आदिवासियों को आपस में लड़ा दो
इस आधुनिक युग में किसी समुदाय के ऊपर विजय पाने के लिये सम, दम, दण्ड और भेद की नीति को उपयोग में लाया जाता है। हूल के समय दुश्मनों के साथ आमने-सामने लड़ने की तरकीब, अब मूर्खता की श्रेणी में आ गई है। हाँ, रुस-युक्रेन हो या गाजा-इजराइल, इस घटना में "दण्ड" की नीति का उपयोग हो रहा हो, तो कोई बड़ी बात नहीं है।
किसी के सामुदायिक विकास में उस समुदाय की एकता बहुत मायने रखती है। वरना एकता टूटी, दुर्घटना घटी वात हो जाती है। हमारे पूर्वजों में आपसी एकता कूट-कूटकर भरी हुई थी। संताल इतिहास के पन्नों में इनके जीते-जागते मिसालें हैं - "माधो सिंह बिडरा़उ" और ”संताल हूल-1855“। तब संतालों में गजब की एकता थी! हजारों वर्ष पूर्व की घटना है। उन्होंने अपने समाज की पवित्रता को कायम रखने हेतु दूध-दही की नदियाँ बहने वाला देश "चाय-चाम्पा" को भी दुष्ट माधो सिंह के डर से परित्याग कर दिया था। इसके बाद संतालों ने आज से ठीक 168 वर्ष पूर्व "संताल हूल-1855" के दौेरान बेमिसाल एकता का परिचय दिया था। अब वक्त के साथ संतालों में बहुत बड़ा बदलाव आ गया है। इस पर विश्लेषणनात्मक अध्ययन की जरुरत है।
संताल एक संत प्रवृति के समुदाय हैं। वे कठिन परिश्रमी के साथ-साथ सत्यवादी हैं। उनमें आपसी भाई-चारा और उनका आपसी प्यार देखते ही बनता है। पर उनके साथ विडंबना ही है कि उनके मृदुभाषी एवं सत्यवादी होने के कारण, उन्हें बड़ी आसानी के साथ अपनी गिरफ़्त में लेकर उसका मनमाफिक दोहन किया जा सकता है।
जब भारत देश गुलामी की जंजीरों से जकड़ा हुआ था, तब ऐसी विषम परिस्थिति में भी संताल अपनी एकता का परिचय देते हुए, तात्कालीन हुक्मरानों के साथ युद्ध करके, उनके जबड़े से अपना अलग संताल परगना छिन लिया था। क्या यह कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है? ध्यान रहेऋ ऐसा इसलिए हो पाया, क्योंकि संतालों में एकता रूपी ताकत कूट-कूटकर भरी हुई थी। दूसरी बात, जिनके विरु( हूल का बिगुल फूंका गया था, वे आज की मनुवादी ताकतें हैं। यही मनुवादी ताकतें अब संतालों को नेस्तानाबूद व उनकी एकता को तोड़ने के लिए उनके विरु( हजार तरह के षडयंत्र रचे जा रहे हैं। उन षडयंत्रों के तहत संतालों के बीच धर्म, लिपि, राजनीति एवं क्षेत्रवाद का विषैला जहर फैलाया जा रहा है। अर्थात् इन्हीं विषयों पर इनके बीच विभेद व फूट पैदा करने की साजिश रची जा रही है।
इस समय रोटी के लिए लड़ रही दो बिल्लियों का फैसला अगर कोई बंदर सुनाए, तो अजीब लगता है। जैसे झारखण्ड के तात्कालीन सीएम साहब ने लिटीपाड़ा में सरकारी फरमान जारी कर दिया कि कल सूरज उगने से पहले, सभी सरकारी दफ्तरों में ओल चिकी से लिखे साईन बोर्ड दीखना चाहिए। जो हुक्म जहाँपनाह! और इस तरह चमड़े का सिक्का चल पड़ा। भोर होते ही वह अवैज्ञानिक लिपि दांत फाड़कर हंस रही थी। मानो, सं. प. वालों का मजाक उड़ा रही हो। यही वह बंदर जज है, जो दो बिल्ली की लड़ाई पर अपना फैसला दे रहा था। आप बताओ, क्या पूर्व सीएम साहब ने जो कदम उठाया, क्या वह उसका मात्र जबानी आदेश था? क्या इस तरह कानून को जमीन पर उतारने के लिए किसी सरकारी नियमों का पालन किया गया? शायद नहीं। कुछ भी हो। क्या पूर्व सीएम साहब को संताली के बारे में कुछ पता है? क्या उन्हें मालूम है कि जिस लिपि का वे पैरवी कर रहे हैं, वह पूर्णतः अवैज्ञानिक है? पूर्व सीएम साहब को संताली के बारे में खाक पता है।
मनुवादियों ने भेद की नीति के तहत ही इस लिपि विवाद को बढ़ावा दिया है। सं. प. की जनता किसी सख्त दीवार की तरह अपनी कौम की रक्षार्थ अडिग खड़ी है। सं. प. संतालों का एक अभेद्य किला माना जाता है। लिपि विवाद इस किले को तोड़ने का एक षडयंत्र है। यही वजह है कि इस अवैज्ञानिक लिपि को उड़िसा से मंगाया गया है। झारखण्ड में अच्छा-भला संताली का पठन-पाठन का कार्य सदियों से देवनागरी लिपि से हो रहा था। अब इस लिपि विवाद ने न सिर्फ संताली साहित्य को आगे बढ़ने से रोक दिया है, बल्कि स्कूल-कॉलेजों में संताली की पढ़ाई भी अवरुद्ध हो गई है। और एक दिन ऐसा आयेगा कि इस धरा से संताली जड़समूल नष्ट हो जाएगी।
लिपि एक अति संवेदनशील मामला है। लिपि को पहचान के नाम पर लोगों को बरगलाया जा रहा है। यह जग जाहिर है, दुनिया में लिपि किसी देश, समुदाय एवं भाषा की पहचान नहीं बन सकी है। यह कुतर्क है कि लिपि कोई पहचान देती है।
मनुवादियों का यह एक बहुत बड़ा षडयंत्र है। नहीं तो क्या कारण है कि साहित्य अकादमी जैसी संस्था किसी उत्कृष्ट रचना की पहचान व चयन हेतु सिर्फ किसी एक लिपि विशेष को ही दी जाती है। उस भाषा की अन्य रचनाएं जिसे अन्य लिपियों में लिखी गईं हैं, उसे कोई महत्व नहीं दिया जाता है। स्पष्ट शब्दों में कहा जाय तो यह साफ है कि संताली के लिए सिर्फ ओल चिकी लिपि में लिखित रचनाओं को ही पुरस्कृत किया जाता है। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए ताकि संताल समुदाय लिपि के लिए आपस में लड़ता रहे। मनुवादियों की यह बहुत बड़ी साजिश है कि संतालों को लिपि, धर्म, राजनीति एवं क्षेत्रवाद को लेकर आपस में लड़ाते रहो। इससे मनुवादियों की हर मनोकामना पूरी हो जाती है।
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