मैं आ रहा हूँ : हूल
भादो का महीना। बेला गोधूली। कभी धूप तो कभी छाँव। मौसम के मिजाज के बारे किसी को नहीं मालूम। राजमहल की पश्चिम दिशा पहाड़ियों से आच्छादित। उस पर्वतमाला के ऊपर कारे-कारे बादल मंडरा रहे थे। ठीक उसी समय चरवाहे अपने मवेशियों को घर की तरफ हाँकने के लिए तैयारी कर रहे थे। गाँव की बालाएँ पनघट से पानी लेकर लौट चुकी थी। सनसनाती हवाओं ने आँधी-तूफान का रुप ले लिया। आकाश में बिजली चमकी और उमड़ते-घुमड़ते बादल के खंड एक दूसरे से टकराने के बाद हड़ हड़ाने की आवाज के साथ ही आसमान गूँज उठा। बारिश तो नहीं पर बूँदा-बूँंदी की वजह से धरती जरुर गीली हो गई। कृषक व खेतिहार मजदूर खेत-खलिहान से घर की ओर लौट चले। पक्षी दिनभर की मेहनत के पश्चात् अपने डेरे आ चुके थे। बस्ती में फूस के छप्परों पर धुआँ ही धुआँ दिखाई देने लगा। आसमान ने चुप्पी साध ली। क्षितिज में अँधेरा छा गया। फिर घनघोर अँधियारे ने गाँव-बस्ती को अपनी आगोश में ले लिया। थोड़ी देर में पुनः बादल-बिजली की टकरोपरांत एक अनहोनी आकाशीय आवाज गूँज उठी - मैं आ रहा हूँ ... मैं आ रहा हूँ ... मैं ...। मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कहाँ से आ रहा हूँ? मेरा परिचय देने की जरुरत नहीं। जब भी आपने मुझे याद किया है, मैं आपके दरवाजे पर हाजिर हुआ हूँ। किसी जमाने में तिलका मुर्मू, बुधू भगत, सिदो मुर्मू, बिरसा मुंडा आदि के आह्वान पर मैं अलग-अलग रुपों में उनकी सेवा में हाजिर था। पर अब मैं आपकी उपेक्षा के कारण अज्ञातवास का जीवन जी रहा हूँ। मैं मानवप्राणी नहीं, जो परलोक के बाद इस संसार पर आ नहीं सकता।
मैं आऊँगा ... और निश्चित रुप से आऊँगा। एक बार नहीं, हजार बार आऊँगा। मेरा कोई अमीर दोस्त नहीं। उनसे मेरा दूर-दूर तक कोई रिश्ता भी नहीं। मेरा उनसे साँप-नेवले का संबंध है। मैं गरीबों का मसीहा हूँ। मेरा स्मरण करो और मैं आपके सम्मुख हाजिर हूँ। इतनी जल्दी मुझे भूल जाओगे, मुझे आशा नहीं थी। मैं कौन? मस्तिष्क पर जोर दो। याद करो कुर्बानी सन् 1855 की। स्वतंत्रता संग्राम की पहली जयघोष। मुझे नहीं भाता राजकीय शानो-शौकत। मुझे नहीं चाहिए मखमल की चादर। जरुरत नहीं सोने के चम्मच की। तमसी भोज्य से है मुझे नफरत। धिक्कार है राजसी ठाट-बाट की। मैं पसंद करता हूँ पैदा होना ढिबरी तले छोटी-सी कुटिया में। सुनना चाहते हो मेरी आत्मकहानी? सुनो, बताता हूँ मैं स्वयं अपनी जुबां से।
आज से ठीक 153 वर्ष पूर्व की कहानी है। पूरा प्रदेश झाड़-जंगलों की चादर से लिपटा हुआ था। वन्य प्राणियों का साम्राज्य था उस पर। कौन से जानवर नहीं थे उस वन-जंगल में? दुनिया के तमाम जंगली जानवरों का बसेरा था। तीतर-बटेर से लेकर डायनासॉर की प्रजाति थी राजमहल की पहाड़ियों पर। बड़े.बड़े फलदार वृक्ष, कंद-मूल और सुगंधित फूलों से सजा वन-उपवन। नदी-नाले और झर-झर करते झरनों का है उद्गम। दूर-दूर तक मानवगंध उपलब्ध नहीं। लेकिन छोटी-छोटी टोलियों में आदिमानव जरुर थे। यह छोटी सी जनसंख्या राजमहल पहाड़ी के उत्तरी हिस्से में निवास कर रही थी; जो बाद में मालेर (माले/सावरिया पहाड़िया) जनजाति के रुप में पहचानी गई। यह वही प्रदेश है; जिसे आज आप संताल परगना के नाम से जानते हैं।
देश में फिरंगियों का साम्राज्य था। आश्चर्य की बात! मुट्ठी भर अंग्रेज पूरे देश के मालिक बन बैठे थे। उनके बगैर आदेश पेड़ के पत्ते भी नहीं हिलते। भारतीयों की बोलती बंद थी। कौन बाँधे बिल्ली के गले में घंटी? अठारहवीं सदी का आखिरी पड़ाव। जंगल साफ करने में निपुण संताल आदिवासी। वे कर्मयोगी, कर्मठ और कुशल थे। उनकी रग-रग में सत्य और ईमानदारी की प्रतिछवि थी। वह प्रकृति का प्रेमी और माराङ बुरु का पुजारी था। माँदर की थाप पर वह बेसुध रहनेवाला प्राणी था। अंग्रेजों की उन पर नजर पड़ी। अंग्रेजों ने इन आदिवासियों को मूलतः जंगल साफ करने के लिए ही बीरभूम, मिदनापुर, मानभूम, धालभूम और हजारीबाग आदि जगहों से आमंत्रित किया। मेहनत के धनी ये आदिवासी जंगलों को एक छोर से साफ कर रहे थे और साथ-साथ अपना ठौर भी बनाते जाते थे। बदले में जमीनदारों के मार्फत सरकार को कर अदा करते। जमीन जरुरत से ज्यादा उपजाऊ थी। अतः थोड़ी मेहनत से ही अत्यधिक फसल होती थी। हँसी-खुशी और हर्षोल्लास के साथ समय बीत रहा था। आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत हो रहा था। पर यह खुशी ज्यादा दिनों तक टिक न पाई। खुशियों भरे जीवन पर जल्द ही ग्रहण लग गया था।
आदिवासियों का संताल परगना में प्रवेश करने के थोड़े ही अंतराल में मुट्ठी भर विदेशी यथा पूरब से मोईरा बंगाली और पश्चिम से भोजपुरियों (बिहारियों) का आगमन हुआ। देशी भाषा में इन विदेशियों को दिकु नाम से पुकारा जाने लगा। बंगालियों ने महाजनी व बिहारियों ने फेर-बेपारी का धंधा शुरु कर दिया। तेल-नून व कपड़े-लत्ते के चक्कर में पूरा आदिवासी समाज ऋण में फँसता चला गया। सूद इतना ज्यादा कि आदिवासी पीढ़ी दर पीढ़ी गुलामी व बेगारी खटने के लिए मजबूर हो गए। आदिवासियों को बीस तक गिनती न आती थी। ऋण के चंगुल में सोना उगलती जमीन, गाय-बैल व मासूम स्त्री-बच्चे सब बिकते चले गए। भारी भरकम मालगुजारी ने भी इनकी कमर तोड़कर रख दी। महाजन व जमीनदारों ने जी भरकर आदिवासियों को लूटा। अत्याचार की सारी सीमाएं लाँघ दी गई। चारों ओर हाहाकार मच गया। भागलपुर और जंगीपुर में स्थित कचहरी आदिवासियों की पहुँच से बाहर की बात थी। अतः वे न्याय से कोसों दूर हो गए। आदिवासी लोग अनपढ़ के साथ-साथ भाषाई समस्या से भी अत्यधिक पीड़ित थे। वे परेशान हो उठे थे, झूठ की व्यापकता, साहबों (अंग्रेज प्रशासकों) की लापरवाही, महाजनों की लूट-खसोट, आमला-पियुनों के भ्रष्टाचार एवं पुलिसों के अत्याचार से।
आदिवासी दुःख के इन पहाड़ों को देखकर चिंतित हो उठे। फिर मैंने इनकी कोख में धीरे-धीरे पनपना शुरु कर दिया। समाज के माँझी-परगना नींद से जाग उठे थे। गाँव-गाँव में कुल्ही दुड़ुप् (ग्राम सभा) करने का आयोजन शुरु हुआ। गाँव के तमाम रैयत उस सभा में शामिल होते और उस सभा में समाज की दशा और दिशा तय करते। कैसे हो समाज का उद्धार? कैसे हो अत्याचारियों से मुक्ति? कैसे हो शेरों के जबड़ों से छुटकारा? इन तमाम समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए लोग उतावले हो उठे। चारों ओर वैचारिक क्रांति की आग सुलग गई। मुक्ति का एक ही उपाय, एक ही राह बची - हमारा गाँव, हमारा राज कायम करना। इतना कुछ होने तक मैं इस धरा पर पदार्पण कर चुका था। मैं प्रत्येक आदिवासी के दिलोदिमाग में प्रवेश कर गया था। आदिवासियों ने अपना राज कायम करने की ठान ली थी।
तभी संताल परगना के पूर्वी छोर में रेल लाईन बिछाने का कार्य शुरु हुआ। ऋण से दबे आदिवासी क्या करते? वे अपना घर-बार छोड़कर टिड्डी की भाँति काम की तलाश में निकल पड़े। सपरिवार रेल बिछाने की मजदूरी में जुट गए। अनाप-शनाप मजदूरी मिली पर महाजनों की धोखाधड़ी और कपट चाल के कारण ऋण की अदायगी न हो पाई। इसके विपरीत रेलवे के इंजीनियर, ठेकेदार एवं मुंशी वगैरह आदिवासी बालाओं को बुरी नजरों से घूरने लगे। माँ-बहनों की इज्जत से कोई खिलवाड़ करे, आदिवासियों से रहा न गया। उनका खून खौल उठा और उनसे बदला लेने की कसमें खाने लगे।
माँझी-परगनाओं की बैठकों में लिए गए निर्णयानुसार; अपने ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ लिखित माँग पत्र तैयार किया गया और उनकी प्रतिलिपि सारे संबंधित मैजिस्ट्रेटों को भेज दी गई। महीनों बीत जाने के बाद भी इस पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नजर नहीं आई। फिर मौखिक रुप से शिकायत करने के लिए माँझी-परगना के प्रतिनिधि मंडल ने जंगीपुर, देवघर और भागलपुर का दौरा किया। वहाँ भी कोई सुनवाई नहीं हुई। अंत में कोई उपाय न देखकर आदिवासी लोग सब से बड़े हकीम/लाट साहब, जिसका पदस्थापन कोलकाता में था, उनसे भेंट करने हेतु पैदल मार्च करने के लिए मजबूर हो गए। लॉर्ड वायसराय के पास पहुँचकर आदिवासियों ने जी भरकर रोते हुए अपना दुःखड़ा सुनाया पर उनकी आपबीती पर उसे भी कोई दया न आई। उनके कान में जूँ तक न रेंगी। इतनी दूर से शिकायत लेकर जाने पर तो शायद भगवान भी पसीज जाते पर चुरूट की कस लेने में मशगूल लाट साहब अपने में ही मस्त रहे। बेचारे आदिवासी मुँह लटका कर खाली हाथ घर वापस आ गए।
आदिवासियों को साफ दिखाई दे गया कि अब उनके लिए कहीं से कोई न्यायोचित इंसाफ की आस नहीं। उनके लिए न्याय के सारे दरवाजे बंद हो चुके थे। अब मैं जवानी की दहलीज पर खड़ा था। अंतिम उपाय के रुप में लोग मेरी ओर आशाभरी नजरों से देखने लग गए। जैसे, मैं ही हूँ उनका एकमात्र मुक्तिदाता। अब आप जानना चाहोगे मेरा नाम? आदिवासियों ने मेरा नामकरण किया हुआ था "हूल"। हूल शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई, यह अब भी रहस्य बना हुआ है। मुंडारी भाषा समूह के भाषाविद् भी इस शब्द की परिभाषा देने में असमर्थ रहे हैं। इस शब्द का शाब्दिक व साहित्यिक अर्थ समझाने में भी वे विफल रहे हैं। दुनिया की किसी भी भाषा में इसका सटीक अर्थ उपलब्ध नहीं। संक्षेप में हुल का मतलब ऐसा भी हो सकता है - जब इंसाफ के लिए न्याय के सारे दरवाजे जानबूझ कर बंद कर दिए जाएँ; तो न्याय पाने के लिए जो कार्रवाई की जाती है; उसे हूल कहा जाता है। बताते चलें कि इस शब्द का उपयोग इतिहास में सिर्फ एक ही बार हुआ है। वह है संताल हुल - 1855। भविष्य में इस शब्द का कभी उपयोग होगा, संदेह है। हिन्दुस्तानी में हूल शब्द रिश्ते में विद्रोह, बगावत, बलवा और क्रांति के दादा जी हैं।
नादान और भोले-भाले आदिवासियो की ऐसी नाजुक हालत देखकर मारांङ बुरु (सिंग बोंगा) की आँखों में आँसू आ गए। उसने भोगनाडीह के चुनू मुर्मू के सुपुत्रों सिदो, कान्हू, चाँद और भैरो को अलग-अलग रुपों में सात बार दर्शन दिए। वरदान देते हुए उसने उन्हें अपना राज्य स्थापित करने का आदेश दे दिया। फिर क्या था? चारों दिशाओं में शाल-पत्र व नगाड़े की धुन द्वारा भोगनाडीह में 28-30 जून, 1855 को एक विराट आमसभा आयोजित होने की सूचना दी गई। 30 हजार की भारी भरकम जनसंख्या ने अपने परंपरागत हथियारों से लैस उस आमसभा में शिरकत किया। तीन दिनों तक चली आमसभा में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि मारांग बुरु के आदेशानुसार अब एक ही उपाय रह गया है - हूल का प्रारंभ करना। मारांङ बुरु ने यह भी आदेश दिया है कि हूल का श्रीगणेश करने के लिए वह एक संकेत देगा। इस आमसभा में भी कई प्रस्तावना पारित किए गए एवं 15 दिनों का समय देते हुए, उसे संबंधित मैजिस्ट्रेटों को माँग-पत्र के रुप में भेज दिया गया। मैं अब प्रत्येक आदिवासी के जेहन में प्रवेश कर गया था। स्त्री हो या पुरुष, बच्चे हो या बूढ़े, सब के दिमाग में मैं घर कर गया था। चारों ओर मेरी और सिर्फ मेरी ही चर्चा होने लगी थी। मैं बिल्कुल तैयार बैठा था। सिर्फ इंतजार था तो उस शुभ संकेत का, जिसे मारांङ बुरु ने बताया था। आखिरकार, वह शुभ घड़ी आ ही गई। 7 जूलाई, 1855 को अत्याचारी केनाराम भगत की मिलीभगत से कुछ बेगुनाह आदिवासियों को गिरफ्तार किया गया था। कुख्यात दरोगा महेश लाल दत्ता बरहेट के रास्ते उन कैदियों को भागलपुर जेल ले जा रहे थे। पाडेरकोला के शाम (टुडू) परगना ने उन बेकसूर आदिवासियों को छुड़ाने की भरसक कोशिश की। लेकिन वे असफल रहे। हुल के चाणक्य कहे जाने वाले शाम परगना ने विवेक से काम लिया एवं तत्क्षण एक तेजधावक युवक को भोगनाडी इसलिए दौड़ा दिया ताकि वे सिदो-कान्हू को इस घटना की सूचना दे सके। यही माराङ बुरु का संकेत है; सिदो मुर्मू को समझने में कोई देर न हुई। उसने खतरा-संकेतिक नगाड़ा बजाने का आदेश दे दिया। तड़के भोर होते ही हजारों लोग बरहेट के समीप पाँचकठिया में एकत्रित हुए, क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि महेशलाल दरोगा इसी रास्ते से होकर कैदियों को भागलपुर ले जाएंगे। मुर्गे की दूसरी बाँग होते ही महेश लाल महायोद्धा की तरह खुद घोड़े पर सवार उन कैदियों को चाबुक से हाँक रहे थे। साथ में केनाराम भगत अन्य बरकंदजों के साथ चल रहे थे। महेश लाल दरोगा पाँचकठिया वट वृक्ष के नीचे हजारों की भीड़ देखकर सहम गए। उसे माजरा समझ में न आया। सरकारी रोब दिखाते हुए उसने भीड़ को चीरते हुए कैदियों को आगे ले जाने की हिम्मत जुटाई पर सामने कान्हू मुर्मू की दहाड़ सुनकर वे सिहर उठे। दरोगा को काटो तो खून नहीं।
गरमागरम बहस में कान्हू मुर्मू ने चिंघाड़ते हुए दरोगा से कहा - "यह मेरा देश है और ये मेरी प्रजा हैं। इन्होंने कोई गुनाह नहीं किया है। अतः इन्हें बाइज्जत रिहा कर दो।" पर दरोगा अपनी जिद पर अड़े रहे और सरकारी काम में बाधा डालने वाले को सख्त से सख्त सजा देने का फरमान सुना दिया। तब तक भीड़ में से किसी ने गरभू देशमाँझी जो कैदियों में से एक था की हथकड़ी खोल दी। हथकड़ी खुलते ही गरभू देशमाँझी ने भीड़ के किसी व्यक्ति से फरसा छीनते हुए आव देखा न ताव; अपने जानीदुश्मन केनाराम भगत पर वार कर दिया। गरभू देशमाँझी ने मेरा नाम अर्थात् हूल ... हूल का हुंकार भरते हुए केनाराम भगत का सिर धड़ से अलग कर दिया। एकत्रित भीड़ बाकी कैदियों को भी छुड़ाते हुए दरोगा महेश लाल और उनके सहयोगियों पर टूट पड़ी एवं उनकी हत्या कर दी। सुबा ठाकुर सिदो मुर्मू ने हुल का एलान कर दिया। उसने आदिवासी सैनिकों को आदेश दे दिया कि जो अत्याचारी हैं, उन्हें तलवार की धार दिखा दो एवं जो इन्हें बचाने आएगा, उन्हें अपने देश से बाहर खदेड़ दिया जाए। आदिवासी सैनिकों और अंग्रेज सिपाहियों के बीच घमासान युद्ध हुआ। हुल थमने का नाम नहीं ले रहा था। चारों दिशाओं में आदिवासी सैनिकों का परचम लहरा रहा था। मजबूर होकर अंग्रेज प्रशासकों को 10 नवंबर, 1855 को मार्शल लॉ लागू करना पड़ा। तब तक हुल के महानायक सिदो मुर्मू को छलपूर्वक गिरफ्तार किया गया और उन्हें अपने जन्मस्थल भोगनाडीह मेें तत्कालीन सुपरिन्टेन्डेंट जेम्स पोन्तेत द्वारा भारी भीड़ के सामने फाँसी दे दी गई। हुल में आदिवासी सैनिक बेशक हार गए पर वे अपना लक्ष्य प्राप्त करने में विजयी रहे। महानायक सिदो मुर्मू एवं 60 हजार आदिवासी सैनिकों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। पर उन शहीदों के खून से आदिवासियों के लिए एक अलग प्रदेश संताल परगना का गठन 22 दिसंबर, 1855 को कर दिया गया। जहाँ आदिवासियों को स्वशासन की पूरी छूट दी गई। इस तरह मैं अपने मिशन में कामयाब हो गया।
वक्त बदलता गया। आदिवासी अपनी मस्ती में सारे होश खो बैठे। अपना मतलब पूर्ण होने पर मैं अंडे के छिलके की तरह फेंक दिया गया। कुछ ही वर्षों के बाद शनैः-शनैः आदिवासियों की हालत फिर बिगड़ती गई। कुख्यात दरोगाओं और अत्याचारी महाजनों का पुनर्जन्म होने लगा। आदिवासियों को फिर वही अंग्रेज काल की दशा झेलनी पड़ गई। मारांङ गोमके और दिशोम गुरु का उदय हुआ भी, पर आदिवासियों की हालत जस की तस बनी रही; क्योंकि बारंबार मेरी भ्रूण हत्या हो रही थी। कोई जोड़ा बैल में जुड़ रहा था तो कोई साढ़े तीन करोड़ में बिक रहा था। और तो और सिंग बोंगा द्वारा प्रदत्त झारखंड प्रदेश की रक्षा करने में आदिवासी विफल रहे। आदिवासियों की इस तरह बिगड़ती हुई हालत देखकर मुझे दया आ रही है। आदिवासियों को बचाने हेतु मैं पुनः आऊँगा। इंतजार है, तो बस उस 30 जून का, जिसमें सर्वसम्मति से हूल करने की घोषणा की जाएगी।