आज ही रो लो ...
प्रकृति का यह विचित्र नियम है। मनुष्य बीते हुए कल के लिए रोता है। वह आने वाला कल के लिए भी आंसू बहाता है। और आश्चर्य तो तब होता है, जब वह वर्तमान में भी रो-रोकर जीता है। आगे नाथ न पीछे पगहा। हर मनुष्य अत्यधिक पीड़ित है। उसपर नानक दुखिया सब संसार वाली बात हो जाती है। इस धरती पर उसका आगमन रोते हुए होता है, तो जाना भी हाय कितना पीड़ादायक है?! उसे जिंदगी में चैन ही नहीं। तभी तो दार्शनिकों के कुछ समूह ने संघर्ष ही जीवन है का नाम दिया है। अतः अभी रो लेने में ही भलाई है।
संविधान के साथ ही सूर्योदय हो चुका है। सूरज देवता मीठी-मीठी मुस्कान लिए सर्वत्र अपनी भीनी-भीनी खुशबू बिखेर रहा है। हर प्राणी जाग उठा है। और सभी प्राणी अपने-अपने कामों में अति व्यस्त हो चले हैं। लेकिन अब सूरज ढल चुका है। सभी प्राणी अब थक हार चुके हैं। और वह देखो, अब सूर्यास्त हो ही चुका है। अब घनी अंधेरी रात आएगी। विडंबना यही कि यह एक ऐसी काली रात होगी जो कभी सुबह का मुख न देख पाएगी!
आज की तारीख में ध्रुव राठी को कौन नहीं जानता है? उसने चाय वाले को अपना आईना दिखा दिया है। उनकी दिलेरी देखो। उसने अभिमन्यु की तरह आज के तनाशाह की मांद में घुसकर हमला बोल दिया है। फिर भी न जागो, तो लाख ध्रुव राठी भी आपको कुछ नहीं कर सकता है।
स्मरण दिला दूं 16 दिसंबर, 2023 दुमका की घटना। एक ऐसा शख्स जिसे जनता ने दिल्ली दरबार के लिए अपने प्रतिनिधि के रूप में चुना है, वह अपने ही समाज को आग के हवाले कर रहा था। वह उल जलूल तर्कों पर वाहवाही लूटने के लिए दर्शको से बार-बार चाय वाले के स्टाईल में कह रहा था - ”सा़री काना से बाङ बोयहा?“ खैर, 4 फरवरी 2024 उसको जवाब दिया जा चुका है।
दुनिया कहां जा रही? देश कहां जा रहा है? राज्य कहां जा रहा है? और तो और हम आदिवासी कहां जा रहे हैं? आदिवासियों में भी संताल कहां जा रहे हैं? एकमुश्त देखा जाए, तो संतालों की समस्या अनगिनत हैं। संताल समाज को सिर्फ सर्दी-खासी ही नहीं, बल्कि वह किसी लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो गया है। इसे आप कैंसर रूपी बीमारी भी कह लें, तो कोई हर्जा नहीं है। अब कैंसर का एक ही इलाज ऑपरेशन।
2024 लोकसभा चुनाव दस्तक दे चुका है। इस चुनाव में कई तरह के छोटे-बड़े मदारियों का पदार्पण होगा। मदारी अपने-अपने पिटारे से कई तरह के सांप-बिच्छुओं को निकालेंगे। कई तरह के तमाशे होंगे। और अंत में मदारी पैसा वसूल कर वहां से 5 वर्षें के लिए रफूचक्कर हो जाएगा।
अब यह जानना बड़ा दिलचस्प होगा कि संताल इस भागमभग की दौड़ में कहां स्थित है? क्या वह इस वैज्ञानिक की आधुनिक दौड़ में शामिल भी है अथवा नहीं? कहीं वह धरती का बोझ तो नहीं हो गया है? कहीं वह लाश में परिवर्तित तो नहीं हो गया है? इस छोटे-से लेख में खासकर संताल परगना में बसे संतालों की बात हो रही है। कारण कुछ भी रहा हो, पर यहां कोई भी सामाजिक संगठन हो, अपना दायित्व निभाने में विफल रहा है। यहां की जनता खासकर संताल अपने अस्तित्व की रक्षार्थ राजनीतिक दलों की बाट जोहते-जोहते उनकी आंखें पथरा गई हैं।
संताल हूल-1855 ने हमें बहुत कुछ दिया। पर हम नादान बालक उसे संभाल न पाए। हूल के परिणाम अपनी यौवनावस्था को देख भी न पाया और वह चल बसा। अलग राज्य भी मिला। पर वह भी खोदा पहाड़ निकली चूहिया, वह भी मरी हुई। हमारी हालत करेला तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ी वाली बात हो गई। बेबुनियाद समस्याओं को लेकर हम आपस में ही पिल पड़े हैं। पेट में अन्न नहीं और हम अपनी पहचान पाने के लिए जूझ रहे हैं। धर्म और लिपि के लिए हम एक दूसरे के खून के प्यासे हो चले हैं। भाई को भाई समझने में हम विफल रहे हैं।
निवेदन है; समय की मांग को देखते हुए चलो हम एकजुट हो जाएं। तमाम तरह के विभेदों से ऊपर उठ जाएं। सभी मिलकर अपने दुश्मनों से लड़ने की कसम खा लें। वरना हमारी मौत निश्चित है। संविधान एवं एसपीटी को जिंदा ही दफना दिया गया है। वह दुर्दिन ज्यादा दूर नहीं, जब हम गुलामी की जिंदगी जीने को मजबूर हो जाएंगे।