पुस्तक प्रेमी समाज
एक निवेदन : संताल समाज पढ़ाकु समाज नहीं है। अर्थात् हमारा समाज पुस्तक प्रेमी समाज नहीं है। पुस्तक बोलती नहीं है, पर वह बहुत कुछ सिखाती है। परंतु हमारा समाज अब तक पुस्तक प्रेमी समाज क्यों नहीं बन पाया है? यह एक शोध का विषय हो सकता है। कहा जाता है कि जो समाज जितना पढ़ाकु होगा, वह समाज उतना ही उन्नत कहलाता है। पुस्तक पढ़ना समाज तौलने का एक पैमाना माना जाता है। या यूं कहें कि यह सीधा-सा तर्क है कि अगर पढ़ाकु समाज होगा, तो यह निश्चित है कि वह समाज उन्नत होगा। इसके उलट अगर समाज उन्नत है, तो वह समाज अवश्य ही पढ़ाकु समाज होगा। यह तथ्य निश्चित तौर पर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
इस संदर्भ में स्कूल-कॉलेजों की डिग्री से ही कोई शिक्षित कहलाएगा, ऐसा भी संभव नहीं है। शिक्षा में पैनापन लाने के लिए अनुभव एवं पुस्तक प्रेमी होना बहुत ही जरुरी विधा है। बहुत सारे ऐसे विषय हैं जो हमें कोर्स की किताबों में पढ़ने को नहीं मिलता है। जीवन में बहुत सारी ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, जो हमें दैनंदिनी के जीवन में बहुत प्रभावित करती हैं। ध्यान रहे; कोई कितना भी बड़ा डिग्रीधारी क्यों न हो, पर उसका बुनियादी ज्ञान मैट्रिक स्तर पर ही आधारित रहता है। हाँ, वह अपने ज्ञान का विस्तार आगे की पढ़ाई, पुस्तक प्रेमी बनकर एवं अनुभवी होकर ही कर सकता है।
आज मंगरु को इस संदर्भ में क्यों निवेदन करना पड़ रहा है? इसको इस तरह से समझा जा सकता है। आपने किसी फिल्म को थियेटर में अवश्य देखा होगा। उस फिल्म में क्या दिखाया जाता है? उस फिल्म में औसत 60 वर्ष की जिंदगी को सिर्फ 2 घंटे में दिखाया जाता है। कारण यही है कि इस भागमभाग की दौड़ में पूरी जिंदगी को समझ पाने के लिए 2 घंटे से ज्यादा वक्त किसी के पास उपलब्ध नहीं होता है। टी. व्ही. वगैरह में भी यही फार्मूला चलता है। ठीक ऐसे ही प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक मीडिया, इसी फार्मूला को ही अपनाया जाता है। साहित्य जगत में भी ऐसा ही होता है। यही कारण है कि महाग्रंथ, उपन्यास, कहानी-कविता को लिखा जाता है। साहित्य विधा में आपने देखा होगा कि लंबे-चौड़े विषय को भी एक ही वाक्य में कह दिया जाता है। ऐसे वाक्य को मुहावरा, कहावत, परिभाषा, नारा/स्लोगन कहा जाता है। उदाहरण - "लेल्हा गोडो, मोटा फुट", "आदो़ बाबोन बातावा, झारखण्ड राजबोन हातावा", "तुम मुझे खून दो, मैं तुझे आजादी दूंगा" आदि।
स्पष्ट रूप से कह दूं, तो आपका मंगरु भी इसी फार्मूले का मुरीद है। वह दुनिया भर की बातों को एक छोटा-सा लेख के द्वारा पाठको तक पहुंचाने की कोशिश करता है। ज्यादा वक्त किसी के पास नहीं होता है। यहाँ तक कि 2/3 पन्नों को पढ़ सकने का वक्त भी किसी के पास नसीब नहीं होता है। अतः उदाहरण के लिए शक्ति का वर्णन के लिए - "जिसकी लाठी उसकी भैंस" लिखा हो, तो उसी प्रसंग में ही उसके अर्थ को समझा जाय।
आदिवासी समाज अवनति के कई कारण हो सकते हैं, उनमें यह भी एक मूल कारण है कि समाज में पढ़ने-पढ़ाने की प्रवृति नगण्य है। अतः समाज को पुस्तक प्रेमी बनना ही होगा।
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