Thursday, 15 August 2024

HO̱HO̱ET́AE BIṬLẠHA

“Hẽ̱ ya, un din do̱ okarepe tahẽ̱̱kana? Okaṭak̕ bhugạk̕repe huṛạt̕akan tahẽ̱kana? Bejãe un din do̱ mẽ̱t̕ge baṅ saṛok̕kantape tahẽ̱kan? Tinạk̕ din kho̱n miť lape̱ť sea mạṇḍ̕i hõ̱ aleak̕ lac̕re baṅ bo̱lo̱akana, ale re̱ṅge̱c̕tele jale-thale ńamakan tahẽ̱ mẽ̱ť do̱ ceka totkare tahẽ̱kantapea? Oṛak̕re cuṭĩạko do̱n gujuk̕kana, miť cupuť khode caole bạnuk̕talea. Un jo̱khe̱n ape susạriạko do̱ okarepe burumakan tahẽ̱kana? Nit nõ̱k̕õ̱e noa ạkrińkate jagele jo̱m lo̱lo̱k̕kanre, ạḍi jo̱lo̱npe ạikạuet̕a? Liṭạ Goḍet ạḍile sarhaoedea, e̱nte uni baṅkhan, ale do̱ re̱ṅge̱c̕tele go̱c̕ kuṛcuṅkok̕a. Uni oka rạnu capat̕e sorwa oṭoakať do̱ ṣamạni bhạlại reak̕ kạituk! Nit do̱ sạrige jug cetan jug hạbic̕ reak̕ mõ̱ńjo̱ko̱c̕ ạri! Dhar-udhạrkate jage mit̕bar puńjile lagaoeda. Onate rạnu emanle saoda ạguiyeda. Jage mit̕bar bo̱to̱l ạkrińok̕kantalea. Ona poesate nõ̱k̕õ̱ele jo̱m lo̱lo̱k̕kanre mẽ̱ť jolok̕kantapea? Khabe̱rdar, hạṇḍi ạkrińpe manaket̕le, ṭhik do̱ baṅ hoyok̕a.”

“Henda ya ṭõ̱ebak̕, noa hõ̱ disạkak̕pe. O̱ko̱e họṅgo̱reda hạṇḍi? Ceka alele ho̱ṅgo̱reda? Apege co̱ ya, bidhuạ! Alegepe cạrik baṛalea. Ale baṅkhan, dinge baṅ calak̕tapea. Apege co̱ haṭ kan, baṭ kan, mela kan, ṭhela kan ale ṭhengepe ńir hijuk̕a. Apege co̱ yape ce̱re̱c̕ baṛale. Apege co̱ yape je̱ńjle̱ baṛae. Hạṇḍi alope ńũia. Bale dokana. Apepe ńũiet̕tege tho̱rle ạkrińet̕a.” ...

“... Ar ape ko̱le̱j koṛa! Ce̱ť no̱le̱j hõ̱ co̱ ya, bạnuk̕tape. Po̱rko sãotele hihi-haha baṛaere mẽ̱ť jolok̕kantapea? Ceka ale hõ̱ mo̱ṭo̱r saekel reak̕ tayo̱m gaṇḍore de̱jo̱k̕ reak̕ sad do̱ bạnuk̕talea? Dinomge marak̕ lekale saj oḍokok̕ cintạ bạnuk̕talea? Ale hõ̱ sinạmaren kuṛi leka saj bajkatele haṭ baṛae, ceka baṅ mo̱ne̱alea? Mõ̱ńjge kạcni bande ar so̱ sunum-paoḍar jo̱ť baṛajo̱ṅ ceka managetalea? Coṇḍok̕ cạṭki ar luṭi jo̱roṅkak̕ do̱ ceka bato̱lgetalea? Ape ma ya laṅṭa, kulạuge bạnuk̕tape. Ape ma ḍiṅgrạ, bhạṅguạ re̱ṅge̱c̕tepe jale-thale baṛaekan. Cele kusik̕a ape odor poṭak̕ ṭhen do̱? Jạkiṭ tanak̕ kirińale reak̕ dhe̱j bạnuk̕tapea. Ale onko ṭhen kho̱n mõ̱ńj-mõ̱ńj sạṛi-saeale ńameťkhan, mẽ̱ť jolok̕kantapea? Ar e̱nte onko ṭhen menak̕lete nõ̱k̕õ̱e Mukhiạ, Sạmiti ar Jilạ Pạrisad emanre sạmạnile daṛe baṛawakana. Ape ma ya, sara din rạnu boṅga sãote phulpe patawakať. Mo̱ro̱ť arpe jokyoť cabawakana. Cele ya, ape ro̱ṅgo̱ muṇḍhạť ṭhen do̱ kusik̕a? Ape kho̱n ma sikṛĩc̕ hõ̱ jạnic̕ko bo̱lmange! Ape do̱ o̱ho̱pe ạsul daṛekelea. Calak̕geale, po̱re̱r culhạle o̱ṅgea. Bogele pạsien, bogeko go̱c̕ket̕le. Am babawak̕ do̱ baṅle jo̱jo̱mkana.”

“Ar ya, mo̱rdha jo̱kyo̱t̕! Aleak̕ lahanti ńe̱lte mẽ̱ť saṛok̕kantapea? Ape do̱ ya, cekate onko po̱rjạt do̱ baṅpe bulạu daṛeakokana? Ape hõ̱ ạgukope, o̱ko̱e manaet̕pea? Onko ạgu daṛeako reak̕ dhe̱j ma bạnuk̕tape, ar tãhã alepe duhmạt ńamakat̕lea.”

Cetanrekin rukhạt̕kan pạhilic̕ hạṇḍi akrińic̕ Jhabarạli ar dosaric̕ ko̱le̱j kuṛi Maenomạtitạkinak̕ ruhạť ańjo̱mte o̱no̱liạ do̱e tuṛi baha ńamena. Dhạrti do̱ ńutadea. Ạḍi hudisreye paṛaoena. Sạri kangea; Jhabarạlitako re̱ṅge̱c̕teko gujuk̕kan tahẽ̱re baṅ co̱le hiri baṛalet̕ko, baṅ co̱le go̱ṛoat̕ko tahẽ̱! O̱ko̱rtale onkan so̱maj susạr bạisi? O̱ko̱rtale sedae lekan mạńjhi-pargana be̱bo̱stha? Okate do̱ onkan re̱ṅge̱c̕ ar rạṇḍi-piṭạri ayojo̱nakole go̱ṛo daṛeako. Ale ma onkanko ḍạn uduk̕kate hakĩạle go̱c̕ giḍikako.

Ar no̱te̱ ko̱le̱j kuṛi Maenomạtiak̕ sad do̱ sạrige he̱ṛangea! Hạ̃sạk̕geae lo̱bo̱e-lo̱bo̱ye saj bajkok̕! Uṭi-uṭi sajok̕ reak̕ sad menak̕taea, je̱mo̱n baro̱ dolan gaṛreko bạnij idiye. Jãhã miť dhaoe bijli ruạṛkeť, ar bańcaok̕ upại do̱ o̱ko̱ran? Menak̕gea upại! Hapṛamko do̱ noa reak̕ko upại oṭoakat̕gea. Onko ma baro̱ jo̱ṛ sagaṛ miť likreko lagaleť. To̱be̱ “Kirtạ” do̱ dohṛaetege hoyok̕a? Hạni ńe̱le̱pe ạḍi tạpis aṛaṅate kạu mạue ho̱ho̱ dilạiyet̕kana - “Biṭlạha, Biṭlạha”. Okaenam Biṭlạha? Ale hõ̱ hirikaleme.

Friday, 31 May 2024

 आओ चुनाव-चुनाव खेलें

यह कैसी विडंबना है कि आजकल धर्म-धर्म एवं चिकी-चिकी का खेल कुछ सुस्त-सा पड़ गया है। हो सकता है शायद लोकसभा चुनाव की बाढ़ उन्हें बहा ले गई होगी। यह सत्य है कि अभी तक धर्म और चिकी से किसी की क्षुधा नहीं मिट पाई है। हो सकता है; देश से इस चुनाव के वक्त जब धर्म-धर्म का खेल ही समाप्त हो गया, तो हमारे आंगने में इनका क्या काम? 

छठवें चरण का मतदान समाप्त हो गया है। अब सातवें और अंतिम चरण का मतदान 01 जून को होगा। देशभर का संपूर्ण नतीजा 4 जून 2024 को घोषित होगा। कहा जाता है कि साहब अपनी निश्चित हार को देखते हुए पगला गया है। वह अनाप-शनाप बकवास किए जा रहा है। छठवें चरण का मतदान आते-आते उसकी सारी चालें निष्क्रिय होती गई। यही वजह है कि अब वह किसी कोठे में मुजरे का मजा ले रहा होगा। 

इस बार का लोकसभा चुनाव बड़ा अनोखा रहा! इस तरह का चुनाव न कभी हुआ था और न ही कभी होगा। एक तरफ सारी सरकारी मशीनरी, तो दूसरी तरफ विपक्ष न होकर जनता सत्ता पक्ष का डटकर मुकाबला कर रही है। वाकई यह चुनाव अद्भूत है! इस चुनाव में साहब ने अपने आपको किसी भगवान का अवतार घोषित कर रखा है। इतना ही नहीं भगवान भी उनकी आरती उतारने को मजबूर हो गया है। इसीलिए तो "जो राम को लाये हैं, हम उनको लायेंगे" का डंका बज रहा है।

Whatsapp University में चुनाव का खेल खेलने में सभी तथाकथित छात्र-छात्राओं को बड़ा मजा आता है। आपके बुजुर्ग छात्र को भी यह खेल बड़ा सुहाता है। इस वक्त दुमका-राजमहल लोकसभा क्षेत्र आरक्षित है। याद रखना जिस दिन भी यह क्षेत्र सामान्य हो जाएगा, फिर समझो आपका यह चुनाव चुनाव का खेल भी समाप्त हो जाएगा। इसलिए कबीर दास सही कह गए हैं - "कल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय होएगी, बहुरि करोगे कब?"

ज्ञात हो कि दुमका-राजमहल से जहां इंडिया गठबंधन और एनडीए के बीच कांटे का टक्कर है, तो वहीं दूसरी ओर झामुमो को अपने ही मीरजाफरों से दो-दो हाथ करने पड़ रहे हैं। दुमका से जामा की वर्तमान विधायक बागी बनकर कमल फूल सूंघ रही है। वह अपने ही ससुराल वालों को आईना दिखाने में जुट गई है। जनता से उनकी एक ही अपील है कि उसे ही भारी से भारी मतों से जीताएं, ताकि वह ससुराल वालों से बदला ले सके।

दूसरी ओर राजमहल के झामुमो विभीषण बोरियो विधायक ने अपने ही राज में आक्रमण कर दिया है। उनका एक ही आरोप है कि वर्तमान राजा ठीक नहीं है। वह दस वर्षों से भगौड़ा और लापता हैं। इसलिए वह कहता है कि जीत जाने पर वह घर-घर विकास को पहुंचा देगा।

इस तरह विभिन्न छात्र-छात्राओं का थीसिस अलग-अलग है। उनके बारे में ज्यादा कुछ कहना उचित नहीं। सुना है; वर्षों पहले कुछ मीरजाफर, जयचंद, विभीषण, मुनिया मांझी भी पार्टी छोड़कर चले गए थे। कुछ तो शाम को घर वापस लौट आए थे पर कुछ गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं।

मंगरु को किसी से कोई लेना-देना नहीं है। पर इतना तय है कि Whatsapp University में बहुत तरह के मतभेद हो सकते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अब समय बहुत बदल चुका है। आपको वक्त की नजाकत को पहचानना ही होगा। कभी अंधेरे में तीर मत चला देना।

विशेषकर युवकों से अपील है। हूल हुआ संताल परगना मिल गया, झारखण्ड आंदोलन हुआ और अलग झारखण्ड राज्य भी मिल गया। पर हम आदिवासियों की हालत अभी भी जस की तस बनी हुई है। इसके एक नहीं हजार कारण हो सकते हैं। इस चुनाव में सिर्फ बदलाव मात्र से समाज का कोई भला होने वाला नहीं है। इस बरसात में सिर्फ मेढ़कों का टर्र-टर्र करने मात्र से भी कोई लाभ नहीं है। अगर वास्तव में आपको समाज की चिंता है, तो अविराम फुल टाईमर के रूप में अभी और आज से लोगों के बीच सामाजिक चेतना जगाने के लिए दिन और रात एक करना होगा। आपको समाज उत्थान के लिए पूर्व में ही ब्लूप्रिंट और रोड मैप तैयार करना होगा। वरना आओ चुनाव-चुनाव का खेल खेलें।

Thursday, 23 May 2024

जिसकी लाठी उसकी भैंस

न चाहते हुए भी मंगरु को अपना मुंह खोलना पड़ रहा है कि इस वक्त संतालों की आधी जमीन परायों के हाथों चली गई है। क्यों? कानून तो कहता है कि एसपीटी एक्ट के तहत संतालों की जमीन की खरीद-बिक्री नहीं हो सकती है। फिर भी क्यों संतालों की जमीन को हड़पा जा रहा है? इसके कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण तो यही है - ”मियां-बीबी राजी तो क्या करेगा काजी।“ अब दुनिया बदल चुकी है। हर परिवार में एक चमकता हुआ एंड्रोयड फोन की जरुरत है। समय को देखते हुए घर में मोटर साईकिल की मांग भी बढ़ती गई है। आमदनी आठन्नी, खर्चा रुपैया वाली बात हो गई है। समय की मांग को देखते हुए आधुनिक आवश्यकताओं की पूर्ति किस तरह हो, एक बहुत बड़ी समस्या मुंह बांयें खड़ी है। कोई और उपाय न देख, चलो अपनी अचल संपत्ति पर ही अपना हाथ साफ कर लें। मना करने पर, नोट कर लो आपकी एक भी दलील चलने वाली नहीं है। अब इसमें किसी भी राजनीतिक दल का क्या कसूर? इस समस्या से आपका भगवान भी आपको नहीं बचा पाएगा।

चुनाव का माहौल है। मतदान की तारिख नजदीक आ रही है। दुमका-राजमहल से खड़े उम्मीदवारों की सांसे फूली हुई हैं। सभी अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। हर गली-कूचों की जनता के बीच राजनीतिक बहस छिड़ी हुई है। हर किसी उम्मीदवार पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। हर व्यक्ति अपनी पीड़ा का ठीकरा अपने विधायक/सांसदों पर फोड़ रहा है। सच देखा जाय, तो जितनी गलियां राजनीतिज्ञों को दिया जाता है, शायद ही किसी और को दिया जाता हो।

सत्ता का नशा बादशाहों को मतवाला बना देता है। वे सत्ता वापसी के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाते हैं। वे सरकारी मशीनरियों का दुरुपयोग करने से बाज नहीं आते। कभी-कभी वे अपने ही बुने हुए जाल में फंस जाते हैं। उदाहारणार्थ - इलेक्ट्रोल बॉण्ड। सुना है; सत्ताधारियों ने कोई धुलाई मशीन की ईजाद की हुई है। इस मशीन की हैसियत बहुत अनोखी है! लोग कहते हैं, जितना भी बड़ा भ्रष्टाचारी क्यों न हो, इस मशीन में धुलाई के उपरांत वह दूध-सा उज्जवल चमकने लगता है। वाह री, मोती धुलाई मशीन!

आपने सुना होगा। सत्ता में आसीन बादशाह का हुक्म हुआ - "जाओ, विपक्ष के सभी सदस्यों को अपने खेमे में शामिल कर लो। इससे हमारी शक्ति मजबूत होगी।"

"हुजूर अनार्थ हो जाएगा। वे सभी महा भ्रष्टाचारी हैं।"

"कोई बात नहीं। उन्हें हमारी धुलाई मशीन में नहला दो। जाओ, हमारा मुंह क्या ताक रहे हो?"

"हुजूर उनका क्या करें, जो उस मशीन में नहाने से मना कर दे?"

"उन्हें सलाखों के पीछे धकेल दो। कितनी बार समझाया? समझ में नहीं आता है क्या?"

थानेदार मुंह लटकाये चला गया। उसने आव देखा न ताव, एक आदिवासी मुख्यमंत्री को अकारण ही पकड़ कर जेल में ठूंस दिया। बेचारा शरीफ आदिवासी चुपचाप त्यागपत्र देकर जेल चला गया।

इसके बाद बादशाह का हुक्म हुआ - "दिल्ली का मुख्यमंत्री बहुत फड़फड़ा रहा है। चुनाव में वह हमारा मटियामेट कर देगा। अतः उसे भी जेल में ठूंस दो।" और इस तरह थानेदार ने बादशाह की आज्ञा का पालन किया। लेकिन दिल्ली के सीएम ने हुंकार भरी - "तू डाल-डाल, तो हम पात-पात। हम रिजाईन नहीं करेंगे।"

देशभर में विपक्षी दलों को परेशान करने का सिलसिला जारी है। बादशाह की इच्छा जो चाहे वह कर रहा है। देश की संपत्ति को बेच दो और वह बेच रहा है। वह संविधान, आरक्षण, लोकतंत्र सबकुछ बेच देना चाहता है। वह जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली कहावत को चरितार्थ करने पर उतारु हो गया है। इंडिया गठबंधन उस बादशाह का जोरदार विरोध कर रहा है। चुनाव विश्लेषकों की मानें, तो बादशाह 400 नहीं 140 सीट पर अटक रहा है।

दुमका-राजमहल से भी इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार कमर कस कर मैदान में आ डटे हैं। बादशाह के चेले भी रणक्षेत्र में है। इसमें आश्चर्य की बात यही है कि कुछ निर्दलीय उम्मीदवार बदलाव चाहते हैं। उनका मनिफेस्टो क्या कहता है, यह तो राम जाने। पर वे अकेले ही संविधान एवं आरक्षण को बचा लेने का दंभ भर रहे हैं। आइए, 4 जून 2024 का इंतजार करें।

Thursday, 16 May 2024

हूल प्रदेश का भविष्य

कल इलाके में बारिस हुई थी, इस वजह से मौसम कुछ ठंढा है। फिर भी मंगरु अपनी पुरानी आदतन उसी पेड़ तले बैठे-बैठे कुछ सोच रहा था। मंगरु अच्छी तरह जानता है कि वह कोई ज्योतिष नहीं और न ही वह कोई भविष्यवक्ता है। लेकिन इतिहास के पन्नों को खंगालने के बाद कुछ कहा जाय, तो कोई गलत नहीं।

हूल घटित हुए आज 169 वर्ष बीत गए। आज वक्त ने अच्छी तरह अंगड़ाई ले ली है। तब की और आज की परिस्थिति में जमीन-आसमान का फर्क है। हूल तक लोग पाषाण युग में जी रहे थे। तब आज की आधुनिकता के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। उस वक्त कोई सांसद-विधायक नहीं, कोई चिंटु-पिंटु भी नहीं और ना ही कोई राजनीतिक चमचे-बेलचे ही मौजूद थे। और सबसे बड़ी बात कि उस वक्त आज के जैसा कोई लोकसभा का चुनाव वगैरह भी तो नहीं होता था। और ना ही जनता चुनाव के चक्कर में अपनी मित्रता खो बैठते थे। खैर, संतालों की परंपरागत मांझी-परगना व्यवस्था बहुत सुदृढ़ थी, जिसकी वजह से वे अपना एक अलग प्रदेश "संताल परगना" को हासिल करने में सफल हुए। इतना ही नहीं उन्होंने संताल परगना की शासन व्यवस्था को भी अपनी इच्छानुसार स्थापित करने में सफल हुए।

हूल के बाद संताल परगना में मिशनरियों का आगमन हुआ एवं उनकी देन आपके समक्ष है। इधर 1880 के दशक में हूल प्रदेश में संतालों के बीच हिंदुकरण का बीज बोया गया। इस धार्मिक आंदोलन को "खेरवाड़ आंदोलन" के नाम से भी जाना गया। इस आंदोलन के अगुवे बाबा भगीरथ, धुबिया गोसांई आदि बने। इस दौरान हूल प्रदेश में कुछ हुआ या नहीं पर खतियान का काम जरुर हुआ। स्मरण रहे कि संताली साहित्य का विकास रोमन संताली से आरंभ हुआ।

अंग्रेजों का भारत आगमन से पूर्व देश की सामाजिक अवस्था ठीक नहीं थी। यह अंग्रेजों की ही देन है कि इन्होंने दलितों के उत्थान के लिए बहुत सारे मार्ग प्रशस्त किए। उनमें शिक्षा की क्रांति सहित बहुत सारी सामाजिक कुरीतियों के नाश शामिल हैं।

सन् 1947 को भारत देश आजाद हुआ। तात्क्षण भारत का संविधान बना। संविधान बनते ही भारत में दबे-कुचलों के भविष्य का सूर्योदय हुआ। सीधा कहें, तो देश में सरकारी महकमों में दलितों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसी व्यवस्था के तहत ही आज हम चुनाव चुनाव का खेल खेल रहे हैं। जिस दिन यह व्यवस्था समाप्त हो जाएगी, उसी दिन हम दलित फिर वही गले में हांड़ी टांगते हुए नजर आएंगे।

अंग्रेजों की देन संताल परगना आज किस स्थिति में है? इस आधुनिक दौड़ में वह किस पायदान पर खड़ा है? इस दौरान उसने क्या खोया-क्या पाया? अगर इसका तुलनात्मक अध्ययन किया जाए, तो बहुत सारे राज परत दर परत खुलते जाएंगे। आज हूल प्रदेश की स्थिति ठीक नहीं है। हालांकि संविधान लागू होने के साथ ही यहां आदिवासियों के लिए अधिकांश सीटें आरक्षित की गई, फिर भी आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक अवस्थाएं ढाक के वही तीन पात हैं। हूल प्रदेश में चाहे वह दिसोम गोमके हों अथवा गुरुजी का दौर झारखण्ड नामधारी दलों का ही वर्चस्व रहा है। इतना कुछ होने के बावजूद भी आज हूल प्रदेश में आदिवासियों की जनसंख्या घटती जा रही हैं एवं इनकी आधी आबादी जीवकोपर्जन के लिए अन्य प्रदेशों की ओर पलायन के लिए मजबूर हैं। क्यों?

हूल प्रदेश के पतन के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है? क्या हमारे धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक पतन के लिए सिर्फ चिंटु-पिंटु को ही दोष दिया जाय? या और भी कोई अन्य कारण हैं? इन कारणों पर जब तक विश्लेषणात्मक अध्ययन नहीं किया जाएगा, जब तक हमारा ब्लूप्रिंट व रोड मैप तैयार नहीं होगा, जब तक हमारा प्रयास सामूहिक नहीं होगा, तब तक हमारा कृत्य अंधेरे में तीर मारना ही साबित होगा।

आइए, इस विषय पर गहनपूर्वक मंथन करें, सामूहिक प्रयास पर बल दें जिससे हम अपने हूल प्रदेश के भविष्य को संवार सकें।

Sunday, 12 May 2024

करो या मरो

दुनिया में राजनीति का नशा बड़ा ही अद्भूत है। एक पैर कब्र पर है, फिर भी यह नशा उतरने का नाम नहीं लेता है। जिस तरह दर्जी का बेटा दर्जी, कुम्हार का बेटा कुम्हार उसी तरह यह पेशा भी खानदानी बन जाने का रिवाज है। 

देश में तीसरे चरण का मतदान हो चुका है। 13 मई 2024 को चौथे चरण का मतदान होना है। अब तक सभी चरणों में मतदान करने वालों की संख्या गिर गई है। आखिर ऐसा क्यों? इस संबंध में सौ बात की एक बात लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठना बताया जा रहा है। उनके अनुसार सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे होते हैं। उनकी दलील है कि इस बार तुम लुट लो, फिर हमें अगले पाँच साल बाद लुटने का मौका दो। यह सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। परंतु यह भी सच है कि अधिक दिनों तक जमा किया हुआ पानी जरुर गंदा होता है, अतः इसकी सफाई बहुत जरुरी है। एवं उस तालाब पर नये जल का भराव अत्यावश्यक है। इसे ही एंटीइनकॉम्बेन्सी कहा जाता है।

विश्वास बहुत बड़ी चीज है। अगर विश्वास ही उठ गया, तो सबकुछ का सत्यानाश तय है। आजकल ईव्हीएम द्वारा मतदान का प्रावधान है। ईव्हीएम एक मतदान करने की मशीन है। उस पर आरोप लगते रहा है कि उस मशीन को अपने मनमुताबिक सेट किया जा सकता है। आरोपकर्ता की दलील है कि उसे इस तरह सेट किया जा सकता है कि अगर उस मशीन में दस वोट पड़ा, तो छः वोटों को अपने खाते में आसानी से परिवर्तित किया जा सकता है। लो कर लो बात। कुछ भी चिल्लाते रहो। जीत तो उसी की होगी, जिसके पास लाठी है। 

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अब देश में गरीबों की संख्या 84 करोड़ हो गई है। यह जनसंख्या सिर्फ पाँच किलो सरकारी राशन पर जीवित है। यह भी सच है कि आने वाले दिनों में इनकी संख्या घटेगी नहीं, बल्कि बढ़ती ही जायगी। देश में नौकरी करने की सुविधा गायब हो गई है। वंचित एवं दबे-कुचले लोग अब आसमान से गिरे तो खजूर पर अटक गए हैं। उनकी आरक्षित सीट घटा दी गई है। उन्हें अपने हाल में जीने के लिए अवारा छोड़ दिया गया है। देश की सरकारी संपत्तियों को धड़ल्ले से बेचा रहा है। और जैसे कि आपको मालूम है कि प्राईवेट संस्थानों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। बेचारा आरक्षित वर्ग आखिर जांय तो कहाँ जांय?

देश के संविधान पर भयानक खतरा मंडरा रहा है। बीते दिनों इसे संसद भवन के समीप जलाया गया। जगह-जगह आरक्षण का विरोध किया जा रहा है। इस बात की पुष्टि भी हो चुकी है कि सत्तापक्ष के लोकसभा उम्मीदवारों ने चार सौ पर लाने की दुहाई देते हुए संविधान को बदलने की वकालत कर डाली है। इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि वह दिन दूर नहीं जब देश से लोकतंत्र एवं संविधान का नामोनिशान मिट जाएगा।

अतः अब देश में "करो या मरो" की स्थिति आ गई है। अगर आपसे किसी तरह की चूक हो गई, तो यह आपका अंतिम मतदान होगा। इसके बाद देश जल रहा होगा और साहब बांसुरी बजाने में मस्त होंगे। तब तक देश खण्ड-खण्ड हो जायगा। 

Sunday, 5 May 2024

मान लो; संविधान बदल गया?

तर्क विज्ञान के कई नियमों में यह भी एक नियम है कि जहां धुआँ उठे, समझो वहां आग है। इसका मतलब अगर वहां धुआँ हो, तो वहां आग होने की पूरी-पूरी संभावना से कोई नहीं इंकार कर सकता है। धुआँ और आग में चोली-दामन का साथ है। बगैर धुआँ आग की कल्पना हो ही नहीं सकती है। इसका अर्थ यही हुआ कि भाजपा एवं उसके सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक गाहे-बगाहे यह जो संविधान बदलने की बात उठाते हैं, यह सत्य प्रतीत होता है। इसी चुनाव में भाजपा के कुछ उम्मीदवारों ने साफ तौर पर कह दिया है कि उन्हें 400 पार करा दो, वे संविधान अवश्य बदल देंगे। और तो और वे खुलेआम संविधान को जलाते हैं। उनके समर्थक एससी/एसटी/ओबीसी मुर्दाबाद के नारे लगाते हैं। यह सब धुआँ क्यों उठ रहा है? इसका मतलब साफ है कि वहां आग लगी हुई। वे संविधान बदलने को उतारु हैं।

भारत देश सन् 1947 को आजाद हुआ। बाबा साहब डॉ भीमराव आम्बेडकर की अगुवाई में लिखे हुए इस संविधान को 1949 में हम भारत के लोगों ने उसे अंगीकृत किया। और इसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया। कुछ संशोधनों के साथ फिलहाल इसमें 25 भाग और 448 अनुच्छेद हैं। भारत का संविधान दुनिया के सर्वोत्तम संविधानों में से एक है। परंतु इतना उच्च कोटि का संविधान रहते हुए भी कुछेक घटनाओं को देखकर मन बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर हो जाता है। संविधान के अनुसार भारत का हर नागरिक बराबरी का हक रखता है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है। इस देश में छुआछूत के लिए कोई जगह नहीं, उसे सदा के लिए मिटा दिया गया है। हर नागरिक को मौलिक अधिकारों से सुसज्जित किया गया है। फिर भी हमारे वर्तमान महामहिम राष्ट्रपति के साथ ऐसा तुच्छ भेदभाव क्यों? इसके पूर्व में भी कई दलित नेताओं के साथ ऐसा ही भेदभाव किया गया है। ऐसा क्यों? इसके अलावे भी दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने पर मनाही क्यों? इस तरह के कई उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं।

अब सवाल उठता है मान लो; संविधान को बदल दिया गया, फिर क्या होगा? क्या होगा? ये जो चुनाव-चुनाव हमलोग खेल रहे हैं, सब खत्म। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। न तुम्हारे विधायक होंगे और न कोई सांसद। पंचायत चुनाव में भी आपकी कोई भागीदारी नहीं होगी। सरकारी आरक्षण खत्म हो जायगा। राजनैतिक हो अथवा सरकारी नौकरी, सब समाप्त। याद रखना, सदियों से दबाए गए दलित फिर वहीं पहुंच जाएंगे, जहां से वे आये थे। सभी दलित गले में हांड़ी और कमर में झाड़ू टांगते हुए नजर आएंगे। महिलाओं को स्तन ढांकने की आजादी नहीं होगी। जिस दलित को शिक्षा ग्रहण करने का भूत सवार हो, उनके कानों में पिघलते हुए शीशे डाले जाएंगे। दलित गुलामगीरी करने के लिए मजबूर हो जाएंगे। पक्का सबूत के तौर पर अभी देख लेना। लोकसभा सामान्य सीट से उम्मीदवारी करके देख लेना। वहां से बाहरी जीत सकता है, पर आपकी पूछ नहीं के बराबर होगी। 

सवाल यह नहीं है कि जब संविधान बदलने की घड़ी आएगी, फिर देखा जाएगा। आग लगने पर कुआँ खोदना कहां की बुद्धिमानी होगी? आदिवासी विरोधी मानसिकता वाले को कौन नहीं जानता है? 1977 से पहले वे ”दीया“ दिखाया करते थे। इसके बाद उनके हाथ में "कमल फूल" उग आया। तब से वे धीरे-धीरे सत्तासीन होते गए। और अब तो वे 10 वर्षों से हमारे सिर पर सवार हो गये हैं। उनके काले करतूतों के बारे में इतना ही काफी है कि वे आपको "वनवासी" के नाम से पुकारते हैं एवं धर्म की घूंट पिलाते हैं।

एसपीटी एक्ट इतना सख्त कानून रहते हुए भी किसने मनुवादियों को अपने इलाके में प्रवेश करने की अनुमति दी? उन्हें किसने आमंत्रण दिया? सिर्फ राजनीतिज्ञों को दोष देने मात्र से आपकी समस्या नहीं सुलझ सकती है। इसके जिम्मेवार आप स्वयं हो। यहां "मियां बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी" वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। आपके इलाके में इतने सारे पत्थर एवं कोयला खदान के स्वामी कौन लोग हैं। सारे के सारे मालिक मनुवादी हैं। 

चालू लोकसभा चुनाव में वे किस तरह की चाल चल रहे हैं, आप पूर्णतः अनभिज्ञ मालूम पड़ते हो। पूरे देश में एक ओर संविधान बचाने वाले खड़े हैं, तो दूसरी ओर इसको बदलने वाले 400 पार का नारा दे रहे हैं। साफ शब्दों में कहा जाय, तो राजमहल की सीट किसकी झोली में जाती है, देखना बड़ा दिलचस्प होगा।  आपकी सावधानी हटी, तो दुर्घटना घट सकती है। पछताने से कोई लाभ नहीं, जब चिड़िया चुग गई खेत।

Saturday, 4 May 2024

अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता

यह लेख लिखने तक लोकसभा-2024 चुनाव के चौथे चरण का मतदान हो रहा है। आपका यह मंगरु कोई चुनाव विश्लेषक नहीं। वह सिर्फ इतना जानता है कि देश में चुनाव दो दलों के बीच हो रहा है - इण्डिया गठबंधन तथा एनडीए। इन गठबंधनों से मंगरु को क्या लेना-देना? आग लग जाए ऐसे गठबंधनों को। इससे हमें क्या फर्क पड़ता है? कोई राजा बने या रंक? हमें इससे क्या मतलब? देश में तानाशाही आए या प्रजाशाही? रोजगार-नौकरी मिले या पकौड़ा तलना पड़े? महंगाई आसमान भी छू ले। हमें तो बस अपने हाल ही में जीना है। संविधान मरे-जीये, आरक्षण खत्म हो जाए। हमारा क्या जाता है? जिसका जाता है, वो लड़े। हमें किसी से कोई मतलब नहीं। हमें न उधो का देना और न ही माधो का लेना। इन 75 सालों में बहुत देख लिया। देखो न, मुर्गे ने बांग दी और हम उधर हो लिए। जोड़ा पत्ता आया। हमने उसपर खूब खाना खाया। अब तीर-कमान का जमाना आ गया है। हम आदिवासी जो ठहरे। एकलव्य हमारा आईकॉन है। और हम तीर-कमान के शिकार हो गए। उजड़े वन-जंगलों में शिकार करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

चुनाव का मौसम है। सड़क किनारे गांव है। और उस गांव के सड़क किनारे मंगरु की छोटी-सी झोपड़ी है। रोज कोई न कोई किसी पार्टी के चुनाव प्रचारकों से भेंट-मुलाकात हो ही जाती है। कल की ही तो बात है। गोधूलि का बेला था। कोई नेता जी अपने लव-लश्कर के साथ आपके इस गरीब मंगरु की झोपड़ी में दर्शन दे गए। "बैठिए-बैठिए। बैठिए नेताजी।" यह सुनते ही नेताजी के सभी छोटे-बड़े चमचे अपने आंगने में घुस आए। उनलोगों को बिठाने की बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई। खैर, झोपड़ी में आदम जमाने की कुर्सी पड़ी थी। उसे नेताजी की तरफ खिस्का दी गई। बाकी लोग ईश प्रदत्त कुर्सी पर तशरीफ रख दिए। देखते ही देखते गांव के तमाम लोग इस झोपड़ी की ओर दौड़े चले आए। अच्छी-खासी भीड़ एकट्ठी हो गई। नेताजी को बिन मांगे मोती मिल गई। उम्र का लिहाज रखते हुए सभी समाज सुधारकों ने "डो़बो़क्" किया। दुआ-सलाम के बाद नेताजी ने बात बढ़ाते हुए कहा - "भाईयो तथा बहनो! इधर से गुजर रहा था। याद आई आपकी मंगरु बाबा की। इनकी उम्र बढ़ चली है। सोचा, क्यों न इनसे आशीर्वाद लिया जाय? देखिए, मैं इस राजमहल सीट से एक आजाद उम्मीदवार के रूप में आपकी खिदमत में पेश हूं। विगत दस वर्षों में आपके लिए कुछ भी नहीं हुआ है। मैं आपके लिए टेण्डेण्सी एक्ट, पेसा एक्ट, खतियान एक्ट सब लागू करके रहुंगा। मैं गुरुजी का पक्का चेला हूं। अतः आप हमें गुरुजी के नाम पर भारी से भारी मतों से विजयी बनावें ...।

यह छोटी-सी मुलाकत यहीं समाप्त हो गई। मंगरु ने मेहमानों को अंतःमन से लाल चाय पिलाई। नेताजी बहुत खुश थे। अतः जाते-जाते उसने प्रधान के हाथ में एक मोटा-सा लिफाफा थमाते हुए कहा - "मेरी तरफ से यह एक छोटी-सी भेंट है। ध्यान दीजिएगा।"

गांव वाले समझ गए थे कि नेताजी गुरुजी के चेले हैं। अतः उन्हें गुरुजी के चुनाव चिन्ह पर वोट देकर उनका हाथ मजबूत करना है। पर मंगरु यह पूछना तो भूल ही गया कि आपके पच्चीस वर्षों की विधायकी/मंत्री पद का हिसाब-किताब कौन देगा? आपकी मांगें तब क्यों नहीं पूर्ण हुई? आप अकेले इतनी बड़ी लोकसभा में कुछ कर पाओगे? या यह भी कोई जुमला ही साबित होगा? और तो और इतने मोटे-मोटे लिफाफे का स्त्रोत कहां है? कुबेर का हाथ कहां लग गया? वाह री माया!

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...