Wednesday, 17 August 1994

ग्वाला कभी अपने दही को खट्टा नहीं कहता है

एक जमाना था। जिनके पास घड़ी, रेडियो और साईकिल हुआ करता था; उन्हें आज के लाखपति से कम नहीं आंका जाता था। यह घटना करीब 50 वर्ष पुरानी है। आँखों देखी और भुगती हुई घटना है। लेकिन तब उतनी समझ न थी। पर आज वह दृष्टांत साफ-साफ समझ में आ गया। आखिर ऐसा क्यों हो रहा था?

संतोष रेडियो - सस्ता और टिकाऊ । यह भी तब बहुत कम लोगों के पास हुआ करता था। गाँव हो या शहर, खासकर संतालों को शाम 6.00 बजे का बड़े ही बेसब्री के साथ इंतजार रहता था। सबों के लिए यह शाम 6.00 बजे का समय बड़ा ही माफिक था। गाँव के किसान हों या शहर के बाबू, सभी अपने काम से घर को लौट आते। सभी के पास फुर्सत ही फुर्सत था। शाम 6 बजते ही बिन बुलाए गाँव के छोटे-बड़े सभी मास्टर जी के “पिण्डा़” (घर का बाहरी हिस्से में बैठने की जगह) में एकट्ठे होते थे, क्योंकि उनके पास संतोष रेडिया था। मास्टर जी भी रेडियो को टनाटन रखता थे। बैटरी खत्म होते ही उसमें नई बैटरी डाल दिया करते थे। अरे, 6 बज गया! रेडियो फुल साउंड। “... आकाशबा़नी कोलकाता। खा़ेबो़र ... खो़बो़र पाड़हावेत्आ़ञ हो़रो़ प्रसाद मुर्मू ... तेहेञ मालदो़ रेयाक् ... डा़हीरे सिरा़मंत्री  ...तेकिनकिन ला़ईकेत्आ जे तिरला़ हो़पो़नको ... उनकिन दो़ आ़किनाक् गालोचरे ... । खो़बो़र पाड़हाव दो़ नो़ण्डेगे मुचा़त्एना ...।”

“खो़बो़र मुचा़त्एना” सुनते ही बच्चे तो बच्चे बड़े बुड्ढों की मानो सांस में सांस आ गई हो। खबर की गाथा तो उनके पल्ले कुछ न पड़ी। पर जिस घड़ी की इंजतार में सारा गाँव इकट्ठा था, वह आखिर आ ही गई। “... नितोक् दो़ मित्टेन सेरेञबोन आञजो़मा। सेरेञत्आको राम किस्कू आर साँवतेनको ... ।”

पिन ड्रोप साइलेंस! सुनने वालों की दो तो क्या चार-चार कानें खुली हुई हैं। सभी सांस थामकर महान गायक राम किस्कू के गाने का आनंद ले रहे हैं। मानो, वे जन्नत का सैर कर रहे हों। राम किस्कू का गाना खत्म। अब रेडियो पर जैसे ही ... “हें हों... हें ... हों ...” शुरु, धीरे-धीरे भीड़ छंटनी शुरु। एक पल भी नहीं गुजरा कि अब मास्टरजी अकेले अपने संतोष रेडियो को निहार रहा है। मानो, किसी की मैयत में बैठे हों!

मास्टरजी क्या करते? 6 बजने से पहले तो बच्चे वगैरह बड़े बुजुर्गों के लिए घर से दो-चार कुर्सी बाहर उठा लाते थे। अब वहाँ कोई भी नहीं। मास्टरजी अब खुद ही उन कुर्सियों को घर के अंदर ले जाते।

यह घटना आज से करीब 50 वर्ष पुरानी है। यह घटना क्यों हो रही थी? घटना क्या बताना चाह रही थी? आज जिनकी उम्र 55 वर्ष पार कर रही होगी, उन्होंने इस घटना को न सुना हो, ऐसा कदापि नहीं हो सकता है। बल्कि उन्होंने इस घटना को भुगता जरुर होगा। उनसे तो अपेक्षा है ही; बाकी आप जो भी इस सवाल को पढ़ रहे हों, कृपया इस सवाल का जवाब शेयर करने की चेष्टा करें। वरना, समझा यही जाएगा कि भैंस के आगे बीन बजावे, भैंस रही पगुराई।

सवाल टेढ़ा जरुर है, पर इसी में ही वर्तमान परिस्थिति का जवाब छिपा हुआ है। 

Sunday, 14 August 1994

ग्वाला कभी अपने दही को खट्टा नहीं कहता है

सच पूछो, तो उस कहानी का माजरा आज इस बुढ़ापे में समझ में आया। हो सकता है; समझने में कोई गलती हुई हौ। क्योंकि दृष्टि, सोच, समझ, नजर सबकी अलग-अलग होती है। किसी विद्वान ने सही कहा है कि सत्यवादी हमेशा सच ही बोलता है, पर सुनने वाले इसे गलत समझें, तो इसमें सत्यवादी का क्या कसूर? हर मानव प्राणी सोचता कुछ है, और होता कुछ है। उस दृष्टांत की व्याख्या अलग-अलग हो सकती है। उस समय संताली रेडिया सुनने का क्या ही क्रेज था! अब चूँकि पूरी दुनिया आपके हाथ में सिमटी हुई है; इसलिए आप उस क्रेज की बात को समझ नहीं सकते हो। जिस तरह हम हूल की घटनाओं को समझ पाने में असमर्थ हो रहे हैं; उसी तरह आज के बच्चे उस कथित घटना के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं। लेकिन यह आँखों देखी घटना है, कोई कपोल कल्पना वाली बात नहीं है। आहा! क्या क्रेज था! मानना पड़ेगा! उस दृष्टांत के बारे में जरा सोचो; मास्टरजी, उसका संतोष रेडियो (“हार की जीत” वाला बाबा भारती का घोड़ा सुल्तान से कम न था), गाँव के श्रोतागणों का हुजुम; राम किस्कू का गायन, फिर हें...हों...शुरु होते ही श्रोताओं का पतली गली से खिसक जाना, आज भी प्रासंगिक है। हाँ, इसमें काल, दृश्य, पात्र, पटकथा समय के हिसाब से अवश्य बदले गए हैं। कहानी वही है। सिर्फ हमारी समझ का फेर है।

उपरोक्त दृष्टांत को एक सेेकेंड में समझा जा सकता है। उत्तरी संतालीभाषियों (खासकर संताल परगना निवासियों) से एक निवेदन है; हाथ में एक एण्ड्रोयड फोन लिया जाए। युट्यूब में किसी भी एक बुगड़ी गाने को सुना जाए। अगर शुद्ध संताल परगनावासी होगा, तो वही मास्टरजी की संतोष रेडियो वाली कहानी हो जाएगी। “हें...हो़ं ...” शुरु और युट्यूब निश्चित रूप से बंद हो जाएगा एवं श्रोता पतली गली से खिसक लेगा। इसी कहानी को समझाने हेतु आप एक काम करना। भावी साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता “सिपाहीजी” को बुगड़ी भाषा में लिखित कोई एक अच्छी-सी पुस्तक थमा दो। फिर उससे पढ़ने के लिए निवेदन करना। एक सेकेंड के लिए तो उसकी सांस फुल जाएगी। वह निश्चित रूप से धाराप्रवाह पढ़ने में असमर्थ होगा। सिपाहीजी जरुर सोचेगा - “कहाँ किस दलदल में फंस गया रे बाबा?” लेकिन समस्या वहीं अटक जाती है। हिदुत्व का अफीम खाए व्यक्ति - सरना-इसाई तो उसको करना ही है। संताल परगना के इसाई-सरना एक ही भाषा - संताली बोलते हैं। कितने उत्तर के लोग ट्राइब टी.बी, कलिंगा-फलिंगा बुगड़ी टी.बी चैनल देखते-सुनते हैं, मालूम नहीं। अपना तो उसका कोई क्रेज नहीं है। बाकी चीज छोड़ दो। कल ही दुमका गाँधी मैदान में उड़ीसा और संताल परगना के बीच एक लागड़ें नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन करना। लिख लो, उड़ीसा की टीम शून्य में आउट हो जाएगी। हो सकता है, शायद जीरो देने की नौबत ही न आए, कारण संताल परगना के दर्शक वही हें...हों के चक्कर में नदारद ही रहे।

बुगड़ियों का रहन-सहन, बोली-चाली, भाषा-संस्कृति, धर्म-कर्म सबकुछ बदल चुका है। उनलोगों ने आर्यों के चक्कर में एक नई भाषा-संस्कृति को अपना लिया है, जिसका नाम है - संताड़ी। संताल परगना और उड़ीसा के संताल एक नहीं, बल्कि दो अलग-अलग समुदाय (संताल) हैं। लिपि विवाद पर दोनों कभी एक नहीं हो सकते हैं। दोनों को एक दूसरे का तर्क-वितर्क कतई मंजूर नहीं है। दोनों ग्वाला अपने दही को कभी खट्टा नहीं कहेगा। इस सच्चाई को और कोई नहीं बल्कि भारतीय भाषाई सर्वेक्षण के तात्कालीन महानिदेशक जी. ए. ग्रियर्सन ने अपनी रिपोर्ट में पहले ही लिख दिया है (Ref ; Linguistic Survey of India, Vol-IV page no. 32)। निष्कर्ष यही है कि मास्टरजी का संतोष रेडियो इस वक्त हर संताल प्रदेश में घुमाया जा रहा है। पर उत्तरी संताल उसे सुनने से ही इंकार कर रहे हैं। सच्चाई यही है। पर मास्टरजी का वह संतोष रेडियो उनलोगों के गले में जबरन टांगा जा रहा है। कुछ लोग अफीम के नशे में धुत हैं।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...