Thursday, 4 April 2024

आओ शेरनी का दूध पीयें 

"शिक्षा शेरनी का वह दूध है, जो इसे पीयेगा वह दहाड़ेगा।" - बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर। 

बाबा साहेब का उपरोक्त कथन सौ प्रतिशत सत्य है। हूल तक संताल आदिवासी अर्द्धनग्न ही रहा करते थे। वे दुनिया से वाकिफ न थे। पर उसने जो हूल किया, वह अपवाद ही है। ऐसा इसलिए संभव हो सका, क्योंकि वे अनपढ़ जरुर थे पर ज्ञानी थे। हूल के ठीक 5 वर्ष बाद 1860 को संताल परगना में ईसाई मिशनरियों को आगमन हुआ। उन्हें अच्छी तरह समझ में आ गया था कि अगर इन भोले-भाले संतालों को शिक्षित नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं, जब वे दुबारा इन्हीं कुख्यात महाजनों के गुलाम बन जाएंगे। इसलिए मिशनरियों ने शिक्षा पर विशेष ध्यान देना उचित समझा। इसका नतीजा आज आपके सामने है कि जगह-जगह मिशन स्कूल चलाये जा रहे हैं। अगर उनकी मंशा लोगों को ईसाई बनाना ही होता, तो वे कबके सबों को ईसाई बना दिए होते। 2011 के जनगणना के अनुसार संताल परगना में ईसाईयों की जनसंख्या मात्र 5 प्रतिशत ही है। जनसंख्या छोटी है, पर घाव करे गंभीर। उसने चींटी की भाँति हाथी की नाक में दमकर रखा है। आखिर उसने शेरनी का दूध जो पीया है। अतः वह दहाड़ तो मारेगा ही। जब भी आदिवासियों के साथ अन्याय व अत्याचार हुआ है, यही वह शेरनी का दूध पीने वाला शख्स है, जिसके दहाड़ से अच्छे-अच्छों की बोलती बंद होती है। झारखण्ड आंदोलन हो या और कोई अन्य आदिवासी आंदोलन, इन शेरनी का दूध पीने वालों ने बढचढ़ कर हिस्सा लिया है। जहां कहीं भी आदिवासियों के साथ अन्याय हुआ है, ईसाई आदिवासियों ने इसका जमकर प्रतिरोध किया है। सिर्फ एक घटना ही उदाहरण के लिए काफी है। और वह है - बांझी कांड। यह घटना 19 अप्रैल, 1985 को घटित हुई, जिसमें भू.पू. सांसद फादर अन्थोनी मुर्मू सहित 19 लोग शहीद हो गए। 

रहस्य यही है कि जब भी आदिवासियों के साथ अन्याय होता है, यही ईसाई आदिवासी उसके विरोध में ढाल की तरह सामने आ खड़े होते हैं। ईसाई आदिवासी ने कभी अपने आपको आदिवासी समुदाय से अलग नहीं रखा है। बल्कि उसने हर आदिवासी सामुदायिक कार्यक्रम में बढचढ़ कर हिस्सा लिया है। यहां एक बात समझना बहुत जरुरी है। अंग्रेज आगमन से पूर्व आदिवासी/हरिजन/पिछड़ा वर्ग हिन्दुओं की जाति व्यवस्था के अंतर्गत शूद्र की श्रेणी में रखा गया है। जिन्हें तथाकथित हिन्दुओं द्वारा भयानक रूप से प्रताड़ित किया गया था। अब हिन्दुओं के ठेकेदार भाजपा/आरएसएस फिर से वही दिन लाना चाहते हैं, जिसमें शूद्रों को गुलाम बनाये व पीटे जाने की प्रथा है। हिन्दुओं के धर्म ग्रंथों में भी साफ-साफ उल्लेख है कि ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी। अब बाबा लोग इसकी व्याख्या कुछ भी करता रहे, पर इसका भावार्थ ‘पीटे जाने’ से ही संबंधित है।

ईसाई आदिवासी, आदिवासियों के ढाल हैं। यही कारण है कि मनुवादी विचारधारा के लोग अर्थात् भाजपा/आरएसएस जब तक ईसाईयों को आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) सूची से बाहर नहीं करता है, तब तक उनकी दाल गलने वाली नहीं है। यही कारण है कि भाजपा/आरएसएस वालों ने भेद की नीति के तहत जिन आदिवासियों ने हिन्दु धर्म को अपना रखा है, उन्हें ईसाईयों के खिलाफ खड़ा कर दिया है।

यहां समझने वाली बात यह है कि इस लड़ाई में मनुवादी (भाजपा/आरएसएस) कभी सामने नहीं आते हैं, बल्कि इस काम के लिए उन्होंने अपने गुर्गे छोड़ रखे हैं। और वे सिर्फ सूत्रधार का काम करते हैं। अर्थात् वे आदिवासी के विरुद्ध आदिवासी को खड़ा करने में सफल हो गए हैं।

सबसे अश्चर्य वाली बात तो यह है कि जिस आदिवासी ने पूर्णरुपेण हिन्दु धर्म को अंगीकृत किया हुआ है, वैसे ही आदिवासी, ईसाईयों को डीलिस्ट करने की बात कर रहा है। इसका अर्थ यही हुआ, अगर डीलिस्ट करने की नौबत आ गई, तो सबसे पहले ऐसे ही आदिवासी हिन्दुओं को डीलिस्ट किया जाएगा। इसे ही कहा जाता है; जिस डाली पर बैठना, उसी को काटना। 

यह भी सच है कि किसी मनुष्य जाति के माथे पर उसकी पहचान संबंधित कोई भी चिन्ह् अंकित नहीं होता है। फिर उसे डीलिस्ट करने के लिए कौन-सा मापदंड अपनाया जाएगा एवं ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में कौन होगा उसे पहचान करने वाला अधिकारी? यह एक विकट समस्या आ खड़ी होगी। अगर संताल आदिवासी की बात की जाए, तो उनके बारह गोत्रों में कोई मुर्मू, टुडू ...वगैरह होगा, तो उसकी पहचान संतालों में तो हो ही जाएगी, पर वह किस धर्म को मानता है, यह पता लगाना बहुत ही मुश्किल काम होगा। 

थोड़ी देर के लिए माना कि डीलिस्टिंग करने का आदेश हो गया। फिर आदिवासियों का क्या होगा? आदिवासियों के उपरोक्त धार्मिक विभाजन को देख लें, तो उसके अनुसार 95 प्रतिशत (हिन्दु, ईसाई, अन्य) आदिवासी तो डीलिस्ट हो गए। फिर आरक्षण किसके लिए? घ्यान देने वाली बात है कि अगर ऐसा हुआ, तो बाबा साहेब द्वारा निर्धारित आरक्षण देने की मूल आवधारणा ही बेमानी हो जाएगी। कारण; विशेषकर आदिवासियों के मामले में आरक्षण के लिए धर्म को आधार कभी नहीं माना गया है।

जब तक संविधान जिन्दा है, तब तक आदिवासियों का डीलिस्ट होना संभव नहीं है। फिर भाजपा के गुर्गे क्योंकर डीलिस्टिंग के मुद्दे को हर पांच साल में उछालते रहा है? ऐसा इसलिए ताकि ऐसा कृत्यकर आगामी लोकसभा चुनाव में अपने पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण कर सके। 2024 के लोकसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठता है, यह तो वक्त ही बता पाएगा। 

खैर कुछ भी हो, पर इतना सच है कि भाजपा/आरएसएस वाले आदिवासियों को गुमराह करने में सफलता पा लिया है। अगर समय रहते इस षड्यंत्र को नष्ट नहीं किया गया, तो निश्चित रूप से आदिवासियों का भविष्य अंधकारमय ही होगा। आइए सभी आदिवासी जागें एवं भाजपा/आरएसएस की चाल को बेनकाब करने की कसमें खा लें।


Tuesday, 2 April 2024

 आज के गरभू देशमांझी ...

यह सोलह आना सही है कि कोई भी चीज हाथ में आ जाय, तो उसकी अहमियत तत्क्षण खत्म हो जाती है। वह चीज क्यों और कैसे मिली? उसके संघर्ष की गाथा शनैः-शनैः मलिन हो जाती है। इस रहस्य को आप ऐसे भी समझ सकते हैं। मान लो; कोई ऑरिजिनल (मूल) दस्तावेज है। उस ऑरिजिनल से एक फोटोकॉपी निकाली गई। फिर उस फोटोकॉपी से और कोई फोटोकॉपी निकाली गई। इस तरह फोटोकॉपी से फोटोकॉपी निकलती गई। यकीन मानो, कुछ वर्षों के बाद वह फोटोकॉपी धूमिल हो जाएगी। उस फोटोकॉपी में ऑरिजिनल जैसा अब कुछ भी नहीं दिखाई देगा। अब फोटोकॉपी करने से कागज सफेद ही निकलेगा। ठीक यही स्थिति संताल हूल, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और झारखण्ड आंदोलन के साथ भी घटित हो गई है। 

आज से ठीक 169 वर्ष पूर्व की घटना है। तब लोगों के हाथ में न एंड्रोयड फोन उपलब्ध था, न चमचमाती कार थी और न ही उनके पास बड़े-बड़े मकान थै। उनके पास आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं। उनमें एक भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति मौजूद नहीं था। एक हाथ वस्त्र से पूरा शरीर ढंका जाता था। ऐसी हालत में करेला तो करेला, वह भी ऊपर से नीम चढ़ा। लोग सीधे और सरल थे। उनका सीधापन का अशुभ लाभ गैरों ने खूब उठाया। तब अत्याचार की बाढ़ सिर से ऊपर बहने लगी थी। पर जनता इस मुस्किलत से उबार पाने के लिए अंदर ही अंदर योजनाएं बनाने में व्यस्त थीं। वे अपने संघर्ष का रोड मैप बना रहे थे।

6 जुलाई 1855 की घटना। आज के संताल परगना के आमड़ापाड़ा-लिटीपाड़ा आसपास के गाँवों से चार लोगों को आज के ई.डी. ने गिरफ्तार कर लिया। उनका कसूर भी आपके सीटिंग मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के सीटिंग मुख्यमंत्री केजरीवाल के सदृश था। ई.डी. के अफसर उन गिरफ्तार हुए कैदी को आमड़ापाड़ा, बरहेट के रास्ते भागलपुर जेल पैदल ही ले जा रहे थे। कड़ाके की धूप थी। चारों कैदियों के हाथ-पैर बांधे हुए थे। कैदियों को खाना तो दूर, प्यास बुझाने के लिए एक बूंद पानी तक नसीब न था। ई.डी. के दो अफसर सफेद घोड़े पर शान के साथ सवार थे। दोनों अफसरों को धूप से बचाने के लिए सिपाहियों ने उनके सिर के ऊपर छतरी लिये हुए थे। उन कैदियों में से एक कदकाठी (हेमंत/केजरी) नौजवान भी था। वह भूख और प्यास से तड़प रहा था। वह चल सकने में भी असमर्थ था। ऐसी हालत में भी उसे घसीटा जा रहा था। उनकी हालत पर किसी ई.डी. अफसरों को तरस न आया। और वे आमड़ापाड़ा से चलकर पाडेरकोला पहुंच गए। पाडेरकोला में शाम परगना एक सज्जन व्यक्ति का वास था। वह व्यक्ति बहुत ईमानदार और बुद्धिमान था। उसने ई.डी. के अफसरों से नाक रगड़ते हुए गुहार लगाई - "ये लोग निर्दोष हैं। इन्हें कृपया रिहा कर दो।" पर आका का हुक्म था, ई.डी. के अफसरों ने उनकी एक न सुनी। और वे कैदियों के साथ अपने गंतब्य की ओर आगे बढ़ चले। 

देश की जनता को अच्छी तरह मालूम था कि एक न एक दिन हमारे निर्दोष लोगों को गिरफ्तार कर लिया जायगा। ऐसी स्थिति को संभाल पाने के लिए वे साल भर पूर्व से तैयारी करने में जुटे हुए थे। कहा जाता है कि लोगों ने बन-जंगलों से तीर-धुनष बनाने के लिए बांस-बल्ली (बुरु-मात्) ले आये थे। उन्हें काट-झांटकर सूखने के लिए पत्थरों से दबा दिया था। राहुल का हुक्म था कि प्रत्येक घर से कम से कम एक बैलगाड़ी (मिमित् सागाड़काते) के बराबर तीर-धनुष तैयार हो जाना चाहिए। तलवार, टांगी, फरसा निर्माण हेतु लोहारों की मदद ली जाए। यह योजना साल भर में तब तक तैयार हो चुकी थी। 

अपने निर्दाेष लोगों की गिरफ्तारी की खबर देश भर में दावानाल की तरह फैल गई। सिदो-कान्हू के नेतृत्व में रात भर में अस्त्र-शस्त्र से लैश 30 हजार लोगों की भीड़़ बरहेट के समीप पांचकठिया में एकत्रित हो गई। तड़के सुबह अर्थात् 7 जुलाई 1855 ई.डी. अफसरों की भिड़ंत सिदो-कान्हू से हुई। उनलोगों के बीच तू-तू, मैं-मैं होती रही और इधर गारभू ने का़पी (A battle axe) से दोनों अफसरों को मौत के घाट उतार दिया। हूल संपन्न हुआ। और उस हूल के बदौलत संताल परगना मिल गया। (रावण को मालूम था कि उसकी मौत राम के हाथों होगी। उसी तरह आज के रावण को भी मालूम है, उसकी मौत किसके हाथ होगी।)

Monday, 5 February 2024

 आज ही रो लो ...

प्रकृति का यह विचित्र नियम है। मनुष्य बीते हुए कल के लिए रोता है। वह आने वाला कल के लिए भी आंसू बहाता है। और आश्चर्य तो तब होता है, जब वह वर्तमान में भी रो-रोकर जीता है। आगे नाथ न पीछे पगहा। हर मनुष्य अत्यधिक पीड़ित है। उसपर नानक दुखिया सब संसार वाली बात हो जाती है। इस धरती पर उसका आगमन रोते हुए होता है, तो जाना भी हाय कितना पीड़ादायक है?! उसे जिंदगी में चैन ही नहीं। तभी तो दार्शनिकों के कुछ समूह ने संघर्ष ही जीवन है का नाम दिया है। अतः अभी रो लेने में ही भलाई है।

 संविधान के साथ ही सूर्योदय हो चुका है। सूरज देवता मीठी-मीठी मुस्कान लिए सर्वत्र अपनी भीनी-भीनी खुशबू बिखेर रहा है। हर प्राणी जाग उठा है। और सभी प्राणी अपने-अपने कामों में अति व्यस्त हो चले हैं। लेकिन अब सूरज ढल चुका है। सभी प्राणी अब थक हार चुके हैं। और वह देखो, अब सूर्यास्त हो ही चुका है। अब घनी अंधेरी रात आएगी। विडंबना यही कि यह एक ऐसी काली रात होगी जो कभी सुबह का मुख न देख पाएगी! 

आज की तारीख में ध्रुव राठी को कौन नहीं जानता है? उसने चाय वाले को अपना आईना दिखा दिया है। उनकी दिलेरी देखो। उसने अभिमन्यु की तरह आज के तनाशाह की मांद में घुसकर हमला बोल दिया है। फिर भी न जागो, तो लाख ध्रुव राठी भी आपको कुछ नहीं कर सकता है।

स्मरण दिला दूं 16 दिसंबर, 2023 दुमका की घटना। एक ऐसा शख्स जिसे जनता ने दिल्ली दरबार के लिए अपने प्रतिनिधि के रूप में चुना है, वह अपने ही समाज को आग के हवाले कर रहा था। वह उल जलूल तर्कों पर वाहवाही लूटने के लिए दर्शको से बार-बार चाय वाले के स्टाईल में कह रहा था - ”सा़री काना से बाङ बोयहा?“ खैर, 4 फरवरी 2024 उसको  जवाब दिया जा चुका है।

दुनिया कहां जा रही? देश कहां जा रहा है? राज्य कहां जा रहा है? और तो और हम आदिवासी कहां जा रहे हैं? आदिवासियों में भी संताल कहां जा रहे हैं? एकमुश्त देखा जाए, तो संतालों की समस्या अनगिनत हैं। संताल समाज को सिर्फ सर्दी-खासी ही नहीं, बल्कि वह किसी लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो गया है। इसे आप कैंसर रूपी बीमारी भी कह लें, तो कोई हर्जा नहीं है। अब कैंसर का एक ही इलाज ऑपरेशन।

2024 लोकसभा चुनाव दस्तक दे चुका है। इस चुनाव में कई तरह के छोटे-बड़े मदारियों का पदार्पण होगा। मदारी अपने-अपने पिटारे से कई तरह के सांप-बिच्छुओं को निकालेंगे। कई तरह के तमाशे होंगे। और अंत में मदारी पैसा वसूल कर वहां से 5 वर्षें के लिए रफूचक्कर हो जाएगा।

अब यह जानना बड़ा दिलचस्प होगा कि संताल इस भागमभग की दौड़ में कहां स्थित है? क्या वह इस वैज्ञानिक की आधुनिक दौड़ में शामिल भी है अथवा नहीं? कहीं वह धरती का बोझ तो नहीं हो गया है? कहीं वह लाश में परिवर्तित तो नहीं हो गया है? इस छोटे-से लेख में खासकर संताल परगना में बसे संतालों की बात हो रही है। कारण कुछ भी रहा हो, पर यहां कोई भी सामाजिक संगठन हो, अपना दायित्व निभाने में विफल रहा है। यहां की जनता खासकर संताल अपने अस्तित्व की रक्षार्थ राजनीतिक दलों की बाट जोहते-जोहते उनकी आंखें पथरा गई हैं। 

संताल हूल-1855 ने हमें बहुत कुछ दिया। पर हम नादान बालक उसे संभाल न पाए। हूल के परिणाम  अपनी यौवनावस्था को देख भी न पाया और वह चल बसा। अलग राज्य भी मिला। पर वह भी खोदा पहाड़ निकली चूहिया, वह भी मरी हुई। हमारी हालत  करेला तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ी वाली बात हो गई। बेबुनियाद समस्याओं को लेकर हम आपस में ही पिल पड़े हैं। पेट में अन्न नहीं और हम अपनी पहचान पाने के लिए जूझ रहे हैं। धर्म और लिपि के लिए हम एक दूसरे के खून के प्यासे हो चले हैं। भाई को भाई समझने में हम विफल रहे हैं।

निवेदन है; समय की मांग को देखते हुए चलो हम एकजुट हो जाएं। तमाम तरह के विभेदों से ऊपर उठ जाएं। सभी मिलकर अपने दुश्मनों से लड़ने की कसम खा लें। वरना हमारी मौत निश्चित है। संविधान एवं एसपीटी को जिंदा ही दफना दिया गया है। वह दुर्दिन ज्यादा दूर नहीं, जब हम गुलामी की जिंदगी जीने को मजबूर हो जाएंगे। 

Friday, 2 February 2024

एकता में ही बल था ...

संताल इतिहास में दो सबसे बड़ी ऐसी घटना हुई है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। पहली घटना थी; जब "चाम्पा देश" में हमारा साम्राज्य था। संतालों के बारह गोत्रों के पास अलग-अलग किले थे; एवं उन सभी गोत्रों का व्यापार भी अलग-अलग था। यही कारण था कि हम दूध-दही की नदियों में नहाया करते थे। परंतु समय ने पलटा खाया। और समाज की इज्जत को बचाने हेतु “माधो सिञ” के डर से हम उस देश को सदा के लिए छोड़कर वहां से पलायन कर गए।

दूसरी घटना; आज से ठीक 168 वर्ष पूर्व, तब देश में अंग्रेजों का शासन था। हमने उनसे अत्याचार के विरुद्ध "हूल" किया और शेर के जबड़े से अपने संताल परगना को खींचकर बाहर निकाल लिया। ऐसा इसलिए संभव हो सका, क्योंकि तब हम एकता के सूत्र में बंधे हुए थे। उस समय संतालों के बीच न लिपि विवाद था, न धर्म की खेती होती थी और न ही तब संतालों में उत्तरी-दक्षिणी की कोई लउ़ाई थी। लेकिन आज? आज हम हजार टुकड़ों में बंट गए हैं। हमारा कोई माय-बाप नहीं। यही कारण है कि आज संताल समाज गर्त्त में जा रहा है। इसे शायद भगवान भी न बचा पाएगा।

हो सकता है संतालों के डीएनए में ही कोई खराबी हो। हो सकता है उनके खून में ही कोई खोट हो। नहीं तो क्या कारण है कि हम आपस में तो बेवजह खून के प्यासे हो जाते हैं, परंतु दुश्मनों के सामने हमारी घिग्घी बंध जाती है। उनके सामने हम शेर से चूहा बन जाते हैं।

यह शोध का विषय हो सकता है; क्यों उत्तरी-दक्षिणों के संतालों में इतना कहर बरपा है? क्यों इन दोनों के बीच लिपि के चक्कर में इतनी बड़ी दीवार खड़ी हो गई है? क्यों वे एक दूसरे के खून के प्यासे हो चले हैं? और तो और संताल समाज वर्तमान में कई समस्याओं से जूझ रहा है। पर लोग सभी समस्याओं को छोड़कर लिपि विवाद में ही उलझकर रह गए हैं। इससे अच्छी तरह समझने के लिए ब्रिटिश काल में हुए एक भाषाई सर्वेक्षण की ओर नजर दौड़ाते हैं।

तब देश में अंग्रेजों का शासन था। उसी दौरान सन् 1894 से लेकर 1928 तक भारत में जी. ए. ग्रियर्सन की अगुवाई में एक भाषाई सर्वेक्षण हुआ था। उस सर्वेक्षण में भाषाविदों ने स्पष्ट तौर पर अपनी रिपोर्ट मे लिख डाला; चूंकि संतालों के दक्षिण हिस्से में जो संताली बोली जाती है; वह मिश्रित व प्रदूषित हो चुकी है, जबकि उत्तर में बोली जाने वाली संताली अभी तक विशुद्ध है; अतएव उत्तरी संताली ही मानक (Standard) है। (Linguistic Survey of India, Vol-IV, Page No. 32).

ध्यान रहे; तब उत्तर में संताली साहित्य ने गति पकड़ ली थी। वगैर किसी रोक-टोक व बधित हुए कई पुस्तकें व पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगीं। यह भी संज्ञान लेने वाली बात है कि उत्तर संतालों का गढ़ मना जाने वाला संताल परगना के संतालों ने ब्रिटिश शासक के खिलाफ सन् 1855 में एक बहुत बड़ा “हूल” कर दिया था। इस हूल ने संतालों की महानता पर एक अमिट छाप छोड़ दी है। क्योंकि उस हूल के बदौलत ही संतालों के लिए एक अलग देश (जिला) संताल परगना का गठन हुआ है।

सन् 1947 में भारत देश आजाद हुआ। तब सरकारी स्तर पर शैक्षणिक क्षेत्रों पर बगैर रोमन लिपि की अवहेलना किए देननागरी लिपि से पुस्तकों का प्रकाशन होते रहा है। खसियत यही है कि रोमन हो या देवनागरी, दोनों लिपियों से शुद्ध-शूद्ध उत्तरी संताली लिखी व पढ़ी जाती है।

फिर क्या था? दक्षिण के संताल ईर्ष्या की बीमारी से पीड़ित तो थे ही, उन्होंने आनन-फानन में एक चोरी की हुई लिपि को जन्म दिया। और उस लिपि के प्रचार में रात-दिन एक कर दिया। उनके पास और कोई चारा तो था नहीं, अतएव उन्होंने लिपि को अपनी पहचान एवं अस्मिता के रूप में ढाल की तरह उपयोग करना शुरु कर दिया। जब लोगों ने इस लिपि को सिरे से खारिज कर दिया, तो इन्होंने इसे "आबोवाक्-आबोवाक्" कहा एवं इसे धर्म के साथ जोड़ दिया। मामला यहीं नहीं रुका, कुछ दिन पूर्व झारखण्ड सरकार देवनागरी लिपि से संताली पुस्तकों का प्रकाशन कर रही थी। फिर इन बुगड़ीधारियों ने जिनकी भाषा ही बिगड़ चुकी है, इन पर टांग अड़ा दी। इसके बाद सोशल मीडिया में इन्होंने जिस असंवैधानिक भाषा का उपयोग करते हुए देवनागरी समर्थकों को गाली-गलौच दिया है, यह किसी से छुपा नहीं है।

ओल चिकी समर्थक कितना भी जोर लगा लें, कोई भी राजनीतिज्ञ कितना भी ट्वीट कर लें, लेकिन यह सच है कि “कागज के फूलों से कभी खुशबू आ नहीं सकती है।” अतएव कभी एकता थी, अब वह कहीं गुम हो गई।

Monday, 29 January 2024

 कैसी और किसकी आजादी (6)?

पिछले अंक में हमने जान लिया था कि भारत में अंग्रेज आगमन से पूर्व शूद्रों की क्या स्थिति थी। शूद्रों की धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक एवं ऐतिहासिक परिस्थिति के बारे में अच्छी तरह जान लिया। उनकी क्या ही अमानवीय व विभत्स स्थिति थी। शूद्रों की नवविवाहिता को पंडित जी को सुपुर्द करना, पहले बेटे को गंगा में दान करना, नरबलि के लिए अपने को सुपुर्द करना, उन्हें किसी तरह की कोई चल-अचल संपत्ति रखने का अधिकार नहीं, आदि। और तो और उनको कुर्सी तक में बैठने की इजाजत नहीं थी। खैर, अंग्रेजों ने शूद्रों के विरुद्ध ब्राह्मणों की ऐसी ही तमाम अमानवीय परंपराओं को तोड़ दिया था। अगर अंग्रेज न आये होते, तो अब तक शूद्रों की क्या हालत होती? इस बारे में आप सोच भी नहीं सकते। सन् 1947 को देश आजाद हुआ और एक शूद्र ने देश का संविधान लिख डाला। भारत का संविधान विश्व का सर्वश्रेष्ठ संविधान माना जाता है। फिर भी इतना बढ़िया संविधान होते हुए भी ये ब्राह्मण रोज ही इनकी आलोचना करते रहते हैं। इतना ही नहीं वाभन सरेआम इसकी प्रतियों को जलाते हैं। संविधान में प्रदत्त आरक्षण के विरुद्ध धरना-प्रदर्शन करते रहते हैं। शूद्रों को सदियों से प्रताड़ित करते हुए भी अब तक इनका पेट नहीं भरा है। अब वह घड़ी फिर आ चुकी है, जिसमें शूद्रों को अंग्रेज भारत आगमन से पूर्व की भाँति प्रताड़ित किया जाएगा। शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। अगर यही स्थिति रही, तो इस खेल में शूद्रों का पराजित होना निश्चित है।

 सुर-असुर का खेल बहुत ही पुराना खेल है। यह अनादि काल से चला आ रहा है। इस खेल को समझ पाना उतना आसान नहीं है, जितना हम समझ रहे हैं। इस खेल में दीखता कुछ है और होता कुछ है। इस खेल की विडंबना यही है कि जब शेर को एक बार मानव खून का चस्का लग जाए, तो यह छुटाये नहीं छुटता है। खासकर बरसात के दिनों में आपने किसी जलते हुए बल्ब की रोशनी को अवश्य देखा होगा। यह भी जरुर देखा होगा; किस तरह छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़े उस रोशनी की तरफ अपने आप दौड़े चले आते हैं और थोड़ी देर तक उस जलते बल्ब की परिक्रमा करने के बाद भस्म हो जाते हैं। इस दृश्य में आपने नोट किया होगा कि कीड़े-मकोड़े को छोड़ कोई हाथी-घोड़े नहीं आते हैं। तत्पर्य यही है कि वे छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़े अपने अंतःमन से ”मनुस्मृति“ को स्वीकार कर ले, तो कौन क्या कर सकता है। इसे ही कहा जाता है; मियां-बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी।

देश बदल रहा है। 2024 का चुनावी बिगुल बज चुका है। सियासी दांव-पेंच का खेल चरम पर है। कल (28.1.2024) को बिहार का तख्ता पलट चुका है। अब दो दिन के अंदर झारखण्ड में भी बड़ा खेला होने वाला है। क्योंकि कहा जाता है कि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है।

Tuesday, 2 January 2024

 कैसी और किसकी आजादी (5)?

संताल संताल परगना में प्रवेश तो कर गए पर वे देश-दुनिया की खबरों से अनभिज्ञ थै। हां, उन्होंने सिर्फ किसी ”कुपनी“ (ईस्ट इण्डिया कंपनी) का नाम अवश्य सुन रखा था। पर वे उनकी कार्यशैली से कोसों दूर थे। तब संताल अपने में मस्त होकर बड़े आनंद के साथ अपना जीवनयापन कर रहे थे। ब्रिटिश काल में इनके साथ घटी घटनाओं को हम बाद में जानेंगे। इससे पहले हम भारत में अंग्रेजों द्वारा किए गए कार्यों को संक्षेप में जानने की कोशिश करते हैं। अंग्रेजों द्वारा खासकर दलितों के लिए किए गए कार्यों का विवरण कुछ इस तरह है:-

1. अंग्रेजों ने 1795 में अधिनियम 11 द्वारा शूद्रों को भी संपत्ति रखने का कानून बनाया।

2. 1773 में ईस्ट इण्डिया कंपनी ने रेगुलेटिंग एक्ट पास किया, जिसमें न्याय व्यवस्था समानता पर आधारित थी। 6 मई 1775 को इसी कानून के तहत बंगाल के सामंत ब्राह्मण नन्द कुमार देव को फांसी की सजा दी गई।

3. 1804 अधिनियम 3 द्वारा अंग्रेजों ने कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाई (लड़कियों के पैदा होते ही तालु में अफीम चिपका कर, मां के स्तन पर धतूरे का लेप लगाकर एवं गड्ढा बनाकर उसमें दूध भरकर डूबो कर मारा जाता था।)।

4. 1813 में ब्रिटिश सरकार ने कानून बनाकर शिक्षा ग्रहण करने का सभी जातियों और धर्मों के लोगों को अधिकार दे दिया।

5. 1813 में अंग्रेजों ने कानून बनाकर दास प्रथा का अंत कर दिया।

6. 1817 में अंग्रेजों ने समान नागरिक संहिता कानून बनाया (1817 के पहले सजा का प्रावधान वर्ण के आधार पर था। ब्राह्मण को कोई सजा नहीं होती थी, बल्कि शूद्र को कठोर दण्ड दिया जाता था। अंग्रेजों ने सजा प्रावधान समान कर दिया।)।

7. 1819 में अधिनियम 7 द्वारा ब्राह्मणों द्वारा शूद्रों के शुद्धिकरण पर रोक लगाई। (शूद्रों की शादी होने पर दुल्हन को अपने दूल्हे के घर न जाकर कम से कम तीन रात ब्राह्मण के घर शारीरिक सेवा देनी पड़ती थी।)

8. 1830 नरबलि प्रथा पर रोक लगा दिया। (देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए ब्राह्मण शूद्रों, स्त्री व पुरुष दोनों को मंदिर में सिर पटक-पटक कर चढ़ा देता था।)।

9. 1833 अधिनियम 87 द्वारा सरकारी सेवा में भेदभाव पर रोक अर्थात् योग्यता ही सेवा का आधार स्वीकार किया गया तथा कंपनी के अधीन किसी भारतीय नागरिक को जन्म स्थान, धर्म, जाति या रंग के आधार पर पद से वंचित नहीं रखा जा सकता है।

10. 1834 में पहला भारतीय विधि आयोग का गठन हुआ। कानून बनाने की व्यवस्था जाति, वर्ण, धर्म और क्षेत्र की भावना से ऊपर उठकर करना आयोग का प्रमुख उद्देश्य था।

11. 1835 प्रथम पुत्र को गंगा दान पर रोक लगा दिया। (ब्राह्मणों ने नियम बनाया कि शूद्रों के घर यदि पहला बच्चा लड़का पैदा हो, तो उसे गंगा में फेंक देना चाहिए। पहला पुत्र हृष्ट-पुष्ट ब्राह्मणों से लड़ न पाए, इसलिए उसे पैदा होते ही गंगा को दान करवा देते थे।)

12. 7 मार्च 1835 को लॉर्ड मैकाले ने शिक्षा नीति को राज्य का विषय बनाया और उच्च शिक्षा को अंग्रेजी भाषा का माध्यम बनाया।

13. 1835 को कानून बनाकर अंग्रेजों ने शूद्रों को कुर्सी पर बैठने का अधिकार दिया।

14. दिसम्बर 1829 के नियम 17 द्वारा विधवाओं को जलाना अवैध घोषित कर सती प्रथा का अंत किया।

15. देवदासी प्रथा पर रोक लगाई। ब्राह्मणों के कहने से शूद्र अपनी लड़कियों को मंदिर की सेवा के लिए दान देते थे। मंदिर के पुजारी उनका शारीरिक शोषण करते थे। बच्चा पैदा होने पर उसे फेंक देते थे और उस बच्चे को “हरिजन” नाम देते थे।

1921 को जातिवार जनगणना के आंकड़े के अनुसार अकेले मद्रास में कुल जनसंख्या 4 करोड़ 23 लाख थी, जिसमें 2 लाख देवदासियां मंदिरों में पड़ी थी। यह प्रथा अभी भी दक्षिण भारत के मंदिरों में चल रही है।

16. 1837 अधिनियम द्वारा ठगी प्रथा का अंत किया।

17. 1849 में कलकत्ता में एक बालिका विद्यालय जे. ई. डी. बेटन ने स्थापित किया।

18. 1854 में अंग्रेजों ने 3 विश्वविद्यालय कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे में स्थापित किया। और 1902 में विश्वविद्यालय आयोग नियुक्त किया।

19. 6 अक्टूबर 1860 को अंग्रेजों ने इण्डियन पैनल कोड-प्च्ब् बनाया। लार्ड मैकाले ने सदियों से जकड़े शूद्रों की जंजीरों को काट दिया और भारत में जाति, वर्ण और धर्म के बिना एक समान क्रिमिनल लॉ लागू कर दिया।

20. 1863 में अंग्रेजों ने कानून बनाकर चरक पूजा पर रोक लगा दिया। (आलिशान भवन एवं पुल निर्माण पर शूद्रों को पकड़कर जिन्दा चुनवा दिया जाता था। इस पूजा में मान्यता थी कि भवन और पुल ज्यादा दिनों तक टिकाऊ रहेंगे।)

21. 1867 में बहुविवाह प्रथा पर पूरे देश में प्रतिबंध लगाने के उद्देश्य से बंगाल सकार ने एक कमिटि गठित किया।

22. 1871 में अंग्रेजों ने भारत में जातिवार गणना प्रारंभ की। यह जनगण्ना 1941 तक हुई। 1948 में पण्डित नेहरु ने कानून बनाकर जातिवार गणना पर रोक लगा दी।

23. 1872 में सिविल मैरिज एक्ट द्वारा 14 वर्ष से कम आयु की कन्याओं एवं 18 वर्ष से कम आयु के लड़कों का विवाह पर रोक लगाई।

24. अंग्रेजों ने महार और चमार रेजिमेंट बनाकर इन जातियों को सेना में भर्ती किया, लेकिन 1892 में ब्राह्मणों के दबाव के कारण सेना में अछूतों की भर्ती बन्द हो गई।

25. रैयत वाणी पद्धति अंग्रेजों ने बनाकर प्रत्येक पंजीकृत भूमिदार को भूमि का स्वामी स्वीकार किया।

26. 1918 में साऊथबरो कमेटी को भारत में अंग्रेजो ने भेजा। यह कमेटी भारत में सभी जातियों का विधि मण्डल (कानून बनाने की संस्था) में भागीदारी के लिए आया। शाहू जी महाराज के कहने पर पिछड़ों के नेता भाष्कर राव जाधव एवं अछूतों के नेता डॉ. अम्बेडकर ने अपने लोगों को विधि मण्डल में भागीदारी के लिए मेमोरेंडम/ज्ञापन दिया।

27. अंग्रेजों ने 1919 में भारत सरकार अधिनियम का गठन किया।

28. 1919 में अंग्रेजों ने ब्राह्मणों को जज बनने पर रोक लगा दी थी और कहा था कि इनके अंदर न्यायिक चरित्र नहीं होता है।

29. 25 दिसम्बर 1927 को डॉ. अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति का दहन किया गया। मनुस्मृति में शूद्रों और महिलाओं को गुलाम तथा भोग की वस्तु समझा जाता था, एक पुरुष को अनगिनत शादियां करने का धार्मिक अधिकार है, महिला अधिकार विहीन तथा दासी की स्थिति में थी। एक-एक औरत के अनगिनत सौतनें हुआ करती थीं। औरतों-शूद्रों के लिए सिर्फ और सिर्फ गुलामी लिखा है, जिसको ब्राह्मण मनु ने धर्म का नाम दिया है।

30. 1 मार्च 1930 को डॉ. अम्बेडकर द्वारा काला राम मंदिर (नासिक) प्रवेश का आंदोलन चलाया गया।

31. 1927 को अंग्रेजों ने कानून बनाकर शूद्रों के सार्वजनिक स्थानों पर जाने का अधिकार दिया।

32. 1927 में साईमन कमीशन की नियुक्ति की जो 1928 में भारत के अछूत लोगों की स्थिति का सर्वे करने और उनको अतिरिक्त अधिकार देने के लिए आया। भारत के लोगों को अंग्रेज अधिकार न दे सके, इसलिए इस कमीशन के भारत पहुंचते ही गांधी और लाला लाजपत राय ने इस कमीशन के विरोध में बहुत बड़ा आंदोलन चलाया। जिस कारण साईमन कमीशन अधूरी रिपोर्ट लेकर वापस चला गया। इस पर अंतिम फैसले के लिए अंग्रेजों ने भारतीय प्रतिनिधियों को 12 नवम्बर 1930 को लंदन गोलमेज सम्मेलन में बुलाया।

33. 24 सितम्बर 1932 को अंग्रेजों ने कम्ययुनल अवार्ड घोषित किया, जिसमें निम्न प्रमुख अधिकार दिये:-

ंद्ध वयस्क मताधिकार

इद्ध विधान मण्डलों और संघीय सरकार में जनसंख्या के अनुपात में अछूतों को आरक्षण का अधिकार

बद्ध सिक्ख, ईसाई और मुसलमानों की तरह अछूतों ;ैब्ध्ैज्द्ध को भी स्वतंत्र निर्वाचन के क्षेत्र का अधिकार मिला। जिन क्षेत्रों में अछूत प्रतिनिधि खड़े होंगे, उनका चुनाव केवल अछूत ही करेंगे।

कद्ध प्रतिनिधियों को चुनने के लिए दो बार वोट देने का अधिकार मिला, जिसमें एक बार सिर्फ अपने प्रतिनिधियों को वोट देंगे तो दूसरी बार सामान्य प्रतिनिधियों को वोट देंगे।

34. 19 मार्च 1928 को बेगारी प्रथा के विरुद्ध डॉ. अम्बेडकर ने मुम्बई विधान परिषद में आवाज उठाई, जिसके बाद अंग्रेजों ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया।

35. अंग्रेजो ने 1 जुलाई 1942 से लेकर 10 सितम्बर 1946 तक डॉ. अम्बेडकर को वायसराय की कार्य साधक कौंसिल में लेबर मेम्बर बनाया। लेबरों को डॉ. अम्बेडकर ने 8.3 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दिलवाया।

36. 1937 में अंग्रेजों ने भारत में प्रोविंशियल गवर्नमेंट का चुनाव करवाया।

37. 1942 में अंग्रेजों से डॉ. अम्बेडकर ने 50 हजार हेक्टेयर भूमि को अछूतों एवं पिछड़ों में बांट देने के लिए अपील किया। अंग्रेजों ने 20 वर्षों की समय सीमा तय किया था।

38. अंग्रेजों के शासन प्रशासन में ब्राह्मण की भागीदारी को 100 से 2.5 पर लाकर खड़ा कर दिया था।

इन्हीं सब कारणों से ब्राह्मणों ने अ्रंग्रेजों के खिलाफ क्रांति शुरु कर दी। क्योंकि अंग्रेजों ने शूद्रों और महिलाओं को सारे अधिकार दे दिये थे और सब जातियों के लोगों को एक समान अधिकार देकर सबको बराबरी में लाकर खड़ा कर दिया था। 

(... अगले अंक में जारी।)

Friday, 6 October 2023

 कैसी और किसकी आजादी?

वाइरल हो रहे एक वीडियो "ईसावाद और औपनिवेशिक कानूनों के चक्रव्यूह में" को बड़े ध्यान से सुना। इस पर गहराई के साथ मनन-चिंतन किया। सार स्वरुप यही समझ में आया कि यह वीडियो संघ परिवार के थिंक टैंक द्वारा प्रायोजित है। इस रहस्य को समझने के लिए इतना ही काफी है कि एक छोटा-सा ”दीया“ जिसके बमुश्किल संसद में एकाध सांसद ही हुआ करते थे, आज सत्ता की बागडोर उनके हाथ में है। जिनकी रगों में "हिन्दी, हिन्दु, हिन्दुस्तान" का खून दौड़ रहा हो, आज उसके सपने "प्राण प्रतिष्ठा" आयोजित कर पूर्ण होता दिखाई दे रहा है।

उपरोक्त वीडियो के मनगढ़ंत कहानी के झूठे ब्यानों पर बहुत कुछ कटाक्ष किया जा सकता है। पर इस कहानी की जड़ को समझने के लिए उस कथावाचक के इन शब्दों के तह तक जाने की जरुरत है यथा - अंग्रेज, ईसाई, भारत का स्वतंत्रता आंदोलन, छोटानागपुर एवं संताल परगना काश्तकारी अधिनियम एवं वनवासी।

तथाकथित कथावाचक ने अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों को बड़े ही शालीनता के साथ पिरोया है। उनकी बातों से ऐसा प्रतीत होता है; मानो, वे किसी कब्रगाह की रंगाई-पुताई कर रहे हों। उनके मुँह में राम-राम, तो बगल में एक धारदार छुरी छिपी हुई है। सच कहा जाय तो उसने एक सच को छिपाने के लिए सैकड़ों झूठ का सहारा लिया है। उनकी कथनों में दूर-दूर तक कोई सच्चाई नहीं है। इस वीडियो में कही गई बातों के रहस्य को समझने के लिए इसके पर्दे के पीछे चल रहे खेल को अच्छी तरह समझना बहुत जरुरी है।

किसी भी रहस्य को समझने के लिए हमेशा तीसरी आँख की जरुरत होती है। जब तक गहराई के साथ उस रहस्य पर अन्वेषण न किया जाए, तो ऊपरी सतह पर वह आपको सच-सा ही प्रतीत होगा। क्या आप बता सकते हो; भारतीय स्वतंत्रता का आंदोलन क्यों चलाया गया? क्यों भारतवासी इस जंग में एकजूट हो गए? निःसंदेह आपका उत्तर होगा - "क्योंकि तब भारत देश अंग्रेजों के अधीन था। हम भारत के लोग गुलाम थे। इसलिए आजादी की लड़ाई लड़ी गई।" पर आपका यह उत्तर सच्चाई से कोसों दूर है। अगर पूछा जाय, अंग्रेजों से पहले भी तो बाहर के देशों से कई मुगल, लोदी, पठान आदि आए और इस देश में सदियों तक राज किए। तब क्यों नहीं भारतीय स्वतंत्रता का आंदोलन हुआ? क्या कारण था कि सिर्फ अंग्रेजों के दौरान ही आजादी का बिगुल फूंका गया? इसका सही जवाब के लिए पहले - "आजादी, स्वतंत्रता, स्वावलंबन" के अर्थ, अभिप्राय, भावार्थ आदि को अच्छी तरह समझना होगा। कैसी आजादी? किस तरह की स्वतंत्रता? क्या एक राजा के बदले दूसरे राजा को बैठा देने मात्र से ही आपकी तमाम समस्याओं का समाधान हो गया? शायद नहीं। बल्कि हमारी समस्या और बढ़ गई। खैर, हमारे लिए तो सावन हरे न भादो सूखे। हम तो आसमान से गिरे और खजूर पर अटक गए हैं। 

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...