आओ चुनाव-चुनाव खेलें
यह कैसी विडंबना है कि आजकल धर्म-धर्म एवं चिकी-चिकी का खेल कुछ सुस्त-सा पड़ गया है। हो सकता है शायद लोकसभा चुनाव की बाढ़ उन्हें बहा ले गई होगी। यह सत्य है कि अभी तक धर्म और चिकी से किसी की क्षुधा नहीं मिट पाई है। हो सकता है; देश से इस चुनाव के वक्त जब धर्म-धर्म का खेल ही समाप्त हो गया, तो हमारे आंगने में इनका क्या काम?
छठवें चरण का मतदान समाप्त हो गया है। अब सातवें और अंतिम चरण का मतदान 01 जून को होगा। देशभर का संपूर्ण नतीजा 4 जून 2024 को घोषित होगा। कहा जाता है कि साहब अपनी निश्चित हार को देखते हुए पगला गया है। वह अनाप-शनाप बकवास किए जा रहा है। छठवें चरण का मतदान आते-आते उसकी सारी चालें निष्क्रिय होती गई। यही वजह है कि अब वह किसी कोठे में मुजरे का मजा ले रहा होगा।
इस बार का लोकसभा चुनाव बड़ा अनोखा रहा! इस तरह का चुनाव न कभी हुआ था और न ही कभी होगा। एक तरफ सारी सरकारी मशीनरी, तो दूसरी तरफ विपक्ष न होकर जनता सत्ता पक्ष का डटकर मुकाबला कर रही है। वाकई यह चुनाव अद्भूत है! इस चुनाव में साहब ने अपने आपको किसी भगवान का अवतार घोषित कर रखा है। इतना ही नहीं भगवान भी उनकी आरती उतारने को मजबूर हो गया है। इसीलिए तो "जो राम को लाये हैं, हम उनको लायेंगे" का डंका बज रहा है।
Whatsapp University में चुनाव का खेल खेलने में सभी तथाकथित छात्र-छात्राओं को बड़ा मजा आता है। आपके बुजुर्ग छात्र को भी यह खेल बड़ा सुहाता है। इस वक्त दुमका-राजमहल लोकसभा क्षेत्र आरक्षित है। याद रखना जिस दिन भी यह क्षेत्र सामान्य हो जाएगा, फिर समझो आपका यह चुनाव चुनाव का खेल भी समाप्त हो जाएगा। इसलिए कबीर दास सही कह गए हैं - "कल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय होएगी, बहुरि करोगे कब?"
ज्ञात हो कि दुमका-राजमहल से जहां इंडिया गठबंधन और एनडीए के बीच कांटे का टक्कर है, तो वहीं दूसरी ओर झामुमो को अपने ही मीरजाफरों से दो-दो हाथ करने पड़ रहे हैं। दुमका से जामा की वर्तमान विधायक बागी बनकर कमल फूल सूंघ रही है। वह अपने ही ससुराल वालों को आईना दिखाने में जुट गई है। जनता से उनकी एक ही अपील है कि उसे ही भारी से भारी मतों से जीताएं, ताकि वह ससुराल वालों से बदला ले सके।
दूसरी ओर राजमहल के झामुमो विभीषण बोरियो विधायक ने अपने ही राज में आक्रमण कर दिया है। उनका एक ही आरोप है कि वर्तमान राजा ठीक नहीं है। वह दस वर्षों से भगौड़ा और लापता हैं। इसलिए वह कहता है कि जीत जाने पर वह घर-घर विकास को पहुंचा देगा।
इस तरह विभिन्न छात्र-छात्राओं का थीसिस अलग-अलग है। उनके बारे में ज्यादा कुछ कहना उचित नहीं। सुना है; वर्षों पहले कुछ मीरजाफर, जयचंद, विभीषण, मुनिया मांझी भी पार्टी छोड़कर चले गए थे। कुछ तो शाम को घर वापस लौट आए थे पर कुछ गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं।
मंगरु को किसी से कोई लेना-देना नहीं है। पर इतना तय है कि Whatsapp University में बहुत तरह के मतभेद हो सकते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अब समय बहुत बदल चुका है। आपको वक्त की नजाकत को पहचानना ही होगा। कभी अंधेरे में तीर मत चला देना।
विशेषकर युवकों से अपील है। हूल हुआ संताल परगना मिल गया, झारखण्ड आंदोलन हुआ और अलग झारखण्ड राज्य भी मिल गया। पर हम आदिवासियों की हालत अभी भी जस की तस बनी हुई है। इसके एक नहीं हजार कारण हो सकते हैं। इस चुनाव में सिर्फ बदलाव मात्र से समाज का कोई भला होने वाला नहीं है। इस बरसात में सिर्फ मेढ़कों का टर्र-टर्र करने मात्र से भी कोई लाभ नहीं है। अगर वास्तव में आपको समाज की चिंता है, तो अविराम फुल टाईमर के रूप में अभी और आज से लोगों के बीच सामाजिक चेतना जगाने के लिए दिन और रात एक करना होगा। आपको समाज उत्थान के लिए पूर्व में ही ब्लूप्रिंट और रोड मैप तैयार करना होगा। वरना आओ चुनाव-चुनाव का खेल खेलें।