Wednesday, 30 June 2021
Wednesday, 20 January 2021
अदृश्य समस्याएं
मंगरु आज जितना उदास है, शायद ही वह पहले कभी हुआ हो। वह अत्यंत दुःखी है। दुःखी इसलिए कि अब तक जिस गति से उसके समाज को शिक्षित होना चाहिए था, वह नहीं हो सका है। क्योंकि शिक्षा को ही उन्नति की पहली कुंजी कहा जाता है। इस समय मंगरु के पास अपने समाज के बारे में मंथन करने के सिवा और कोई काम ही नहीं है। उसने बचपन से अब तक अपने समाज की संरचना को बहुत करीब से देखा है। जहां तक संभाव हो सका, उसने अपने समाज की भूत एवं वर्तमान परिस्थिति को समझने की भरपूर कोशिश की है। लेकिन उनके साथ ढाक के वही तीन पात वाली बात हो गई। उसका समाज शिक्षा के अभाव में अवनति के दलदल में धंसते ही जा रहा है।
मंगरु की उम्र छोटी थी, फिर भी माराङ गोमके के झारखण्ड आंदोलन को वह अपनी आँखों से देखा था। आदिवासियों की मांग पर झारखण्ड अलग प्रांत लेने के लिए सन् 1950 में झारखण्ड पार्टी नामक एक राजनैतिक दल का गठन हुआ था। झारखण्ड की जनता अलग प्रांत लेने के लिए मदहोश थी। यही वजह थी कि एकीकृत बिहार में झारखण्ड पार्टी प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभर कर सामने आई। तब कोई सुविधा उपलब्ध न थी, फिर भी लोग जयपाल सिंह मुण्डा को सुनने के लिए कोसों दूर पैदल ही चल पड़ते थे। कुछ वर्षों के बाद झारखण्ड पार्टी कांग्रेस पार्टी में विलय हो गई एवं उनका प्यारा चुनाव चिन्ह मुर्गा को भी ठंडे बक्से में डाल दिया गया।
संक्षेप में यही कि झारखण्ड का कांग्रेस में विलय के बाद हूल प्रदेश में एक सन्नाटा छा गया था। अल्प समय के लिए जस्टिन रिचार्ड सरीखे नेताओं का उदय हुआ। जिन्होंने हूल झारखण्ड पार्टी की स्थापना की एवं उनके कई विधायक भी बने। साथ ही 1960 के उतरार्ध में एक महान् सामाजिक कार्यकर्ता फा. अन्थोनी मुर्मू का उदय हुआ। इनका कार्यक्षेत्र मूलतः साहिबगंज-पाकुड़ जिले में दुर्तगति से फैलता चला गया। फिर 1970-80 के दशक में दिसोम गुरु शिबू सोरेन के नेतृत्व में अलग झारखण्ड प्रदेश का आंदोलन आरंभ हुआ। दिसोम गुरु ने झामुमो नामक एक राजनैतिक दल का गठन किया, और इसके बैनर तले अलग झारखण्ड प्रदेश की मांग की धार को और तेज कर दिया। स्मरण रहे कि सन् 1977 में जनता पार्टी की आंधी भी आई थी। जनता पार्टी जिस गति से आई थी उस गति से अस्त भी हो गई।
दिसोम गुरु का झारखण्ड आंदोलन काफी उतार-चढ़ाव के साथ चलते रहा। जनता की उन्नति की आस और अभिलाषा अलग प्रांत पर टिक गई थी। उन्होंने झारखण्ड अलग राज्य को किसी संजीवनी बूटी की तरह मान बैठा था। उनकी आशा थी कि अलग झारखण्ड राज्य मिलने के बाद उनकी सारी समस्याएं उड़नछू हो जाएंगी। काफी जद्दोजहद के बाद आखिरकार 15 नवंबर 2000 को अलग झारखण्ड राज्य मिल तो गया, पर अफसोस खोदा पहाड़ निकली चुहिया!
मंगरु अपने आप से पूछता है; क्या कारण है कि हमारा समाज आज भी जहां से चला था, फिर वहीं पहुंच गया है? समाज की ऐसी कौन-सी समस्याएं हैं जिनका समाधान नहीं हो सकता है? मंगरु के अनुसार; हो सकता है झारखण्ड चलाने के लिए हमारे पास कोई ब्लूप्रिंट उपलब्ध न था। और न ही किसी तरह का कोई रोडमैप ही तैयार था। हमने अंधेरे में ही तीर चलाने की कोशिश की है। हमारी छोटी-बड़ी सामाजिक संस्थाएं भी समाज की उन्नति के लिए नपुंसक सिद्ध हुई। इससे ऐसा भी कहा जा सकता है कि सभी तरह के सामाजिक कार्यों का ठेका राजनीतिज्ञों ने ले रखा है। परंतु नेताओं में भी दूरदर्शिता का अभाव है एवं उनकी नीयत में कोई न कोई खोट अवश्य है।
देश में आजकल लोकसभा चुनाव का महापर्व चल रहा है। नेताओं पर कई तरह के आरोप लगाए जाते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि नेताओं के चुनाव करने में हमसे ही कोई भूल हुई जा रही हो? चुनना था मीठा फल पर खाया तो पता चला फल खट्टा है।
हमारे समाज में समस्या एक हो तो उसका समाधान निकाला जाय। पर यहां तो समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। कहीं हमारा समाज कैंसर से पीड़ित तो नहीं हो गया है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि उसका शल्य चिकित्सा ही अंतिम उपाय हो? हमारे समाज में दृश्य-अदृश्य कई तरह की समस्याएं किसी राक्षसनी की तरह सामने खड़ी हैं। कुछ भी हो, गहराईपूर्वक चिंतन के बाद इसका समाधान होना जरुरी है।
आइए, आज हम अपने समाज उत्थान के लिए अंतःमन से प्रण लें।
Thursday, 20 August 2020
HAERE MAENO!
Hae Maeno! Cedak̕ amge?Amge cedak̕?Aeno̱m-kajo̱r dibi saj,Muluc̕ mẽ̱t̕hã gạwic̕ dilại,Jhalak amak̕ ńe̱lte,Bijli Rạni so̱ro̱mko̱k̕ae.Cedak̕ amgem haṭa?Jio̱n jharna, jio̱n juḍạsi,Jio̱n dak̕, ạmrit jo̱l?Haṭ-baṭ, mela-ṭhela,Pata-chata, dibi-kạli,Ar bo̱l gatek̕ ṭạṇḍi hõ̱.Cedak̕ amgem haṭkok̕a?Digdhạ meṭaotińme Maeno!Am lasãṛhẽ̱t̕ Jio̱n dak̕? Ar se̱Jio̱n dak̕ge am bhorsa?O̱ko̱eṭak̕ben so̱ro̱sa Maeno?Amge se̱ Jio̱n dak̕?Re̱ṅge̱c̕ kan, kisạ̃ṛ kan,Kãṛã ar se̱ gujạ,Bachnao bạnuk̕ e̱se̱l-he̱nde̱,Jo̱to̱ amren o̱ndata.Cakha-cuṇḍuc̕ me̱lo̱t̕ate,Emok̕aem hare̱-phare̱,Ạ̃ṛti bạnuk̕ cakha cara,Am ńe̱lte Jio̱n dak̕, ar se̱Jio̱n dak̕ge sebelen?Ma se̱ Maeno bho̱ṅạńme.Ma se̱ Maeno jado̱ạn̕me.Kuṛi, go̱ ar chạḍwi,Nanan ruptam base̱?Gharõ̱ńj ạsul ṭhikạ,Amre aka menak̕.Jo̱k̕-raca, isin-basaṅ,Arhõ̱ no̱te̱ bale belteń,Ho̱bo̱r-dipil hạni tora,Jio̱n dak̕an caṇḍa cạṇḍi.Ḍipṭi amak̕ ajhãṭgea,Ạpsar kho̱n hõ̱jhõ̱ńjho̱ṭgea.Ce̱t̕iń kulim Maeno?Amak̕ hanaso, amak̕ jala,Bańjha he̱re̱l iń bạń baḍae,Nãwãnkoko darae hanaso.Kạbiak̕ ko̱lo̱m ṭhoṇṭa,Rạput̕en Maeno,Ańje̱t̕entae kạli.Ro̱ho̱ṛ kagatre,Ar baṅge o̱lo̱go̱k̕kan,Amak̕ jibo̱n do̱ro̱so̱n!Calak̕-calak̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕ jivi te̱nen,Hanko -Purub, pạchim, uttạr, dạkhin,Barnao ạcur cạriokoṇḍ,Tuṛi do̱ho̱e jaega bạnuk̕,Okare bạnui Maeno,Okare banuk̕ Jio̱n dak̕.Haere Maeno!Haere Jio̱n dak̕!Abenge Pilcu,Abenge Liṭạ,Abenge porodhol.Oka ḍaharben sotok̕ idile?Abenge ma uduk̕aleben.
Wednesday, 19 August 2020
Tuesday, 4 August 2020
यह कैसी विडंबना?
कोई कल्पना नहीं, परंतु आँखों देखी घटना है। बचपना था। पर उस समय की याद आज भी तरोतजा है। तब हमारा समाज कैसा था और अब किस मोड़ पर है, लेखक को अपने विवेकानुसार अच्छी तरह पता है। इस पर किसी का मतभेद होना स्वाभाविक है। खैर, समाज सुधार का बागडोर तब भी राजनीतिज्ञों के हाथों था, और आज भी उन्हीं राजकुमारों के हाथों सुपुर्द है। किसी भी सामाजिक संस्थाओं को तब भी और आज भी कोई घास नहीं डालता है। तब खासकर संताल परगना में ‘जोड़ा बैल’ और ‘मुर्गा’ के बीच राजनीतिक द्वन्द था। माराङ गोमके ने आदिवासियों को पता नहीं कौन-सी घुट्ठी पिलाई थी कि लोग अलग प्रांत के लिए अत्यधिक मदहोश थे। कहीं भी माराङ गोमके का भाषण होता, लोग ‘ताबेन और सा़तु' बांधकर’ दूर-दूर से चले आते थे। इतनी भीड़ होती थी कि सभास्थल पर तिल रखने के लिए जगह नहीं होती थी। तब जनता भी सा़ेहराय नृत्य करते हुए अपना मताधिकार का प्रयोग करने हेतु पोलिंग बुथ तक जाती थी। पर कुछ ही वर्षों के बाद किसी राजनीतिक दांव-पेच के कारण उस मुर्गा को चखना कर दिया गया। झारखण्ड पार्टी दो बैलों के साथ जुड़ गई। आदिवासी जनता इस बारे में अनभिज्ञ थी।
संताल परगना के लोगों ने तब ‘जोड़ा पत्ता’ में खूब खाना खाया। लेकिन जल्द ही ‘जोड़ा पत्ता’ भी फट गया। अब संताल परगना में एक राजनैतिक सूनापन-सा छाने लगा। तब उसकी भरपाई हेतु आंधी-तूफान की तरह एक बावंडर आ गया। यह कोई 1972 की घटना है। संताल परगना में एक ऐसा महाबलि का उदय हुआ था, जो पेड़ को हिला दे, तो उनसे रोटियों की बरसात होती थी, जल के अंदर मोटर साईकिल चलाने की कूवत थी और तो और उनपर चली गोलियां सब पानी बन जाती थीं। उनपर किसी तरह का कोई भी प्रहार असर नहीं करता था। और इस तरह धान काटो व महाजनों के विरुद्ध आंदोलन अपनी चरम स्थिति को छू गई थी। तब जनता ने भी नई आस के साथ उनका खूब साथ दिया। लोगों ने अलग प्रांत को ‘संजीवनी बूटी’ मान लिया था। जनता ने अपना सब काम छोड़कर उनका खूब साथ दिया। इस आंदोलन में न जाने कितनों की जानें चली गईं, कोई हिसाब नहीं।
और इस तरह 15 नवंबर, 2000 को झारखण्ड के आदिवासियों के लिए एक नई सुबह आई। ऐसी सुबह जिसमें एक नये अलग झारखण्ड राज्य का उदय हुआ था। नये राज्य का उदय होते ही कुछ लोग बालू फांकने के लिए अपनी बोरियां समेटने लगे थे, पर किसी ने बड़े भाई समझकर उसे अपने पास ही पनाह दे दी।
नये राज्य का गठन किए आज 20 वर्ष भी बीत चले। पर संजीवनी बूटी भी काम न आई। खोदा पहाड़ निकली चुहिया, वह भी मरी हुई। आदिवासियों की आस पर पानी फिर गया। मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक। जनता अब किंकर्तव्यविमूढ़ है। आइए इसका कारण ढूंढ़कर समाधान निकालने की कोशिश करते हैं।
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BOḌIṄ MÃHÃ DINISẠ (02 No̱be̱mbo̱r, 1865) Cando Babawak̕ ạḍi hahaṛa sirjo̱n! Pilcu Haṛam-Buḍhi kho̱n nit hạbic̕te ạḍi lekan man...