पोते के नाम पत्र
मानव समाज में चिट्ठी लिखने की परंपरा बहुत पुरानी है। इस परंपरा से कोई अछूता नहीं। चिट्ठी की कई प्रजातियाँ हैं; यथा सरकारी, गैर-सरकारी एवं निजी। कई तरह से चिट्ठियाँ लिखने का प्रचलन है। बच्चों के चाचाजी ने भी अपनी पुत्री के नाम खत लिखा था। उसने यह पत्र किसी काल कोठरी से लिखा था। पर आपका परदादा फूस के नीचे खटिया पर पड़े-पड़े आपको यह अंतिम पत्र लिख रहा है, वह भी ठीक अपनी अंतिम श्वास लेने से पहले। यह कोई पत्र नहीं है, यह तो आपके परदादे के जीवन-दर्शन का अंतिम निचोड़ है। आपको यह पत्र लिखकर कोई गुनाह तो नहीं किया है? खैर, जिस काल में यह पत्र आपके नाम लिखा गया था, उस दौरान खत लिखने की परंपरा ही अपनी अंतिम साँस ले रही थी। दुनिया के वैज्ञानिकों ने द्रुतगामी से संदेश पहुँचाने के लिए तब नई विधि ईजाद कर ली थी, दूरभाष, घुमंतूभाष, एसएमएस और ई-मेल आदि। अब तो विज्ञान ने यहाँ तक प्रगति कर ली है कि बात करने वाले एक दूसरे का खोपड़ा भी आसानी से देख सकते हैं। आपका जमाना इस विधि को छोड़ वार्त्ताकार स्वयं एक दूसरे से ई-मेल से भी कम समय में मिल सकने की तरकीब निकाल लेंगे। कितनी बार मैंने आपके पिताजी को आगाह करते रहा कि सावधान! आपके गाँव-घर में आग लग चुकी है। इसे बुझाने का कोई उपाय ढूँढ़ों। पर उन्होंने मेरी सलाह को सिरे से ही खारिज कर दिया था। अब और पत्र लिखने की मेरी हिम्मत नहीं बची है। कब मैं भगवान का प्यारा बन जाऊँ, मुझे भी नहीं मालूम। अतः आपके नाम यह मेरा आखिरी पैगाम समझो। आप यह खत न समझना पर इसे तार समझना। चूँकि तार का उपयोग हमेशा दुःख की घड़ी में ही हुआ करता था। यह बहुत बड़ी विडंबना ही होगी कि इस पत्र को आप तक सुपुर्दगी होने में करीब पाँच सौ वर्ष तक का सफर तय करना होगा। आप इसे पढ़ पाओगे, मुझे संदेह है। दुनिया के किसी कोने में यह खत मिले या न मिले पर संपादक जी के पाँचवें गोदाम में यह आपके लिए सुरक्षित रखा रहेगा। रिवाजानुसार खत सिर्फ जीवित लोगों को ही लिखा जाता है। पर यह आठवाँ आश्चर्य ही होगा कि एक परदादे ने अपने भावी पोते के लिए एक दुःखभरी दास्तान लिख छोड़ी है।
यह जानकर आपको अति प्रसन्नता होगी कि मैं ही आपका एकमात्र बदनसीब परदादा हूँ; जिसने इस ममतामयी पत्र की माला को गूँथने की चेष्टा की है। दूध का दूध और पानी का पानी न्याय कर सको, अतः मैंने इस खत को लिखने का दुःसाहस किया हैै। बताते चलूँ कि पत्र लिखते वक्त यहाँ चंद्रग्रहण हो रहा है। आशा है आप लोग तब सूर्यग्रहण झेल रहे होंगे। आज मुझे मालूम नहीं क्योंकर खत लिखते समय मेरा हाथ काँप रहा है। गला सूखता जा रहा है। मस्तिष्क में अनगिनत अच्छे-बुरे विचार कौंध रहे हैं। आगे नाथ न पीछे पगहा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। फिर भी ताकि आपका शोध-पत्र तथ्य पर आधारित हो; अतएव मैंने सोचा कि इस पत्र के माध्यम से आपके लिए एक सत्य की गठरी छोड़ जाऊँ। इस खत में जो कुछ भी लिखा जा रहा है, वह सच्ची घटना पर आधारित है। मनगढ़ंत व कपोल कल्पना जैसी कोई भी चीज इस पत्र में वर्णित नहीं है। मुझे अच्छी तरह मालूम है कि आप मुझे एक बार नहीं हजारों बार दोषी ठहरा रहे होओगे। यहाँ तक कि मेरी अस्थियों को फाँसी के तख्ते पर लटकाने के लिए भी उतावले हो रहे होंगे। पर करुँ भी तो क्या करुँ? मैं भी वक्त का मारा हूँ। समय के थपेड़ों ने मुझे अधमरा कर दिया है। आपकी दशा का ख्याल आते ही मैं जी भरकर रो पड़ता था। और मेरे आँसूओं की बूँद स्याही बनकर मेरी लेखनी को ताउम्र मदद करती रही। लेकिन एक बात का ध्यान रखो। जिस दुःख से सिदो-बिरसा परेशान थे, जिन कारणों को लेकर मारांग गोमके व दिसोम गुरु ने आंदोलन किया, आज हम भी उन्हीं कारणों से पीड़ित हो रहे हैं। और आशा है आप भी उसी दुःख से ही दबे रहोगे। अर्थात् दुःख के अंतराल में कोई ज्यादा परिवर्तन नहीं होगा। आसमान से गिरे तो खजूर पर अटक गए।
कहा जाता है; पुरखे हमारे शहीद होते रहे हैं। किसी को घोड़े की चंवार से बाँधकर तब तक घसीटा गया जब तक कि उनके प्राणपखेरु उड़ नहीं गए, तो किसी को अपने ही जन्मस्थल में फाँसी दी गई और तो और किसी को तो जहर का प्याला पीने के लिए भी मजबूर किया गया। जिस किसी ने भी अन्याय के विरुद्ध मुँह खोला, उसकी बोलती सदा-सदा के लिए बंद कर दी गई। पुरखों के बलिदानस्वरुप हमने कुछ दिन सीएनटी और एसपीटी एक्ट का लुत्फ उठाने का असफल प्रयास किया। पर यह वही साबित हुआ, जिसे हाथी के दाँत दिखाने के कुछ और खाने को कुछ कहते हैं। बलि का बकरा कब तक खैर मनाता? जगह-जगह उनकी बपौती जमीन पर कल-कारखाने बैठा दिए गए। बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण हुआ। वे कुशल कारीगर तो थे नहीं; अतः उन्हें चतुर्थ श्रेणी की नौकरी से भी वंचित कर दिया गया। वे बेचारे भूमिपुत्र विस्थापन के जाल में फँसते चले गए थे। वे रोजगार की तलाश में असम, अंडमान और महानगरों की ओर कूच कर गए। आरक्षण मिलने लायक आबादी न रही। सरल, सीधे और सत्यवादी भूमिपुत्र अपने ऊपर हो रहे अत्याचार का सामना करने में विफल रहे। हमेशा उनके मुखवृंद से भगवान देखता है का सुवचन निकलता था। किन्तु कोई भी भगवान उसे बचाने नहीं आया। क्यों आता? यहाँ तो यह उक्ति चरितार्थ हो रही थी; भगवान भी उसी की मदद करता है, जो अपनी मदद स्वयं करता है।
मुगलों के बाद दो सौ वर्षों तक देश अंग्रेजों का गुलाम रहा। आजादी की लड़ाई छेड़ दी गई और अंततः सन् 1947 ई. में अंग्रेज देश छोड़कर चले गए। पर झाड़ जंगल में काले अंग्रेजों का साम्राज्य बढ़ता गया। उनके फन कुचलने के लिए आँधी-तूफान की तरह झाड़ जंगल में मारांग गोमके का उदय हुआ। सदियों से दबाए गए लोगों ने अपने बीच एक ऐसा गरीबों का मसीहा पाकर बहुत आनंदित हो उठे। गरीबों ने कुछ हद तक राहत की साँस ली। लोग उनसे जुड़ते गए एवं कारवां बनते गया। मारांङ गोमके जहाँ भी जाते, उन्हें सुनने के लिए ऐसी भीड़ जमा होती, जो न अब तक इकट्ठी हुई थी और न ही भविष्य में ऐसी भीड़ कभी इकट्ठा होने की उम्मीद है। उनकी सभा में शामिल होने के लिए लोग भूखे-प्यासे कई सौ मील तक का सफर पैदल ही तय करते। मुर्गे की बांग ने लोगों को गहरी नींद से जगा दिया था। लोगों में जागरुकता नाम का जीव प्रवेश कर गया था। फिर क्या था? जहाँ देखो मुर्गा छाप, वहीं लगाओ मोहर आप चरितार्थ हो गया। इस तरह मारांङ गोमके ने तैंतीस विधायकों को बिहार विधान सभा में भेज दिया। इस प्रकरण से कुछ हुआ कि नहीं यह तो ज्ञात नहीं पर यह सर्वविदित है कि लोगों के मन मंदिर में एक ऐसी ममतामयी भावना जाग उठी, जिससे लोग इस कदर ग्रसित हो गए कि यह भावना भुलाए न भूली। अपने लिए अलग झाड़ जंगल प्रदेश की माँग ने लोगों की नींद हराम कर रखी थी। उठते, बैठते, सोते आँखों के सामने सिर्फ और सिर्फ अलग प्रदेश ही दिखाई दे रहा था; क्योंकि अलग प्रदेश मूर्छितों की एकमात्र संजीवनी बूटी थी। मुर्गे की कुकड़ुकूं से सारी जनता अति प्रसन्नचित्त थी। पर हाय री अभागिन जनता! एक दिन उन्हें पता चला कि मारांग गोमके और उनके सहयोगियों ने उस मुर्गे को ही चखना कर दिया था। और इस तरह मारांङ गोमके देश के प्रथम प्रधानमंत्री की गोद में जा बैठे। मारांङ गोमके राजनीति छोड़ एक किसान बन गए। जिसे वह हल में जोतने हेतु जोड़ा बैल बन गए। मारांग गोमके द्वारा खरीद-फरोख्त की यह एक ऐसी बेसुरी परंपरा स्थापित की गई कि बाद के नेता भी इनके पदचिह्नों का अनुसरण करते नहीं अघाते थे।
मारांङ गोमके के अस्त होने के बाद झाड़ जंगल में एक बहुत बड़ी रिक्तता पैदा हो गई। लगा, मानो लोगों को साँप सूँघ गया हो। कहीं से कोई चूँ तक की आवाज न आई। इस रिक्तता की पूर्ति हेतु फिर आया तेज हवा का एक झोंका। एक मुट्ठी चावल और एक रुपया का कमाल देखिए कि वह कुछ ही दिनों में साढ़े तीन करोड़ में परिणत हो गया। लोगों ने उन्हें सिर आँखों पर बैठा लिया था। लोगों ने अपनी ममतामयी भावना को गिरवी रख दिया। तीस वर्षों तक उन्हें राज करने का मौका दिया गया। इस दौरान कुछ हासिल हुआ कि नहीं यह तो मालूम नहीं। लेकिन उन्हीं की सहमति से एक देश लूटा गया। हुल में शहीदों के खून से लिखा गया उपझारखण्ड नीलाम हो गया। एक के बदले अब वह छह टुकड़ों में विभाजित हो गया। प्रशासनिक दृष्टिकोण से चाहे वह सौ टुकड़ों में बाँट दिया होता पर उनका नामकरण तो अपनी संस्कृति की पहचान पर आधारित होता। पर ऐसा संभव न हो सका। इस तरह खून की नदी से सिंची गई धरती भी परायी हो गई। वह सदैव तारे तोड़ने का वादा करने वाले, लोगों की आँखों में धूल झोंकने में कामयाब हो गया। मारांग गोमके और दिसोम गुरु दलितों के सर्वमान्य नेता रहे हैं। दोनों ही महान क्रांतिकारी थे; इसमें कोई दो राय नहीं। पर क्यों कांग्रेस में विलय और साढ़े तीन में बिकने की घटना घटी? इस प्रश्न का उत्तर अब तक कोई दे न सका। निश्चित तौर पर लगता है; दोनों नेताओं के पास दूरदृष्टि, स्पष्ट विचारधारा और अच्छे दर्शन की कमी थी। और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि रातोंरात एक झाड़ जंगल प्रदेश का सृजन भी हो गया था। इस प्रदेश सृजन के पीछे भी एक बहुत बड़ा रहस्य छिपा हुआ है। दो की लड़ाई में तीसरे का फायदा हुआ। तीसरा असहाय और दरिद्र था। संक्षेप में आपको बता दूँ कि यह तो वही बात हो गई कि रातोंरात एक भिखारी को मर्सीडिज कार की भेंट दी गई। अब भिखारी कार को सुबह-शाम देखे, चाटे या सूँघे? कुछ भी करे, यह तो वो जाने और उसका काम जाने। पर भिखारी अब दूर से ही टुकुर-टुकुर उस मर्सीडिज कार को निहारने में तल्लीन है। मर्सीडिज को चलाने के लिए उस भिखारी के पास न तो तेल है और न ही तेल लेने के लिए जेब में पैसे। पानी से आखिर गाड़ी भी तो नहीं चल सकती। रखे-रखे मर्सीडिज अब सड़ने के कगार पर खड़ी है।
मेरे प्रिय पोते! कहीं धोखे में न रहना कि आपके परदादे अनपढ़ और गंवार थे। यह सच है कि देश आजाद होने तक गाँव में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या नगण्य थी। पर इसके पूर्व अंग्रेजों से लोहा लेने वाले तिलका मुर्मू, सिदो मुर्मू एवं बिरसा मुंडा ने कौन से विश्वविद्यालय से कौन-सी डिग्रियां ली थी, जिसे अंग्रेजों को लोहे का चना चबवाया था? ये महान नेता अंगूठा टेक थे। इन्होंने किसी स्कूल का दरवाजा न देखा था। फिर भी इन्होंने अंग्रेजों को छठी का दूध पिलाया था। और इनके आंदोलन के फलस्वरुप संताल परगना एवं छोटानागपुर का जन्म हुआ था। जहाँ कहीं भी समाज उन्नति की बात होती, लोगों ने सर्वसम्मति से मान लिया था कि शिक्षा ही विकास की एकमात्र कुंजी है। बगैर शिक्षा उन्नति करना कोरी कल्पना ही होगी। अतएव प्रदेश में सरकारी, गैर-सरकारी एवं अर्द्धसरकारी विद्यालयों की बाढ़ आ गई। देश आजाद होने के साठ वर्ष में कोई ऐसा गाँव न रहा, जहाँ कोई स्नातक न हुआ हो। बालक-बालिकाएँ ओले की तरह पढ़ लिखकर बादलों से बारिश के रुप में दनादन गिर रहे थे। लेकिन यह क्या? विद्यार्थियों के मस्तिष्क में मीठे फल के बीज बोए जा रहे थे, लेकिन फल आ रहे थे कड़ुवे। बच्चों को अमीर बनने की सिखावन दी जा रही थी; पर बन रहे थे रंक। स्वर्ग जाने का रास्ता बताया जा रहा था; पर जी रहे थे नरक में। ऐसा क्यों? समाज की माली हालत अब बद से बदतर होती जा रही थी। कोई ऐसी समस्या न बची; जिससे लोग पीड़ित न हों। उन्नति के बारे समाज के ठेकेदारों की अलग-अलग दलीलें थीं। राजनीतिज्ञ अपने लिए वोट को ही समाज प्रगति का एकमात्र नुस्खा बताते। धर्मगुरु इस दुनिया के बारे न बताकर परलोक की बात करते। समाज सेवक गाँव का आँकड़ा लेकर सिर्फ कागजी घोड़ा दौड़ा रहे थे। और तो और सरकारी संपत्ति, किसी की संपत्ति नहीं चरितार्थ हो रहा था। सरकारी तंत्र लूट-खसोट का अड्डा बन गया था। सरकार का मतलब मूर्खों का, मूर्खों द्वारा, मूर्खों के लिए।
किसी दार्शनिक ने बिल्कुल सही कहा है कि कोई भी शिक्षा कभी निष्क्रिय नहीं रह सकती। या तो यह मुक्त करती है अथवा दास बनाती है। दबंग समाज द्वारा शिक्षा का पाठ्यक्रम इस तरह तैयार किया जाता है कि हम दास व गुलामी खटने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
मेरे प्रिय पोते! अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि हम और आप चाहे लाख यत्न कर लें। हमें रेड इंडियन बनने से कोई रोक नहीं सकता। इसमें दोष उनका नहीं, सौ फीसदी गलती हमारी ही है। पत्र मिलने तक आप "लाल भारतीय" के रुप में परिणत हो चुके होंगे। ढेर सारे आशीर्वाद सहित पत्रांत करता हूँ।
