Saturday, 31 January 1981

मनु का भूत पकड़ में आ गया

जब से होश संभाला है, जब से दुनियादारी की थोड़ी-सी समझ आई है, आदिवासियो जागो, उठो, संघर्ष करो का नारा सुनते-सुनते कान पक गए हैं। आह्वान इतना तीखा कि कान के पर्दे फटे जा रहे हैं। लगता है; अब तक प्रबुद्ध आदिवासी घोड़े बेचकर सोए ही जा रहे हैं। सभी तरह के आदिवासी सामाजिक अखाड़ों में सदैव प्रगति का घोल घोंटा जाता रहा है, एवं उसे हमें बड़े ही प्यार और दुलार के साथ पिलाया जाता है। पठन.पाठन में हमें अब तक यही शिक्षा दी जा रही है कि हम आदिवासी उन्नति की अंतिम कतार में खड़े हैं। आकाश, पाताल और धरती सर्वत्र हम पिछड़े हैं, गरीब हैं के स्वर गूँज रहे हैं। आदिवासियों का भूत, भविष्य और वर्तमान काले अध्याय के रुप में वर्णित हैं। आदिवासी जगत में दूर-दूर तक स्वर्णिम अध्यायों का कोई नामोनिशान ही नहीं। आदिवासी दरिद्र थे, हैं और सदा गरीब ही रहेंगे। लगता है; आदिवासी इंसान न होकर मानो, कोई जंगली जानवर हो गए हों। या यों कह लीजिए कि वे सजीव न होकर कोई निर्जीव धातु बन गए हों। उनके लाख चाहने पर भी वे प्रगति के पथ पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। अतः हे आदिवासी भाईयो तथा बहनो! अपने हक और अधिकार के लिए संघर्ष करो। क्योंकि संघर्ष ही जीवन है। यही है; आदिवासियों की उन्नति के लिए प्रयोग में लाए जानेवाला अब तक का महान दर्शन (शास्त्र)। किंतु समस्या की घुंडी डी और कहीं फँसी हुई है। रोग कुछ, दवा कुछ। ऐसी हालत में मरीज क्या खाक ठीक होगा? उसके पास मरने के सिवाय और कोई चारा ही नहीं। शब्दकोश के मायाजाल में आदिवासी शब्द - नीच, जंगली, असभ्य, गंवार, देहाती, मूर्ख, पिछड़ा, दलित, बेवकूफ, गरीब, असहाय आदि का पर्यायवाची शब्द बन गया है। जब भी इस शब्द का प्रयोग होता है, बरबस ही आँखों के सामने वही नंग-धड़ंग, वन-जंगल, गुफा-कंदराओं में वास करने वाले आदिमानव का दृश्य चमकने लग जाता है। इन्हीं अलंकारों को नेस्तानाबूद करने के लिए ही इतिहास गवाह है कि हमारे पुरखों ने अन्याय के विरुद्ध लड़ते-लड़ते अपने प्राणों की आहुति दे दी। शहीद तिलका, सिदो, बिरसा के अलावे वीरांगनाएँ झानो, फूलो व सिनगी दई का नाम आज भी बड़े आदर के साथ लिया जाता है। झारखंड के जनकों में दिवंगत मारांग गोमके ने भी आदिवासी अलग प्रदेश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। उम्रदराज आदिवासी नेताओं में सर्वश्री एनई होरो, बागुन सुम्बरुई, शिबू सोरेन आदि अब भी प्रयासरत हैं; ताकि किसी तरह इन असभ्य और जंगली आदिवासियों को बचाया जा सके। और तो और वर्तमान में हमारे पैंतीस पंजीकृत झारखंडी राजनीतिज्ञ भी हैं, जो पिछड़े हुए आदिवासियों की नैया पार कराने का असफल प्रयास करने में जुटे हुए हैं। इस तरह सैकड़ों गैरसरकारी संस्थाएँ भी हैं, जो आदिवासियों के उत्थान के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। प्रचार-प्रसार का कोई ऐसा माध्यम न बचा, जिसमें आदिवासियों को संघर्ष करने की नसीहत न दी जाती हो। कोई ऐसा राजनेता न हुआ, जिसने असभ्य और जंगली आदिवासियों के लिए खून की नदियाँ बहाने का हुंकार न भरा हो। हमारी कोई ऐसी पुस्तक.पत्रिका न बची है, जहाँ आदिवासियों को अवनति के दलदल से उबरने की सलाह न दी जाती हो। कोई ऐसी आदिवासी बैठक व सभा नहीं होती, जहाँ पिछड़े हुए आदिवासियों को बचाने के बारे चर्चा न होती हो। पक्ष.विपक्ष द्वारा प्रयोजित ऐसी कोई राजनैतिक रैली नहीं होती, जहाँ दलित आदिवासियों को उठाने की लोक.लुभावन घोषणाएँ नहीं होती। हमारे धार्मिक गुरु, राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद्, समाज सुधारक, लेखक, कवि, सरकारी उच्च पदाधिकारीगण कोई ऐसा नहीं बचा है, जो सुबह.शाम आदिवासी उत्थान के बारे न सोचता हो। हमारे कृषक, मजदूर, रेजाकुली, कोई ऐसा, नहीं जो उठते-बैठते अपनी गरीबी के बारे विचार-मंथन न करता हो। बच्चे से लेकर बुड्ढे तक अर्थात् हम तमाम नर-नारी इसी रोग से पीड़ित हैं कि हम आदिवासी असभ्य, पिछड़े और गरीब हैं। हमारी उन्नति कैसे हो? इस प्रश्न का हल बगैर जाने ही, हमारे बुजुर्ग इस धरती से विदा हो लिए। अब हमारी नियति ही बन चुकी है कि हम गरीबी में जन्म लेते हैं और गरीबी के साथ ही दफना दिए जाते हैं। हमारे जीवन में कोई बसंत नहीं। हमारे नसीब में सिर्फ पतझड़ ही पतझड़ है। कोई ऐसी सुबह नहीं आती, जहाँ मंद-मंद मुस्कुराती सूर्य की किरणें पड़ती हों, भीनी-भीनी ताजी हवाएँ हमारे शरीर को स्पर्श करती हों। और तो और हमारे चारों ओर रंग-बिरंगे खुशबूदार फूलों की महक से सारा जहां ही मदहोश हो उठता हो। ईश्वर द्वारा प्रदत्त हमारा यह अनमोल जीवन जिंदगी भर एक मृत काया बनकर विचरण करने के लिए मजबूर हो जाता है। हमारी जिंदगी के किसी भी मोड़ पर आनंद का तार झंकृत नहीं हो पाता। आया राम न गया राम, हम जीवन भर दुःख के कड़ुवे घूँट पीकर रह जाते हैं। यही है किस्मत हमारी समझकर, हम ताउम्र बेचैनी की नींद सोए चले जा रहे हैं। 

असभ्य का जहर इतना मीठा कि हम उसे पूरे होशोहवास के साथ पान किए जा रहे हैं। इस मसले पर कोई प्रतिवाद नहीं, कोई आपत्ति नहीं। हम अपने आपको आदिवासी कहलाने में गर्व महसूस करते हैं। तभी तो, गर्व के साथ कहो - हम आदिवासी हैं का मंत्रोच्चर करने में पीछे नहीं रहते। हमें अच्छी तरह ठोक.बजाकर समझा दिया गया है कि आदिवासी का मतलब-असभ्य मानव। कोई भी विद्वान इसका अर्थ यह नहीं लगाता कि जो मानव इस भूखंड पर सदियों से रह रहा हो, उसे ही आदिवासी कहा जाता है। परंतु आदिवासी शब्द सुनते ही अच्छे.अच्छों के दिमाग में वही नंग-धड़ंग आदिमानव का चित्र उभर कर सामने आता है। गाँव.देहात में झाड़ जंगल के बीच निवास करने वाले आदिवासी अपने आपको पिछड़ा कहलाए, तो बात कुछ समझ में आती है। परंतु हमारे तमाम शिक्षित वर्ग, उच्च पदों पर कार्यरत हमारे सारे आदिवासी भाई.बहन, धार्मिक संस्थानों के मुख्याधिकारी यथा कार्डिनल, बिशप एवं यहाँ तक कि राजनीतिक गलियारे में प्रथम स्थान रखने वाले गुरु जी, कोड़ा जी, मुंडा जी, मरांडी जी व अन्य मंत्रीगण भी आदिवासी का अर्थ जो गंवार हैं, समझने की भूल कर बैठते हैं। वे अपने आपको श्रेष्ठतम रहते हुए भी दीन-हीन साबित करने में लगे हुए हैं। अन्य लोगों द्वारा हमारी तौहीन की जाए तो बात कुछ समझ में आती है। किंतु स्वयं ही अपने आपको नीच, जंगली, असभ्य, गंवार, देहाती, मूर्ख, पिछड़ा, दलित, बेवकूफ, गरीब, असहाय का ढोल पीटते फिरें, तो बात गले नहीं उतरती है। हम अपने पैरों पर स्वयं ही कुल्हाड़ी मार रहे हैं। कोई मजाक नहीं, बड़प्पन नहीं, पर करोड़पति रहते हुए भी हम अपने आपको भिखारी मानते हैं। महापंडित रहते हुए भी हम अपने आपको मूर्ख साबित करने में जुटे हुए हैं। महान डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक रहते हुए भी हम अपने आपको अनपढ़ समझें, तो कोई क्या कर सकता है? दोनों आँखें ठीक-ठाक रहने के बावजूद भी हम काना अथवा सूरदास कहलाने को लालायित हों, तो बात कुछ समझ में नहीं आ रही है। कहने का तात्पर्य, लोग हमें नीच तो कहेंगे ही, पर हम भी उसे बगैर तर्क दिए हामी भर लें तो इस पर उनका क्या कसूर? अनुभव कहता है कि अपना आदिवासी अपने विभाग का अध्यक्ष होते हुए भी उनके अधिनस्थ कर्मचारी, उसे मुँह चिढ़ाकर छींटाकसी करते फिरते हैं कि अरे ये तो आदिवासी है। अब आप ही बताइए, इस तरह का अपमानयुक्त संबोधन क्या उचित है? इसके विपरीत अगर विभागाध्यक्ष गैरआदिवासी हों एवं अकुशल हों तो भी उनके सात खून माफ है। अर्थात् कोई भी उनका बाल बांका नहीं कर सकता, वरन् चोर-चोर मौसेरे भाई का संबंध जोड़ लेते हैं। अतएव यह स्वतः ही सिद्ध हो गया कि आदिवासी कितना भी महान, विलक्षण, विद्वान, धनवान क्यों न हों, वह गंवार ही कहलाएगा। इसका पक्का सबूत है कि देश की आजादी के लिए शहीद हुए वीर तिलका मुर्मू, सिदो मुर्मू, बिरसा मुंडा आदि महापुरुषों का जन्मदिवस मनाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा कौन लेता है? निश्चित तौर पर सिर्फ आदिवासी ही मनाते हैं। क्यों? क्योंकि वे स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी, अपने आदिवासी जो ठहरे। गैरआदिवासी इस तरह के मामले मे न तीन में है न तेरह में।

आये दिन अक्सर देखा गया है कि जहाँ कहीं भी आदिवासियों की छोटी-बड़ी सभाएँ, बैठकें आयोजित की जाती हैं, वहाँ प्रत्येक के मुँह से हम गरीब हैं, पिछड़े हैं के स्वर गूँज उठते हैं। हम गरीब हैं के सिवाय और कोई बात ही नहीं होती। घुम फिर कर चर्चा का विषय वहीं गरीबी पर अटक जाता है। पूरी सभा ही मान बैठती है कि हम आदिवासी अत्यंत ही दीन-हीन हैं। संक्षेप में कहें तो गरीबी के हम महान प्रचारक बन गए हैं - "पास्टर/प्रीचर ऑफ पोभर्टी।" हम सभी, कोई छोटा तो कोई बड़ा, गरीबी के महान प्रचारक बन गए हैं। सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिज्ञ वगैरह तो गरीबी का प्रचार करके ही अपनी जीविका चलाते हैं। इस कार्य में हमारे धार्मिक संस्थान भी पीछे नहीं हैं। हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई सारे के सारे धर्मावलंबियों ने गरीबी के प्रचार-प्रसार हेतु अपने छोटे-बड़े चेले-चेलियाँ पाल रखे हैं। सिर्फ उदाहरण के तौर पर देखें, तो कोई पंडित-पुरोहित, हाजी-मौलवी, ग्रंथी-ज्ञानी, फादर-सिस्टर आदि नियुक्त किए हुए हैं, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसी संदर्भ में झरने के ऊपरी हिस्से में पानी पी रहे शेर और नीचले भाग में पानी पी रही बकरी की कहानी याद आ रही है। जैसे कि आपको पता है, शेर ने नादान बकरी पर इल्जाम लगाते हुए आरोप लगाया कि क्योंकर वह शेर के पानी को जूठा कर रही है? यह परम सत्य है कि ऊपर से पानी का बहाव हमेशा नीचे की ओर ही होता है, नीचे से पानी कभी भी ऊपर की ओर नहीं बहता। अतः शेर का पानी कभी जूठा नहीं हो सकता। किंतु यह तथ्य लाचार बकरी को मालूम होते हुए भी, उसने शेर के पानी को जूठा करने का बेबुनियाद आरोप, सही मान लिया है। जिसकी वजह से शेर ने उस नादान बकरी को मौत के घाट उतार दिया। अब आप ही सोचिए, इसमें कसूर शेर का है कि बकरी का? निश्चित तौर पर कसूर बकरी का है। अतः हमारी मनःस्थिति भी कहीं बकरी जैसी तो नहीं हो गई है?

आदिवासी का अर्थ यानि असभ्य मानव, इस कदर हमारे दिमाग में समाया हुआ है कि हम उससे उबर ही नहीं सकते। इसमें उनका दोष नहीं, दोष हमारा है। पूरे भारतीय संविधान पर अगर सरसरी निगाह डालें, तो उसमें भी कहीं आदिवासी शब्द का कोई जिक्र ही नहीं। हो सकता है आदिवासी शब्द के बदले में ही अनुसूचित जनजाति का उपयोग हुआ हो। परंतु हरिजन, आदिवासी, दलित आदि शब्दों का प्रयोग विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हमेशा होते रहा है। ध्यान देने वाली बात है कि नॉर्थ-ईस्ट के एसटी, आदिवासी नहीं हैं। गुर्जर-मीणा आदिवासी नहीं, पर एसटी बनने के लिए जान देने को तैयार बैठे हैं। लेकिन अफसोस है कि असम, अंडमान-निकोबार आदि राज्यों में आदिवासी है, पर एसटी नहीं हैं। कुछ भी हो, सरकारी तंत्र में जो भी अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति कहलाए, वे हमेशा ही नीच एवं हेय दृष्टि से दिखने के पात्र बन गए हैं। और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया ने ही मान लिया है कि आदिवासी अर्थात् असभ्य मानव। तभी तो 9 अगस्त को पूरी दुनिया में आदिवासी दिवस बड़े ही ताम-झाम के साथ मनाया जाता है।
आस्तिक हो या नास्तिक, सभी शत प्रतिशत मानते हैं कि दुनिया में कोई भी नवजात शिशु इस धरती पर पदार्पण करते वक्त अपने शरीर पर कोई विशेष चिह्न लेकर नहीं आता कि वह आदिवासी है या गैर आदिवासी। माथे पर किसी तरह का कोई प्रतीक चिह्न भी नहीं कि वह हिन्दु है या मुसलमान। शरीरांग पर किसी तरह का कोई नामोनिशान भी नहीं कि वह पहचाना जा सके कि वह कौन-सी जाति का सदस्य है? प्रायः सभी मानवों की बनावट एक जैसी ही है। हरेक मनुष्य के दो ही आँख होती हैं। कभी यह सुनने में नहीं आया है कि किसी के माथे के पीछे भी तीसरी आँख होती है। यह तो प्रकृति का नियम व जलवायु पर निर्भर करता है कि हम काले हैं या गोरे। फिर यह जात-पात की कैसी बातें? इस धरा पर तो दो ही जातियाँ हैं-नर और नारी।

एक झूठ को सौ बार दुहरा देने से वह सच में परिवर्तित हो जाता है। कहीं ऐसा ही तो नहीं कि हमारे विरुद्ध पर्दे के पीछे से कोई सोची-समझी चाल चलाई जा रही हो? हमारे विरुद्ध कोई गहरी साजिश रची जा रही हो? कहीं हम किसी षड्यंत्र के शिकार तो नहीं हो रहे? जिससे हम जन्म जन्मांतर तक उन्नति ही न कर सकें। काफी सोच.विचार व मनन-चिंतन के बाद इस आदिवासी-बकरी को बिल्कुल समझ में आ गया है कि शेर का आरोप झूठा और बेबुनियाद है। यह सत्य से परे है कि हम उसके पानी को जूठा कर रहे हैं। हम तो झरने के नीचले हिस्से में आराम से पानी पी रहे हैं, फिर हमारा जूठा पानी कैसे ऊपर जा सकता है? शेर का पानी जूठा कैसे हो गया? बल्कि सत्य तो यही है कि हम शेर के जूठे पानी को कब से पीए जा रहे हैं। लेकिन हम नादान बकरी ने इसके विरुद्ध कभी चूँ तक न की। क्यों? यह शोध का विषय हो सकता है। अतः यह सिद्ध हो गया कि शेर झूठ बोल रहा है। वह षड्यंत्रकारी, दगाबाज, घमंडी और फरेबी है। कमजोर को देखकर सबको गुस्सा आता है, कहावत को वह चरितार्थ कर रहा है। लेकिन अब वक्त बदल गया है। फूँक-फूँककर कदम रखने का समय आ गया है। कब तक बबूल के पेड़ पर आम फलता रहेगा? बकरी अच्छी तरह समझ गई है पांसा खेलने की कला। अंधा एक ही बार लाठी खो सकता है, बार-बार नहीं। कहीं किसी साजिश के तहत ही मनुस्मृति की रचना तो नहीं की गई है? कहीं यह चाल तो नहीं? महाराज मनु के अनुसार ब्रह्मा जी ने मानव समाज को चार वर्णों में बाँट दिया - ब्रह्माण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। किस पंडित का कारनामा है कि सब से नीचले पायदान पर अर्थात् शूद्र के पाले में हम नादान बकरी को भी डाल दिया गया है? हमारे लिए शूद्र रुपी जेलखाने की तैयारी की गई है। सब से हैरानी की बात तो यही है कि वर्ण व्यवस्था स्थापित करने के बाद ब्रह्मा जी ने उस जेलखाने की कुंजी को ही समुद्र में फेंक दिया है। कहाँ का नियम है कि हमारी छाया मात्र से ही शेर अपवित्र हो जाता है?

हम किसी भी मंदिर के पुजारी बनने के लिए अयोग्य ठहरा दिए गए हैं। किसने हमारा नामकरण किया हुआ है? हम गिरिजन, हरिजन, गिरिवासी, वनवासी, अनुसूचित जनजाति क्योंकर कहलाए? मनु के भूत ने हमें इस कदर जकड़ रखा है कि हम चाहते हुए भी उठ नहीं सकते। दिन और रात, सदैव मनु का डरावना भूत हमें सताए जा रहा है। मनुवादियों के अनुसार हमारी दोनों आँखें ठीक-ठाक रहते हुए भी हम कयामत के दिन तक सूरदास ही कहलाएंगे। फिर तो इस रंग-बिरंगी और आनंदमयी दुनिया को देख सकने की हमारी हैसियत ही कहाँ रही? अतएव अब मनु का भूत पकड़ में आ गया है। अब इसे किसी विद्युत प्रवाह से नहीं, पर ज्ञान के झटके से इसे प्रताड़ित करना होगा। ताकि वह हमें कयामत की घड़ी तक, फिर कभी अपना डरावना व भयानक चेहरा दिखाकर भयभीत न कर सके। तभी हम प्रगति के पथ पर आगे बढ़ सकते हैं, तभी हमारी उन्नति हो सकती है, तभी हम सभ्य मानव कहलाने के योग्य समझे जाएंगे।

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