ग्वाला कभी अपने दही को खट्टा नहीं कहता है
एक जमाना था। जिनके पास घड़ी, रेडियो और साईकिल हुआ करता था; उन्हें आज के लाखपति से कम नहीं आंका जाता था। यह घटना करीब 50 वर्ष पुरानी है। आँखों देखी और भुगती हुई घटना है। लेकिन तब उतनी समझ न थी। पर आज वह दृष्टांत साफ-साफ समझ में आ गया। आखिर ऐसा क्यों हो रहा था?
संतोष रेडियो - सस्ता और टिकाऊ । यह भी तब बहुत कम लोगों के पास हुआ करता था। गाँव हो या शहर, खासकर संतालों को शाम 6.00 बजे का बड़े ही बेसब्री के साथ इंतजार रहता था। सबों के लिए यह शाम 6.00 बजे का समय बड़ा ही माफिक था। गाँव के किसान हों या शहर के बाबू, सभी अपने काम से घर को लौट आते। सभी के पास फुर्सत ही फुर्सत था। शाम 6 बजते ही बिन बुलाए गाँव के छोटे-बड़े सभी मास्टर जी के “पिण्डा़” (घर का बाहरी हिस्से में बैठने की जगह) में एकट्ठे होते थे, क्योंकि उनके पास संतोष रेडिया था। मास्टर जी भी रेडियो को टनाटन रखता थे। बैटरी खत्म होते ही उसमें नई बैटरी डाल दिया करते थे। अरे, 6 बज गया! रेडियो फुल साउंड। “... आकाशबा़नी कोलकाता। खा़ेबो़र ... खो़बो़र पाड़हावेत्आ़ञ हो़रो़ प्रसाद मुर्मू ... तेहेञ मालदो़ रेयाक् ... डा़हीरे सिरा़मंत्री ...तेकिनकिन ला़ईकेत्आ जे तिरला़ हो़पो़नको ... उनकिन दो़ आ़किनाक् गालोचरे ... । खो़बो़र पाड़हाव दो़ नो़ण्डेगे मुचा़त्एना ...।”
“खो़बो़र मुचा़त्एना” सुनते ही बच्चे तो बच्चे बड़े बुड्ढों की मानो सांस में सांस आ गई हो। खबर की गाथा तो उनके पल्ले कुछ न पड़ी। पर जिस घड़ी की इंजतार में सारा गाँव इकट्ठा था, वह आखिर आ ही गई। “... नितोक् दो़ मित्टेन सेरेञबोन आञजो़मा। सेरेञत्आको राम किस्कू आर साँवतेनको ... ।”
पिन ड्रोप साइलेंस! सुनने वालों की दो तो क्या चार-चार कानें खुली हुई हैं। सभी सांस थामकर महान गायक राम किस्कू के गाने का आनंद ले रहे हैं। मानो, वे जन्नत का सैर कर रहे हों। राम किस्कू का गाना खत्म। अब रेडियो पर जैसे ही ... “हें हों... हें ... हों ...” शुरु, धीरे-धीरे भीड़ छंटनी शुरु। एक पल भी नहीं गुजरा कि अब मास्टरजी अकेले अपने संतोष रेडियो को निहार रहा है। मानो, किसी की मैयत में बैठे हों!
मास्टरजी क्या करते? 6 बजने से पहले तो बच्चे वगैरह बड़े बुजुर्गों के लिए घर से दो-चार कुर्सी बाहर उठा लाते थे। अब वहाँ कोई भी नहीं। मास्टरजी अब खुद ही उन कुर्सियों को घर के अंदर ले जाते।
यह घटना आज से करीब 50 वर्ष पुरानी है। यह घटना क्यों हो रही थी? घटना क्या बताना चाह रही थी? आज जिनकी उम्र 55 वर्ष पार कर रही होगी, उन्होंने इस घटना को न सुना हो, ऐसा कदापि नहीं हो सकता है। बल्कि उन्होंने इस घटना को भुगता जरुर होगा। उनसे तो अपेक्षा है ही; बाकी आप जो भी इस सवाल को पढ़ रहे हों, कृपया इस सवाल का जवाब शेयर करने की चेष्टा करें। वरना, समझा यही जाएगा कि भैंस के आगे बीन बजावे, भैंस रही पगुराई।
सवाल टेढ़ा जरुर है, पर इसी में ही वर्तमान परिस्थिति का जवाब छिपा हुआ है।