Thursday, 15 August 2024
Friday, 31 May 2024
आओ चुनाव-चुनाव खेलें
यह कैसी विडंबना है कि आजकल धर्म-धर्म एवं चिकी-चिकी का खेल कुछ सुस्त-सा पड़ गया है। हो सकता है शायद लोकसभा चुनाव की बाढ़ उन्हें बहा ले गई होगी। यह सत्य है कि अभी तक धर्म और चिकी से किसी की क्षुधा नहीं मिट पाई है। हो सकता है; देश से इस चुनाव के वक्त जब धर्म-धर्म का खेल ही समाप्त हो गया, तो हमारे आंगने में इनका क्या काम?
छठवें चरण का मतदान समाप्त हो गया है। अब सातवें और अंतिम चरण का मतदान 01 जून को होगा। देशभर का संपूर्ण नतीजा 4 जून 2024 को घोषित होगा। कहा जाता है कि साहब अपनी निश्चित हार को देखते हुए पगला गया है। वह अनाप-शनाप बकवास किए जा रहा है। छठवें चरण का मतदान आते-आते उसकी सारी चालें निष्क्रिय होती गई। यही वजह है कि अब वह किसी कोठे में मुजरे का मजा ले रहा होगा।
इस बार का लोकसभा चुनाव बड़ा अनोखा रहा! इस तरह का चुनाव न कभी हुआ था और न ही कभी होगा। एक तरफ सारी सरकारी मशीनरी, तो दूसरी तरफ विपक्ष न होकर जनता सत्ता पक्ष का डटकर मुकाबला कर रही है। वाकई यह चुनाव अद्भूत है! इस चुनाव में साहब ने अपने आपको किसी भगवान का अवतार घोषित कर रखा है। इतना ही नहीं भगवान भी उनकी आरती उतारने को मजबूर हो गया है। इसीलिए तो "जो राम को लाये हैं, हम उनको लायेंगे" का डंका बज रहा है।
Whatsapp University में चुनाव का खेल खेलने में सभी तथाकथित छात्र-छात्राओं को बड़ा मजा आता है। आपके बुजुर्ग छात्र को भी यह खेल बड़ा सुहाता है। इस वक्त दुमका-राजमहल लोकसभा क्षेत्र आरक्षित है। याद रखना जिस दिन भी यह क्षेत्र सामान्य हो जाएगा, फिर समझो आपका यह चुनाव चुनाव का खेल भी समाप्त हो जाएगा। इसलिए कबीर दास सही कह गए हैं - "कल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय होएगी, बहुरि करोगे कब?"
ज्ञात हो कि दुमका-राजमहल से जहां इंडिया गठबंधन और एनडीए के बीच कांटे का टक्कर है, तो वहीं दूसरी ओर झामुमो को अपने ही मीरजाफरों से दो-दो हाथ करने पड़ रहे हैं। दुमका से जामा की वर्तमान विधायक बागी बनकर कमल फूल सूंघ रही है। वह अपने ही ससुराल वालों को आईना दिखाने में जुट गई है। जनता से उनकी एक ही अपील है कि उसे ही भारी से भारी मतों से जीताएं, ताकि वह ससुराल वालों से बदला ले सके।
दूसरी ओर राजमहल के झामुमो विभीषण बोरियो विधायक ने अपने ही राज में आक्रमण कर दिया है। उनका एक ही आरोप है कि वर्तमान राजा ठीक नहीं है। वह दस वर्षों से भगौड़ा और लापता हैं। इसलिए वह कहता है कि जीत जाने पर वह घर-घर विकास को पहुंचा देगा।
इस तरह विभिन्न छात्र-छात्राओं का थीसिस अलग-अलग है। उनके बारे में ज्यादा कुछ कहना उचित नहीं। सुना है; वर्षों पहले कुछ मीरजाफर, जयचंद, विभीषण, मुनिया मांझी भी पार्टी छोड़कर चले गए थे। कुछ तो शाम को घर वापस लौट आए थे पर कुछ गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं।
मंगरु को किसी से कोई लेना-देना नहीं है। पर इतना तय है कि Whatsapp University में बहुत तरह के मतभेद हो सकते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अब समय बहुत बदल चुका है। आपको वक्त की नजाकत को पहचानना ही होगा। कभी अंधेरे में तीर मत चला देना।
विशेषकर युवकों से अपील है। हूल हुआ संताल परगना मिल गया, झारखण्ड आंदोलन हुआ और अलग झारखण्ड राज्य भी मिल गया। पर हम आदिवासियों की हालत अभी भी जस की तस बनी हुई है। इसके एक नहीं हजार कारण हो सकते हैं। इस चुनाव में सिर्फ बदलाव मात्र से समाज का कोई भला होने वाला नहीं है। इस बरसात में सिर्फ मेढ़कों का टर्र-टर्र करने मात्र से भी कोई लाभ नहीं है। अगर वास्तव में आपको समाज की चिंता है, तो अविराम फुल टाईमर के रूप में अभी और आज से लोगों के बीच सामाजिक चेतना जगाने के लिए दिन और रात एक करना होगा। आपको समाज उत्थान के लिए पूर्व में ही ब्लूप्रिंट और रोड मैप तैयार करना होगा। वरना आओ चुनाव-चुनाव का खेल खेलें।
Thursday, 23 May 2024
जिसकी लाठी उसकी भैंस
न चाहते हुए भी मंगरु को अपना मुंह खोलना पड़ रहा है कि इस वक्त संतालों की आधी जमीन परायों के हाथों चली गई है। क्यों? कानून तो कहता है कि एसपीटी एक्ट के तहत संतालों की जमीन की खरीद-बिक्री नहीं हो सकती है। फिर भी क्यों संतालों की जमीन को हड़पा जा रहा है? इसके कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण तो यही है - ”मियां-बीबी राजी तो क्या करेगा काजी।“ अब दुनिया बदल चुकी है। हर परिवार में एक चमकता हुआ एंड्रोयड फोन की जरुरत है। समय को देखते हुए घर में मोटर साईकिल की मांग भी बढ़ती गई है। आमदनी आठन्नी, खर्चा रुपैया वाली बात हो गई है। समय की मांग को देखते हुए आधुनिक आवश्यकताओं की पूर्ति किस तरह हो, एक बहुत बड़ी समस्या मुंह बांयें खड़ी है। कोई और उपाय न देख, चलो अपनी अचल संपत्ति पर ही अपना हाथ साफ कर लें। मना करने पर, नोट कर लो आपकी एक भी दलील चलने वाली नहीं है। अब इसमें किसी भी राजनीतिक दल का क्या कसूर? इस समस्या से आपका भगवान भी आपको नहीं बचा पाएगा।
चुनाव का माहौल है। मतदान की तारिख नजदीक आ रही है। दुमका-राजमहल से खड़े उम्मीदवारों की सांसे फूली हुई हैं। सभी अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। हर गली-कूचों की जनता के बीच राजनीतिक बहस छिड़ी हुई है। हर किसी उम्मीदवार पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। हर व्यक्ति अपनी पीड़ा का ठीकरा अपने विधायक/सांसदों पर फोड़ रहा है। सच देखा जाय, तो जितनी गलियां राजनीतिज्ञों को दिया जाता है, शायद ही किसी और को दिया जाता हो।
सत्ता का नशा बादशाहों को मतवाला बना देता है। वे सत्ता वापसी के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाते हैं। वे सरकारी मशीनरियों का दुरुपयोग करने से बाज नहीं आते। कभी-कभी वे अपने ही बुने हुए जाल में फंस जाते हैं। उदाहारणार्थ - इलेक्ट्रोल बॉण्ड। सुना है; सत्ताधारियों ने कोई धुलाई मशीन की ईजाद की हुई है। इस मशीन की हैसियत बहुत अनोखी है! लोग कहते हैं, जितना भी बड़ा भ्रष्टाचारी क्यों न हो, इस मशीन में धुलाई के उपरांत वह दूध-सा उज्जवल चमकने लगता है। वाह री, मोती धुलाई मशीन!
आपने सुना होगा। सत्ता में आसीन बादशाह का हुक्म हुआ - "जाओ, विपक्ष के सभी सदस्यों को अपने खेमे में शामिल कर लो। इससे हमारी शक्ति मजबूत होगी।"
"हुजूर अनार्थ हो जाएगा। वे सभी महा भ्रष्टाचारी हैं।"
"कोई बात नहीं। उन्हें हमारी धुलाई मशीन में नहला दो। जाओ, हमारा मुंह क्या ताक रहे हो?"
"हुजूर उनका क्या करें, जो उस मशीन में नहाने से मना कर दे?"
"उन्हें सलाखों के पीछे धकेल दो। कितनी बार समझाया? समझ में नहीं आता है क्या?"
थानेदार मुंह लटकाये चला गया। उसने आव देखा न ताव, एक आदिवासी मुख्यमंत्री को अकारण ही पकड़ कर जेल में ठूंस दिया। बेचारा शरीफ आदिवासी चुपचाप त्यागपत्र देकर जेल चला गया।
इसके बाद बादशाह का हुक्म हुआ - "दिल्ली का मुख्यमंत्री बहुत फड़फड़ा रहा है। चुनाव में वह हमारा मटियामेट कर देगा। अतः उसे भी जेल में ठूंस दो।" और इस तरह थानेदार ने बादशाह की आज्ञा का पालन किया। लेकिन दिल्ली के सीएम ने हुंकार भरी - "तू डाल-डाल, तो हम पात-पात। हम रिजाईन नहीं करेंगे।"
देशभर में विपक्षी दलों को परेशान करने का सिलसिला जारी है। बादशाह की इच्छा जो चाहे वह कर रहा है। देश की संपत्ति को बेच दो और वह बेच रहा है। वह संविधान, आरक्षण, लोकतंत्र सबकुछ बेच देना चाहता है। वह जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली कहावत को चरितार्थ करने पर उतारु हो गया है। इंडिया गठबंधन उस बादशाह का जोरदार विरोध कर रहा है। चुनाव विश्लेषकों की मानें, तो बादशाह 400 नहीं 140 सीट पर अटक रहा है।
दुमका-राजमहल से भी इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार कमर कस कर मैदान में आ डटे हैं। बादशाह के चेले भी रणक्षेत्र में है। इसमें आश्चर्य की बात यही है कि कुछ निर्दलीय उम्मीदवार बदलाव चाहते हैं। उनका मनिफेस्टो क्या कहता है, यह तो राम जाने। पर वे अकेले ही संविधान एवं आरक्षण को बचा लेने का दंभ भर रहे हैं। आइए, 4 जून 2024 का इंतजार करें।
Thursday, 16 May 2024
Sunday, 12 May 2024
करो या मरो
दुनिया में राजनीति का नशा बड़ा ही अद्भूत है। एक पैर कब्र पर है, फिर भी यह नशा उतरने का नाम नहीं लेता है। जिस तरह दर्जी का बेटा दर्जी, कुम्हार का बेटा कुम्हार उसी तरह यह पेशा भी खानदानी बन जाने का रिवाज है।
देश में तीसरे चरण का मतदान हो चुका है। 13 मई 2024 को चौथे चरण का मतदान होना है। अब तक सभी चरणों में मतदान करने वालों की संख्या गिर गई है। आखिर ऐसा क्यों? इस संबंध में सौ बात की एक बात लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठना बताया जा रहा है। उनके अनुसार सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे होते हैं। उनकी दलील है कि इस बार तुम लुट लो, फिर हमें अगले पाँच साल बाद लुटने का मौका दो। यह सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। परंतु यह भी सच है कि अधिक दिनों तक जमा किया हुआ पानी जरुर गंदा होता है, अतः इसकी सफाई बहुत जरुरी है। एवं उस तालाब पर नये जल का भराव अत्यावश्यक है। इसे ही एंटीइनकॉम्बेन्सी कहा जाता है।
विश्वास बहुत बड़ी चीज है। अगर विश्वास ही उठ गया, तो सबकुछ का सत्यानाश तय है। आजकल ईव्हीएम द्वारा मतदान का प्रावधान है। ईव्हीएम एक मतदान करने की मशीन है। उस पर आरोप लगते रहा है कि उस मशीन को अपने मनमुताबिक सेट किया जा सकता है। आरोपकर्ता की दलील है कि उसे इस तरह सेट किया जा सकता है कि अगर उस मशीन में दस वोट पड़ा, तो छः वोटों को अपने खाते में आसानी से परिवर्तित किया जा सकता है। लो कर लो बात। कुछ भी चिल्लाते रहो। जीत तो उसी की होगी, जिसके पास लाठी है।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अब देश में गरीबों की संख्या 84 करोड़ हो गई है। यह जनसंख्या सिर्फ पाँच किलो सरकारी राशन पर जीवित है। यह भी सच है कि आने वाले दिनों में इनकी संख्या घटेगी नहीं, बल्कि बढ़ती ही जायगी। देश में नौकरी करने की सुविधा गायब हो गई है। वंचित एवं दबे-कुचले लोग अब आसमान से गिरे तो खजूर पर अटक गए हैं। उनकी आरक्षित सीट घटा दी गई है। उन्हें अपने हाल में जीने के लिए अवारा छोड़ दिया गया है। देश की सरकारी संपत्तियों को धड़ल्ले से बेचा रहा है। और जैसे कि आपको मालूम है कि प्राईवेट संस्थानों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। बेचारा आरक्षित वर्ग आखिर जांय तो कहाँ जांय?
देश के संविधान पर भयानक खतरा मंडरा रहा है। बीते दिनों इसे संसद भवन के समीप जलाया गया। जगह-जगह आरक्षण का विरोध किया जा रहा है। इस बात की पुष्टि भी हो चुकी है कि सत्तापक्ष के लोकसभा उम्मीदवारों ने चार सौ पर लाने की दुहाई देते हुए संविधान को बदलने की वकालत कर डाली है। इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि वह दिन दूर नहीं जब देश से लोकतंत्र एवं संविधान का नामोनिशान मिट जाएगा।
अतः अब देश में "करो या मरो" की स्थिति आ गई है। अगर आपसे किसी तरह की चूक हो गई, तो यह आपका अंतिम मतदान होगा। इसके बाद देश जल रहा होगा और साहब बांसुरी बजाने में मस्त होंगे। तब तक देश खण्ड-खण्ड हो जायगा।
Sunday, 5 May 2024
मान लो; संविधान बदल गया?
तर्क विज्ञान के कई नियमों में यह भी एक नियम है कि जहां धुआँ उठे, समझो वहां आग है। इसका मतलब अगर वहां धुआँ हो, तो वहां आग होने की पूरी-पूरी संभावना से कोई नहीं इंकार कर सकता है। धुआँ और आग में चोली-दामन का साथ है। बगैर धुआँ आग की कल्पना हो ही नहीं सकती है। इसका अर्थ यही हुआ कि भाजपा एवं उसके सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक गाहे-बगाहे यह जो संविधान बदलने की बात उठाते हैं, यह सत्य प्रतीत होता है। इसी चुनाव में भाजपा के कुछ उम्मीदवारों ने साफ तौर पर कह दिया है कि उन्हें 400 पार करा दो, वे संविधान अवश्य बदल देंगे। और तो और वे खुलेआम संविधान को जलाते हैं। उनके समर्थक एससी/एसटी/ओबीसी मुर्दाबाद के नारे लगाते हैं। यह सब धुआँ क्यों उठ रहा है? इसका मतलब साफ है कि वहां आग लगी हुई। वे संविधान बदलने को उतारु हैं।
भारत देश सन् 1947 को आजाद हुआ। बाबा साहब डॉ भीमराव आम्बेडकर की अगुवाई में लिखे हुए इस संविधान को 1949 में हम भारत के लोगों ने उसे अंगीकृत किया। और इसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया। कुछ संशोधनों के साथ फिलहाल इसमें 25 भाग और 448 अनुच्छेद हैं। भारत का संविधान दुनिया के सर्वोत्तम संविधानों में से एक है। परंतु इतना उच्च कोटि का संविधान रहते हुए भी कुछेक घटनाओं को देखकर मन बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर हो जाता है। संविधान के अनुसार भारत का हर नागरिक बराबरी का हक रखता है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है। इस देश में छुआछूत के लिए कोई जगह नहीं, उसे सदा के लिए मिटा दिया गया है। हर नागरिक को मौलिक अधिकारों से सुसज्जित किया गया है। फिर भी हमारे वर्तमान महामहिम राष्ट्रपति के साथ ऐसा तुच्छ भेदभाव क्यों? इसके पूर्व में भी कई दलित नेताओं के साथ ऐसा ही भेदभाव किया गया है। ऐसा क्यों? इसके अलावे भी दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने पर मनाही क्यों? इस तरह के कई उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं।
अब सवाल उठता है मान लो; संविधान को बदल दिया गया, फिर क्या होगा? क्या होगा? ये जो चुनाव-चुनाव हमलोग खेल रहे हैं, सब खत्म। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। न तुम्हारे विधायक होंगे और न कोई सांसद। पंचायत चुनाव में भी आपकी कोई भागीदारी नहीं होगी। सरकारी आरक्षण खत्म हो जायगा। राजनैतिक हो अथवा सरकारी नौकरी, सब समाप्त। याद रखना, सदियों से दबाए गए दलित फिर वहीं पहुंच जाएंगे, जहां से वे आये थे। सभी दलित गले में हांड़ी और कमर में झाड़ू टांगते हुए नजर आएंगे। महिलाओं को स्तन ढांकने की आजादी नहीं होगी। जिस दलित को शिक्षा ग्रहण करने का भूत सवार हो, उनके कानों में पिघलते हुए शीशे डाले जाएंगे। दलित गुलामगीरी करने के लिए मजबूर हो जाएंगे। पक्का सबूत के तौर पर अभी देख लेना। लोकसभा सामान्य सीट से उम्मीदवारी करके देख लेना। वहां से बाहरी जीत सकता है, पर आपकी पूछ नहीं के बराबर होगी।
सवाल यह नहीं है कि जब संविधान बदलने की घड़ी आएगी, फिर देखा जाएगा। आग लगने पर कुआँ खोदना कहां की बुद्धिमानी होगी? आदिवासी विरोधी मानसिकता वाले को कौन नहीं जानता है? 1977 से पहले वे ”दीया“ दिखाया करते थे। इसके बाद उनके हाथ में "कमल फूल" उग आया। तब से वे धीरे-धीरे सत्तासीन होते गए। और अब तो वे 10 वर्षों से हमारे सिर पर सवार हो गये हैं। उनके काले करतूतों के बारे में इतना ही काफी है कि वे आपको "वनवासी" के नाम से पुकारते हैं एवं धर्म की घूंट पिलाते हैं।
एसपीटी एक्ट इतना सख्त कानून रहते हुए भी किसने मनुवादियों को अपने इलाके में प्रवेश करने की अनुमति दी? उन्हें किसने आमंत्रण दिया? सिर्फ राजनीतिज्ञों को दोष देने मात्र से आपकी समस्या नहीं सुलझ सकती है। इसके जिम्मेवार आप स्वयं हो। यहां "मियां बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी" वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। आपके इलाके में इतने सारे पत्थर एवं कोयला खदान के स्वामी कौन लोग हैं। सारे के सारे मालिक मनुवादी हैं।
चालू लोकसभा चुनाव में वे किस तरह की चाल चल रहे हैं, आप पूर्णतः अनभिज्ञ मालूम पड़ते हो। पूरे देश में एक ओर संविधान बचाने वाले खड़े हैं, तो दूसरी ओर इसको बदलने वाले 400 पार का नारा दे रहे हैं। साफ शब्दों में कहा जाय, तो राजमहल की सीट किसकी झोली में जाती है, देखना बड़ा दिलचस्प होगा। आपकी सावधानी हटी, तो दुर्घटना घट सकती है। पछताने से कोई लाभ नहीं, जब चिड़िया चुग गई खेत।
Saturday, 4 May 2024
संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...
-
हमारी पहचान है या विनाश की फाँस? अगर दुनिया में लिपि ही किसी समुदाय विशेष की पहचान होती, तो आज अंग्रेज ही दुनिया के महामूर्ख कहलाते। यही वे ...
-
संताली साहित्य का भविष्य यह सौ प्रतिशत सच है कि संतालों में संताल हूल-1855 तक एक भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति मौजूद नहीं था। तात्पर्य यही है कि किसी ...
-
BOḌIṄ MÃHÃ DINISẠ (02 No̱be̱mbo̱r, 1865) Cando Babawak̕ ạḍi hahaṛa sirjo̱n! Pilcu Haṛam-Buḍhi kho̱n nit hạbic̕te ạḍi lekan man...