Thursday, 17 August 2023

कैसी और किसकी आजादी (3)?

पिछले अंक में हमने संक्षेप में जाना कि विगत पांच हजार वर्षों से इन ब्राह्मणों ने SC/ST/OBC का मानसिक व शारीरिक रूप से जी भरकर दोहन किया। इनके द्वारा निर्मित वर्ण व्यवस्था ने तो इन दलितों को कहीं का नहीं छोड़ा। क्या आपने कभी सोचा है; शूद्रों का मंदिर में प्रवेश क्यों वर्जित है? इसलिए वर्जित है; क्योंकि अंदर ब्राह्मण अपने राजा की मूर्ति बनाकर शूद्र के राजा जिसकी हत्या की गई, उसके साथ अपने राजा की पूजी की जाती थी। ऐसा दृश्य देखकर कहीं शूद्र न भड़क जाए, इसलिए शूद्रों का मंदिर में प्रवेश वर्जित है। इसका साक्षात उदाहरण आज भी संतालों में ”दुर्गापूजा“ (दिबी दासांय) देखने को मिलता है। जिसमें संतालों के राजा हुदुड़ दुर्गा की हत्या के जश्न में वे त्योहार मनाते हैं, तो संताल अपने बलशाली राजा की शहादत "हाय-हाय" करते हुए, उसके प्रतिरोध में "दासांय नृत्य" (war dance) करते हैं।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इन ब्राह्मणों ने शूद्रों को मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने का सिलसिला इस देश में अंग्रेजों के आगमन तक जारी रखा हुआ था। इस देश में अंग्रेजों के आने से पहले कई विदेशियों का साम्राज्य रहा है यथा महमूद गजनबी, मुहम्मद गौरी, चंगेज खान, कुतुबुद्दिन ऐबक, गुलाम वंश, तुगलक वंश, खिलजी वंश, लोदी वंश, फिर मुसलमान (ये मुसलमान नहीं थे, मुगल एक रेस या वंश का नाम है।) आदि वंशों ने भारत पर राज किया एवं खूब अत्याचार किये। फिर भी इन ब्राह्मणों/वाभनों ने कोई क्रांति या आंदोलन नहीं चलाया। फिर अंग्रेजों के खिलाफ ही इन्होंने क्रांति क्यों कर दी? इसका स्पष्ट कारण यही था कि मुगलों ने भारत पर सदियों से चली आ रही “मनुस्मृति” के संविधान को यथावत बनाये रखा। मुगलों को इस संविधान पर कोई आपत्ति न थी। उन्होंने बीच का रास्ता अपना रखा था। पर अंग्रजों ने उस तथाकथित संविधान (मनुस्मृति) की धज्जियां उड़ाकर रख दी थी। वे मनुस्मृति के घोर विरोधी थे। उन्होंने दलित, पिछड़ों, आदिवासियों, मूलवासियों और अल्पसंख्यकों को समानाधिकार दिया। अर्थात् कानून के सामने सब बराबर हैं। महान चिंतक एवं संविधान निर्माता बाबा साहेब उपरोक्त सवाल का जवाब देते हुए लिखते हैं - “चूंकि मुसलमानों ने सदियों से चली आ रही तथाकथित वाभनों की “मनुस्मृति” पर कोई उंगली न उठाई। उन्होंने चापलूसी की राजनीति अपनाई। उनको (वाभनों को) अपने “नवरत्नों” में जगह दी। अतः स्पष्ट तौर पर कहा जाय तो, मुगल शासकों ने “मनुस्मृति” की आत्मा को जिंदा बनाए रखा। यथा दलित, पिछड़े एवं जंगली आदिवासियों की औरतों को स्तन ढकने के लिए कर देना होता था। वे गले में हांडी, कमर में झाड़ू बांधकर चलने को मजबूर थे। कारण कुछ भी रहा हो, करीब 1600 ई. के आस पास अग्रेजों का भारत में पदार्पण हुआ। 

(... अगले अंक में जारी।)

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