Thursday, 20 August 2020
HAERE MAENO!
Hae Maeno! Cedak̕ amge?Amge cedak̕?Aeno̱m-kajo̱r dibi saj,Muluc̕ mẽ̱t̕hã gạwic̕ dilại,Jhalak amak̕ ńe̱lte,Bijli Rạni so̱ro̱mko̱k̕ae.Cedak̕ amgem haṭa?Jio̱n jharna, jio̱n juḍạsi,Jio̱n dak̕, ạmrit jo̱l?Haṭ-baṭ, mela-ṭhela,Pata-chata, dibi-kạli,Ar bo̱l gatek̕ ṭạṇḍi hõ̱.Cedak̕ amgem haṭkok̕a?Digdhạ meṭaotińme Maeno!Am lasãṛhẽ̱t̕ Jio̱n dak̕? Ar se̱Jio̱n dak̕ge am bhorsa?O̱ko̱eṭak̕ben so̱ro̱sa Maeno?Amge se̱ Jio̱n dak̕?Re̱ṅge̱c̕ kan, kisạ̃ṛ kan,Kãṛã ar se̱ gujạ,Bachnao bạnuk̕ e̱se̱l-he̱nde̱,Jo̱to̱ amren o̱ndata.Cakha-cuṇḍuc̕ me̱lo̱t̕ate,Emok̕aem hare̱-phare̱,Ạ̃ṛti bạnuk̕ cakha cara,Am ńe̱lte Jio̱n dak̕, ar se̱Jio̱n dak̕ge sebelen?Ma se̱ Maeno bho̱ṅạńme.Ma se̱ Maeno jado̱ạn̕me.Kuṛi, go̱ ar chạḍwi,Nanan ruptam base̱?Gharõ̱ńj ạsul ṭhikạ,Amre aka menak̕.Jo̱k̕-raca, isin-basaṅ,Arhõ̱ no̱te̱ bale belteń,Ho̱bo̱r-dipil hạni tora,Jio̱n dak̕an caṇḍa cạṇḍi.Ḍipṭi amak̕ ajhãṭgea,Ạpsar kho̱n hõ̱jhõ̱ńjho̱ṭgea.Ce̱t̕iń kulim Maeno?Amak̕ hanaso, amak̕ jala,Bańjha he̱re̱l iń bạń baḍae,Nãwãnkoko darae hanaso.Kạbiak̕ ko̱lo̱m ṭhoṇṭa,Rạput̕en Maeno,Ańje̱t̕entae kạli.Ro̱ho̱ṛ kagatre,Ar baṅge o̱lo̱go̱k̕kan,Amak̕ jibo̱n do̱ro̱so̱n!Calak̕-calak̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕̕ jivi te̱nen,Hanko -Purub, pạchim, uttạr, dạkhin,Barnao ạcur cạriokoṇḍ,Tuṛi do̱ho̱e jaega bạnuk̕,Okare bạnui Maeno,Okare banuk̕ Jio̱n dak̕.Haere Maeno!Haere Jio̱n dak̕!Abenge Pilcu,Abenge Liṭạ,Abenge porodhol.Oka ḍaharben sotok̕ idile?Abenge ma uduk̕aleben.
Wednesday, 19 August 2020
Tuesday, 4 August 2020
यह कैसी विडंबना?
कोई कल्पना नहीं, परंतु आँखों देखी घटना है। बचपना था। पर उस समय की याद आज भी तरोतजा है। तब हमारा समाज कैसा था और अब किस मोड़ पर है, लेखक को अपने विवेकानुसार अच्छी तरह पता है। इस पर किसी का मतभेद होना स्वाभाविक है। खैर, समाज सुधार का बागडोर तब भी राजनीतिज्ञों के हाथों था, और आज भी उन्हीं राजकुमारों के हाथों सुपुर्द है। किसी भी सामाजिक संस्थाओं को तब भी और आज भी कोई घास नहीं डालता है। तब खासकर संताल परगना में ‘जोड़ा बैल’ और ‘मुर्गा’ के बीच राजनीतिक द्वन्द था। माराङ गोमके ने आदिवासियों को पता नहीं कौन-सी घुट्ठी पिलाई थी कि लोग अलग प्रांत के लिए अत्यधिक मदहोश थे। कहीं भी माराङ गोमके का भाषण होता, लोग ‘ताबेन और सा़तु' बांधकर’ दूर-दूर से चले आते थे। इतनी भीड़ होती थी कि सभास्थल पर तिल रखने के लिए जगह नहीं होती थी। तब जनता भी सा़ेहराय नृत्य करते हुए अपना मताधिकार का प्रयोग करने हेतु पोलिंग बुथ तक जाती थी। पर कुछ ही वर्षों के बाद किसी राजनीतिक दांव-पेच के कारण उस मुर्गा को चखना कर दिया गया। झारखण्ड पार्टी दो बैलों के साथ जुड़ गई। आदिवासी जनता इस बारे में अनभिज्ञ थी।
संताल परगना के लोगों ने तब ‘जोड़ा पत्ता’ में खूब खाना खाया। लेकिन जल्द ही ‘जोड़ा पत्ता’ भी फट गया। अब संताल परगना में एक राजनैतिक सूनापन-सा छाने लगा। तब उसकी भरपाई हेतु आंधी-तूफान की तरह एक बावंडर आ गया। यह कोई 1972 की घटना है। संताल परगना में एक ऐसा महाबलि का उदय हुआ था, जो पेड़ को हिला दे, तो उनसे रोटियों की बरसात होती थी, जल के अंदर मोटर साईकिल चलाने की कूवत थी और तो और उनपर चली गोलियां सब पानी बन जाती थीं। उनपर किसी तरह का कोई भी प्रहार असर नहीं करता था। और इस तरह धान काटो व महाजनों के विरुद्ध आंदोलन अपनी चरम स्थिति को छू गई थी। तब जनता ने भी नई आस के साथ उनका खूब साथ दिया। लोगों ने अलग प्रांत को ‘संजीवनी बूटी’ मान लिया था। जनता ने अपना सब काम छोड़कर उनका खूब साथ दिया। इस आंदोलन में न जाने कितनों की जानें चली गईं, कोई हिसाब नहीं।
और इस तरह 15 नवंबर, 2000 को झारखण्ड के आदिवासियों के लिए एक नई सुबह आई। ऐसी सुबह जिसमें एक नये अलग झारखण्ड राज्य का उदय हुआ था। नये राज्य का उदय होते ही कुछ लोग बालू फांकने के लिए अपनी बोरियां समेटने लगे थे, पर किसी ने बड़े भाई समझकर उसे अपने पास ही पनाह दे दी।
नये राज्य का गठन किए आज 20 वर्ष भी बीत चले। पर संजीवनी बूटी भी काम न आई। खोदा पहाड़ निकली चुहिया, वह भी मरी हुई। आदिवासियों की आस पर पानी फिर गया। मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक। जनता अब किंकर्तव्यविमूढ़ है। आइए इसका कारण ढूंढ़कर समाधान निकालने की कोशिश करते हैं।
Monday, 3 August 2020
AŃCAR DO̱TAM MẠILẠKEDAE
संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...
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