हूल के परिणामस्वरूप अलग संताल परगना मिल तो गया पर शिक्षा के क्षेत्र में संताल परगना फिसड्डी ही रहा।

हूल के ठीक 5 वर्ष बाद 1860 को संताल परगना में ईसाई मिशनरियों का अगमन हुआ। उसने संतालों के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार आरंभ कर दिया। देखते ही देखते करीब तीन सौ छोटे-बड़े स्कूलों का उदय हुआ। इन स्कूलों में अमीर-गरीब बगैर किसी भेदभाव के सभी तरह के बच्चों को तालीम दी जाने लगी। मिशनरियों का नक्शा आपके सामने है कि आज भी इनके द्वारा प्रायोजित कई अच्छे-अच्छे स्कूल एवं कॉलेज चल रहे हैं।

कोई माने या न माने, लेकिन यह कड़ुवा सच है कि इन्हीं मिशन स्कूल से निकले बच्चों ने अपने हक और अधिकारों को पहचाना एवं संघर्ष के लिये सड़क पर उतर आए, चाहे वह अलग प्रांत की मांग हो अथवा किसी और तरह की मांग। इन्हीं की अगुवाई में कई आंदोलन हुए एवं आगे भी होते रहेंगे। एक ही कारण है कि अब इनकी आँखें खुल चुकी हैं। आदिवासियों को जहां भी प्रताड़ित किया जाएगा, ये शिक्षित बच्चे अग्रिम पंक्ति में अवश्य दिखाई देंगे। ऐसा इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि मिशनरियों ने आजतक शिक्षा की अलख को जगाए रखा है।

 रोमन लिपि : परिवर्धित संताली लिपि

आखिर कोट-टाई-पैन्ट किसकी पोशाक है? नि:संदेह यह अंग्रेजों की पोशाक है। पर इस वक्त इसे दुनिया तो छोड़ो हर संताल द्वारा इसका उपयोग बड़े ही गर्व के साथ किया जाता है। इसे पहनने में किसी भी संताल को कोई गुरेज व एतराज नहीं और न ही कोई इसके विरोध में चूँ तक कर रहा है। सभी संताल इसे पहनने में अपना गौरव महसूस करते हैं। लेकिन रोमन संताली लिपि के साथ ठीक इसके विपरीत हो गया। अक्सर इनपर आरोप मढ़ दिया जाता है कि यह तो ईसाईयों द्वारा ईजाद की हुई लिपि है। अतः यह संतालों की लिपि कतई नहीं हो सकती है। यह लिपि हमें किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। हमें तो किसी संताल द्वारा ईजाद की हुई अपनी लिपि चाहिए, जिससे हम अपनी पहचान को बरकरार रखते हुए गौरव महसूस कर सकें। बेशक वह लिपि चोरी की हुई, अवैज्ञानिक एवं मानक संताली के लिये अनुपयुक्त ही क्यों न हों।

मालूम हो कि रेव्ह. पी. ओ. बोडिंग ने जिस रोमन लिपि को संताली के लिये परिवर्धित कर संताली लिखने के लिये ईजाद किया, इससे श्रेष्ठ, उत्कृष्ट एवं बेहत्तर संताली लिपि और कोई दूसरी नहीं हो सकती है। अतः इस संताली लिपि को कोई अन्य माने या न माने, अपनाए या न अपनाए, इसका विरोध करे; हमें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। हमें इस संताली लिपि की उन्नति के लिये हर संभव प्रयास करते रहना चाहिए। यह लिपि संताली के लिये सर्वश्रेष्ठ लिपि है।
बोडिंग साहब : एक महान संताल

बेशक पी. ओ. बोडिंग किसी संताल की कोख से पैदा नहीं हुए थे। वे अवश्य ही मूल रूप से एक विदेशी एवं ईसाई धर्म प्रचारक थे। पर उनकी सारी रचनाएं बेहद उम्दी, बेहतरीन, उत्कृष्ट एवं अव्वल दर्जे की हैं। उनकी किसी भी रचनाओं से किसी भी ऐंगल से विदेशी एवं ईसाई धर्म प्रचारक होने की बू नहीं आती है। उनकी ”ए संताल डिक्शनरी” को ही देख लिया जाए। उन्होंने इसमें हर शब्द की व्याख्या बड़े ही उत्कृष्ट तरीके से किया हुआ है। उन्होंने इस शब्दकोश में भाषाविज्ञान के सिद्धांतों का अक्षरश: अनुपालन करते हुए अपनी विद्वत्ता का परिचय दिया है; जो कि इस तरह का कृत्य किसी साधारण संताल द्वारा संभव नहीं है।
 
अतः उपरोक्त कारणों को मद्देनजर रखते हुए डंके की चोट पर कहा जा रहा है कि रेव्ह. पी. ओ. बोडिंग संतालों में महान संताल थे!
पी. ओ. बोडिंग : मानक संताली के महान रक्षक
(2 नवंबर 1865 - 25 सितंबर 1938)
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पी. ओ. बोडिंग का आगमन यूरोप के नॉर्वे देश से भारत में 1890 के उतरार्द्ध में हुआ। उनका कार्यक्षेत्र था - संताल परगना के बेनागाड़िया, मुहलपहाड़ी एवं दुमका। उन्होंने बहुत ही कम समय में संताली भाषा को न सिर्फ सीखा, बल्कि वह अपने को संताली का महान विचारक, मानवशास्त्री, दार्शनिक एवं भाषावैज्ञानिक के रूप में स्थापित कर दिया। इनके जैसा संताली के महान विद्वान न कभी थे और न ही निकट भविष्य में होने की संभावना नजर आ रही है। वह संताली को जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखने का प्रबल, कठोर, सशक्त एवं घोर समर्थक था। इसीलिए तो उसने अपने पूर्व मिशनरियों के द्वारा ईजाद की गई रोमन संताली लिपि को परिवर्धित कर संताली लिपि में परिवर्तित कर दिया।

पी. ओ. बोडिंग को अपने ही काल में अच्छी तरह पता चल गया था कि संताल परगना के संतालों को अपनी मानक संताली को बचाने के लिए भविष्य में अपने ही बिरादरी के लोगों के साथ गृहयुद्ध करना पड़ेगा। वे लोग संताल परगना पर हावी होंगे। अर्थात दक्षिणी संताली जो तब तक आर्यों की भाषा के साथ मिश्रित एवं प्रदूषित हो चुकी है को उत्तरी संतालों पर जबरन लागू करने की कोशिश की जाएगी। अतः इस भयंकर मुस्किलत से बचने हेतु पी. ओ. बोडिंग ने इसका बेड़ा उठा लिया था। इस महान कार्य के लिए उसने दिन-रात एक कर दिया। उन्होंने अपने खून-पसीने एक कर दिए। उन्होंने करीब 22 वर्षों तक कड़ी मेहनत की। और अंततः अपने अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप उन्होंने इन पुस्तकों की रचना कर डाली। पी. ओ. बोडिंग ने इन पुस्तकों को मानक संताली के किसी भी तरह के दुश्मनों को मार गिराने के लिए हैड्रोजन बम तुल्य आविष्कार किया है :- 1. Materials for a Santali Grammar, Part-I (Mostly Phonetics); 2. Materials for a Santali Grammar, Part-II (Mostly Morphology) एवं 3. A Santal Dictionary (V Vols). अतः यह अब हमारी ड्यूटी बनती है कि हम उपरोक्त हैड्रोजन बमों का प्रयोग कब, कहाँ और किस तरह के दुश्मनों पर करें?

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...