Saturday, 31 August 2024

अच्छे दोस्त की पहचान

कल और आज झारखण्ड में बिजली क्या कड़की, जो डरा वो भागते हुए नजर आए। कल एक तथाकथित टाइगर ने फूलवालों के घर में पनाह ले ली। उसने अपने पैतृक दल पर आरोप लगाया कि उसकी उपेक्षा हुई है। हो सकता है शायद उस नए आशियाने में उसकी आरती उतारी जायेगी। लेकिन इतना तो सच है कि अब तक उसे अपने पैतृक घर में जो इज्जत मिल रही थी, क्या वह बनावटी थी? उस घर ने उसे विधायक से लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचा दिया। क्या यह कम है? हो सकता है; शायद अब उसका प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा हो जायगा? और आज एक “कैंची” वाले ने भी फूलवालों के घर में शरण ले ली। आपने भी 25 वर्षों तक विधायक एवं मंत्री बनकर जनता की सेवा की है। तब आपकी आँखेँ पीछे की ओर रही होंगी, तभी आपको “बदलती डेमोग्राफी” नहीं दिखाई दे रही थी। कुछ भी हो; आप दोनों महानुभाओं को अग्रिम मुबारक हो! अब सवाल यह उठता है कि इस वक्त वास्तव में झारखण्ड जल रहा है। इस समस्या का समाधान सिर्फ नेताओं का नहीं है, बल्कि हमारा भी फर्ज बनता है। लेकिन आप दोनों तो अपनी इज्जत बचाने के चक्कर में आशियाना बदलते फिर रहे हैं। जनता आप दोनों को स्वार्थी नेताओं की श्रेणी में रख रहे हैं। कोई गलत उपाधि तो नहीं दे रहे हैं? क्योंकि बड़े बुजुर्ग भी कह गए हैं; “जो दुख की घड़ी में साथ दे, वही सच्चा दोस्त कहलाता है।"

Friday, 30 August 2024

डूबता जहाज या नूह की नाव?

सिदो-बिरसा के सपने को साकार करने हेतु आदिवासियों ने माराङ गोमके के नेतृत्व में जिस झारखण्ड पार्टी का गठन किया था, वह आंधी की तरह आया और तूफान की तरह चल बसा। कुछ आदिवासी शुभचिंतकों ने अलग प्रांत की मांग को जिंदा रखने की कोशिश की पर वे असफल रहे। फिर 1970 के दशक में गुरुजी का उदय हुआ। आप आदिवासी भावनाओं के साथ क्रीड़ा करने में सफल रहे। झारखण्ड आंदोलन का उतार-चढ़ाव होते रहा। लेकिन आश्चर्य तो तब हुआ जब आदिवासियों को अपना सपने का अलग प्रांत नसीब नहीं हुआ। फूलवालों ने इस मांग का अपहरण कर लिया। और इस तरह अलग झारखण्ड राज्य 15 नवंबर, 2000 को मिला। लेकिन खोदा पहाड़ निकली चुहिया, वह भी मरी हुई।

झारखण्ड मिले 24 वर्ष बीत चुके हैं। इस दौरान की कहानी आपके सामने है। यह सच है कि सिदो-बिरसा का सपना चकनाचूर हो गया। इसके लिए हमारे नेताओं को जितना दोष दिया जाय कम है। लेकिन इसके लिए हम भी कम जिम्मेवार नहीं हैं। हम वोट के बदले नोट एवं हँडिया-दारू के अत्यधिक लती व आदी हो चुके हैं। इस वक्त सभी सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं। हर तरफ घूसखोरी का आलम है। माफियाओं का राज कायम है। बेचारी झारखण्डी जनता बेमौत मरी जा रही है। वह नरक में जीने को मजबूर है।

आजकल झामुमो जिसकी राज्य में गठबंधन सरकार चल रही है, उसके बारे में जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं। कोई कह रहा है झामुमो एक डूबता जहाज है। सवारी कूदकर अपनी जान बचा रहे हैं। लेकिन इतिहास साक्षी है; जो भी इस जहाज से कूदा, वह मर-खप गया। या यों कहें की वह विलीन हो गया। कोई कह रहा है चिंटू-पिंटूओं ने झामुमो का हैजाक कर रखा है। आरोप-प्रत्यारोप लगाना बहुत आसान है। बांझ क्या जाने प्रसव की पीड़ा? नई पार्टी बनाना इतना आसान नहीं है।

आज वो देखो कोल्हन का शेर तथाकथित डूबता जहाज से कूद गया है। लेकिन कूदकर वह जिस दूसरे जहाज में सवार हो रहा है, वह तो इससे भी बड़ा खतरनाक है। अब उसका चड्डी-बनियान भी छीना जायगा। खासकर इस वक्त अगर आदिवासियों को धीमा जहर दिया जा रहा है, तो अब उनकी दिन-दहाड़े कत्लेआम होगी। अतः इस नादान मंगरु की सलाह यही है कि हो सकता है कि आपका भवन पुराना हो गया हो, इसे मरम्मत की जरूरत है। इतने आच्छादित मकान को क्यों तोड़ने के लिए लालायित हो रहे हो? नया आशियाना बनाना बहुत मुश्किल है। और दूसरा घर जहां जा रहे हो वह डाकुओं का बसेरा है। वहाँ आपका पनाह लेना खतरे से खाली नहीं होगा। अतः इस परिस्थिति में झामुमो डूबता जहाज है अथवा नूह की नाव? इस पर मंथन करना आपका कर्तव्य है।

Tuesday, 27 August 2024

BAŃCAOLEM BABA


Oka ńumteń ńumme Baba?
Oka buliteń pukạrme?
Rak̕ chaḍa oka hõ̱ bạnuk̕tiń,
Ho̱mo̱r chaḍa bạnuk̕tiń pạrsi.
Meṭaotińme digdhạ ińak̕,
Ho̱po̱n amren kạnạń se̱ baṅ?
Pujại than hõ̱ ạḍitam,
Taṛam taṛamre piṇḍtam,
Nana rup nana ro̱ṅ,
Hataṅ ińak̕ ạulạuen,
Amaṅ menamreń digdhạen.
Cae kho̱n hõ̱m bahe̱rkeťle,
Madho̱ Siń hõ̱m piḍgạuaťle,
Aso̱k̕ ṭayo̱k̕kanle Baba,
Ceka noa amak̕ kạrdhạni?
Kho̱j Kaman se̱ṅge̱l dak̕,
Ạurie aso̱ṛ nit hõ̱,
Haṭak̕te are̱c̕eť nit hõ̱,
Ale talare jaḍame jaḍam.
Ko̱clo̱n birudre holage,
Sar-kạpi malkaoleťle,
Hul se̱ṅge̱lle salgaoleť.
Hapṛamkoak̕ mãyãm kạlite,
Khõ̱ṇḍ begaren ḍiṇḍạ aleak̕.
Re̱c̕keťleko ḍiṇḍạ Baba,
Do̱kho̱lkeťtaleko disạm Baba.
Kena-Beca sagal-sagal,
Jo̱l-jumi, mĩhũ-me̱ro̱m,
Sanam Babako ḍiglạukeťko.
Rak̕ aleak̕, ho̱mo̱r aleak̕,
Ańjo̱mkatalem amge Baba,
Amge Baba bańcaokalem!

Monday, 26 August 2024

BAṄGEM TAHẼ̱NA HO̱Ṛ HO̱PO̱N

Mẽ̱t̕dak̕ge ṭo̱ṛo̱go̱k̕kan hae!
Umạr reak̕ noa hạsur anacurre,
Campa-Badoli ar Citri disạlere,
Hiḍir-hiḍir hae ban bạsien!
Purkhạkoak̕ co̱l durib,
Miť miťte hasa lataren,
Hae iń sudhạń aṅge̱n aťen!
Lạṛhại-lạpạṛhại sạrdi se̱ṅge̱len,
Bo̱ko̱-boeha talare tarwaṛe,
Lo̱ho̱ť laṭ paṭaoen jive̱ť mãyãmte.
Ho̱mo̱r halaṅeťko era-ho̱po̱n,
So̱maj go̱ hõ̱e gạrsilo̱mena,
Hae ho̱po̱niń cedak̕ko mapak̕?
Bo̱rno̱re o̱no̱l bạnuk̕ ce̱ťge,
Pachnao bạnuk̕ jạt-kujạt,
Pạris hõ̱ co̱ bạnuk̕ o̱l,
Amak̕ bo̱rno̱ sapha pĩṛĩť,
Cak̕ to̱be̱m potaoeť?
Amak̕ bo̱rno̱ arak̕ mãyãmte.
Judi niạ dho̱co̱r tahẽ̱yena amak̕,
Gapam ńamok̕a ciṛiạkhanare,
Jae jug lạgiť noa pirthimi kho̱n,
Ať apať ado̱k̕am tirikal lạgiť,
Baṅgem tahẽ̱na am Ho̱ṛ ho̱po̱n.

Friday, 23 August 2024

जातिवाद : एक घनचक्करी

बाबा साहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर द्वारा रचित उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ”जाति प्रथा का विनाश“ में बहुत कुछ कहा गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य कब तक पूर्ण होगा, कहना किसी के वश की बात नहीं। कभी-कभी यह देखकर बड़ा ही आश्चर्य मालूम पड़ता है कि आखिर क्यों संताल लोग ही हूल के महानायक सिदो मुर्मू को मानते हैं? बाकी समुदाय के लोगों को इतनी महान हस्ती सिदो मुर्मू से कोई लेना-देना नहीं है। उसी तरह सिर्फ दलित लोग ही डॉ भीमराव आम्बेडकर की जयंती वगैरह मनाते हैं। बाबा साहब भारत के संविधान के रचयिता हैं, इसलिए मजबूरीवश अन्य समुदाय के लोग इन्हें याद करते हैं। वरना जाति प्रथा ने तो सबका नाश कर रखा है। सच कहा जाय, तो दलितों के महापुरुषों की पूजा दलित लोग ही करते हैं। अन्य समुदाय के लोग इन महापुरुषों के प्रति ईर्ष्या और घृणा का भाव रखते हैं। आखिर ऐसा क्यों?

सुना है; दुनिया के अन्य देशों में जहां जाति प्रथा नहीं है, वहां काले-गोरे का भेदभाव है। यह भी एक जटिल समस्या है। जाति प्रथा हो या काले-गोरे का भेदभाव, समाज के लिए यह एक बहुत बड़ा अभिशाप है। मालूम होता है, जिसने भी इस तरह के भेदभाव की सृष्टि की है, वह बड़ा ही चालाक और चतुर प्रवृति का रहा होगा। कुछ भी हो, हमारे देश में ऐसी कुप्रथा के जनक मनु महाराज को दोष देना कहां तक उचित है? जब तक वर्ण व्यवस्था जीवित है, तब तक जाति प्रथा का विनाश संभव नहीं लगता है।

देश में लोकसभा का चुनाव अंतिम पड़ाव पर है। सवाल इसलिए उठ रहा है; क्योंकि देखा जा रहा है कि इस चुनाव में जातीय समीकरण का भी बहुत बड़ा हाथ होता है। अनजाने में ही सही, जनता भी उम्मीदवार की जाति देखकर ही वोट देती है। उम्मीदवार कितना भी अयोग्य क्यों न हों जनता उसे ही वोट देने के लिए लालायित रहती है। यही कारण है कि दलित आज भी पूना एक्ट को याद करते हैं।

वर्ण व्यवस्था की स्थापना यूं ही चुटकियों में नहीं हुई है। इसके पीछे न जाने कितने रहस्य छिपे हुए हैं। इतिहास साक्षी है कि भारत में अंग्रेजों के आगमन तक उच्च जाति के लोगों ने शुद्रों का जी भरकर दोहन किया। यह तो ईश्वरीय वरदान ही समझो कि अंग्रेजों ने शूद्रों की आंखें खोल दीं एवं उनकी मुक्ति के लिए कई सारे मार्ग प्रशस्त किये। ब्रिटिश काल में ही डॉ भीमराव आम्बेडकर का जन्म हुआ। उस दलित भीमराव आम्बेडकर ने देश में छुआछूत को झेलते हुए उच्च शिक्षा ग्रहण किया। डॉ भीमराव आम्बेडकर दलितों के मसीहा बन गए। देश 1947 को आजाद हुआ। विडंबना देखिए कि डॉ भीमराव आम्बेडकर देश के प्रथम कानून एवं न्याय मंत्री बनाए गए एवं उन्हें भारत का संविधान लिखने की जिम्मेदारी दी गई। बाबा साहब की अगुवाई में दुनिया का सबसे बेहतरीन संविधान लिखा गया। इसी संविधान में सदियों से दबाये गए एससी, एसटी एवं ओबीसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसी संविधान के बदौलत ही आज दबे-कुचलों के लिए सरकारी संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था की गई। यह भी सच है कि इसी आरक्षण के तहत ही आज हम चुनाव-चुनाव का खेल खेल रहे हैं।

लोकसभा चुनाव 2024 के अंतिम एवं 7वें चरण का मतदान 1 जून 2024 को होना है। इसी चरण में ही दुमका एवं राजमहल (आरक्षित-अजजा) के लिए मतदान होना है। दोनों ही क्षेत्रों में इंडिया गठबंधन और भाजपा के बीच सीधी टक्कर है। मालूम हो कि भाजपा जहां संविधान एवं आरक्षण को समाप्त करना चाहती है, वहीं इंडिया गठबंधन-झामुमो इसे बचाने के लिए पूरे देश में जी तोड़ मेहनत कर रहा है। ध्यान रहे, राजमहल से कोई निर्दलीय उम्मीदवार भी है, जो जिसने जिस थाली में खाया है, उसी को ही छेद करने में जुटा हुआ है।

सवाल यही है कि अगर संविधान एवं आरक्षण समाप्त हो गया तो न हम घर के और न घाट के रहेंगे। समाज से फिलहाल जाति प्रथा का विनाश भी संभव नहीं है। यह एक घनचक्करी है। इस स्थिति में हमारा क्या दायित्व बनता है। आइए, हम सब मिलकर इस संबंध में सोचें एवं विचारें।


Thursday, 15 August 2024

HO̱HO̱ET́AE BIṬLẠHA

“Hẽ̱ ya, un din do̱ okarepe tahẽ̱̱kana? Okaṭak̕ bhugạk̕repe huṛạt̕akan tahẽ̱kana? Bejãe un din do̱ mẽ̱t̕ge baṅ saṛok̕kantape tahẽ̱kan? Tinạk̕ din kho̱n miť lape̱ť sea mạṇḍ̕i hõ̱ aleak̕ lac̕re baṅ bo̱lo̱akana, ale re̱ṅge̱c̕tele jale-thale ńamakan tahẽ̱ mẽ̱ť do̱ ceka totkare tahẽ̱kantapea? Oṛak̕re cuṭĩạko do̱n gujuk̕kana, miť cupuť khode caole bạnuk̕talea. Un jo̱khe̱n ape susạriạko do̱ okarepe burumakan tahẽ̱kana? Nit nõ̱k̕õ̱e noa ạkrińkate jagele jo̱m lo̱lo̱k̕kanre, ạḍi jo̱lo̱npe ạikạuet̕a? Liṭạ Goḍet ạḍile sarhaoedea, e̱nte uni baṅkhan, ale do̱ re̱ṅge̱c̕tele go̱c̕ kuṛcuṅkok̕a. Uni oka rạnu capat̕e sorwa oṭoakať do̱ ṣamạni bhạlại reak̕ kạituk! Nit do̱ sạrige jug cetan jug hạbic̕ reak̕ mõ̱ńjo̱ko̱c̕ ạri! Dhar-udhạrkate jage mit̕bar puńjile lagaoeda. Onate rạnu emanle saoda ạguiyeda. Jage mit̕bar bo̱to̱l ạkrińok̕kantalea. Ona poesate nõ̱k̕õ̱ele jo̱m lo̱lo̱k̕kanre mẽ̱ť jolok̕kantapea? Khabe̱rdar, hạṇḍi ạkrińpe manaket̕le, ṭhik do̱ baṅ hoyok̕a.”

“Henda ya ṭõ̱ebak̕, noa hõ̱ disạkak̕pe. O̱ko̱e họṅgo̱reda hạṇḍi? Ceka alele ho̱ṅgo̱reda? Apege co̱ ya, bidhuạ! Alegepe cạrik baṛalea. Ale baṅkhan, dinge baṅ calak̕tapea. Apege co̱ haṭ kan, baṭ kan, mela kan, ṭhela kan ale ṭhengepe ńir hijuk̕a. Apege co̱ yape ce̱re̱c̕ baṛale. Apege co̱ yape je̱ńjle̱ baṛae. Hạṇḍi alope ńũia. Bale dokana. Apepe ńũiet̕tege tho̱rle ạkrińet̕a.” ...

“... Ar ape ko̱le̱j koṛa! Ce̱ť no̱le̱j hõ̱ co̱ ya, bạnuk̕tape. Po̱rko sãotele hihi-haha baṛaere mẽ̱ť jolok̕kantapea? Ceka ale hõ̱ mo̱ṭo̱r saekel reak̕ tayo̱m gaṇḍore de̱jo̱k̕ reak̕ sad do̱ bạnuk̕talea? Dinomge marak̕ lekale saj oḍokok̕ cintạ bạnuk̕talea? Ale hõ̱ sinạmaren kuṛi leka saj bajkatele haṭ baṛae, ceka baṅ mo̱ne̱alea? Mõ̱ńjge kạcni bande ar so̱ sunum-paoḍar jo̱ť baṛajo̱ṅ ceka managetalea? Coṇḍok̕ cạṭki ar luṭi jo̱roṅkak̕ do̱ ceka bato̱lgetalea? Ape ma ya laṅṭa, kulạuge bạnuk̕tape. Ape ma ḍiṅgrạ, bhạṅguạ re̱ṅge̱c̕tepe jale-thale baṛaekan. Cele kusik̕a ape odor poṭak̕ ṭhen do̱? Jạkiṭ tanak̕ kirińale reak̕ dhe̱j bạnuk̕tapea. Ale onko ṭhen kho̱n mõ̱ńj-mõ̱ńj sạṛi-saeale ńameťkhan, mẽ̱ť jolok̕kantapea? Ar e̱nte onko ṭhen menak̕lete nõ̱k̕õ̱e Mukhiạ, Sạmiti ar Jilạ Pạrisad emanre sạmạnile daṛe baṛawakana. Ape ma ya, sara din rạnu boṅga sãote phulpe patawakať. Mo̱ro̱ť arpe jokyoť cabawakana. Cele ya, ape ro̱ṅgo̱ muṇḍhạť ṭhen do̱ kusik̕a? Ape kho̱n ma sikṛĩc̕ hõ̱ jạnic̕ko bo̱lmange! Ape do̱ o̱ho̱pe ạsul daṛekelea. Calak̕geale, po̱re̱r culhạle o̱ṅgea. Bogele pạsien, bogeko go̱c̕ket̕le. Am babawak̕ do̱ baṅle jo̱jo̱mkana.”

“Ar ya, mo̱rdha jo̱kyo̱t̕! Aleak̕ lahanti ńe̱lte mẽ̱ť saṛok̕kantapea? Ape do̱ ya, cekate onko po̱rjạt do̱ baṅpe bulạu daṛeakokana? Ape hõ̱ ạgukope, o̱ko̱e manaet̕pea? Onko ạgu daṛeako reak̕ dhe̱j ma bạnuk̕tape, ar tãhã alepe duhmạt ńamakat̕lea.”

Cetanrekin rukhạt̕kan pạhilic̕ hạṇḍi akrińic̕ Jhabarạli ar dosaric̕ ko̱le̱j kuṛi Maenomạtitạkinak̕ ruhạť ańjo̱mte o̱no̱liạ do̱e tuṛi baha ńamena. Dhạrti do̱ ńutadea. Ạḍi hudisreye paṛaoena. Sạri kangea; Jhabarạlitako re̱ṅge̱c̕teko gujuk̕kan tahẽ̱re baṅ co̱le hiri baṛalet̕ko, baṅ co̱le go̱ṛoat̕ko tahẽ̱! O̱ko̱rtale onkan so̱maj susạr bạisi? O̱ko̱rtale sedae lekan mạńjhi-pargana be̱bo̱stha? Okate do̱ onkan re̱ṅge̱c̕ ar rạṇḍi-piṭạri ayojo̱nakole go̱ṛo daṛeako. Ale ma onkanko ḍạn uduk̕kate hakĩạle go̱c̕ giḍikako.

Ar no̱te̱ ko̱le̱j kuṛi Maenomạtiak̕ sad do̱ sạrige he̱ṛangea! Hạ̃sạk̕geae lo̱bo̱e-lo̱bo̱ye saj bajkok̕! Uṭi-uṭi sajok̕ reak̕ sad menak̕taea, je̱mo̱n baro̱ dolan gaṛreko bạnij idiye. Jãhã miť dhaoe bijli ruạṛkeť, ar bańcaok̕ upại do̱ o̱ko̱ran? Menak̕gea upại! Hapṛamko do̱ noa reak̕ko upại oṭoakat̕gea. Onko ma baro̱ jo̱ṛ sagaṛ miť likreko lagaleť. To̱be̱ “Kirtạ” do̱ dohṛaetege hoyok̕a? Hạni ńe̱le̱pe ạḍi tạpis aṛaṅate kạu mạue ho̱ho̱ dilạiyet̕kana - “Biṭlạha, Biṭlạha”. Okaenam Biṭlạha? Ale hõ̱ hirikaleme.

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...