Saturday, 31 August 2024
Friday, 30 August 2024
Tuesday, 27 August 2024
BAŃCAOLEM BABA
Monday, 26 August 2024
BAṄGEM TAHẼ̱NA HO̱Ṛ HO̱PO̱N
Umạr reak̕ noa hạsur anacurre,
Campa-Badoli ar Citri disạlere,
Hiḍir-hiḍir hae ban bạsien!
Purkhạkoak̕ co̱l durib,
Miť miťte hasa lataren,
Hae iń sudhạń aṅge̱n aťen!
Lạṛhại-lạpạṛhại sạrdi se̱ṅge̱len,
Bo̱ko̱-boeha talare tarwaṛe,
Lo̱ho̱ť laṭ paṭaoen jive̱ť mãyãmte.
Ho̱mo̱r halaṅeťko era-ho̱po̱n,
So̱maj go̱ hõ̱e gạrsilo̱mena,
Hae ho̱po̱niń cedak̕ko mapak̕?
Bo̱rno̱re o̱no̱l bạnuk̕ ce̱ťge,
Pachnao bạnuk̕ jạt-kujạt,
Pạris hõ̱ co̱ bạnuk̕ o̱l,
Amak̕ bo̱rno̱ sapha pĩṛĩť,
Cak̕ to̱be̱m potaoeť?
Amak̕ bo̱rno̱ arak̕ mãyãmte.
Judi niạ dho̱co̱r tahẽ̱yena amak̕,
Gapam ńamok̕a ciṛiạkhanare,
Jae jug lạgiť noa pirthimi kho̱n,
Ať apať ado̱k̕am tirikal lạgiť,
Friday, 23 August 2024
जातिवाद : एक घनचक्करी
बाबा साहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर द्वारा रचित उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ”जाति प्रथा का विनाश“ में बहुत कुछ कहा गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य कब तक पूर्ण होगा, कहना किसी के वश की बात नहीं। कभी-कभी यह देखकर बड़ा ही आश्चर्य मालूम पड़ता है कि आखिर क्यों संताल लोग ही हूल के महानायक सिदो मुर्मू को मानते हैं? बाकी समुदाय के लोगों को इतनी महान हस्ती सिदो मुर्मू से कोई लेना-देना नहीं है। उसी तरह सिर्फ दलित लोग ही डॉ भीमराव आम्बेडकर की जयंती वगैरह मनाते हैं। बाबा साहब भारत के संविधान के रचयिता हैं, इसलिए मजबूरीवश अन्य समुदाय के लोग इन्हें याद करते हैं। वरना जाति प्रथा ने तो सबका नाश कर रखा है। सच कहा जाय, तो दलितों के महापुरुषों की पूजा दलित लोग ही करते हैं। अन्य समुदाय के लोग इन महापुरुषों के प्रति ईर्ष्या और घृणा का भाव रखते हैं। आखिर ऐसा क्यों?
सुना है; दुनिया के अन्य देशों में जहां जाति प्रथा नहीं है, वहां काले-गोरे का भेदभाव है। यह भी एक जटिल समस्या है। जाति प्रथा हो या काले-गोरे का भेदभाव, समाज के लिए यह एक बहुत बड़ा अभिशाप है। मालूम होता है, जिसने भी इस तरह के भेदभाव की सृष्टि की है, वह बड़ा ही चालाक और चतुर प्रवृति का रहा होगा। कुछ भी हो, हमारे देश में ऐसी कुप्रथा के जनक मनु महाराज को दोष देना कहां तक उचित है? जब तक वर्ण व्यवस्था जीवित है, तब तक जाति प्रथा का विनाश संभव नहीं लगता है।
देश में लोकसभा का चुनाव अंतिम पड़ाव पर है। सवाल इसलिए उठ रहा है; क्योंकि देखा जा रहा है कि इस चुनाव में जातीय समीकरण का भी बहुत बड़ा हाथ होता है। अनजाने में ही सही, जनता भी उम्मीदवार की जाति देखकर ही वोट देती है। उम्मीदवार कितना भी अयोग्य क्यों न हों जनता उसे ही वोट देने के लिए लालायित रहती है। यही कारण है कि दलित आज भी पूना एक्ट को याद करते हैं।
वर्ण व्यवस्था की स्थापना यूं ही चुटकियों में नहीं हुई है। इसके पीछे न जाने कितने रहस्य छिपे हुए हैं। इतिहास साक्षी है कि भारत में अंग्रेजों के आगमन तक उच्च जाति के लोगों ने शुद्रों का जी भरकर दोहन किया। यह तो ईश्वरीय वरदान ही समझो कि अंग्रेजों ने शूद्रों की आंखें खोल दीं एवं उनकी मुक्ति के लिए कई सारे मार्ग प्रशस्त किये। ब्रिटिश काल में ही डॉ भीमराव आम्बेडकर का जन्म हुआ। उस दलित भीमराव आम्बेडकर ने देश में छुआछूत को झेलते हुए उच्च शिक्षा ग्रहण किया। डॉ भीमराव आम्बेडकर दलितों के मसीहा बन गए। देश 1947 को आजाद हुआ। विडंबना देखिए कि डॉ भीमराव आम्बेडकर देश के प्रथम कानून एवं न्याय मंत्री बनाए गए एवं उन्हें भारत का संविधान लिखने की जिम्मेदारी दी गई। बाबा साहब की अगुवाई में दुनिया का सबसे बेहतरीन संविधान लिखा गया। इसी संविधान में सदियों से दबाये गए एससी, एसटी एवं ओबीसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसी संविधान के बदौलत ही आज दबे-कुचलों के लिए सरकारी संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था की गई। यह भी सच है कि इसी आरक्षण के तहत ही आज हम चुनाव-चुनाव का खेल खेल रहे हैं।
लोकसभा चुनाव 2024 के अंतिम एवं 7वें चरण का मतदान 1 जून 2024 को होना है। इसी चरण में ही दुमका एवं राजमहल (आरक्षित-अजजा) के लिए मतदान होना है। दोनों ही क्षेत्रों में इंडिया गठबंधन और भाजपा के बीच सीधी टक्कर है। मालूम हो कि भाजपा जहां संविधान एवं आरक्षण को समाप्त करना चाहती है, वहीं इंडिया गठबंधन-झामुमो इसे बचाने के लिए पूरे देश में जी तोड़ मेहनत कर रहा है। ध्यान रहे, राजमहल से कोई निर्दलीय उम्मीदवार भी है, जो जिसने जिस थाली में खाया है, उसी को ही छेद करने में जुटा हुआ है।
सवाल यही है कि अगर संविधान एवं आरक्षण समाप्त हो गया तो न हम घर के और न घाट के रहेंगे। समाज से फिलहाल जाति प्रथा का विनाश भी संभव नहीं है। यह एक घनचक्करी है। इस स्थिति में हमारा क्या दायित्व बनता है। आइए, हम सब मिलकर इस संबंध में सोचें एवं विचारें।
Thursday, 15 August 2024
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