Thursday, 4 April 2024

आओ शेरनी का दूध पीयें 

"शिक्षा शेरनी का वह दूध है, जो इसे पीयेगा वह दहाड़ेगा।" - बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर। 

बाबा साहेब का उपरोक्त कथन सौ प्रतिशत सत्य है। हूल तक संताल आदिवासी अर्द्धनग्न ही रहा करते थे। वे दुनिया से वाकिफ न थे। पर उसने जो हूल किया, वह अपवाद ही है। ऐसा इसलिए संभव हो सका, क्योंकि वे अनपढ़ जरुर थे पर ज्ञानी थे। हूल के ठीक 5 वर्ष बाद 1860 को संताल परगना में ईसाई मिशनरियों को आगमन हुआ। उन्हें अच्छी तरह समझ में आ गया था कि अगर इन भोले-भाले संतालों को शिक्षित नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं, जब वे दुबारा इन्हीं कुख्यात महाजनों के गुलाम बन जाएंगे। इसलिए मिशनरियों ने शिक्षा पर विशेष ध्यान देना उचित समझा। इसका नतीजा आज आपके सामने है कि जगह-जगह मिशन स्कूल चलाये जा रहे हैं। अगर उनकी मंशा लोगों को ईसाई बनाना ही होता, तो वे कबके सबों को ईसाई बना दिए होते। 2011 के जनगणना के अनुसार संताल परगना में ईसाईयों की जनसंख्या मात्र 5 प्रतिशत ही है। जनसंख्या छोटी है, पर घाव करे गंभीर। उसने चींटी की भाँति हाथी की नाक में दमकर रखा है। आखिर उसने शेरनी का दूध जो पीया है। अतः वह दहाड़ तो मारेगा ही। जब भी आदिवासियों के साथ अन्याय व अत्याचार हुआ है, यही वह शेरनी का दूध पीने वाला शख्स है, जिसके दहाड़ से अच्छे-अच्छों की बोलती बंद होती है। झारखण्ड आंदोलन हो या और कोई अन्य आदिवासी आंदोलन, इन शेरनी का दूध पीने वालों ने बढचढ़ कर हिस्सा लिया है। जहां कहीं भी आदिवासियों के साथ अन्याय हुआ है, ईसाई आदिवासियों ने इसका जमकर प्रतिरोध किया है। सिर्फ एक घटना ही उदाहरण के लिए काफी है। और वह है - बांझी कांड। यह घटना 19 अप्रैल, 1985 को घटित हुई, जिसमें भू.पू. सांसद फादर अन्थोनी मुर्मू सहित 19 लोग शहीद हो गए। 

रहस्य यही है कि जब भी आदिवासियों के साथ अन्याय होता है, यही ईसाई आदिवासी उसके विरोध में ढाल की तरह सामने आ खड़े होते हैं। ईसाई आदिवासी ने कभी अपने आपको आदिवासी समुदाय से अलग नहीं रखा है। बल्कि उसने हर आदिवासी सामुदायिक कार्यक्रम में बढचढ़ कर हिस्सा लिया है। यहां एक बात समझना बहुत जरुरी है। अंग्रेज आगमन से पूर्व आदिवासी/हरिजन/पिछड़ा वर्ग हिन्दुओं की जाति व्यवस्था के अंतर्गत शूद्र की श्रेणी में रखा गया है। जिन्हें तथाकथित हिन्दुओं द्वारा भयानक रूप से प्रताड़ित किया गया था। अब हिन्दुओं के ठेकेदार भाजपा/आरएसएस फिर से वही दिन लाना चाहते हैं, जिसमें शूद्रों को गुलाम बनाये व पीटे जाने की प्रथा है। हिन्दुओं के धर्म ग्रंथों में भी साफ-साफ उल्लेख है कि ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी। अब बाबा लोग इसकी व्याख्या कुछ भी करता रहे, पर इसका भावार्थ ‘पीटे जाने’ से ही संबंधित है।

ईसाई आदिवासी, आदिवासियों के ढाल हैं। यही कारण है कि मनुवादी विचारधारा के लोग अर्थात् भाजपा/आरएसएस जब तक ईसाईयों को आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) सूची से बाहर नहीं करता है, तब तक उनकी दाल गलने वाली नहीं है। यही कारण है कि भाजपा/आरएसएस वालों ने भेद की नीति के तहत जिन आदिवासियों ने हिन्दु धर्म को अपना रखा है, उन्हें ईसाईयों के खिलाफ खड़ा कर दिया है।

यहां समझने वाली बात यह है कि इस लड़ाई में मनुवादी (भाजपा/आरएसएस) कभी सामने नहीं आते हैं, बल्कि इस काम के लिए उन्होंने अपने गुर्गे छोड़ रखे हैं। और वे सिर्फ सूत्रधार का काम करते हैं। अर्थात् वे आदिवासी के विरुद्ध आदिवासी को खड़ा करने में सफल हो गए हैं।

सबसे अश्चर्य वाली बात तो यह है कि जिस आदिवासी ने पूर्णरुपेण हिन्दु धर्म को अंगीकृत किया हुआ है, वैसे ही आदिवासी, ईसाईयों को डीलिस्ट करने की बात कर रहा है। इसका अर्थ यही हुआ, अगर डीलिस्ट करने की नौबत आ गई, तो सबसे पहले ऐसे ही आदिवासी हिन्दुओं को डीलिस्ट किया जाएगा। इसे ही कहा जाता है; जिस डाली पर बैठना, उसी को काटना। 

यह भी सच है कि किसी मनुष्य जाति के माथे पर उसकी पहचान संबंधित कोई भी चिन्ह् अंकित नहीं होता है। फिर उसे डीलिस्ट करने के लिए कौन-सा मापदंड अपनाया जाएगा एवं ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में कौन होगा उसे पहचान करने वाला अधिकारी? यह एक विकट समस्या आ खड़ी होगी। अगर संताल आदिवासी की बात की जाए, तो उनके बारह गोत्रों में कोई मुर्मू, टुडू ...वगैरह होगा, तो उसकी पहचान संतालों में तो हो ही जाएगी, पर वह किस धर्म को मानता है, यह पता लगाना बहुत ही मुश्किल काम होगा। 

थोड़ी देर के लिए माना कि डीलिस्टिंग करने का आदेश हो गया। फिर आदिवासियों का क्या होगा? आदिवासियों के उपरोक्त धार्मिक विभाजन को देख लें, तो उसके अनुसार 95 प्रतिशत (हिन्दु, ईसाई, अन्य) आदिवासी तो डीलिस्ट हो गए। फिर आरक्षण किसके लिए? घ्यान देने वाली बात है कि अगर ऐसा हुआ, तो बाबा साहेब द्वारा निर्धारित आरक्षण देने की मूल आवधारणा ही बेमानी हो जाएगी। कारण; विशेषकर आदिवासियों के मामले में आरक्षण के लिए धर्म को आधार कभी नहीं माना गया है।

जब तक संविधान जिन्दा है, तब तक आदिवासियों का डीलिस्ट होना संभव नहीं है। फिर भाजपा के गुर्गे क्योंकर डीलिस्टिंग के मुद्दे को हर पांच साल में उछालते रहा है? ऐसा इसलिए ताकि ऐसा कृत्यकर आगामी लोकसभा चुनाव में अपने पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण कर सके। 2024 के लोकसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठता है, यह तो वक्त ही बता पाएगा। 

खैर कुछ भी हो, पर इतना सच है कि भाजपा/आरएसएस वाले आदिवासियों को गुमराह करने में सफलता पा लिया है। अगर समय रहते इस षड्यंत्र को नष्ट नहीं किया गया, तो निश्चित रूप से आदिवासियों का भविष्य अंधकारमय ही होगा। आइए सभी आदिवासी जागें एवं भाजपा/आरएसएस की चाल को बेनकाब करने की कसमें खा लें।


Tuesday, 2 April 2024

 आज के गरभू देशमांझी ...

यह सोलह आना सही है कि कोई भी चीज हाथ में आ जाय, तो उसकी अहमियत तत्क्षण खत्म हो जाती है। वह चीज क्यों और कैसे मिली? उसके संघर्ष की गाथा शनैः-शनैः मलिन हो जाती है। इस रहस्य को आप ऐसे भी समझ सकते हैं। मान लो; कोई ऑरिजिनल (मूल) दस्तावेज है। उस ऑरिजिनल से एक फोटोकॉपी निकाली गई। फिर उस फोटोकॉपी से और कोई फोटोकॉपी निकाली गई। इस तरह फोटोकॉपी से फोटोकॉपी निकलती गई। यकीन मानो, कुछ वर्षों के बाद वह फोटोकॉपी धूमिल हो जाएगी। उस फोटोकॉपी में ऑरिजिनल जैसा अब कुछ भी नहीं दिखाई देगा। अब फोटोकॉपी करने से कागज सफेद ही निकलेगा। ठीक यही स्थिति संताल हूल, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और झारखण्ड आंदोलन के साथ भी घटित हो गई है। 

आज से ठीक 169 वर्ष पूर्व की घटना है। तब लोगों के हाथ में न एंड्रोयड फोन उपलब्ध था, न चमचमाती कार थी और न ही उनके पास बड़े-बड़े मकान थै। उनके पास आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं। उनमें एक भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति मौजूद नहीं था। एक हाथ वस्त्र से पूरा शरीर ढंका जाता था। ऐसी हालत में करेला तो करेला, वह भी ऊपर से नीम चढ़ा। लोग सीधे और सरल थे। उनका सीधापन का अशुभ लाभ गैरों ने खूब उठाया। तब अत्याचार की बाढ़ सिर से ऊपर बहने लगी थी। पर जनता इस मुस्किलत से उबार पाने के लिए अंदर ही अंदर योजनाएं बनाने में व्यस्त थीं। वे अपने संघर्ष का रोड मैप बना रहे थे।

6 जुलाई 1855 की घटना। आज के संताल परगना के आमड़ापाड़ा-लिटीपाड़ा आसपास के गाँवों से चार लोगों को आज के ई.डी. ने गिरफ्तार कर लिया। उनका कसूर भी आपके सीटिंग मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के सीटिंग मुख्यमंत्री केजरीवाल के सदृश था। ई.डी. के अफसर उन गिरफ्तार हुए कैदी को आमड़ापाड़ा, बरहेट के रास्ते भागलपुर जेल पैदल ही ले जा रहे थे। कड़ाके की धूप थी। चारों कैदियों के हाथ-पैर बांधे हुए थे। कैदियों को खाना तो दूर, प्यास बुझाने के लिए एक बूंद पानी तक नसीब न था। ई.डी. के दो अफसर सफेद घोड़े पर शान के साथ सवार थे। दोनों अफसरों को धूप से बचाने के लिए सिपाहियों ने उनके सिर के ऊपर छतरी लिये हुए थे। उन कैदियों में से एक कदकाठी (हेमंत/केजरी) नौजवान भी था। वह भूख और प्यास से तड़प रहा था। वह चल सकने में भी असमर्थ था। ऐसी हालत में भी उसे घसीटा जा रहा था। उनकी हालत पर किसी ई.डी. अफसरों को तरस न आया। और वे आमड़ापाड़ा से चलकर पाडेरकोला पहुंच गए। पाडेरकोला में शाम परगना एक सज्जन व्यक्ति का वास था। वह व्यक्ति बहुत ईमानदार और बुद्धिमान था। उसने ई.डी. के अफसरों से नाक रगड़ते हुए गुहार लगाई - "ये लोग निर्दोष हैं। इन्हें कृपया रिहा कर दो।" पर आका का हुक्म था, ई.डी. के अफसरों ने उनकी एक न सुनी। और वे कैदियों के साथ अपने गंतब्य की ओर आगे बढ़ चले। 

देश की जनता को अच्छी तरह मालूम था कि एक न एक दिन हमारे निर्दोष लोगों को गिरफ्तार कर लिया जायगा। ऐसी स्थिति को संभाल पाने के लिए वे साल भर पूर्व से तैयारी करने में जुटे हुए थे। कहा जाता है कि लोगों ने बन-जंगलों से तीर-धुनष बनाने के लिए बांस-बल्ली (बुरु-मात्) ले आये थे। उन्हें काट-झांटकर सूखने के लिए पत्थरों से दबा दिया था। राहुल का हुक्म था कि प्रत्येक घर से कम से कम एक बैलगाड़ी (मिमित् सागाड़काते) के बराबर तीर-धनुष तैयार हो जाना चाहिए। तलवार, टांगी, फरसा निर्माण हेतु लोहारों की मदद ली जाए। यह योजना साल भर में तब तक तैयार हो चुकी थी। 

अपने निर्दाेष लोगों की गिरफ्तारी की खबर देश भर में दावानाल की तरह फैल गई। सिदो-कान्हू के नेतृत्व में रात भर में अस्त्र-शस्त्र से लैश 30 हजार लोगों की भीड़़ बरहेट के समीप पांचकठिया में एकत्रित हो गई। तड़के सुबह अर्थात् 7 जुलाई 1855 ई.डी. अफसरों की भिड़ंत सिदो-कान्हू से हुई। उनलोगों के बीच तू-तू, मैं-मैं होती रही और इधर गारभू ने का़पी (A battle axe) से दोनों अफसरों को मौत के घाट उतार दिया। हूल संपन्न हुआ। और उस हूल के बदौलत संताल परगना मिल गया। (रावण को मालूम था कि उसकी मौत राम के हाथों होगी। उसी तरह आज के रावण को भी मालूम है, उसकी मौत किसके हाथ होगी।)

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...