1932 खतियान: आदिवासी-मूलवासियों की पहचान
(संताल परगना के संदर्भ में)
यह विडंबना ही है कि युद्ध शांति के लिए अथवा शांति के लिए युद्ध किया जाता है? इसका जवाब ढूंढ़ पाना एक टेढ़ी खीर के समान है। फिर भी सृष्टि से लेकर अब तक अगर घर-परिवार के युद्धों को भी जोड़ दिया जाए, तो दुनिया में औसतन रोज दस युद्ध होते आए हैं। रामायण (राम-रावण) का युद्ध, महाभारत (कौरव-पाण्डवों) का युद्ध, तुर्क-मुगलों का आक्रमण, राजा-महाराजाओं (पानीपत, हल्दीघाटी आदि) का युद्ध, विष्व युद्ध (प्रथम व द्वितीय), भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, भारत-चीन, भारत-पाक, दुनिया की क्रांतियां एवं अब वर्तमान में रुस-युक्रेन का युद्ध। अगर संताल आदिवासी के संदर्भ में कहा जाए, तो छोटे-बड़े कई सामाजिक-राजनैतिक आंदोलनों के साथ सबसे बड़ा जो युद्ध हुआ, उसे हम - “संताल हूल 1855” के नाम से खूब जानते हैं। संताल हूल आखिर क्यों हुआ? अगर गहराई से इसकी जांच की जाए, तो हम पाएंगे कि यह हूल मिट्टी से जुड़ा हुआ है। बीहड़ जंगलों को साफ कर हमने रहने व खेती योग्य जमीन तैयार की और आज आप उसके मालिक बनोगे? यह हमें कतई मंजूर नहीं। हम इसके मालिक हैं। यहां हमारी मर्जी चलेगी, आपकी नहीं।
अंग्रेजों ने भारत पर करीब 200 वर्षों तक राज किया। सवाल उठता है; वाभनों ने उनको भगाने के लिए पूरे भारत में आजादी की जंग क्यों छेड़ दी? क्या कारण था कि इन वाभनों के झांसे में सभी दलित, पिछड़े, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक आ गए एवं उनकी अगुवाई में चल रहे हथियार बंद आंदोलन में शामिल हो गए?
अब सवाल यह उठता है कि इससे पहले भी तो कई मुगल शासकों ने भारत पर अपना अधिपत्य या यों कहें कि उन्होंने बड़ी शान के साथ राज किया था। फिर क्यों नहीं इन वाभनों ने उस दौरान कोई आजादी का आंदोलन चलाया? जबकि भारत पर सबसे पहला हमला मुस्लिम शासक मीर कासिम ने 712 ई. में किया। उसके बाद मानो मुसलमानों में भारत पर राज करने की होड़-सी लग गई। जिनमें प्रमुख रूप से - महमूद गजनबी, मुहम्मद गौरी, चंगेज खान, कुतुबुद्दिन ऐबक, गुलाम वंश, तुगलक वंश, खिलजी वंश, लोदी वंश, फिर मुसलमान (ये मुसलमान नहीं थे, मुगल एक रेस या वंश का नाम है।) आदि वंशों ने भारत पर राज किया एवं खूब अत्याचार किये। फिर भी वाभनों ने कोई क्रांति या आंदोलन नहीं चलाया। फिर अंग्रेजों के खिलाफ ही इन्होंने क्रांति क्यों कर दी? इसका स्पष्ट कारण यही था कि मुगलों ने भारत पर सदियों से चली आ रही “मनुस्मृति” के संविधान को यथावत बनाये रखा। मुगलों को इस संविधान पर कोई आपत्ति न थी। उन्होंने बीच का रास्ता अपना रखा था। पर अंग्रजों ने उस तथाकथित संविधान (मनुस्मृति) की धज्जियां उड़ाकर रख दी थी। वे मनुस्मृति के घोर विरोधी थे। उन्होंने दलित, पिछड़ों, आदिवासियों, मूलवासियों और अल्पसंख्यकों को समानाधिकार दिया। अर्थात् कानून के सामने सब बराबर हैं। महान चिंतक एवं संविधान निर्माता बाबा साहेब उपरोक्त सवाल का जवाब देते हुए आगे लिखते हैं - “चूँकि मुसलमानों ने सदियों से चली आ रही तथाकथित वाभनों की “मनुस्मृति” पर कोई उंगली न उठाई। उन्होंने चापलूसी की राजनीति अपनाई। उनको (वाभनों को) अपने “नवरत्नों” में जगह दी। अतः स्पष्ट तौर पर कहा जाय तो, मुगल शासकों ने “मनुस्मृति” की आत्मा को जिंदा बनाए रखा। यथा दलित, पिछड़े एवं जंगली आदिवासियों की औरतों को स्तन ढकने के लिए कर देना होता था। वे गले में हांडी, कमर में झाड़ू बंधकर चलने को मजबूर थे। कारण कुछ भी रहा हो, करीब 1600 ई. के आस पास अग्रेजों का भारत में पदार्पण हुआ। सर्वप्रथम अंग्रेजों ने तमाम मुगल शासकों के पर उखाड़ते गए। जब बादशाह बहादुरशाह जाफर के रूप में अंतिम पर उखाड़े गए तो, भारत में पूर्णरूपेण अंग्रेजी हुकुमत कायम हो गई। अंग्रेजों को मनुस्मृति की कुरीतियों को समझने में देर न लगी। उन्होंने छुआछूत, सती प्रथा, शिक्षा, राजनीति, प्रशासन एवं तमाम तरह के दलित, पिछड़े, आदिवासी की हकमारी को बहुत करीब से देखा। तात्पर्य यही कि भारतवर्ष में अंग्रेजी राज नहीं, अपितु देश मनु महाराज की “मनुस्मृति” के संविधान के अनुसार चल रहा है, जो मानवाधिकार की दृष्टि से अति निंदनीय एवं निहायत ही अमानवीय है। फिर क्या था; अंग्रेजों ने धीरे-धीरे लंकारूपी “मनुस्मृति” पर आग लगानी शुरू कर दी। इसके कुछ अंश उदाहरणार्थ दिए जा रहे हैं। ये अंश डॉ. हीरालाल यादब (पीएचडी इतिहास) के व्हाट्सअप वाल से उद्धृत हैं:-
1. अंग्रेजो ने 1795 में अधिनियम 11 द्वारा शूद्रों को भी संपत्ति रखने का कानून बनाया।
2. 1773 में ईस्ट इण्डिया कंपनी ने रेगुलेटिंग एक्ट पास किया जिसमें न्याय व्यवस्था समानता पर आधारित थी। 6 मई 1775 को इसी कानून के तहत बंगाल के सामंत ब्राह्मण नन्द कुमार देव को फांसी की सजा दी गई।
3. 1804 अधिनियम 3 द्वारा अंग्रेजों ने कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाई (लड़कियों के पैदा होते ही तालु में अफीम चिपका कर, मां के स्तन पर धतूरे का लेप लगाकर एवं गड्ढा बनाकर उसमें दूध भरकर डूबो कर मारा जाता था।)।
4. 1813 में ब्रिटिष सरकार ने कानून बनाकर षिक्षा ग्रहण करने का सभी जातियों और धर्मों के लोगों को अधिकार दे दिया।
5. 1813 में अंग्रेजों ने कानून बनाकर दास प्रथा का अंत कर दिया।
6. 1817 में अंग्रेजों ने समान नागरिक संहिता कानून बनाया (1817 के पहले सजा का प्रावधान वर्ण के आधार पर था। ब्राह्मण को कोई सजा नहीं होती थी, बल्कि शूद्र को कठोर दण्ड दिया जाता था। अंग्रेजों ने सजा प्रावधान समान कर दिया।)।
7. 1819 में अधिनियम 7 द्वारा ब्राह्मणो द्वारा शूद्रों के शुद्धिकरण पर रोक लगाई। (शूद्रों की शादी होने पर दुल्हन को अपने दूल्हे के घर न जाकर कम से कम तीन रात ब्राह्मण के घर शारीरिक सेवा देनी पड़ती थी।)
8. 1830 नरबलि प्रथा पर रोक लगा दिया। (देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए ब्राह्मण शूद्रों, स्त्री व पुरुष दोनों को मंदिर में सिर पटक-पटक कर चढ़ा देता था।)।
9. 1833 अधिनियम 87 द्वारा सरकारी सेवा में भेदभाव पर रोक अर्थात् योग्यता ही सेवा का आधार स्वीकार किया गया तथा कंपनी के अधीन किसी भारतीय नागरिक को जन्म स्थान, धर्म, जाति या रंग के आधार पर पद से वंचित नहीं रखा जा सकता है।
10. 1834 में पहला भारतीय विधि आयोग का गठन हुआ। कानून बनाने की व्यवस्था जाति, वर्ण, धर्म और क्षेत्र की भावना से ऊपर उठकर करना आयोग का प्रमुख उद्देश्य था।
11. 1835 प्रथम पुत्र को गंगा दान पर रोक लगा दिया। (ब्राह्मणों ने नियम बनाया कि शूद्रों के घर यदि पहला बच्चा लड़का पैदा हो, तो उसे गंगा में फेंक देना चाहिए। पहला पुत्र हृष्ट-पुष्ट ब्राह्मणों से लड़ न पाए, इसलिए उसे पैदा होते ही गंगा को दान करवा देते थे।)
12. 7 मार्च 1835 को लॉर्ड मैकाले ने शिक्षा नीति को राज्य का विषय बनाया और उच्च शिक्षा को अंग्रेजी भाषा का माध्यम बनाया।
13. 1835 को कानून बनाकर अंग्रेजों ने शूद्रों को कुर्सी पर बैठने का अधिकार दिया।
14. दिसम्बर 1829 के नियम 17 द्वारा विधवाओं को जलाना अवैध घोषित कर सती प्रथा का अंत किया।
15. देवदासी प्रथा पर रोक लगाई। ब्राह्मणों के कहने से शूद्र अपनी लड़कियों को मंदिर की सेवा के लिए दान देते थे। मंदिर के पुजारी उनका शारीरिक शोषण करते थे। बच्चा पैदा होने पर उसे फेंक देते थे और उस बच्चे को “हरिजन” नाम देते थे।
1921 को जातिवार जनगणना के आंकड़े के अनुसार अकेले मद्रास में कुल जनसंख्या 4 करोड़ 23 लाख थी, जिसमें 2 लाख देवदासियां मंदिरों में पड़ी थी। यह प्रथा अभी भी दक्षिण भारत के मंदिरों में चल रही है।
16. 1837 अधिनियम द्वारा ठगी प्रथा का अंत किया।
17. 1849 में कलकत्ता में एक बालिका विद्यालय जे. ई. डी. बेटन ने स्थापित किया।
18. 1854 में अंग्रेजों ने 3 विश्वविद्यालय कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे में स्थापित किया। और 1902 में विश्वविद्यालय आयोग नियुक्त किया।
19. 6 अक्टूबर 1860 को अंग्रेजों ने इण्डियन पैनल कोड-आईपीसी बनाया। लार्ड मैकाले ने सदियों से जकड़े शूद्रों की जंजीरों को काट दिया और भारत में जाति, वर्ण और धर्म के बिना एक समान क्रिमिनल लॉ लागू कर दिया।
20. 1863 में अंग्रेजों ने कानून बनाकर चरक पूजा पर रोक लगा दिया। (आलिशान भवन एवं पुल निर्माण पर शूद्रों को पकड़कर जिन्दा चुनवा दिया जाता था। इस पूजा में मान्यता थी कि भवन और पुल ज्यादा दिनों तक टिकाऊ रहेंगे।)
21. 1867 में बहुविवाह प्रथा पर पूरे देष में प्रतिबंध लगाने के उद्देष्य से बंगाल सकार ने एक कमिटि गठित किया।
22. 1871 में अंग्रेजों ने भारत में जातिवार गणना प्रारंभ की। यह जनगण्ना 1941 तक हुई। 1948 में पण्डित नेहरु ने कानून बनाकर जातिवार गणना पर रोक लगा दी।
23. 1872 में सिविल मैरिज एक्ट द्वारा 14 वर्ष से कम आयु की कन्याओं एवं 18 वर्ष से कम आयु के लड़कों का विवाह पर रोक लगाई।
24. अंग्रेजों ने महार और चमार रेजिमेंट बनाकर इन जातियों को सेना में भर्ती किया, लेकिन 1892 में ब्राह्मणों के दबाव के कारण सेना में अछूतों की भर्ती बन्द हो गई।
25. रैयत वाणी पद्धति अंग्रेजों ने बनाकर प्रत्येक पंजीकृत भूमिदार को भूमि का स्वामी स्वीकार किया।
26. 1918 में साऊथबरो कमेटी को भारत में अंग्रेजो ने भेजा। यह कमेटी भारत में सभी जातियों का विधि मण्डल (कानून बनाने की संस्था) में भागीदारी के लिए आया। शाहू जी महाराज के कहने पर पिछड़ों के नेता भाष्कर राव जाधव एवं अछूतों के नेता डॉ. अम्बेडकर ने अपने लोगों को विधि मण्डल में भागीदारी के लिए मेमोरेंडम/ज्ञापन दिया।
27. अंग्रेजों ने 1919 में भारत सरकार अधिनियम का गठन किया।
28. 1919 में अंग्रेजों ने ब्राह्मणों को जज बनने पर रोक लगा दी थी और कहा था कि इनके अंदर न्यायिक चरित्र नहीं होता है।
29. 25 दिसम्बर 1927 को डॉ. अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति का दहन किया गया। मनुस्मृति में शूद्रों और महिलाओं को गुलाम तथा भोग की वस्तु समझा जाता था, एक पुरुष को अनगिनत शादियां करने का धार्मिक अधिकार है, महिला अधिकार विहीन तथा दासी की स्थिति में थी। एक-एक औरत के अनगिनत सौतनें हुआ करती थीं। औरतों-शूद्रों के लिए सिर्फ और सिर्फ गुलामी लिखा है, जिसको ब्राह्मण मनु ने धर्म का नाम दिया है।
30. 1 मार्च 1930 को डॉ. अम्बेडकर द्वारा काला राम मंदिर (नासिक) प्रवेश का आंदोलन चलाया गया।
31. 1927 को अंग्रेजों ने कानून बनाकर शूद्रों के सार्वजनिक स्थानों पर जाने का अधिकार दिया।
32. 1927 में साईमन कमीशन की नियुक्ति की जो 1928 में भारत के अछूत लोगों की स्थिति का सर्वे करने और उनको अतिरिक्त अधिकार देने के लिए आया। भारत के लोगों को अंग्रेज अधिकार न दे सके, इसलिए इस कमीशन के भारत पहुंचते ही गांधी और लाला लाजपत राय ने इस कमीशन के विरोध में बहुत बड़ा आंदोलन चलाया। जिस कारण साईमन कमीशन अधूरी रिपोर्ट लेकर वापस चला गया। इस पर अंतिम फैसले के लिए अंग्रेजों ने भारतीय प्रतिनिधियों को 12 नवम्बर 1930 को लंदन गोलमेज सम्मेलन में बुलाया।
33. 24 सितम्बर 1932 को अंग्रेजों ने कम्ययुनल अवार्ड घोषित किया, जिसमें निम्न प्रमुख अधिकार दिये:-
i ) वयस्क मताधिकार
ii ) विधान मण्डलों और संघीय सरकार में जनसंख्या के अनुपात में अछूतों को आरक्षण का अधिकार
iii) बुद्ध, सिक्ख, ईसाई और मुसलमानों की तरह अछूतों ; (बौद्ध) को भी स्वतंत्र निर्वाचन के क्षेत्र का अधिकार मिला। जिन क्षेत्रों में अछूत प्रतिनिधि खड़े होंगे, उनका चुनाव केवल अछूत ही करेंगे।
iv) प्रतिनिधियों को चुनने के लिए दो बार वोट देने का अधिकार मिला, जिसमें एक बार सिर्फ अपने प्रतिनिधियों को वोट देंगे तो दूसरी बार सामान्य प्रतिनिधियों को वोट देंगे।
34. 19 मार्च 1928 को बेगारी प्रथा के विरुद्ध डॉ. अम्बेडकर ने मुम्बई विधान परिषद में आवाज उठाई, जिसके बाद अंग्रेजों ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया।
35. अंग्रेजो ने 1 जुलाई 1942 से लेकर 10 सितम्बर 1946 तक डॉ. अम्बेडकर को वायसराय की कार्य साधक कौंसिल में लेबर मेम्बर बनाया। लेबरों को डॉ. अम्बेडकर ने 8.3 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दिलवाया।
36. 1937 में अंग्रेजों ने भारत में प्रोविंशियल गवर्नमेंट का चुनाव करवाया।
37. 1942 में अंग्रेजों से डॉ. अम्बेडकर ने 50 हजार हेक्टेयर भूमि को अछूतों एवं पिछड़ों में बांट देने के लिए अपील किया। अंग्रेजों ने 20 वर्षों की समय सीमा तय किया था।
38. अंग्रेजों के शासन प्रशासन में ब्राह्मण की भागीदारी को 100 से 2.5 पर लाकर खड़ा कर दिया था।
इन्हीं सब कारणों से ब्राह्मणों ने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति शुरु कर दी। क्योंकि अंग्रेजों ने शूद्रों और महिलाओं को सारे अधिकार दे दिये थे और सब जातियों के लोगों को एक समान अधिकार देकर सबको बराबरी में लाकर खड़ा कर दिया था।
संताल परगना का संक्षिप्त इतिहास
संताल एक खानाबदोश, घुमक्कड़ और कबीला प्रवृति का मानव है। वे अपने में ही मस्त रहने वाले प्राणी हैं। उन्हें अपने जीवन में परायों की दखलंदाजी कतई पसंद नहीं। उन्हें झूठ और फरेब से ज्यादा ही परहेज है। वे सत्यवादी हैं। जहां तक संभव हो, वे अत्याचार के घूंट पीने के आदी हैं। पर जब पानी सर के ऊपर बह जाए, तो वे अपना असली रंग दिखाने में कोई्र कसर नहीं छोड़ते हैं। संताल हूल 1855 इसका पक्का सबूत है।
तब भारतवर्ष में अंग्रेजों का राज स्थापित हो चुका था। उन्होंने देखा कि राजमहल की पहाड़ी घने वन-जंगलों से घिरी हुई एक ऐसी जगह है, जिसकी कटाई/सफाई उपरांत उस पर अच्छी खेती हो सकती है। तब पहाड़ों के ऊपरी हिस्से में पहाड़िया जनजाति का वास था, पर वे आलसी प्रवृति के थे। वे मेहनती नहीं थे। चोरी और राहगीरों की छिनतई से वे अपनी जीविका चलाते थे। अर्थात यही उनका मुख्य पेशा था। फिर अंग्रजों की नजर कटक, मानभूम, धालभूम, हजारीबाग, मिदनापुर आदि स्थानों पर निवास कर रहे संतालों पर पड़ी। संताल मेहनतकश के अलावे परम सत्यवादी भी थे। फिर अंग्रेजों ने संतालों को तात्कालीन संताल परगना में आने का आमंत्रण दे डाला। अंधे को और क्या चाहिए? उनके लिए तो एक आंख ही काफी थी। संताल झुण्ड के झुण्ड टिड्डी की तरह संताल परगना में प्रवेश कर गए। शुरु-शुरु में पहाड़ियों ने इसका विरोध किया। अंतोगत्वा अंग्रेज अफसर सुपरिण्टेण्डेण्ट जेम्स पोण्टेट की देखरेख में संताल-पहाड़िया के बीच उत्पन्न हुए झगड़े को सुलझा लिया गया। इसी कुटनीति के तहत ब्रिटिश शासकों ने पहाड़ियों को खुश रखने के लिए उनके लड़कों को फौज में भर्ती कर लिया (हिल रंजैर्स रेजिमेण्ट/बटालियन) एवं बस्ती के सभी सरदारों को मासिक वेतन के रूप में कुछ रुपये देना शुरु कर दिया। दूसरी ओर संतालों को बगैर खजना दिए खेती करने की आजादी दे डाली। जिससे अंग्रेजों के सांप भी मर गए एवं लाठी भी नहीं टूटी। दोनों जातियों को प्रसन्न रखने के लिए जेम्स पोण्टेट की अगुवाई में ही आदिवासियों के लिए 1832 में भागलपुर से राजमहल तक दामिन-इ-कोह का गठन किया गया, ताकि आदिवासी अपनी सुविधानुसार इस क्षेत्र को साफ कर उस पर अच्छी तरह खेती कर सके।
दामिन-इ-कोह के सीमांकन के बाद, संतालों की बस्तियां बड़ी तेजी से बढ़ीं, संतालों के गांवों की संख्या जो 1838 में 40 थी, तेजी से बढ़कर 1851 तक 1,473 तक पहुंच गई। इसी अवधि में संतालों की जनसंख्या जो केवल 3,000 थी, बढ़कर 82,000 से भी अधिक हो गई। संताल परगना डिस्ट्रिक्ट गजेटियर बताता है कि तब संताल परगना में आदिवासियों की जनसंख्या 90 प्रतिशत थी, जहां दिकूओं की जनसंख्या मात्र 10 प्रतिशत ही थी।
तभी संतालों के बीच एक अजीबो-गरीब घटना घट गई। संतालों का तात्कालीन संताल परगना प्रवेशोपरांत ही उनके पीछे-पीछे दिकू लोगों का आगमन शुरु हुआ। इन्होंने सर्वप्रथम भोले भाले संतालों को पल्थी मारने की जगह मांगी। संतालों के बीच दिकूओं का आने का एक ही मकसद था; उनके बीच महाजनी करोबार करना। किंतु, संतालों ने भी जल्दी ही यह समझ लिया कि उन्होंने जिस भूमि पर खेती करनी शुरु की थी, वह उनके हाथों से निकलती जा रही है। संतालों ने जिस जमीन को साफ करके खेती शुरु की थी, उस पर सरकार (राज्य) भारी कर लगा रही थी, साहूकार, दिकू लोग बहुत ऊंची दर पर ब्याज लगा रहे थे और कर्ज अदा न किए जाने की सूरत में जमीन पर ही कब्जा कर रहे थे और जमींदार लोग दामिन इलाके पर अपने नियंत्रण का दावा कर रहे थे।
1854 आते-आते संतालों के सिर के ऊपर से पानी बहने लगा। खेत-खलिहान तो संतालों के हाथों से जा ही रहा था। उनके मवेशी एवं स्त्री-बच्चे पर भी आफत का पहाड़ टूटने लगा था। संताल किंकर्त्तव्यविमूढ़ः की स्थिति में पहुंच गए थे। तब दामिन-इ-कोह इलाके में जेम्स पोण्टेट के अलावे और कोई अंग्रेज अफसर की बहाली भी न थी। यह भी विडंबना ही थी कि पोण्टेट के पास मजिस्ट्रेयल पावर भी नही था। भला एक अंग्रेज अफसर के लिए इतना बड़ा इलाके को संभाल पाना बड़ा ही दुरुह कार्य था। संतालों को उचित न्याय पाने हेतु दूर-दूर तक जाना पड़ता था। पर महाजन एवं दरोगा की मिलीभगत ने संतालों की आशाओं पर पानी फेर दिया था। कोर्ट-कचहरी में भी आमला-पियुन वगैरह महाजनों की ही दलाली करते थे।
संतालों ने सभी तरह के न्यायिक दरवाजे खटखटाये। पर उन्हें चारों ओर से मुंह की खानी पड़ी। उन्हें मुंह लटका कर लौटना पड़ा। आखिर, मरता क्या नहीं करता। गांव-गांव हूल के बारे में खबर पहुंचा दी गई। आम जनता को अच्छी तरह समझ में आ गया कि ये सूदखोर महाजन ही उनके असली अत्याचारी एवं दुश्मन हैं। अतएव उनको जड़ समेत उखाड़ फेंकने में ही उनकी भलाई है। अतः उनसे निजात पाने के लिए संतालों ने हूल का बिगुल फूँक दिया। “हूल” का शाब्दिक अर्थ है - क्रांति, विद्रोह, बलवा ...। परंतु संताली में इसका आंतरिक अर्थ - अत्याचार के विरुद्ध अंतिम अस्त्र उठाना। फिर क्या था? 07 जुलाई 1855 बरहेट के समीप पंचकठिया वट वृक्ष के नीचे से कुख्यात महेश लाल दरोगा एवं अत्याचारी महाजन केनाराम भगत सहित 14 सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिए जाने के बाद ही हूल का श्रीगणेश हुआ। उन्होंने आर-पार की लड़ाई छेड़ दी। दावानल की तरह हूल की आग जल उठी। चारों ओर हाहाकर मच गया। महाजनों को चुन चुनकर उनका भूरता बनाया जाने लगा। ब्रिटिश शासकों को जब इसकी खबर लगी, तो उन्होंने महाजनों के बचाव हेतु अपनी फौज को संताल इलाके में भेज दिया। संताल फौज और गोरे पल्टनों के बीच घमासन युद्ध हुआ। परंतु हूल थमने का नाम नहीं ले रहा था। आखिर 10 नवम्बर 1855 को मार्शल लॉ भी लागू किया गया। फिर भी हूल नहीं थमा। सर कटा सकते हैं, पर जमीन नहीं दे सकते के नारों से आसमान गूंज उठा था।
अंततः ब्रिटिश शासकों ने हूल के कारणों का गहराई पूर्वक विश्लेषण करने के लिए एक उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया। जांच समिति के निर्देशानुसार संतालों के लिए एक अलग राज्य संताल परगना का गठन किया गया। जहां संतालों को अपने विधि-विधान के अनुसार राज करने का प्रस्ताव पास किया गया। मालूम हो कि सर्वप्रथम 22 दिसम्बर 1855 को जिस संताल परगाना का गठन हुआ था, उसकी सीमा भागलपुर के साथ-साथ कटिहर-पुर्णिया भी शामिल थी। परंतु दिकूओं के विरोधस्वरुप 1857 में इसकी सीमांकन को घटा दी गई। अंग्रेजों को अच्छी तरह समझ में आ गया था कि आदिवासियों के लिए उनकी जमीन ही उनकी आत्मा है। मच्छली की तरह अगर उसे पानी से बाहर कर दिया जाय, तो वह एक पल भी जिंदा नहीं रह सकता है। अतः अंग्रेजों ने जमीन के महत्व को समझते हुए एक ऐसा कानून पास किया, जिसमें आदिवासी न तो अपनी जमीन दिकू को बेच सकता है और न ही कोई दिकू आदिवासी की जमीन को खरीद सकता है। साथ ही यह भी कानून पास किया कि इस कानून को भारत की कोई भी संस्था संशोधन नहीं कर सकती है। यह कानून आज भी संताल परगना काश्तकारी अधिनियम-1949 के तहत जस के तस रक्षा कवच के रूप में खड़ा है। फिर भी आज आदिवासियों की आधी जमीन दिकूओं के हाथों चली गई है।
अंग्रेजों द्वारा संताल परगना का गठन तो कर दिया गया, पर उनसे एक बहुत बड़ी बुनियादी भूल हो गई। अंग्रेज इसे चाहकर भी कुछ नहीं कर सके। वह बुनियादी भूल यही थी कि तब संतालों (आदिवासी) में एक भी शिक्षित व्यक्ति नहीं था। अर्थात् सभी आदिवासी अंगूठा टेक थे। जिसके कारण सरकारी दफ्तर हो या कोर्ट-कचहरी उनकी नियुक्ति नहीं हो सकती थी। इस तरह एक जीवंत एवं नई समस्या उत्पन्न हो गई। अंग्रेज चाहकर भी इस समस्या का समाधान नहीं कर सके। फिर भी उनसे जितना बन पड़ा, उन्होंने भरसक कोशिश की। जहां तक संभव हो सका, उन्होंने आदिवासियों को न्याय देने का अथक प्रयास किया।
वक्त के साथ समय का चक्र घुमता गया। स्वायत्तशासन के तहत परगनैत को दरोगा की शक्ति भी दी गई। हालांकि इस शक्ति को बाद में वापस लिया गया। फिर भी सूदखोर महाजनों का अत्याचार रुकने का नाम नहीं ले रहा था। एक अलग प्रदेश संताल परगना भी मिल गया था, पर लोगों की आर्थिक हालत बद से बदतर होती गई। ढाक के वही तीन पात वाली कहावत चरितार्थ हो गई। जमीन संतालों ने तैयार की थी पर उनकी जमीन तेजी के साथ महाजनों के हाथ जा रही थी। यही कारण था कि लोगों में पुनः द्वितीय हूल करने की भावना जाग उठी थी। लोगों का आक्रोश बढ़ते जा रहा था। इसी मूल उद्देश्य के तहत 1872 को मांझी-परगनाओं की अगुवाई में दुमका में एक महारैली का आयोजन हुआ। उस रैली में हजारों की संख्या में आदिवासी-मूलवासी एकत्र हुए। दुमका में पदस्थापित तात्कालीन डिस्ट्रिक्ट कमिशनर को एक सूत्रीय मांगपत्र सौंपा गया। जिसमें स्पष्ट रूप से भूमि बंदोबस्ती की मांग जोदार तरीके से रखी गई थी।
ब्रिटिश शासकों ने त्वरित कार्रवाई करते हुए तत्क्षण 1872 रेगुलेशन एक्ट पारित कर सर्वे सेटेलमैंट का काम आरंभ कर दिया। इस सेटेलमैंट की प्रकिया पर महाजनों ने कई तरह की अड़चनें पैदा करने की कोशिश की। अंग्रेजों को महाजनों का मजरा शीघ्र ही समझ में आ गया। “जमीन जिसकी, नाम उसका” पहल करते हुए सर्वे सेटेलमेण्ट का काम तीन चरणों में संपन्न हो गया। यथा - (i) प्रथम सर्वे - Browne Wood Settlement (1873-1879); (संताली में इसे ”हुंट“ सेटलमेंट के नाम से जाना गया; (ii) द्वितीय सर्वे - Mr H. McPherson Settlement (1898-1905); एवं (iii) तृतीय सर्वे - J. F. Gantzer Settlement (16.2.1932-8.7.1934)। यह अंतिम सर्वे था, जिसे लोग इन्हें 1932 खतियान के नाम से खूब जानते हैं।
अब सवाल उठता है; अंग्रेजों की वजह से अलग प्रदेश संताल परगना भी मिल गया, एसपीटी/सीएनट जैसे सख्त भूमि कानून भी पास हुए, 1932 का खतियान भी हाथ में आ गया, देश आजाद भी हो गया; फिर झारखण्ड अलग प्रांत की मांग क्यों उठी। अंग्रेज होते; तो शायद यह मांग भी कब की पूरी को गई होती। जिन महान क्रांतिकारियों ने अलग प्रांत की मांग जोरदार ढंग से उठाई, उनमें अग्रिम कतार में थे - सर्वश्री माराङ गोमके जयपाल सिंह मुण्डा, एनई होरो, बागुन सुम्बरुई, जस्टिन रिचार्ड, दिसोम गुरु शिबू सोरेन आदि। झारखण्ड आंदोलन की कहानी लंबी है। खैर, तात्कालीन कांग्रेस सरकार ने “मुर्गा” को ही चखना कर दिया। कोई साढ़े तीन करोड़ लेकर फरार हो गया। कारण कुछ भी रहा हो, अनवरत अलग झारखण्ड आंदोलन की वजह से 2000 में “शेर” के बदले “सांप” स्वरुप “वनांचल” पारित हुआ। बड़ी मशक्कत के बाद उसमें “झारखण्ड” नाम सुधारा गया।
झारखण्ड बने करीब 22 वर्ष गुजर गए। झारखण्ड सरकार भी आती-जाती रही। फिर भी पुरखों का सपना अधूरा ही रह गया। कहा गया कि जब अपनी सरकार होगी, तो अपने लोगो पर नौकरियों की बहार होगी। पुरखों की मनोकामना अवश्य पूरी होगी। अब वादा करने वालों की इच्छा तो पूरी हो गई। सरकार बने ढाई वर्ष भी बीतने को है। पर अब आदिवासी-मूलवासी को अपने ही घर में भोजपूरी बोलने के लिए मजबूर किया जा रहा है। साथ ही झारखण्ड सरकार की नौकरियों पर बाहरी लोगों की बहार हो रही है। जब अपनी सरकार में यह हाल है, तो आखिर आदिवासी-मूलवासी जाएं तो कहां जाएं? इस हालात में 1932 खतियान न करें तो क्या करें? आप बताओ। काश! आज अंग्रेज जीवित होते!
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