बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी?
कहा जाता है कि चिंता चिता समान है। अत्याधिक चिंता करने से अच्छी-भली सेहत भी बिगड़ सकती है। जो व्यक्ति ज्यादा चिंतित रहता है, वह उस चिंता रुपी चिता में जलकर भस्म हो जाता है। लेकिन आज मंगरु तो केवल सोच ही रहा है। सबसे पहले वह अपनी सोच में बदलाव लाना चाहता है। चूँकि सोच बदलना ही उन्नति की पहली सीढ़ी है। वह अपने समाज का गहराई से विश्लेषण कर रहा है। वह कोई अपनी व्यक्तिगत समस्या से थोडे़ ही न चिंतित है। अगर वह चिंतित भी है, तो वह अपने सुनहरे समाज को देखकर चिंतित है! वाह रे आदिवासी समाज! मंगरु देख रहा है; किस तरह आदिवासी लोग आत्महत्या कर रहे हैं। ठीक उसी तरह; जैसे पहली बरसात के समय बिजली के खंभे पर जल रहे बल्ब की रोशनी की ओर आकर्षित होकर कीड़े-मकोड़े अपने आप जलकर मर-मिटते हैं। इस भूमंडलीकरण के युग में आदिवासी आधुनिकता के बहाव में बह गए। वे अपने आदिवासी मूल्यों को त्याग कर किस तरह चमगादड़ बनने की कोशिश में जुट गए हैं। और जैसे कि आपको मालूम है; चमगादड़ न तो जानवर है और न ही पक्षी। उसी तरह मंगरु को डर है, कहीं आदिवासी भी धोबी के कुत्ते की तरह न घर का और न ही घाट का रह जाएगा। घड़ी के पेंडुलम की तरह वह झूलता ही रह जाएगा। मंगरु सोच रहा है; आखिर लोग दुःखी क्यों होते हैं? अनुभव के आधार पर मंगरु का मानना है कि लोगों को अपने आप से संतुष्ट होना सीखना चाहिए। क्योंकि अक्सर लोग, जो कुछ अपने पास उपलब्ध है, उससे खुश नहीं होते; पर जो दूसरों के पास है, उसे देखकर दुःखी होते हैं। उसी तरह दूसरों के पास जब कोई चीज नहीं होती है अर्थात् जब दूसरे लोग दुःखी होते हैं, तो वह खुश होता है। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहोगे?
आज मंगरु सोचने में कुछ ज्यादा ही व्यस्त हो गया है। कब दिन निकला, कब दोपहर हुई और कब शाम ढल गई, कुछ पता भी न चला। वह अच्छी तरह जानता है; उसकी सोच के फलस्वरुप निकली छोटी सी रश्मि भी अगर समाज को थोड़ी दूर तक ही सही, कोई रास्ता दिखाने में कामयाब हो सके, तो वह अपने मनुष्य जन्म को सफल मानकर, इस दुनिया से विदाई लेने में उसे थोड़ी-सी वेदना भी नहीं होगी। उसे किसी तरह का कोई गिला शिकवा भी नहीं रहेगा; परंतु उसे आनंदपूर्वक परलोक सिधार जाने में परम संतुष्टी होगी।
हमने पिछले अंक में राजनीति के बारे मंगरु की थोड़ी-सी सोच को जाना। हमारे कुछ मित्रगण, राजनीति को ही सभी समस्याओं का एकमात्र समाधान मानते हैं। वे भी उस ग्वाले की भाँति अपने दही को खट्टा मानने से ही इनकार करते हैं। कुछ भी हो, मंगरु के अनुसार राजनीति का अखाड़ा एक मंदिर के समान है। जहाँ सिर्फ स्वर्ग की ही बातें होती हैं। वहाँ दूध का दूध और पानी का पानी न्याय होता है। लेकिन जरा देश-दुनिया की राजनीति को देख लो; वह हमें कहाँ ले जाना चाहती है, भगवान ही मालिक है। खैर, मंगरु की सोच का दायरा सिर्फ झारखण्ड तक ही सीमित है। अतएव मंगरु आगे सोचता ही चला जा रहा है। राजनीति के अखाड़े में अंदर क्या होता है; मंगरु को इस बारे कुछ भी नहीं मालूम। पर उस राजनीति के फलस्वरुप जो फल उग आते हैं, उसे चखकर वह बता सकने में जरुर काबिल है कि फल मीठा है कि खट्टा। मारांङ गोमके से लेकर दिसोम गुरु तक की राजनीतिक घटनाओं को वह माइक्रोस्कॉप के जरिए देखकर, उसकी जाँच पड़ताल करने में जुटा हुआ है। इस दौरान हमने क्या पाया, क्या खोया विश्लेषण कर रहा है। राजनीतिक मंदिर के पुजारियों ने हमें कौन से गुल खिलाए हैं, मंगरु जानने की कोशिश कर रहा है। पर मंगरु को खाक कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। मस्तिष्क पर जोर देते हुए, वह राजनीतिक उठा-पटक को गहराई से खंगालने की चेष्टा कर रहा है। पर हवा की तरह कुछ पकड़ में ही नहीं आ रहा। काफी देर मंथन करने के बाद, उसे लगा कि देश आजाद होने के बाद से अभी तक झारखंड की राजनीति में काफी उथल-पुथल हुआ है। झारखण्ड की राजनीति आदिवासियों को केन्द्रबिन्दु मानकर ही संपन्न होती रही है। पर बेचारे आदिवासी! अभी तक वे प्रयोगशाला की सामग्री बनकर ही रह गए हैं। झारखंडी राजनीति को कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है। फुटबॉल या हॉकी खेल से आप अच्छी तरह परिचित होंगे। इस मैच में टीम कप्तान चाहे मारांग गोमके, लालबाबू, मुंडा, कोड़ा, हो या गुरु जी; सभी ने अब तक एक बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया है। पर उस उत्कृष्ट खेल का क्या फायदा, जब उनकी टीमें एक भी गोल करने में विफल रही हों। अतएव स्पष्ट रुप से कहा जा सकता है कि किसी मैच में विजयी घोषित होने के लिए गोल नितांत जरुरी है। मैच देखकर लगता है; कहीं हमारी टीम ही गोल खाकर मुँह लटकाए तो नहीं बैठी है? कुछ भी हो। इतना निश्चित है कि हमारी टीम ने कभी गोल नहीं दागा है। हो सकता है प्रतिद्वंदी टीम ने हमारे ऊपर ही दनादन गोल किए हों? इसके बारे आप ही ज्यादा जानकार हैं। इतने दिनों से इतना बढ़िया मैच खेलने के बावजूद भी गोल न कर सकना ही साबित करता है कि राजनीति भी एकमात्र समाधान नहीं है।
मंगरु सोच-सोचकर अत्यंत दुःखी हुआ जा रहा है। फिर क्या हो समस्या का सही समाधान? वह गहरी चिंता में डूब गया है। मंगरु नास्तिक तो नहीं पर असली आस्तिक भी नहीं बन पाया है। वह भगवान को ढूँढ़े जा रहा है; पर अब तक तो उसके साथ मुलाकात संभव नहीं हो पाई है। कब होगी उसकी भेंट, उसे कुछ नहीं मालूम। सोचता है; जो कुछ भी उसके साथ हो रहा है, कभी वह इसके लिए उसे ही जिम्मेवार ठहरा रहा है। वह अपने दिमाग पर जोर देते हुए भगवान पर ही लांछन लगा देता है। वह पूछना चाहता है; हे भगवान, तूने क्या हमारी सृष्टि यही दिन देखने के लिए ही की है? क्या हमारे भाग्य में सारी उम्र गुलामी की जिंदगी जीने के लिए ही लिख दी गई है? क्या हमारे नसीब में दर-दर की ठोकरें खाना ही दर्ज है? हे परमपिता परमेश्वर! तू तो दयासागर है। तू तो दयानिधि है। कहाँ गई आपकी वह दयालुता? कहाँ गई आपकी वह स्नेह और दयामयी ममता? तुम तो चालाकों के चालाक ठहरे! आकाश, पाताल और धरती का सृजन करने के बाद ऐसा छूमंतर हो गया कि आपको ढूँढ़ने के लिए हमें चर्च, मंदिर, गुरुद्वारा, मस्जिद आदि के निर्माण करने पड़े। फिर भी न तो आप दिखते हो और न ही सुनते हो। कोई भी दुखियारा कितना भी रोए-पीटे, गिड़गिड़ाए; न तो तू उसे सुनता है, न तो दर्शन देता है और न ही उसे सांत्वना भरी कुछ बातें ही करता है। कैसा भगवान है तू? किस मिट्टी का बना है तू? इतना कुछ भगवान पर इल्जाम लगाने के बाद, मंगरु ठंडे दिमाग से सोचने के लिए मजबूर हो गया। अत्यधिक पीड़ा के कारण उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। वह ओछेपन पर उतार आया। गुस्से से आदमी पागल भी हो सकता है। खैर, इस दौरान सोची गई बातों पर उसे पछतावा हो रहा है। उसे अब समझ में आ गया है कि कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली। कहाँ भगवान और कहाँ मंगरु? उसे अपने किए पर पछतावा हो रहा है। उसे यकीन हो चला था कि इस संसार को चलाने वाला कोई न कोई तो होगा ही। ईश्वर, अल्लाह कुछ भी कह लो; कोई तो इस जग का मालिक होगा ही। संसार को चलाने के पीछे कोई न कोई ताकत, कोई शक्ति तो अवश्य होगी ही। एक तुच्छ प्राणी की यह कैसी हिम्मत की वह ब्रह्मांड के सृष्टिकर्ता पर ही उँगली उठाए; जिसने पूरे मानव समुदाय के साथ-साथ जग के सारे सजीव और निर्जीव पदार्थों की रचना की है। जिसने आकाश में चाँद, तारे और सूर्य को टाँग दिया है; इनका कोई न कोई सृष्टिकर्ता तो होगा ही। उसके अंतःमन में ज्ञान की एक छोटी सी ज्योति जल उठी थी। उसके मन में एक छोटा सा दिव्यप्रकाश जल उठा था। वह समझ गया था कि भगवान इतना बेवकूफ नहीं। भगवान ने सृष्टि के द्वारा अपने सारे रहस्य को बताने की पूरी चेष्टा की है। बस, उसे समझने की देर है। जो उसकी लीला को समझ सकता है, वही ज्ञानी है। धीरे-धीरे वह भगवान की अपरंपार महिमा को समझने की कोशिश कर रहा है। अंत में वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि कहीं हमारा समाज शरीर की तरह तो नहीं है? हमारे समाजशास्त्री ही किसी धोखे में अवश्य होंगे। महान दार्शनिक अरस्तु कुछ भी कहता रहे कि व्यक्ति के समूह को ही समाज कहा जाता है। फूल व्यक्ति है, तो माला समाज। और जो व्यक्ति समाज के अंदर नहीं रहता; वह या तो देवता है और नहीं तो भूत। ऐसी परिभाषा मंगरु तो क्या बड़े-बड़े समाजशास्त्रियों की समझ से परे की बात है। समाज क्या है; कुछ समझ में नहीं आ रहा। अतएव काफी गहन चिंतन के पश्चात् मंगरु अपने समाज की तुलना किसी शरीर के साथ कर रहा है। मानव देह से उसकी तुलना कर रहा है। समाज एक शरीर की तरह है। जिस तरह शरीर का हरेक अंग महत्वपूर्ण है; उसी तरह समाज का हरेक प्राणी महत्वपूर्ण है। शरीर के किसी भी अंग की अहमियत तुच्छ नहीं गिनी जा सकती। शरीर की एड़ी से लेकर चोटी तक के संपूर्ण हिस्से महत्वपूर्ण हैं। नाखून से लेकर बाल तक सभी जरुरी अंग हैं। अगर कोई भी अंग बीमार हो जाए, तो पूरा शरीर ही चरमरा जाता है। शरीर के किसी भी अंग पर छोटी सी चुभन लग जाए, तो पूरा शरीर ही सिहर उठता है। हो सकता है हाथ, पैर, आँख, कान, नाक, दाँत, दिमाग आदि शरीर के महत्वपूर्ण हिस्से हों; पर अगर सिर में एक भी बाल न हों तो मनुष्य की सुंदरता में बट्टा ही लग जाता है। कहने का तात्पर्य यही कि शरीर के किसी भी अंग को कम नहीं आँका जा सकता है। सारे अंग ही महत्वपूर्ण हैं और वे अपने-अपने तरीके से ही अपने सारे काम को अंजाम देते रहते हैं। अतः मंगरु से लेकर दिसोम गुरु तक सभी समाज के अभिन्न अंग हैं। अपनी-अपनी जगह वे सारे महत्वपूर्ण हैं। हो सकता है; समाज में कोई किसान, मजदूर, रेजाकूली, विद्यार्थी, नौकर, व्यापारी, बुद्धिजीवी, लेखक, समाज सेवक, याजक, राजनीतिज्ञ आदि हों; वे सारे ही एक दूसरे के पूरक हैं। जिस तरह पूरा शरीर स्वस्थ हो पर आँख ही न हो, तो वह व्यक्ति अंधा कहलाता है। उस अंधे को चलने-फिरने में किस तरह की तकलीफ होती होगी, उसे आप अच्छी तरह समझते हो। उसी तरह कोई समाज ठीक-ठाक हो, पर उस समाज में कोई लेखक ही न हो, तो वह समाज भी अंधा ही कहलाता है। शरीर के हाथ-पैर समाज के किसान-मजदूर तुल्य हैं। और अगर दिमाग की तुलना राजनीतिज्ञ से की जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। अतः स्पष्ट हो गया कि हमारे समाज की बनावट भी किसी शरीर की तरह ही है। शरीर के किसी भी अंग में दर्द हो, तो पूरा शरीर ही बीमार हो जाता है। उसी तरह समाज में किसी भी वर्ग को चोट लग जाए, तो पूरा समाज ही बीमार हो जाता है। अतः शरीर के सारे अंग सही, तो शरीर स्वस्थ। उसी तरह समाज के सारे वर्ग ठीक, तो पूरा समाज ही स्वस्थ समाज कहलाता है।
मंगरु को समाज का इस तरह विश्लेषण करते हुए काफी देर हो चली थी। गहन विश्लेषण के उपरांत जो निष्कर्ष निकला; काफी मंथन करने के बाद जो निचोड़ निकला, वह यही कि समाज की समस्याएँ कुछ और हैं और समाधान के रुप में कुछ और दवाएँ सुझाई जा रही हैं। अब तक समाज के रोग और औषधि में कोई मिलान नहीं हो पाया है। यही कारण है कि हमारा समाज स्वस्थ होने का नाम ही नहीं ले रहा। हमारे समाज सेवक भी उस ग्वाले की तरह अपने दही को खट्टा मानने से ही इनकार करते रहे हैं। उनकी दलील यही कि शरीर के हाथ-पैर ठीक तो पूरा शरीर ही ठीक। दिमाग सही तो पूरा शरीर ही सही। लेकिन ऐसा नहीं है। अगर शरीर के किसी भी अंग पर दर्द हो, तो पूरा शरीर ही बीमार हो जाता है; इस कड़ुवे सच को कोई नकार नहीं सकता है।
अतः हमारे समाज के शुभचिंतकों की हालत भी उन अंधों जैसी तो नहीं, जिन्होंने हाथी के किसी एक भाग को छू लेने भर से ही हाथी के वास्तविक हुलिया के बारे ऊटपटांग घोषणा कर दी। जिस अंधे ने हाथी की पूँछ पकड़ ली, उसने कह दिया कि हाथी रस्सी जैसा है। जिसने पैर छू लिया, उसका दावा था कि हाथी किसी खंभे जैसा है। जिसने हाथी के कान पकड़ लिया, उसका कहना था कि हाथी का आकार सूप जैसा है। जिसने हाथी का पेट छू लिया, उसने सभी की दलील को धता बताते हुए ढिंढोरा पीट दिया कि हाथी किसी दीवार जैसा है। इस तरह जिस अंधे को हाथी के जो भी अंग छूने का मौका मिला, वह उसी अनुरुप हाथी के बारे अपनी गलत दलील देते गया। पर किसी भी अंधे ने हाथी के पूरे आकार को न तो ठीक से छू सका था और न ही वे हाथी के सही आकार को ही समझ पाने में सफल हुए थे। अतः कहीं हमारे समाज के शुभचिंतकों की स्थिति भी ऐसी तो नहीं, जो स्थिति उन बेचारे अंधों की बन गई है। मंगरु की यह अंतिम सोच ने उसे आसमान से लाकर पथरीली जमीन पर पटक दिया है। उसके चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगी थीं। और यह प्रश्न उसके मस्तिष्क पर हथौड़े की तरह बारंबार चोट किए जा रहा था कि उन बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी है?
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