Sunday, 1 September 2024

सत्ता का खेल अजीबोगरीब है

आपका यह मंगरु कोई राजनीतिज्ञ नहीं है और न ही उसे राजनीति के बारे में a, b, c मालूम है। हाँ, इतना जरूर है कि उसके पास कच्चा-पक्का ढेर सारा अनुभव है। उसने अपनी निरीह आँखों से इन चिन्हों के उगते-डूबते सूरज को बहुत करीब से देखा है; यथा - मुर्गा, जोड़ा पत्ता और अब तीर-धनुष; जोड़ा बैल, गाय-बछड़ा और अब पंजा। इसके अलावे उसने टिमटिमाती दीये की लौ को भी बहुत करीब से देखा है। अब वह दीया फूल बनकर एक से तीन सौ पार करेगा, उसे विश्वास ही नहीं हो रहा है। उसे घोर आश्चर्य तो तब हुआ जब उसकी नींद खुली तो देखा कि केंद्र में तीन टर्म से उसकी सरकार चल रही है। बाकी कई राज्यों में भी उसकी सरकार है।

मंगरु झाखण्ड की कल-परसों की घटना को देखकर अत्यधिक विचलित हुआ जा रहा है। सुना है कि तथाकथित डूबते जहाज से कुछ कप्तान कूद गए हैं और वे अपना बेड़ा पार करने हेतु दूसरे जहाज पर सवार हो गए हैं। उनकी यात्रा मंगलमय हो! यह भी सुना है कि सत्ता का नशा अपरंपार है। यह नशा मरते दम तक उतरने का नाम ही नहीं लेता है। राजनीति के सामने नीतिविज्ञान फेल है। यह भी सच है कि अब मुर्गे का दौर समाप्त हो चुका है। मीटिंगों में कोई स्वयं जाता नहीं है बल्कि उन्हें ले जाना पड़ता है। जनता भी पैसे की भाषा को ही समझती है। हाय पैसा! चुनावी खर्चा हद से ज्यादा हो गया है। सत्ता पैसामय हो चुका है। और उस पैसे का जुगाड़ जनता को सूली पर टाँग कर ही प्राप्त किया जा सकता है। सोचो फिर दोनों विभीषणों ने कितने पैसों का डील किया होगा? इसीलिए कहा जाता है कि सत्ता का खेल जैसा दीखता है, वैसा वह है नहीं।

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