Monday, 5 February 2024

 आज ही रो लो ...

प्रकृति का यह विचित्र नियम है। मनुष्य बीते हुए कल के लिए रोता है। वह आने वाला कल के लिए भी आंसू बहाता है। और आश्चर्य तो तब होता है, जब वह वर्तमान में भी रो-रोकर जीता है। आगे नाथ न पीछे पगहा। हर मनुष्य अत्यधिक पीड़ित है। उसपर नानक दुखिया सब संसार वाली बात हो जाती है। इस धरती पर उसका आगमन रोते हुए होता है, तो जाना भी हाय कितना पीड़ादायक है?! उसे जिंदगी में चैन ही नहीं। तभी तो दार्शनिकों के कुछ समूह ने संघर्ष ही जीवन है का नाम दिया है। अतः अभी रो लेने में ही भलाई है।

 संविधान के साथ ही सूर्योदय हो चुका है। सूरज देवता मीठी-मीठी मुस्कान लिए सर्वत्र अपनी भीनी-भीनी खुशबू बिखेर रहा है। हर प्राणी जाग उठा है। और सभी प्राणी अपने-अपने कामों में अति व्यस्त हो चले हैं। लेकिन अब सूरज ढल चुका है। सभी प्राणी अब थक हार चुके हैं। और वह देखो, अब सूर्यास्त हो ही चुका है। अब घनी अंधेरी रात आएगी। विडंबना यही कि यह एक ऐसी काली रात होगी जो कभी सुबह का मुख न देख पाएगी! 

आज की तारीख में ध्रुव राठी को कौन नहीं जानता है? उसने चाय वाले को अपना आईना दिखा दिया है। उनकी दिलेरी देखो। उसने अभिमन्यु की तरह आज के तनाशाह की मांद में घुसकर हमला बोल दिया है। फिर भी न जागो, तो लाख ध्रुव राठी भी आपको कुछ नहीं कर सकता है।

स्मरण दिला दूं 16 दिसंबर, 2023 दुमका की घटना। एक ऐसा शख्स जिसे जनता ने दिल्ली दरबार के लिए अपने प्रतिनिधि के रूप में चुना है, वह अपने ही समाज को आग के हवाले कर रहा था। वह उल जलूल तर्कों पर वाहवाही लूटने के लिए दर्शको से बार-बार चाय वाले के स्टाईल में कह रहा था - ”सा़री काना से बाङ बोयहा?“ खैर, 4 फरवरी 2024 उसको  जवाब दिया जा चुका है।

दुनिया कहां जा रही? देश कहां जा रहा है? राज्य कहां जा रहा है? और तो और हम आदिवासी कहां जा रहे हैं? आदिवासियों में भी संताल कहां जा रहे हैं? एकमुश्त देखा जाए, तो संतालों की समस्या अनगिनत हैं। संताल समाज को सिर्फ सर्दी-खासी ही नहीं, बल्कि वह किसी लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो गया है। इसे आप कैंसर रूपी बीमारी भी कह लें, तो कोई हर्जा नहीं है। अब कैंसर का एक ही इलाज ऑपरेशन।

2024 लोकसभा चुनाव दस्तक दे चुका है। इस चुनाव में कई तरह के छोटे-बड़े मदारियों का पदार्पण होगा। मदारी अपने-अपने पिटारे से कई तरह के सांप-बिच्छुओं को निकालेंगे। कई तरह के तमाशे होंगे। और अंत में मदारी पैसा वसूल कर वहां से 5 वर्षें के लिए रफूचक्कर हो जाएगा।

अब यह जानना बड़ा दिलचस्प होगा कि संताल इस भागमभग की दौड़ में कहां स्थित है? क्या वह इस वैज्ञानिक की आधुनिक दौड़ में शामिल भी है अथवा नहीं? कहीं वह धरती का बोझ तो नहीं हो गया है? कहीं वह लाश में परिवर्तित तो नहीं हो गया है? इस छोटे-से लेख में खासकर संताल परगना में बसे संतालों की बात हो रही है। कारण कुछ भी रहा हो, पर यहां कोई भी सामाजिक संगठन हो, अपना दायित्व निभाने में विफल रहा है। यहां की जनता खासकर संताल अपने अस्तित्व की रक्षार्थ राजनीतिक दलों की बाट जोहते-जोहते उनकी आंखें पथरा गई हैं। 

संताल हूल-1855 ने हमें बहुत कुछ दिया। पर हम नादान बालक उसे संभाल न पाए। हूल के परिणाम  अपनी यौवनावस्था को देख भी न पाया और वह चल बसा। अलग राज्य भी मिला। पर वह भी खोदा पहाड़ निकली चूहिया, वह भी मरी हुई। हमारी हालत  करेला तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ी वाली बात हो गई। बेबुनियाद समस्याओं को लेकर हम आपस में ही पिल पड़े हैं। पेट में अन्न नहीं और हम अपनी पहचान पाने के लिए जूझ रहे हैं। धर्म और लिपि के लिए हम एक दूसरे के खून के प्यासे हो चले हैं। भाई को भाई समझने में हम विफल रहे हैं।

निवेदन है; समय की मांग को देखते हुए चलो हम एकजुट हो जाएं। तमाम तरह के विभेदों से ऊपर उठ जाएं। सभी मिलकर अपने दुश्मनों से लड़ने की कसम खा लें। वरना हमारी मौत निश्चित है। संविधान एवं एसपीटी को जिंदा ही दफना दिया गया है। वह दुर्दिन ज्यादा दूर नहीं, जब हम गुलामी की जिंदगी जीने को मजबूर हो जाएंगे। 

Friday, 2 February 2024

एकता में ही बल था ...

संताल इतिहास में दो सबसे बड़ी ऐसी घटना हुई है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। पहली घटना थी; जब "चाम्पा देश" में हमारा साम्राज्य था। संतालों के बारह गोत्रों के पास अलग-अलग किले थे; एवं उन सभी गोत्रों का व्यापार भी अलग-अलग था। यही कारण था कि हम दूध-दही की नदियों में नहाया करते थे। परंतु समय ने पलटा खाया। और समाज की इज्जत को बचाने हेतु “माधो सिञ” के डर से हम उस देश को सदा के लिए छोड़कर वहां से पलायन कर गए।

दूसरी घटना; आज से ठीक 168 वर्ष पूर्व, तब देश में अंग्रेजों का शासन था। हमने उनसे अत्याचार के विरुद्ध "हूल" किया और शेर के जबड़े से अपने संताल परगना को खींचकर बाहर निकाल लिया। ऐसा इसलिए संभव हो सका, क्योंकि तब हम एकता के सूत्र में बंधे हुए थे। उस समय संतालों के बीच न लिपि विवाद था, न धर्म की खेती होती थी और न ही तब संतालों में उत्तरी-दक्षिणी की कोई लउ़ाई थी। लेकिन आज? आज हम हजार टुकड़ों में बंट गए हैं। हमारा कोई माय-बाप नहीं। यही कारण है कि आज संताल समाज गर्त्त में जा रहा है। इसे शायद भगवान भी न बचा पाएगा।

हो सकता है संतालों के डीएनए में ही कोई खराबी हो। हो सकता है उनके खून में ही कोई खोट हो। नहीं तो क्या कारण है कि हम आपस में तो बेवजह खून के प्यासे हो जाते हैं, परंतु दुश्मनों के सामने हमारी घिग्घी बंध जाती है। उनके सामने हम शेर से चूहा बन जाते हैं।

यह शोध का विषय हो सकता है; क्यों उत्तरी-दक्षिणों के संतालों में इतना कहर बरपा है? क्यों इन दोनों के बीच लिपि के चक्कर में इतनी बड़ी दीवार खड़ी हो गई है? क्यों वे एक दूसरे के खून के प्यासे हो चले हैं? और तो और संताल समाज वर्तमान में कई समस्याओं से जूझ रहा है। पर लोग सभी समस्याओं को छोड़कर लिपि विवाद में ही उलझकर रह गए हैं। इससे अच्छी तरह समझने के लिए ब्रिटिश काल में हुए एक भाषाई सर्वेक्षण की ओर नजर दौड़ाते हैं।

तब देश में अंग्रेजों का शासन था। उसी दौरान सन् 1894 से लेकर 1928 तक भारत में जी. ए. ग्रियर्सन की अगुवाई में एक भाषाई सर्वेक्षण हुआ था। उस सर्वेक्षण में भाषाविदों ने स्पष्ट तौर पर अपनी रिपोर्ट मे लिख डाला; चूंकि संतालों के दक्षिण हिस्से में जो संताली बोली जाती है; वह मिश्रित व प्रदूषित हो चुकी है, जबकि उत्तर में बोली जाने वाली संताली अभी तक विशुद्ध है; अतएव उत्तरी संताली ही मानक (Standard) है। (Linguistic Survey of India, Vol-IV, Page No. 32).

ध्यान रहे; तब उत्तर में संताली साहित्य ने गति पकड़ ली थी। वगैर किसी रोक-टोक व बधित हुए कई पुस्तकें व पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगीं। यह भी संज्ञान लेने वाली बात है कि उत्तर संतालों का गढ़ मना जाने वाला संताल परगना के संतालों ने ब्रिटिश शासक के खिलाफ सन् 1855 में एक बहुत बड़ा “हूल” कर दिया था। इस हूल ने संतालों की महानता पर एक अमिट छाप छोड़ दी है। क्योंकि उस हूल के बदौलत ही संतालों के लिए एक अलग देश (जिला) संताल परगना का गठन हुआ है।

सन् 1947 में भारत देश आजाद हुआ। तब सरकारी स्तर पर शैक्षणिक क्षेत्रों पर बगैर रोमन लिपि की अवहेलना किए देननागरी लिपि से पुस्तकों का प्रकाशन होते रहा है। खसियत यही है कि रोमन हो या देवनागरी, दोनों लिपियों से शुद्ध-शूद्ध उत्तरी संताली लिखी व पढ़ी जाती है।

फिर क्या था? दक्षिण के संताल ईर्ष्या की बीमारी से पीड़ित तो थे ही, उन्होंने आनन-फानन में एक चोरी की हुई लिपि को जन्म दिया। और उस लिपि के प्रचार में रात-दिन एक कर दिया। उनके पास और कोई चारा तो था नहीं, अतएव उन्होंने लिपि को अपनी पहचान एवं अस्मिता के रूप में ढाल की तरह उपयोग करना शुरु कर दिया। जब लोगों ने इस लिपि को सिरे से खारिज कर दिया, तो इन्होंने इसे "आबोवाक्-आबोवाक्" कहा एवं इसे धर्म के साथ जोड़ दिया। मामला यहीं नहीं रुका, कुछ दिन पूर्व झारखण्ड सरकार देवनागरी लिपि से संताली पुस्तकों का प्रकाशन कर रही थी। फिर इन बुगड़ीधारियों ने जिनकी भाषा ही बिगड़ चुकी है, इन पर टांग अड़ा दी। इसके बाद सोशल मीडिया में इन्होंने जिस असंवैधानिक भाषा का उपयोग करते हुए देवनागरी समर्थकों को गाली-गलौच दिया है, यह किसी से छुपा नहीं है।

ओल चिकी समर्थक कितना भी जोर लगा लें, कोई भी राजनीतिज्ञ कितना भी ट्वीट कर लें, लेकिन यह सच है कि “कागज के फूलों से कभी खुशबू आ नहीं सकती है।” अतएव कभी एकता थी, अब वह कहीं गुम हो गई।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...