बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी?
पिछले अंक में हमने शिक्षा के प्रति मंगरु की सोच को जान लिया है। किसी भी तरह की गलतफहमी में न रहें कि वह शिक्षा का घोर विरोधी है। अपितु उसका कहने का तात्पर्य यही है कि शिक्षा के साथ-साथ किसी श्रृंगार के रुप में अच्छे विवेक का भी वह तीमारदारी है; जिसे सोने पे सुहागा कहा जाता है। वह ऐसी शिक्षा हासिल करने का पक्षधर है, जिस शिक्षा से हमें मुक्ति मिल सके। वह ऐसी शिक्षा का समर्थक है; जिस शिक्षा से हमारी सभी तरह की गरीबी मिट सके एवं हम सदा उन्नति की राह पर आगे बढ़ते रहें। ऐसी शिक्षा का क्या औचित्य? जिस शिक्षा से हम गुलाम अथवा दास बनने के लिए मजबूर हो जाते हैं। बल्कि मंगरु पढ़-लिखकर मूर्ख बन जाने का घोर विरोधी है। प्रमाण देते हुए वह कहना चाहता है कि क्या आठ वर्षों से झारखंड में एक भी शिक्षित व्यक्ति का उदय नहीं हुआ है? क्या हमारे पास एक भी डिग्रीधारी उपलब्ध नहीं हैं? एक नहीं, हमारे पास हजारों डिग्रीधारी मौजूद हैं। पर उनकी शिक्षा पर हमें शक और संदेह है। यह अतिश्योक्ति नहीं कि जिस शिक्षा को उन्होंने ग्रहण किया, जिस शिक्षा ने उन्हें बड़ी-बड़ी डिग्रियों का हकदार बनाया; उस शिक्षा ने आखिरकार उन्हें अंत में पशुतुल्य बना दिया है। अच्छे और बुरे पहचानने के वे काबिल नहीं रहे। यही कारण है कि झारखण्ड गठन के बाद से आदिवासी मुख्यमंत्रियों के पदस्थापित होते रहने के बावजूद भी आज हमारी यह सुनहरी हालत हो रखी है!
मंगरु आज कब खाना खा रहा है, कब सो रहा है, उसे कुछ ध्यान ही नहीं। आज वह अपने समाज के प्रति चिंतामग्न है। लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर पहुँच पाना, उसे टेढ़ी खीर लग रहा है। मंगरु आगे विश्लेषण कर रहा है। सामाजिक बैठकों में शिक्षा के बाद सबसे ज्यादा चर्चा होने वाला विषय है; मद्यपान। बार-बार कहा जाता है कि नशे की लत ने हमारे समाज को बर्बाद करके रख दिया है। लोग पीने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं। शादी-ब्याह व पर्व-त्योहार के अवसर पर तो बात ही छोड़ दीजिए। आज रानू देवता हमारे गाँव.घर की चहार दीवारों को फाँदकर, बीच सड़क पर खड़े होकर अपना जलवा दिखा रहा है। झारखण्ड में ऐसा कोई हाट-बाजार नहीं बचा है, जहाँ खुलेआम हँड़िया-दारु की बिक्री न हो रही हो। कोई मेला, कोई सभास्थल, कोई सार्वजनिक स्थल ऐसा नहीं बचा है, जहाँ देसी शराब धड़ल्ले के साथ न बेची जाती हो। इस पर किसी तरह की कोई सरकारी रोक-टोक भी नहीं। सेल्स गर्ल के रुप में हमारी भोली-भाली बालाएँ ही इस धंधे में लिप्त दिखाई देती हैं। लगता है; मानो पूरा झारखण्ड ही ऑपेन बार में तब्दील हो गया हो। जिसमें खासकर हम आदिवासी उस बार में गोता लगाने में मशगूल हो गए हैं। बच्चे हों या बुड्ढे, सारे सोमरस का मजा लूटने में व्यस्त हो गए हैं। और इस तरह अत्यधिक नशे के फलस्वरुप हम शारीरिक व मानसिक रुप से कमजोर हो चले हैं। यहाँ तक तो बात जायज लगती है। दारु पीना कोई बुरी बात नहीं; लेकिन दारु हम सभी को पी डाले, यह कतई बर्दास्त नहीं। लेकिन सवाल उठता है; क्या आपने कभी दारुबाज के सामने यह सवाल उठाया है कि वह दारु क्यों पीता है? क्या कारण है कि वह हमेशा हँड़िया-दारु के साथ रहता है? बाँहों में बाँहें डाले वह उसके संग घुमता रहता है? शराब सिर्फ दो ही अवस्था में पी जाती है; एक खुशी और दूसरा गम को भुलाने के लिए। लेकिन हम आदिवासी किस कारण शराब को गले लगाए हुए हैं; इसका जवाब शायद सिंग बोंगा के पास भी उपलब्ध नहीं है। झारखण्ड को देखकर न तो हमें खुशी है और न ही गम। फिर भी हम शराब के इतने दीवाने क्यों हैं? इसकी जड़ तक पहुँचने के लिए मंगरु को शायद और भी वक्त की जरुरत है। लेकिन इस संबंध में मंगरु के मन में अनगिनत शंकाएँ उठ रही हैं। मंगरु को अच्छी तरह याद है; गुरु जी के आरंभिक काल में, आदिवासी समाज से नशापान को जड़ समेत उखाड़ फेंकने के लिए, उसने हँड़िया-दारु की बिक्री बंद करने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया। हुक्म हुआ कि अगर कोई पीने-पिलाने के धंधे में रंगेहाथ पकड़ा गया, तो उसे "दिल्ली रोड" दिखा दिया जाएगा। और कुदरत का करिश्मा देखिए कि उस हुक्म की जोरशोर से तामील की गई। लेकिन आम जनता पर इसका प्रतिकूल असर पड़ा। कहीं जगह न मिलने पर नशेबाजों ने गुदड़ी में पनाह लेनी शुरु कर दी। लोग चोरी-छिपे पर पहले की अपेक्षा और अधिक मस्त होकर पीने में लीन हो गए। परंतु आश्चर्य तो तब हुआ, जब गुरु जी के चेले दिन के उजाले में नशेड़ियों को दिल्ली रोड दिखा रहे थे, तो रात अँधेरे में वे स्वयं ही मस्त होकर दिल्ली रोड पर सरपट भाग रहे थे। अर्थात् उनके ही चमचे-बेलचे भयंकर दारुबाज निकले। हँड़िया-दारु उर्फ गुरु जी ने बिन माँगे जगप्रसिद्धि पा ली। इस तरह मद्यपान खत्म नहीं हुआ। परंतु यह दिन दुगुनी रात चौगुनी प्रगति के पथ पर आगे बढ़ता ही गया।
उदाहरण के तौर पर झारखण्ड से निकल कर एक ऐसे प्रदेश की ओर निगाह डालें, जहाँ हर गाँव में बिजली की व्यवस्था है और हर गाँव सड़क से जुड़ा हुआ है। यह एक कृषि प्रधान प्रदेश है; और यहाँ के निवासी काफी खुशहाल हैं। उस प्रदेश को आप हरियाणा के नाम से जानते हैं। कुछ वर्ष पहले की घटना है। तब हरियाणा में श्री बंसीलाल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुआ करते थे। प्रदेश की खुशहाली में चार चाँद लगाने हेतु बंसीलाल की सरकार ने प्रदेश में सौ फीसदी मद्यपान निषेध की घोषणा कर दी। हरियाणा में नशामुक्ति का सरकारी आंदोलन छेड़ दिया गया। पूरे प्रदेश में एक बूँद शराब की बिक्री नहीं हो सकती थी। इसका परिणाम क्या हुआ? होना क्या था; जो उपरवर्णित घटना गुरु जी के साथ हुई, वही घटना यहाँ भी दुहरा दी गई। पहले सौ की बोतल मिलती थी, अब अवैध रुप से उस बोतल की कीमत हजारों में पहुँच गई थी। इसकी विपरीत प्रतिक्रिया हुई; पहले लोग गिलास में पीते थे, अब लोग मग्गे में पीने लग गए। दुष्परिणाम यही कि जब विधान सभा का अगला चुनाव हुआ; तो शराब ने बंसीलाल की लुटिया ही डूबो दी। उसकी सरकार तो गई ही साथ में उसकी मिट्टी ऐसी पलीद हो गई कि वह मुँह छिपाने के लायक न रहा। कहने का तात्पर्य यही कि जहाँ भी मद्यपान रोकने की कोशिश की गई है; वहाँ बुरा हाल ही हुआ है।
मंगरु को आज यह तर्क समझ में नहीं आ रहा है। वह देख रहा है कि भोले-भाले आदिवासी तो सिर्फ घरेलू और सस्ती शराब का ही पान कर रहे हैं; पर अन्य शहरी लोग तो एक से एक बढ़िया और महंगी शराब का सेवन करते हैं। कोई भी बड़े-बड़े होटल, रेस्तरां, पब का नजारा देखिए, वहाँ शराब इस तरह परोसी जाती है; जैसे उसकी बिक्री मुफ्त में हो रही हो। फिर भी उनका कुछ नहीं बिगड़ रहा है। उसे यह भी ज्ञात है कि हमारे फौजियों को शराब से नहला देने का सरकारी नियम भी है। ऐसा क्यों होता है? कारण कुछ भी हो; पर आदिवासियों के संदर्भ में इतना अवश्य है कि यह हमारी संस्कृति से जुड़ी हुई प्रथा है। जबरन इस प्रथा को बंद नहीं किया जा सकता। हाँ, किसी भी चीज का अति होना हानिकारक है; इसमें कोई दो राय नहीं। जरुरत है तो सिर्फ इतनी कि हमें पीने की कला अवश्य सीखनी चाहिए। ध्यान रहे कि किसी भी कीमत पर हँड़िया हमें डकार न जाए। निचोड़ यही कि जो भी हमारे मद्यपान विरोधी मित्र हैं; उनसे आग्रह है कि वे जबरन हँड़िया-दारु की संस्कृति को बंद न कराए। क्योंकि मनोवैज्ञानिक कारण है कि जिस भी चीज को जितना भी छुपाने की कोशिश करोगे; उसे देखने के लिए मन में उतनी ही जिज्ञासा तीव्रगति से बढ़ती जाएगी। और यकीन मानो, लोग उस छिपी हुई चीज को देखने के लिए दूसरा अवैध रास्ता निकाल ही लेते हैं। लेकिन हमारे मद्यपान विरोधी मित्र, उस ग्वाले की भाँति इस तथ्य को समझने से ही इनकार करते हैं। वे तर्क देते हुए कहते हैं कि मद्यपान ही है हमारे समाज का पिछड़ने का एकमात्र कारण। अगर तत्काल शराबबंदी हो जाए तो हम क्षण भर में उन्नति की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए नजर आएंगे। लेकिन दोस्तो, अक्सर ऐसा होता नहीं है। दुनिया के ठंडे देशों में देखो, तो वहाँ पानी की तरह लोग शराब का सेवन करते हैं। और विडंबना यही कि वे हमसे कई गुना अधिक प्रगतिशील हैं। अगर शराब विनाश का कारण होता, तो वे बेचारे ठंडे देश के लोग कब के मर-खप गए होते।
दोपहर का खाना खा चुकने के बाद मंगरु फिर अपनी सोच को जारी रखे हुए है। सोचते.सोचते उसे लगा कि समाज की समस्याएँ तो अनेक हैं। किस.किसके बारे वह सोचे? कौन सी समस्या के लिए, कौन से समाधानों को वह सुझाए? काफी देर चिंतन करने के बाद मंगरु इस नतीजे पर पहुँचा कि समस्या तो सिर्फ दो प्रकार की होती है - व्यक्तिगत और सामूहिक। परिभाषा के रुप में अगर कहना चाहें तो व्यक्तिगत समस्या उसे कहा जाता है; जो निजी हो एवं उस समस्या के समाधान हेतु किसी बाहरी व्यक्ति की मदद की कोई आवश्यकता ही न हो। अर्थात् जिसका समाधान खुद को ही करना पड़े। इसके विपरीत; सामूहिक समस्या उसे कहा जाता है; जिस समस्या से पूरा समाज ही पीड़ित हो एवं जिसका समाधान एक व्यक्ति द्वारा संभव न हो। परंतु इस समस्या के समाधान के लिए पूरे समाज की जरुरत हो। फिर तो पेसा, परिसीमन ... आदि सामूहिक समस्याएँ हुईं? बिल्कुल। सामूहिक समस्याओं के समाधान के लिए आज हमारे पास कई सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाएँ कार्यरत हैं। इनके अलावे छोटे-मोटे कई क्लब, संस्था, संघ, दल वगैरह भी इस शुभ कार्य में हाथ बँटा रहे हैं। इनमें कुछ पंजीकृत हैं तो कुछ अपंजीकृत। और इन सभी दलों में से जो सबसे बड़ा दल है, जो हमारे देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ है; वह राजनीतिक दल किसी भी सामूहिक समस्या के निदान के लिए अनवरत कार्यरत है। अतएव क्यों न राजनीति के बारे थोड़ी-सी चर्चा की जाए।
राजनीति अर्थात् ऐसी नीतियों का निर्धारण करना, जिन नीतियों व नियमों के तहत जनता पर शासन किया जा सके अर्थात् राज्य चलाया जा सके। राज दरबार में बैठकर ऐसी नीति बनाना जिससे जनता/प्रजा की भलाई हो सके। और इस नीति को बनाने के लिए जिसे भी उत्तरदायित्व सौंपा जाता है, उसे राजनीतिज्ञ या विशुद्ध रुप से आधुनिक भाषा में उन्हें सांसद या विधायक कहा जाता है। देश, प्रदेश व समाज की उन्नति या अवनति के लिए बहुत हद तक राजनीति को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। छोटी-मोटी कोई भी गैर-सरकारी संस्थाएँ अपनी सोच को दर्शा सकती हैं; पर नियम व कानून बनाने का हक तो सिर्फ राजनीतिज्ञों को ही है। अतः कहा जा सकता है कि राजनीति का अखाड़ा (विधान सभा/संसदद्) एक मंदिर के समान है और सांसद या विधायक उस मंदिर के पुरोहित व पुजारी होते हैं। अतः सिद्ध हो गया कि राजनीति एक धार्मिक स्थल है। यहाँ पुण्य के अलावे और किसी तरह के गलत धंधे को अंजाम देना सख्त वर्जित है। लेकिन अभी तक हमें जिस शिक्षा का घूँट पिलाया गया है; उस घूँट में राजनीति को हमेशा ही बुरी नजर से देखने की हिदायत दी गई है। राजनीति एक गंदा खेल है का कुपाठ हमें पढ़ाया गया है। राजनीति से दूर-दूर तक भी रिश्ते जोड़ने की मनाही है। मंगरु इस तर्क को समझने में आजतक सौ फीसदी विफल रहा है। जिस मंदिर में सिर्फ स्वर्ग जाने का ही रास्ता बताया जा रहा हो, उसे आजतक हमने जाने अनजाने नरक की संज्ञा दी हुई है। उस मंदिर की पूजा-अर्चना में शामिल होना तो दूर, उस ओर झाँकने तक भी मनाही है। जिस मंदिर में हमारे भाग्य और तकदीर का फैसला होता हो, उस स्थल को अभी तक हमने कूड़ेदान समझकर तिरस्कृत किया हुआ है। ऐड्स की तरह पॉलिटिक्स की पी तक को छूने नहीं दिया जाता है। कहा जाता है कि राजनीति गंदे लोगों का खेल है। इस खेल में जो अपराधी होता है, वही सफल होता है। इस तरह की भूलभुलैया के चक्कर में अच्छे और नेक इंसानों ने बुरे लोगों के लिए मंदिर जाने का रास्ता ही त्याग दिया है। यकीन मानो, इस प्रकरण में कसूरवार नेक इंसान ही हैं न कि अपराधी। थोड़ी देर के लिए कल्पना करो। मान लो, उस पवित्र मंदिर में किसी पुरोहित के बदले डाकू सुल्तान सिंह जैसे अपराधिक छवि वाले लोगों का कब्जा हो जाए, तो वहाँ का दृश्य कैसा होगा? उस भव्य मंदिर में अगर वास्तव में चोर-डकैत इकट्ठे हो जाएँ, तो यह निश्चित है कि वहाँ भजन-कीर्तन तो होने से रहा। बल्कि मारकाट और खून-खराबे की ऐसी भयावह स्थिति पैदा हो जाएगी कि आप सोच भी नहीं सकते। रोज अत्याचार, बलात्कार, भ्रष्टाचार और खूनी संघर्ष से उस मंदिर का तो सत्यानाश होगा ही, साथ ही श्रद्धालुओं का भी बेड़ा गर्क हो जाएगा। इस तरह सोचते-सोचते मंगरु की बंद आँखें खुल गईं। उसे लगा कहीं वह सपना तो नहीं देख रहा है?
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