Saturday, 7 February 2015

पोते के नाम पत्र

मानव समाज में चिट्ठी लिखने की परंपरा बहुत पुरानी है। इस परंपरा से कोई अछूता नहीं। चिट्ठी की कई प्रजातियाँ हैं; यथा सरकारी, गैर-सरकारी एवं निजी। कई तरह से चिट्ठियाँ लिखने का प्रचलन है। बच्चों के चाचाजी ने भी अपनी पुत्री के नाम खत लिखा था। उसने यह पत्र किसी काल कोठरी से लिखा था। पर आपका परदादा फूस के नीचे खटिया पर पड़े-पड़े आपको यह अंतिम पत्र लिख रहा है, वह भी ठीक अपनी अंतिम श्वास लेने से पहले। यह कोई पत्र नहीं है, यह तो आपके परदादे के जीवन-दर्शन का अंतिम निचोड़ है। आपको यह पत्र लिखकर कोई गुनाह तो नहीं किया है? खैर, जिस काल में यह पत्र आपके नाम लिखा गया था, उस दौरान खत लिखने की परंपरा ही अपनी अंतिम साँस ले रही थी। दुनिया के वैज्ञानिकों ने द्रुतगामी से संदेश पहुँचाने के लिए तब नई विधि ईजाद कर ली थी, दूरभाष, घुमंतूभाष, एसएमएस और ई-मेल आदि। अब तो विज्ञान ने यहाँ तक प्रगति कर ली है कि बात करने वाले एक दूसरे का खोपड़ा भी आसानी से देख सकते हैं। आपका जमाना इस विधि को छोड़ वार्त्ताकार स्वयं एक दूसरे से ई-मेल से भी कम समय में मिल सकने की तरकीब निकाल लेंगे। कितनी बार मैंने आपके पिताजी को आगाह करते रहा कि सावधान! आपके गाँव-घर में आग लग चुकी है। इसे बुझाने का कोई उपाय ढूँढ़ों। पर उन्होंने मेरी सलाह को सिरे से ही खारिज कर दिया था। अब और पत्र लिखने की मेरी हिम्मत नहीं बची है। कब मैं भगवान का प्यारा बन जाऊँ, मुझे भी नहीं मालूम। अतः आपके नाम यह मेरा आखिरी पैगाम समझो। आप यह खत न समझना पर इसे तार समझना। चूँकि तार का उपयोग हमेशा दुःख की घड़ी में ही हुआ करता था। यह बहुत बड़ी विडंबना ही होगी कि इस पत्र को आप तक सुपुर्दगी होने में करीब पाँच सौ वर्ष तक का सफर तय करना होगा। आप इसे पढ़ पाओगे, मुझे संदेह है। दुनिया के किसी कोने में यह खत मिले या न मिले पर संपादक जी के पाँचवें गोदाम में यह आपके लिए सुरक्षित रखा रहेगा। रिवाजानुसार खत सिर्फ जीवित लोगों को ही लिखा जाता है। पर यह आठवाँ आश्चर्य ही होगा कि एक परदादे ने अपने भावी पोते के लिए एक दुःखभरी दास्तान लिख छोड़ी है।

यह जानकर आपको अति प्रसन्नता होगी कि मैं ही आपका एकमात्र बदनसीब परदादा हूँ; जिसने इस ममतामयी पत्र की माला को गूँथने की चेष्टा की है। दूध का दूध और पानी का पानी न्याय कर सको, अतः मैंने इस खत को लिखने का दुःसाहस किया हैै। बताते चलूँ कि पत्र लिखते वक्त यहाँ चंद्रग्रहण हो रहा है। आशा है आप लोग तब सूर्यग्रहण झेल रहे होंगे। आज मुझे मालूम नहीं क्योंकर खत लिखते समय मेरा हाथ काँप रहा है। गला सूखता जा रहा है। मस्तिष्क में अनगिनत अच्छे-बुरे विचार कौंध रहे हैं। आगे नाथ न पीछे पगहा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। फिर भी ताकि आपका शोध-पत्र तथ्य पर आधारित हो; अतएव मैंने सोचा कि इस पत्र के माध्यम से आपके लिए एक सत्य की गठरी छोड़ जाऊँ। इस खत में जो कुछ भी लिखा जा रहा है, वह सच्ची घटना पर आधारित है। मनगढ़ंत व कपोल कल्पना जैसी कोई भी चीज इस पत्र में वर्णित नहीं है। मुझे अच्छी तरह मालूम है कि आप मुझे एक बार नहीं हजारों बार दोषी ठहरा रहे होओगे। यहाँ तक कि मेरी अस्थियों को फाँसी के तख्ते पर लटकाने के लिए भी उतावले हो रहे होंगे। पर करुँ भी तो क्या करुँ? मैं भी वक्त का मारा हूँ। समय के थपेड़ों ने मुझे अधमरा कर दिया है। आपकी दशा का ख्याल आते ही मैं जी भरकर रो पड़ता था। और मेरे आँसूओं की बूँद स्याही बनकर मेरी लेखनी को ताउम्र मदद करती रही। लेकिन एक बात का ध्यान रखो। जिस दुःख से सिदो-बिरसा परेशान थे, जिन कारणों को लेकर मारांग गोमके व दिसोम गुरु ने आंदोलन किया, आज हम भी उन्हीं कारणों से पीड़ित हो रहे हैं। और आशा है आप भी उसी दुःख से ही दबे रहोगे। अर्थात् दुःख के अंतराल में कोई ज्यादा परिवर्तन नहीं होगा। आसमान से गिरे तो खजूर पर अटक गए।

कहा जाता है; पुरखे हमारे शहीद होते रहे हैं। किसी को घोड़े की चंवार से बाँधकर तब तक घसीटा गया जब तक कि उनके प्राणपखेरु उड़ नहीं गए, तो किसी को अपने ही जन्मस्थल में फाँसी दी गई और तो और किसी को तो जहर का प्याला पीने के लिए भी मजबूर किया गया। जिस किसी ने भी अन्याय के विरुद्ध मुँह खोला, उसकी बोलती सदा-सदा के लिए बंद कर दी गई। पुरखों के बलिदानस्वरुप हमने कुछ दिन सीएनटी और एसपीटी एक्ट का लुत्फ उठाने का असफल प्रयास किया। पर यह वही साबित हुआ, जिसे हाथी के दाँत दिखाने के कुछ और खाने को कुछ कहते हैं। बलि का बकरा कब तक खैर मनाता? जगह-जगह उनकी बपौती जमीन पर कल-कारखाने बैठा दिए गए। बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण हुआ। वे कुशल कारीगर तो थे नहीं; अतः उन्हें चतुर्थ श्रेणी की नौकरी से भी वंचित कर दिया गया। वे बेचारे भूमिपुत्र विस्थापन के जाल में फँसते चले गए थे। वे रोजगार की तलाश में असम, अंडमान और महानगरों की ओर कूच कर गए। आरक्षण मिलने लायक आबादी न रही। सरल, सीधे और सत्यवादी भूमिपुत्र अपने ऊपर हो रहे अत्याचार का सामना करने में विफल रहे। हमेशा उनके मुखवृंद से भगवान देखता है का सुवचन निकलता था। किन्तु कोई भी भगवान उसे बचाने नहीं आया। क्यों आता? यहाँ तो यह उक्ति चरितार्थ हो रही थी; भगवान भी उसी की मदद करता है, जो अपनी मदद स्वयं करता है।

मुगलों के बाद दो सौ वर्षों तक देश अंग्रेजों का गुलाम रहा। आजादी की लड़ाई छेड़ दी गई और अंततः सन् 1947 ई. में अंग्रेज देश छोड़कर चले गए। पर झाड़ जंगल में काले अंग्रेजों का साम्राज्य बढ़ता गया। उनके फन कुचलने के लिए आँधी-तूफान की तरह झाड़ जंगल में मारांग गोमके का उदय हुआ। सदियों से दबाए गए लोगों ने अपने बीच एक ऐसा गरीबों का मसीहा पाकर बहुत आनंदित हो उठे। गरीबों ने कुछ हद तक राहत की साँस ली। लोग उनसे जुड़ते गए एवं कारवां बनते गया। मारांङ गोमके जहाँ भी जाते, उन्हें सुनने के लिए ऐसी भीड़ जमा होती, जो न अब तक इकट्ठी हुई थी और न ही भविष्य में ऐसी भीड़ कभी इकट्ठा होने की उम्मीद है। उनकी सभा में शामिल होने के लिए लोग भूखे-प्यासे कई सौ मील तक का सफर पैदल ही तय करते। मुर्गे की बांग ने लोगों को गहरी नींद से जगा दिया था। लोगों में जागरुकता नाम का जीव प्रवेश कर गया था। फिर क्या था? जहाँ देखो मुर्गा छाप, वहीं लगाओ मोहर आप चरितार्थ हो गया। इस तरह मारांङ गोमके ने तैंतीस विधायकों को बिहार विधान सभा में भेज दिया। इस प्रकरण से कुछ हुआ कि नहीं यह तो ज्ञात नहीं पर यह सर्वविदित है कि लोगों के मन मंदिर में एक ऐसी ममतामयी भावना जाग उठी, जिससे लोग इस कदर ग्रसित हो गए कि यह भावना भुलाए न भूली। अपने लिए अलग झाड़ जंगल प्रदेश की माँग ने लोगों की नींद हराम कर रखी थी। उठते, बैठते, सोते आँखों के सामने सिर्फ और सिर्फ अलग प्रदेश ही दिखाई दे रहा था; क्योंकि अलग प्रदेश मूर्छितों की एकमात्र संजीवनी बूटी थी। मुर्गे की कुकड़ुकूं से सारी जनता अति प्रसन्नचित्त थी। पर हाय री अभागिन जनता! एक दिन उन्हें पता चला कि मारांग गोमके और उनके सहयोगियों ने उस मुर्गे को ही चखना कर दिया था। और इस तरह मारांङ गोमके देश के प्रथम प्रधानमंत्री की गोद में जा बैठे। मारांङ गोमके राजनीति छोड़ एक किसान बन गए। जिसे वह हल में जोतने हेतु जोड़ा बैल बन गए। मारांग गोमके द्वारा खरीद-फरोख्त की यह एक ऐसी बेसुरी परंपरा स्थापित की गई कि बाद के नेता भी इनके पदचिह्नों का अनुसरण करते नहीं अघाते थे।

मारांङ गोमके के अस्त होने के बाद झाड़ जंगल में एक बहुत बड़ी रिक्तता पैदा हो गई। लगा, मानो लोगों को साँप सूँघ गया हो। कहीं से कोई चूँ तक की आवाज न आई। इस रिक्तता की पूर्ति हेतु फिर आया तेज हवा का एक झोंका। एक मुट्ठी चावल और एक रुपया का कमाल देखिए कि वह कुछ ही दिनों में साढ़े तीन करोड़ में परिणत हो गया। लोगों ने उन्हें सिर आँखों पर बैठा लिया था। लोगों ने अपनी ममतामयी भावना को गिरवी रख दिया। तीस वर्षों तक उन्हें राज करने का मौका दिया गया। इस दौरान कुछ हासिल हुआ कि नहीं यह तो मालूम नहीं। लेकिन उन्हीं की सहमति से एक देश लूटा गया। हुल में शहीदों के खून से लिखा गया उपझारखण्ड नीलाम हो गया। एक के बदले अब वह छह टुकड़ों में विभाजित हो गया। प्रशासनिक दृष्टिकोण से चाहे वह सौ टुकड़ों में बाँट दिया होता पर उनका नामकरण तो अपनी संस्कृति की पहचान पर आधारित होता। पर ऐसा संभव न हो सका। इस तरह खून की नदी से सिंची गई धरती भी परायी हो गई। वह सदैव तारे तोड़ने का वादा करने वाले, लोगों की आँखों में धूल झोंकने में कामयाब हो गया। मारांग गोमके और दिसोम गुरु दलितों के सर्वमान्य नेता रहे हैं। दोनों ही महान क्रांतिकारी थे; इसमें कोई दो राय नहीं। पर क्यों कांग्रेस में विलय और साढ़े तीन में बिकने की घटना घटी? इस प्रश्न का उत्तर अब तक कोई दे न सका। निश्चित तौर पर लगता है; दोनों नेताओं के पास दूरदृष्टि, स्पष्ट विचारधारा और अच्छे दर्शन की कमी थी। और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि रातोंरात एक झाड़ जंगल प्रदेश का सृजन भी हो गया था। इस प्रदेश सृजन के पीछे भी एक बहुत बड़ा रहस्य छिपा हुआ है। दो की लड़ाई में तीसरे का फायदा हुआ। तीसरा असहाय और दरिद्र था। संक्षेप में आपको बता दूँ कि यह तो वही बात हो गई कि रातोंरात एक भिखारी को मर्सीडिज कार की भेंट दी गई। अब भिखारी कार को सुबह-शाम देखे, चाटे या सूँघे? कुछ भी करे, यह तो वो जाने और उसका काम जाने। पर भिखारी अब दूर से ही टुकुर-टुकुर उस मर्सीडिज कार को निहारने में तल्लीन है। मर्सीडिज को चलाने के लिए उस भिखारी के पास न तो तेल है और न ही तेल लेने के लिए जेब में पैसे। पानी से आखिर गाड़ी भी तो नहीं चल सकती। रखे-रखे मर्सीडिज अब सड़ने के कगार पर खड़ी है।

मेरे प्रिय पोते! कहीं धोखे में न रहना कि आपके परदादे अनपढ़ और गंवार थे। यह सच है कि देश आजाद होने तक गाँव में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या नगण्य थी। पर इसके पूर्व अंग्रेजों से लोहा लेने वाले तिलका मुर्मू, सिदो मुर्मू एवं बिरसा मुंडा ने कौन से विश्वविद्यालय से कौन-सी डिग्रियां ली थी, जिसे अंग्रेजों को लोहे का चना चबवाया था? ये महान नेता अंगूठा टेक थे। इन्होंने किसी स्कूल का दरवाजा न देखा था। फिर भी इन्होंने अंग्रेजों को छठी का दूध पिलाया था। और इनके आंदोलन के फलस्वरुप संताल परगना एवं छोटानागपुर का जन्म हुआ था। जहाँ कहीं भी समाज उन्नति की बात होती, लोगों ने सर्वसम्मति से मान लिया था कि शिक्षा ही विकास की एकमात्र कुंजी है। बगैर शिक्षा उन्नति करना कोरी कल्पना ही होगी। अतएव प्रदेश में सरकारी, गैर-सरकारी एवं अर्द्धसरकारी विद्यालयों की बाढ़ आ गई। देश आजाद होने के साठ वर्ष में कोई ऐसा गाँव न रहा, जहाँ कोई स्नातक न हुआ हो। बालक-बालिकाएँ ओले की तरह पढ़ लिखकर बादलों से बारिश के रुप में दनादन गिर रहे थे। लेकिन यह क्या? विद्यार्थियों के मस्तिष्क में मीठे फल के बीज बोए जा रहे थे, लेकिन फल आ रहे थे कड़ुवे। बच्चों को अमीर बनने की सिखावन दी जा रही थी; पर बन रहे थे रंक। स्वर्ग जाने का रास्ता बताया जा रहा था; पर जी रहे थे नरक में। ऐसा क्यों? समाज की माली हालत अब बद से बदतर होती जा रही थी। कोई ऐसी समस्या न बची; जिससे लोग पीड़ित न हों। उन्नति के बारे समाज के ठेकेदारों की अलग-अलग दलीलें थीं। राजनीतिज्ञ अपने लिए वोट को ही समाज प्रगति का एकमात्र नुस्खा बताते। धर्मगुरु इस दुनिया के बारे न बताकर परलोक की बात करते। समाज सेवक गाँव का आँकड़ा लेकर सिर्फ कागजी घोड़ा दौड़ा रहे थे। और तो और सरकारी संपत्ति, किसी की संपत्ति नहीं चरितार्थ हो रहा था। सरकारी तंत्र लूट-खसोट का अड्डा बन गया था। सरकार का मतलब मूर्खों का, मूर्खों द्वारा, मूर्खों के लिए।

किसी दार्शनिक ने बिल्कुल सही कहा है कि कोई भी शिक्षा कभी निष्क्रिय नहीं रह सकती। या तो यह मुक्त करती है अथवा दास बनाती है। दबंग समाज द्वारा शिक्षा का पाठ्यक्रम इस तरह तैयार किया जाता है कि हम दास व गुलामी खटने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

मेरे प्रिय पोते! अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि हम और आप चाहे लाख यत्न कर लें। हमें रेड इंडियन बनने से कोई रोक नहीं सकता। इसमें दोष उनका नहीं, सौ फीसदी गलती हमारी ही है। पत्र मिलने तक आप "लाल भारतीय" के रुप में परिणत हो चुके होंगे। ढेर सारे आशीर्वाद सहित पत्रांत करता हूँ।

Friday, 6 February 2015

बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी?

पिछले अंक में हमने शिक्षा के प्रति मंगरु की सोच को जान लिया है। किसी भी तरह की गलतफहमी में न रहें कि वह शिक्षा का घोर विरोधी है। अपितु उसका कहने का तात्पर्य यही है कि शिक्षा के साथ-साथ किसी श्रृंगार के रुप में अच्छे विवेक का भी वह तीमारदारी है; जिसे सोने पे सुहागा कहा जाता है। वह ऐसी शिक्षा हासिल करने का पक्षधर है, जिस शिक्षा से हमें मुक्ति मिल सके। वह ऐसी शिक्षा का समर्थक है; जिस शिक्षा से हमारी सभी तरह की गरीबी मिट सके एवं हम सदा उन्नति की राह पर आगे बढ़ते रहें। ऐसी शिक्षा का क्या औचित्य? जिस शिक्षा से हम गुलाम अथवा दास बनने के लिए मजबूर हो जाते हैं। बल्कि मंगरु पढ़-लिखकर मूर्ख बन जाने का घोर विरोधी है। प्रमाण देते हुए वह कहना चाहता है कि क्या आठ वर्षों से झारखंड में एक भी शिक्षित व्यक्ति का उदय नहीं हुआ है? क्या हमारे पास एक भी डिग्रीधारी उपलब्ध नहीं हैं? एक नहीं, हमारे पास हजारों डिग्रीधारी मौजूद हैं। पर उनकी शिक्षा पर हमें शक और संदेह है। यह अतिश्योक्ति नहीं कि जिस शिक्षा को उन्होंने ग्रहण किया, जिस शिक्षा ने उन्हें बड़ी-बड़ी डिग्रियों का हकदार बनाया; उस शिक्षा ने आखिरकार उन्हें अंत में पशुतुल्य बना दिया है। अच्छे और बुरे पहचानने के वे काबिल नहीं रहे। यही कारण है कि झारखण्ड गठन के बाद से आदिवासी मुख्यमंत्रियों के पदस्थापित होते रहने के बावजूद भी आज हमारी यह सुनहरी हालत हो रखी है!

मंगरु आज कब खाना खा रहा है, कब सो रहा है, उसे कुछ ध्यान ही नहीं। आज वह अपने समाज के प्रति चिंतामग्न है। लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर पहुँच पाना, उसे टेढ़ी खीर लग रहा है। मंगरु आगे विश्लेषण कर रहा है। सामाजिक बैठकों में शिक्षा के बाद सबसे ज्यादा चर्चा होने वाला विषय है; मद्यपान। बार-बार कहा जाता है कि नशे की लत ने हमारे समाज को बर्बाद करके रख दिया है। लोग पीने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं। शादी-ब्याह व पर्व-त्योहार के अवसर पर तो बात ही छोड़ दीजिए। आज रानू देवता हमारे गाँव.घर की चहार दीवारों को फाँदकर, बीच सड़क पर खड़े होकर अपना जलवा दिखा रहा है। झारखण्ड में ऐसा कोई हाट-बाजार नहीं बचा है, जहाँ खुलेआम हँड़िया-दारु की बिक्री न हो रही हो। कोई मेला, कोई सभास्थल, कोई सार्वजनिक स्थल ऐसा नहीं बचा है, जहाँ देसी शराब धड़ल्ले के साथ न बेची जाती हो। इस पर किसी तरह की कोई सरकारी रोक-टोक भी नहीं। सेल्स गर्ल के रुप में हमारी भोली-भाली बालाएँ ही इस धंधे में लिप्त दिखाई देती हैं। लगता है; मानो पूरा झारखण्ड ही ऑपेन बार में तब्दील हो गया हो। जिसमें खासकर हम आदिवासी उस बार में गोता लगाने में मशगूल हो गए हैं। बच्चे हों या बुड्ढे, सारे सोमरस का मजा लूटने में व्यस्त हो गए हैं। और इस तरह अत्यधिक नशे के फलस्वरुप हम शारीरिक व मानसिक रुप से कमजोर हो चले हैं। यहाँ तक तो बात जायज लगती है। दारु पीना कोई बुरी बात नहीं; लेकिन दारु हम सभी को पी डाले, यह कतई बर्दास्त नहीं। लेकिन सवाल उठता है; क्या आपने कभी दारुबाज के सामने यह सवाल उठाया है कि वह दारु क्यों पीता है? क्या कारण है कि वह हमेशा हँड़िया-दारु के साथ रहता है? बाँहों में बाँहें डाले वह उसके संग घुमता रहता है? शराब सिर्फ दो ही अवस्था में पी जाती है; एक खुशी और दूसरा गम को भुलाने के लिए। लेकिन हम आदिवासी किस कारण शराब को गले लगाए हुए हैं; इसका जवाब शायद सिंग बोंगा के पास भी उपलब्ध नहीं है। झारखण्ड को देखकर न तो हमें खुशी है और न ही गम। फिर भी हम शराब के इतने दीवाने क्यों हैं? इसकी जड़ तक पहुँचने के लिए मंगरु को शायद और भी वक्त की जरुरत है। लेकिन इस संबंध में मंगरु के मन में अनगिनत शंकाएँ उठ रही हैं। मंगरु को अच्छी तरह याद है; गुरु जी के आरंभिक काल में, आदिवासी समाज से नशापान को जड़ समेत उखाड़ फेंकने के लिए, उसने हँड़िया-दारु की बिक्री बंद करने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया। हुक्म हुआ कि अगर कोई पीने-पिलाने के धंधे में रंगेहाथ पकड़ा गया, तो उसे "दिल्ली रोड" दिखा दिया जाएगा। और कुदरत का करिश्मा देखिए कि उस हुक्म की जोरशोर से तामील की गई। लेकिन आम जनता पर इसका प्रतिकूल असर पड़ा। कहीं जगह न मिलने पर नशेबाजों ने गुदड़ी में पनाह लेनी शुरु कर दी। लोग चोरी-छिपे पर पहले की अपेक्षा और अधिक मस्त होकर पीने में लीन हो गए। परंतु आश्चर्य तो तब हुआ, जब गुरु जी के चेले दिन के उजाले में नशेड़ियों को दिल्ली रोड दिखा रहे थे, तो रात अँधेरे में वे स्वयं ही मस्त होकर दिल्ली रोड पर सरपट भाग रहे थे। अर्थात् उनके ही चमचे-बेलचे भयंकर दारुबाज निकले। हँड़िया-दारु उर्फ गुरु जी ने बिन माँगे जगप्रसिद्धि पा ली। इस तरह मद्यपान खत्म नहीं हुआ। परंतु यह दिन दुगुनी रात चौगुनी प्रगति के पथ पर आगे बढ़ता ही गया।

उदाहरण के तौर पर झारखण्ड से निकल कर एक ऐसे प्रदेश की ओर निगाह डालें, जहाँ हर गाँव में बिजली की व्यवस्था है और हर गाँव सड़क से जुड़ा हुआ है। यह एक कृषि प्रधान प्रदेश है; और यहाँ के निवासी काफी खुशहाल हैं। उस प्रदेश को आप हरियाणा के नाम से जानते हैं। कुछ वर्ष पहले की घटना है। तब हरियाणा में श्री बंसीलाल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुआ करते थे। प्रदेश की खुशहाली में चार चाँद लगाने हेतु बंसीलाल की सरकार ने प्रदेश में सौ फीसदी मद्यपान निषेध की घोषणा कर दी। हरियाणा में नशामुक्ति का सरकारी आंदोलन छेड़ दिया गया। पूरे प्रदेश में एक बूँद शराब की बिक्री नहीं हो सकती थी। इसका परिणाम क्या हुआ? होना क्या था; जो उपरवर्णित घटना गुरु जी के साथ हुई, वही घटना यहाँ भी दुहरा दी गई। पहले सौ की बोतल मिलती थी, अब अवैध रुप से उस बोतल की कीमत हजारों में पहुँच गई थी। इसकी विपरीत प्रतिक्रिया हुई; पहले लोग गिलास में पीते थे, अब लोग मग्गे में पीने लग गए। दुष्परिणाम यही कि जब विधान सभा का अगला चुनाव हुआ; तो शराब ने बंसीलाल की लुटिया ही डूबो दी। उसकी सरकार तो गई ही साथ में उसकी मिट्टी ऐसी पलीद हो गई कि वह मुँह छिपाने के लायक न रहा। कहने का तात्पर्य यही कि जहाँ भी मद्यपान रोकने की कोशिश की गई है; वहाँ बुरा हाल ही हुआ है।

मंगरु को आज यह तर्क समझ में नहीं आ रहा है। वह देख रहा है कि भोले-भाले आदिवासी तो सिर्फ घरेलू और सस्ती शराब का ही पान कर रहे हैं; पर अन्य शहरी लोग तो एक से एक बढ़िया और महंगी शराब का सेवन करते हैं। कोई भी बड़े-बड़े होटल, रेस्तरां, पब का नजारा देखिए, वहाँ शराब इस तरह परोसी जाती है; जैसे उसकी बिक्री मुफ्त में हो रही हो। फिर भी उनका कुछ नहीं बिगड़ रहा है। उसे यह भी ज्ञात है कि हमारे फौजियों को शराब से नहला देने का सरकारी नियम भी है। ऐसा क्यों होता है? कारण कुछ भी हो; पर आदिवासियों के संदर्भ में इतना अवश्य है कि यह हमारी संस्कृति से जुड़ी हुई प्रथा है। जबरन इस प्रथा को बंद नहीं किया जा सकता। हाँ, किसी भी चीज का अति होना हानिकारक है; इसमें कोई दो राय नहीं। जरुरत है तो सिर्फ इतनी कि हमें पीने की कला अवश्य सीखनी चाहिए। ध्यान रहे कि किसी भी कीमत पर हँड़िया हमें डकार न जाए। निचोड़ यही कि जो भी हमारे मद्यपान विरोधी मित्र हैं; उनसे आग्रह है कि वे जबरन हँड़िया-दारु की संस्कृति को बंद न कराए। क्योंकि मनोवैज्ञानिक कारण है कि जिस भी चीज को जितना भी छुपाने की कोशिश करोगे; उसे देखने के लिए मन में उतनी ही जिज्ञासा तीव्रगति से बढ़ती जाएगी। और यकीन मानो, लोग उस छिपी हुई चीज को देखने के लिए दूसरा अवैध रास्ता निकाल ही लेते हैं। लेकिन हमारे मद्यपान विरोधी मित्र, उस ग्वाले की भाँति इस तथ्य को समझने से ही इनकार करते हैं। वे तर्क देते हुए कहते हैं कि मद्यपान ही है हमारे समाज का पिछड़ने का एकमात्र कारण। अगर तत्काल शराबबंदी हो जाए तो हम क्षण भर में उन्नति की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए नजर आएंगे। लेकिन दोस्तो, अक्सर ऐसा होता नहीं है। दुनिया के ठंडे देशों में देखो, तो वहाँ पानी की तरह लोग शराब का सेवन करते हैं। और विडंबना यही कि वे हमसे कई गुना अधिक प्रगतिशील हैं। अगर शराब विनाश का कारण होता, तो वे बेचारे ठंडे देश के लोग कब के मर-खप गए होते।

दोपहर का खाना खा चुकने के बाद मंगरु फिर अपनी सोच को जारी रखे हुए है। सोचते.सोचते उसे लगा कि समाज की समस्याएँ तो अनेक हैं। किस.किसके बारे वह सोचे? कौन सी समस्या के लिए, कौन से समाधानों को वह सुझाए? काफी देर चिंतन करने के बाद मंगरु इस नतीजे पर पहुँचा कि समस्या तो सिर्फ दो प्रकार की होती है - व्यक्तिगत और सामूहिक। परिभाषा के रुप में अगर कहना चाहें तो व्यक्तिगत समस्या उसे कहा जाता है; जो निजी हो एवं उस समस्या के समाधान हेतु किसी बाहरी व्यक्ति की मदद की कोई आवश्यकता ही न हो। अर्थात् जिसका समाधान खुद को ही करना पड़े। इसके विपरीत; सामूहिक समस्या उसे कहा जाता है; जिस समस्या से पूरा समाज ही पीड़ित हो एवं जिसका समाधान एक व्यक्ति द्वारा संभव न हो। परंतु इस समस्या के समाधान के लिए पूरे समाज की जरुरत हो। फिर तो पेसा, परिसीमन ... आदि सामूहिक समस्याएँ हुईं? बिल्कुल। सामूहिक समस्याओं के समाधान के लिए आज हमारे पास कई सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाएँ कार्यरत हैं। इनके अलावे छोटे-मोटे कई क्लब, संस्था, संघ, दल वगैरह भी इस शुभ कार्य में हाथ बँटा रहे हैं। इनमें कुछ पंजीकृत हैं तो कुछ अपंजीकृत। और इन सभी दलों में से जो सबसे बड़ा दल है, जो हमारे देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ है; वह राजनीतिक दल किसी भी सामूहिक समस्या के निदान के लिए अनवरत कार्यरत है। अतएव क्यों न राजनीति के बारे थोड़ी-सी चर्चा की जाए।

राजनीति अर्थात् ऐसी नीतियों का निर्धारण करना, जिन नीतियों व नियमों के तहत जनता पर शासन किया जा सके अर्थात् राज्य चलाया जा सके। राज दरबार में बैठकर ऐसी नीति बनाना जिससे जनता/प्रजा की भलाई हो सके। और इस नीति को बनाने के लिए जिसे भी उत्तरदायित्व सौंपा जाता है, उसे राजनीतिज्ञ या विशुद्ध रुप से आधुनिक भाषा में उन्हें सांसद या विधायक कहा जाता है। देश, प्रदेश व समाज की उन्नति या अवनति के लिए बहुत हद तक राजनीति को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। छोटी-मोटी कोई भी गैर-सरकारी संस्थाएँ अपनी सोच को दर्शा सकती हैं; पर नियम व कानून बनाने का हक तो सिर्फ राजनीतिज्ञों को ही है। अतः कहा जा सकता है कि राजनीति का अखाड़ा (विधान सभा/संसदद्) एक मंदिर के समान है और सांसद या विधायक उस मंदिर के पुरोहित व पुजारी होते हैं। अतः सिद्ध हो गया कि राजनीति एक धार्मिक स्थल है। यहाँ पुण्य के अलावे और किसी तरह के गलत धंधे को अंजाम देना सख्त वर्जित है। लेकिन अभी तक हमें जिस शिक्षा का घूँट पिलाया गया है; उस घूँट में राजनीति को हमेशा ही बुरी नजर से देखने की हिदायत दी गई है। राजनीति एक गंदा खेल है का कुपाठ हमें पढ़ाया गया है। राजनीति से दूर-दूर तक भी रिश्ते जोड़ने की मनाही है। मंगरु इस तर्क को समझने में आजतक सौ फीसदी विफल रहा है। जिस मंदिर में सिर्फ स्वर्ग जाने का ही रास्ता बताया जा रहा हो, उसे आजतक हमने जाने अनजाने नरक की संज्ञा दी हुई है। उस मंदिर की पूजा-अर्चना में शामिल होना तो दूर, उस ओर झाँकने तक भी मनाही है। जिस मंदिर में हमारे भाग्य और तकदीर का फैसला होता हो, उस स्थल को अभी तक हमने कूड़ेदान समझकर तिरस्कृत किया हुआ है। ऐड्स की तरह पॉलिटिक्स की पी तक को छूने नहीं दिया जाता है। कहा जाता है कि राजनीति गंदे लोगों का खेल है। इस खेल में जो अपराधी होता है, वही सफल होता है। इस तरह की भूलभुलैया के चक्कर में अच्छे और नेक इंसानों ने बुरे लोगों के लिए मंदिर जाने का रास्ता ही त्याग दिया है। यकीन मानो, इस प्रकरण में कसूरवार नेक इंसान ही हैं न कि अपराधी। थोड़ी देर के लिए कल्पना करो। मान लो, उस पवित्र मंदिर में किसी पुरोहित के बदले डाकू सुल्तान सिंह जैसे अपराधिक छवि वाले लोगों का कब्जा हो जाए, तो वहाँ का दृश्य कैसा होगा? उस भव्य मंदिर में अगर वास्तव में चोर-डकैत इकट्ठे हो जाएँ, तो यह निश्चित है कि वहाँ भजन-कीर्तन तो होने से रहा। बल्कि मारकाट और खून-खराबे की ऐसी भयावह स्थिति पैदा हो जाएगी कि आप सोच भी नहीं सकते। रोज अत्याचार, बलात्कार, भ्रष्टाचार और खूनी संघर्ष से उस मंदिर का तो सत्यानाश होगा ही, साथ ही श्रद्धालुओं का भी बेड़ा गर्क हो जाएगा। इस तरह सोचते-सोचते मंगरु की बंद आँखें खुल गईं। उसे लगा कहीं वह सपना तो नहीं देख रहा है?

Tuesday, 3 February 2015

बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी?

कहा जाता है कि चिंता चिता समान है। अत्याधिक चिंता करने से अच्छी-भली सेहत भी बिगड़ सकती है। जो व्यक्ति ज्यादा चिंतित रहता है, वह उस चिंता रुपी चिता में जलकर भस्म हो जाता है। लेकिन आज मंगरु तो केवल सोच ही रहा है। सबसे पहले वह अपनी सोच में बदलाव लाना चाहता है। चूँकि सोच बदलना ही उन्नति की पहली सीढ़ी है। वह अपने समाज का गहराई से विश्लेषण कर रहा है। वह कोई अपनी व्यक्तिगत समस्या से थोडे़ ही न चिंतित है। अगर वह चिंतित भी है, तो वह अपने सुनहरे समाज को देखकर चिंतित है! वाह रे आदिवासी समाज! मंगरु देख रहा है; किस तरह आदिवासी लोग आत्महत्या कर रहे हैं। ठीक उसी तरह; जैसे पहली बरसात के समय बिजली के खंभे पर जल रहे बल्ब की रोशनी की ओर आकर्षित होकर कीड़े-मकोड़े अपने आप जलकर मर-मिटते हैं। इस भूमंडलीकरण के युग में आदिवासी आधुनिकता के बहाव में बह गए। वे अपने आदिवासी मूल्यों को त्याग कर किस तरह चमगादड़ बनने की कोशिश में जुट गए हैं। और जैसे कि आपको मालूम है; चमगादड़ न तो जानवर है और न ही पक्षी। उसी तरह मंगरु को डर है, कहीं आदिवासी भी धोबी के कुत्ते की तरह न घर का और न ही घाट का रह जाएगा। घड़ी के पेंडुलम की तरह वह झूलता ही रह जाएगा। मंगरु सोच रहा है; आखिर लोग दुःखी क्यों होते हैं? अनुभव के आधार पर मंगरु का मानना है कि लोगों को अपने आप से संतुष्ट होना सीखना चाहिए। क्योंकि अक्सर लोग, जो कुछ अपने पास उपलब्ध है, उससे खुश नहीं होते; पर जो दूसरों के पास है, उसे देखकर दुःखी होते हैं। उसी तरह दूसरों के पास जब कोई चीज नहीं होती है अर्थात् जब दूसरे लोग दुःखी होते हैं, तो वह खुश होता है। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहोगे?

आज मंगरु सोचने में कुछ ज्यादा ही व्यस्त हो गया है। कब दिन निकला, कब दोपहर हुई और कब शाम ढल गई, कुछ पता भी न चला। वह अच्छी तरह जानता है; उसकी सोच के फलस्वरुप निकली छोटी सी रश्मि भी अगर समाज को थोड़ी दूर तक ही सही, कोई रास्ता दिखाने में कामयाब हो सके, तो वह अपने मनुष्य जन्म को सफल मानकर, इस दुनिया से विदाई लेने में उसे थोड़ी-सी वेदना भी नहीं होगी। उसे किसी तरह का कोई गिला शिकवा भी नहीं रहेगा; परंतु उसे आनंदपूर्वक परलोक सिधार जाने में परम संतुष्टी होगी।

हमने पिछले अंक में राजनीति के बारे मंगरु की थोड़ी-सी सोच को जाना। हमारे कुछ मित्रगण, राजनीति को ही सभी समस्याओं का एकमात्र समाधान मानते हैं। वे भी उस ग्वाले की भाँति अपने दही को खट्टा मानने से ही इनकार करते हैं। कुछ भी हो, मंगरु के अनुसार राजनीति का अखाड़ा एक मंदिर के समान है। जहाँ सिर्फ स्वर्ग की ही बातें होती हैं। वहाँ दूध का दूध और पानी का पानी न्याय होता है। लेकिन जरा देश-दुनिया की राजनीति को देख लो; वह हमें कहाँ ले जाना चाहती है, भगवान ही मालिक है। खैर, मंगरु की सोच का दायरा सिर्फ झारखण्ड तक ही सीमित है। अतएव मंगरु आगे सोचता ही चला जा रहा है। राजनीति के अखाड़े में अंदर क्या होता है; मंगरु को इस बारे कुछ भी नहीं मालूम। पर उस राजनीति के फलस्वरुप जो फल उग आते हैं, उसे चखकर वह बता सकने में जरुर काबिल है कि फल मीठा है कि खट्टा। मारांङ गोमके से लेकर दिसोम गुरु तक की राजनीतिक घटनाओं को वह माइक्रोस्कॉप के जरिए देखकर, उसकी जाँच पड़ताल करने में जुटा हुआ है। इस दौरान हमने क्या पाया, क्या खोया विश्लेषण कर रहा है। राजनीतिक मंदिर के पुजारियों ने हमें कौन से गुल खिलाए हैं, मंगरु जानने की कोशिश कर रहा है। पर मंगरु को खाक कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। मस्तिष्क पर जोर देते हुए, वह राजनीतिक उठा-पटक को गहराई से खंगालने की चेष्टा कर रहा है। पर हवा की तरह कुछ पकड़ में ही नहीं आ रहा। काफी देर मंथन करने के बाद, उसे लगा कि देश आजाद होने के बाद से अभी तक झारखंड की राजनीति में काफी उथल-पुथल हुआ है। झारखण्ड की राजनीति आदिवासियों को केन्द्रबिन्दु मानकर ही संपन्न होती रही है। पर बेचारे आदिवासी! अभी तक वे प्रयोगशाला की सामग्री बनकर ही रह गए हैं। झारखंडी राजनीति को कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है। फुटबॉल या हॉकी खेल से आप अच्छी तरह परिचित होंगे। इस मैच में टीम कप्तान चाहे मारांग गोमके, लालबाबू, मुंडा, कोड़ा, हो या गुरु जी; सभी ने अब तक एक बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया है। पर उस उत्कृष्ट खेल का क्या फायदा, जब उनकी टीमें एक भी गोल करने में विफल रही हों। अतएव स्पष्ट रुप से कहा जा सकता है कि किसी मैच में विजयी घोषित होने के लिए गोल नितांत जरुरी है। मैच देखकर लगता है; कहीं हमारी टीम ही गोल खाकर मुँह लटकाए तो नहीं बैठी है? कुछ भी हो। इतना निश्चित है कि हमारी टीम ने कभी गोल नहीं दागा है। हो सकता है प्रतिद्वंदी टीम ने हमारे ऊपर ही दनादन गोल किए हों? इसके बारे आप ही ज्यादा जानकार हैं। इतने दिनों से इतना बढ़िया मैच खेलने के बावजूद भी गोल न कर सकना ही साबित करता है कि राजनीति भी एकमात्र समाधान नहीं है।

मंगरु सोच-सोचकर अत्यंत दुःखी हुआ जा रहा है। फिर क्या हो समस्या का सही समाधान? वह गहरी चिंता में डूब गया है। मंगरु नास्तिक तो नहीं पर असली आस्तिक भी नहीं बन पाया है। वह भगवान को ढूँढ़े जा रहा है; पर अब तक तो उसके साथ मुलाकात संभव नहीं हो पाई है। कब होगी उसकी भेंट, उसे कुछ नहीं मालूम। सोचता है; जो कुछ भी उसके साथ हो रहा है, कभी वह इसके लिए उसे ही जिम्मेवार ठहरा रहा है। वह अपने दिमाग पर जोर देते हुए भगवान पर ही लांछन लगा देता है। वह पूछना चाहता है; हे भगवान, तूने क्या हमारी सृष्टि यही दिन देखने के लिए ही की है? क्या हमारे भाग्य में सारी उम्र गुलामी की जिंदगी जीने के लिए ही लिख दी गई है? क्या हमारे नसीब में दर-दर की ठोकरें खाना ही दर्ज है? हे परमपिता परमेश्वर! तू तो दयासागर है। तू तो दयानिधि है। कहाँ गई आपकी वह दयालुता? कहाँ गई आपकी वह स्नेह और दयामयी ममता? तुम तो चालाकों के चालाक ठहरे! आकाश, पाताल और धरती का सृजन करने के बाद ऐसा छूमंतर हो गया कि आपको ढूँढ़ने के लिए हमें चर्च, मंदिर, गुरुद्वारा, मस्जिद आदि के निर्माण करने पड़े। फिर भी न तो आप दिखते हो और न ही सुनते हो। कोई भी दुखियारा कितना भी रोए-पीटे, गिड़गिड़ाए; न तो तू उसे सुनता है, न तो दर्शन देता है और न ही उसे सांत्वना भरी कुछ बातें ही करता है। कैसा भगवान है तू? किस मिट्टी का बना है तू? इतना कुछ भगवान पर इल्जाम लगाने के बाद, मंगरु ठंडे दिमाग से सोचने के लिए मजबूर हो गया। अत्यधिक पीड़ा के कारण उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। वह ओछेपन पर उतार आया। गुस्से से आदमी पागल भी हो सकता है। खैर, इस दौरान सोची गई बातों पर उसे पछतावा हो रहा है। उसे अब समझ में आ गया है कि कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली। कहाँ भगवान और कहाँ मंगरु? उसे अपने किए पर पछतावा हो रहा है। उसे यकीन हो चला था कि इस संसार को चलाने वाला कोई न कोई तो होगा ही। ईश्वर, अल्लाह कुछ भी कह लो; कोई तो इस जग का मालिक होगा ही। संसार को चलाने के पीछे कोई न कोई ताकत, कोई शक्ति तो अवश्य होगी ही। एक तुच्छ प्राणी की यह कैसी हिम्मत की वह ब्रह्मांड के सृष्टिकर्ता पर ही उँगली उठाए; जिसने पूरे मानव समुदाय के साथ-साथ जग के सारे सजीव और निर्जीव पदार्थों की रचना की है। जिसने आकाश में चाँद, तारे और सूर्य को टाँग दिया है; इनका कोई न कोई सृष्टिकर्ता तो होगा ही। उसके अंतःमन में ज्ञान की एक छोटी सी ज्योति जल उठी थी। उसके मन में एक छोटा सा दिव्यप्रकाश जल उठा था। वह समझ गया था कि भगवान इतना बेवकूफ नहीं। भगवान ने सृष्टि के द्वारा अपने सारे रहस्य को बताने की पूरी चेष्टा की है। बस, उसे समझने की देर है। जो उसकी लीला को समझ सकता है, वही ज्ञानी है। धीरे-धीरे वह भगवान की अपरंपार महिमा को समझने की कोशिश कर रहा है। अंत में वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि कहीं हमारा समाज शरीर की तरह तो नहीं है? हमारे समाजशास्त्री ही किसी धोखे में अवश्य होंगे। महान दार्शनिक अरस्तु कुछ भी कहता रहे कि व्यक्ति के समूह को ही समाज कहा जाता है। फूल व्यक्ति है, तो माला समाज। और जो व्यक्ति समाज के अंदर नहीं रहता; वह या तो देवता है और नहीं तो भूत। ऐसी परिभाषा मंगरु तो क्या बड़े-बड़े समाजशास्त्रियों की समझ से परे की बात है। समाज क्या है; कुछ समझ में नहीं आ रहा। अतएव काफी गहन चिंतन के पश्चात् मंगरु अपने समाज की तुलना किसी शरीर के साथ कर रहा है। मानव देह से उसकी तुलना कर रहा है। समाज एक शरीर की तरह है। जिस तरह शरीर का हरेक अंग महत्वपूर्ण है; उसी तरह समाज का हरेक प्राणी महत्वपूर्ण है। शरीर के किसी भी अंग की अहमियत तुच्छ नहीं गिनी जा सकती। शरीर की एड़ी से लेकर चोटी तक के संपूर्ण हिस्से महत्वपूर्ण हैं। नाखून से लेकर बाल तक सभी जरुरी अंग हैं। अगर कोई भी अंग बीमार हो जाए, तो पूरा शरीर ही चरमरा जाता है। शरीर के किसी भी अंग पर छोटी सी चुभन लग जाए, तो पूरा शरीर ही सिहर उठता है। हो सकता है हाथ, पैर, आँख, कान, नाक, दाँत, दिमाग आदि शरीर के महत्वपूर्ण हिस्से हों; पर अगर सिर में एक भी बाल न हों तो मनुष्य की सुंदरता में बट्टा ही लग जाता है। कहने का तात्पर्य यही कि शरीर के किसी भी अंग को कम नहीं आँका जा सकता है। सारे अंग ही महत्वपूर्ण हैं और वे अपने-अपने तरीके से ही अपने सारे काम को अंजाम देते रहते हैं। अतः मंगरु से लेकर दिसोम गुरु तक सभी समाज के अभिन्न अंग हैं। अपनी-अपनी जगह वे सारे महत्वपूर्ण हैं। हो सकता है; समाज में कोई किसान, मजदूर, रेजाकूली, विद्यार्थी, नौकर, व्यापारी, बुद्धिजीवी, लेखक, समाज सेवक, याजक, राजनीतिज्ञ आदि हों; वे सारे ही एक दूसरे के पूरक हैं। जिस तरह पूरा शरीर स्वस्थ हो पर आँख ही न हो, तो वह व्यक्ति अंधा कहलाता है। उस अंधे को चलने-फिरने में किस तरह की तकलीफ होती होगी, उसे आप अच्छी तरह समझते हो। उसी तरह कोई समाज ठीक-ठाक हो, पर उस समाज में कोई लेखक ही न हो, तो वह समाज भी अंधा ही कहलाता है। शरीर के हाथ-पैर समाज के किसान-मजदूर तुल्य हैं। और अगर दिमाग की तुलना राजनीतिज्ञ से की जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। अतः स्पष्ट हो गया कि हमारे समाज की बनावट भी किसी शरीर की तरह ही है। शरीर के किसी भी अंग में दर्द हो, तो पूरा शरीर ही बीमार हो जाता है। उसी तरह समाज में किसी भी वर्ग को चोट लग जाए, तो पूरा समाज ही बीमार हो जाता है। अतः शरीर के सारे अंग सही, तो शरीर स्वस्थ। उसी तरह समाज के सारे वर्ग ठीक, तो पूरा समाज ही स्वस्थ समाज कहलाता है।

मंगरु को समाज का इस तरह विश्लेषण करते हुए काफी देर हो चली थी। गहन विश्लेषण के उपरांत जो निष्कर्ष निकला; काफी मंथन करने के बाद जो निचोड़ निकला, वह यही कि समाज की समस्याएँ कुछ और हैं और समाधान के रुप में कुछ और दवाएँ सुझाई जा रही हैं। अब तक समाज के रोग और औषधि में कोई मिलान नहीं हो पाया है। यही कारण है कि हमारा समाज स्वस्थ होने का नाम ही नहीं ले रहा। हमारे समाज सेवक भी उस ग्वाले की तरह अपने दही को खट्टा मानने से ही इनकार करते रहे हैं। उनकी दलील यही कि शरीर के हाथ-पैर ठीक तो पूरा शरीर ही ठीक। दिमाग सही तो पूरा शरीर ही सही। लेकिन ऐसा नहीं है। अगर शरीर के किसी भी अंग पर दर्द हो, तो पूरा शरीर ही बीमार हो जाता है; इस कड़ुवे सच को कोई नकार नहीं सकता है।

अतः हमारे समाज के शुभचिंतकों की हालत भी उन अंधों जैसी तो नहीं, जिन्होंने हाथी के किसी एक भाग को छू लेने भर से ही हाथी के वास्तविक हुलिया के बारे ऊटपटांग घोषणा कर दी। जिस अंधे ने हाथी की पूँछ पकड़ ली, उसने कह दिया कि हाथी रस्सी जैसा है। जिसने पैर छू लिया, उसका दावा था कि हाथी किसी खंभे जैसा है। जिसने हाथी के कान पकड़ लिया, उसका कहना था कि हाथी का आकार सूप जैसा है। जिसने हाथी का पेट छू लिया, उसने सभी की दलील को धता बताते हुए ढिंढोरा पीट दिया कि हाथी किसी दीवार जैसा है। इस तरह जिस अंधे को हाथी के जो भी अंग छूने का मौका मिला, वह उसी अनुरुप हाथी के बारे अपनी गलत दलील देते गया। पर किसी भी अंधे ने हाथी के पूरे आकार को न तो ठीक से छू सका था और न ही वे हाथी के सही आकार को ही समझ पाने में सफल हुए थे। अतः कहीं हमारे समाज के शुभचिंतकों की स्थिति भी ऐसी तो नहीं, जो स्थिति उन बेचारे अंधों की बन गई है। मंगरु की यह अंतिम सोच ने उसे आसमान से लाकर पथरीली जमीन पर पटक दिया है। उसके चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगी थीं। और यह प्रश्न उसके मस्तिष्क पर हथौड़े की तरह बारंबार चोट किए जा रहा था कि उन बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी है?

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...