Thursday, 5 September 2024

धर्म, भाषा और लिपि

1. धर्म - यह एक व्यक्तिगत और बहुत ही संवेदनशील विषय है। सबसे पहले तो आस्तिक-नास्तिक का सवाल उठ खड़ा होता है। साथ ही ईश्वर है-नहीं है का सवाल है। अगर ईश्वर है, तो कितने तरह के ईश्वर हैं, वगैरह-वगैरह। इस बहस में नास्तिकों ने हमेशा आस्तिकों से बाजी मारी है। किसी धर्म विशेष का ठेकेदार जो धर्म पर बहस करने को राजी हो, तो समझ लेना उससे महा अधार्मिक व्यक्ति इस जगत में और कोई हो नहीं सकता है। चूंकि यह व्यक्तिगत है, अतएव इसका भाषा और लिपि से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है।

2. भाषा - भाषा वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि भाषा कोई दैवीय देन नहीं है। इसकी उत्पत्ति मानव समाज में बहुत बाद में हुई होगी। मानव जाति के पास जन्म लेते ही ध्वनि तो है पर भाषा नहीं। यह स्वाभाविक है कि मानव समुदाय कई वर्षों तक इशारों में ही अपना काम चलाते रहे। लेकिन पास रहे तो इशारों में काम चल सकता है। पर त्वरित एवं दूर-दराज तक संप्रेषण कर पाना असंभव है। अतः इसके लिए प्रतीकों का सृजन अवश्यंभावी था।

ध्वनि का निकलना मानव मुख से ही संभव है। ध्वनि मुख के किस कोण से निकलती है, समाज ने उसपर चिंतन किया और उस ध्वनि के अर्थ को सामाजिक मान्यता दी। बगैर सामाजिक मान्यता दिये वह ध्वनि भाषा कदापि नहीं बन सकती है। इससे एक दूसरे के साथ संप्रेषण करने में सुविधा होती है। अतः मुख से निकलने वाले प्रतीक चिन्हों को भाषा कहा जाता है। भाषा की प्रकार दो तरह की होती है - मौखिक (oral) और लिखित (written)।

3. लिपि - जो ध्वनि/वर्ण भाषा को लिखित रूप प्रदान करे, उसे लिपि कहा जाता है। अतः सिद्ध हो गया कि :

· भाषा ध्वनि संकेतों से मिलकर बनी होती है, जबकि लिपि वर्ण संकेतों से मिलकर बनी होती है।

· भाषा मौखिक होती है, जबकि लिपि को लिखने के लिए भौतिक साधनों की ज़रूरत होती है।

· भाषा का संबंध कानों से होता है, जबकि लिपि समय-स्थान की सीमाओं से मुक्त होती है।

· भाषा में अस्थायित्व होता है, जबकि लिपि ज़्यादा स्थायी होती है।
सार यही है कि धर्म, भाषा और लिपि में कोई आपसी संबंध नहीं है। अगर कोई संबंध है, तो उसे सामाजिक मान्यता देने वाली संस्था है। उस संस्था को किसी समाज विशेष का नाम भी दिया जा सकता है।

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