संताली साहित्य का भविष्य
जब संताली के लिए रोमन, देवनागरी एवं बंगला लिपि चलन में थी, तो चौथी अवैज्ञानिक लिपि बनाने की क्या जरुरत थी? सुना है, 1900 के दशक में उड़िसा के मयुरभंज इलाके में किसी लिपि चोर का उदय हुआ। उस लिपि चोर को भाषाविज्ञान के बारे में क, ख, ग ... भी मालूम नहीं। उसके साथ भाषा के मामले में एक तो करेला और दूजा ऊपर से नीम चढ़ा वाली बात हो गई। उसने आव देखा न ताव, इधर-उधर से लिपियों की चोरी कर ली। और इस तरह कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा उस भानुमति भाई ने कुनबा जोड़ दिया। यह भी कहा जाता है कि मूलतः वह लिपि मुण्डारी भाषा समूह के लिए बनाई गई थी। पर संताल छोड़ अन्यों ने अवैज्ञानिक होने के कारण उसे अस्वीकार कर दिया। फिर भागते चोर को लंगोटा ही सही, उसने अपनी लिपि के प्रचार हेतु एक संस्था की स्थापना कर डाली। तब से यह संस्था अपने खट्टे दही का प्रचार-प्रसार में जुटी हुई है। उस प्रचार की कड़ी में सबसे अहम मुद्दा बना "पहचान"। यह किस तरह की पहचान हुई? जबकि वे चौबीसों घंटे विदेशी वस्तुओं का उपयोग करने में तल्लीन हैं, और जब पढ़ाई-लिखाई के लिए लिपि की बात आती है, तो वे "आबुआक्-आबुआक्" करने लग जाते हैं। ज्ञात हो कि "मोंज दान्देर आंक" भी आबोआक् है, और यह इससे पहले और इससे भी अच्छी लिपि बन पड़ी है। फिर भी, क्यों नहीं उसे "आबुआक्-आबुआक्" करते हैं? अब जब "आबुआक्-आबुआक्" करने वाले चारों खाने चित हो गए, तो इन्होंने लिपि के साथ धर्म को भी जोड़ दिया है। जबकि धर्म के साथ भाषा व लिपि का कोई संबंध नहीं है। दुनिया में कई ऐसे देश हैं, जिनका रोम की जात-पात और धर्म के साथ कोई मेल नहीं, फिर भी इन्होंने रोमन लिपि को अपना रखा है। अंग्रेज को ही देख लो, उनकी अपनी कोई लिपि नहीं है। अंग्रेजी रोमन लिपि में लिखी जाती है, और इस वक्त अंग्रेजी दुनिया में अपना डंका बजा रही है। और तो और अपने पड़ोसी देश बंग्लादेश को ही देख लो। यह एक मुस्लिम बाहुल देश है। फिर भी यहां की जनता ने उर्दू-फारसी को छोड़कर बंगला लिपि को अपना रखा है। एक बात समझ में नहीं आती है, जब वे अंग्रेजों की पोशाक पैंट को बड़ी शान के साथ पहनते हैं, तो उनकी पहचान कहां चली जाती है? है न यह अजीब बात! इसे ही कहा जाता है - "गुड़ खाये, गुलगुले से परहेज।"
जब से उस नई लिपि का सृजन हुआ है, तब से उसके अंधभक्त उसके प्रचार कार्य में लगे हुए हैं। शुरुआती दौर में इसका खूब प्रचार-प्रसार हुआ। उनके लिए भाषा भाड़ में जाय, उनके लिए लिपि ही महत्वपूर्ण हो गई। यही कारण है कि 100 वर्ष की जयंती पर उन्होंने अब ओल चिकी मिशन - 2025 चला रखा है। लेकिन इनके सभी प्रचारक कंबल ओढ़कर घी पीने में मस्त निकले। न अभिावक, न मां-बाप और न ही कोई बच्चा, उस नई अवैज्ञानिक लिपि को सीख रहा है। कारण, पैंट के सामने सारी संताली पोशाक बेकार साबित हो गई।
स्पष्ट रूप से कहा जाय, तो हम तो डूबे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे वाली कहावत चरितार्थ हो गई। उन्होंने कोई ऐसी जगह न छोड़ी है, जहां उनका कब्जा न हो। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से लेकर हर जगह उनकी तूती बोल रही है। पाटाबिन्दा हो या लालपनिया धा़ेरो़म गढ़ हर जगह उनके परचम लहरा रहे हैं। लेकिन यह सच है, उनका यह खोटा सिक्का अब तक तो कामयाब होते दीख रहा है। इसका एकमात्र कारण यही है कि अच्छे लोग बुराई पर अपनी जुबान बंद रखे हुए हैं। जौहरी अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभा रहे हैं। तभी तो सोना के बदले लोहा हर जगह फुदक रहा है। "आबुआक्-आबुआक्" सिर्फ भावुकता पर अटकी हुई है। अंदर से यह पूरी तरह खोखली है। इसका साक्षात प्रमाण आपने हाल में संपन्न हुए जमशेदपुर पुस्तक मेले का नजारा देख ही लिया। उस मेले में ओल चिकी से मुद्रित संताली पुस्तकों का स्टॉल भी लगा हुआ था। परंतु कितनी अफसोस की बात है कि उस मेले में एक भी ओल चिकी संताली पुस्तक की बिक्री न हो सकी। हां, संताली पुस्तक प्रेमी देवनागरी/रोमन में प्रकाशित पुस्तकों के बारे में जानकारी अवश्य ले रहे थे। जमशेदपुर के उस पुस्तक मेले ने ओल चिकी के अंधभक्तों को अपना आईना दिखा ही दिया।
सत्य को परेशान किया जा सकता है। पर उसकी जीत अवश्यंभावी है। ओल चिकी एक मरा हुआ हाथी साबित हो रहा है। फिर भी कुछ अंधभक्त उसे जीवित होने की सूई भोंकने में जुटे हुए हैं। झारखण्ड के मुखिया धो़रो़म गढ़ से ओल चिकी की पैरवी करे, तो दाल में कुछ काला नजर आना स्वाभाविक है।
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