Friday, 6 September 2024

पी. ओ. बोडिंग : मानक संताली के महान रक्षक
(2 नवंबर 1865 - 25 सितंबर 1938)
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पी. ओ. बोडिंग का आगमन यूरोप के नॉर्वे देश से भारत में 1890 के उतरार्द्ध में हुआ। उनका कार्यक्षेत्र था - संताल परगना के बेनागाड़िया, मुहलपहाड़ी एवं दुमका। उन्होंने बहुत ही कम समय में संताली भाषा को न सिर्फ सीखा, बल्कि वह अपने को संताली का महान विचारक, मानवशास्त्री, दार्शनिक एवं भाषावैज्ञानिक के रूप में स्थापित कर दिया। इनके जैसा संताली के महान विद्वान न कभी थे और न ही निकट भविष्य में होने की संभावना नजर आ रही है। वह संताली को जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखने का प्रबल, कठोर, सशक्त एवं घोर समर्थक था। इसीलिए तो उसने अपने पूर्व मिशनरियों के द्वारा ईजाद की गई रोमन संताली लिपि को परिवर्धित कर संताली लिपि में परिवर्तित कर दिया।

पी. ओ. बोडिंग को अपने ही काल में अच्छी तरह पता चल गया था कि संताल परगना के संतालों को अपनी मानक संताली को बचाने के लिए भविष्य में अपने ही बिरादरी के लोगों के साथ गृहयुद्ध करना पड़ेगा। वे लोग संताल परगना पर हावी होंगे। अर्थात दक्षिणी संताली जो तब तक आर्यों की भाषा के साथ मिश्रित एवं प्रदूषित हो चुकी है को उत्तरी संतालों पर जबरन लागू करने की कोशिश की जाएगी। अतः इस भयंकर मुस्किलत से बचने हेतु पी. ओ. बोडिंग ने इसका बेड़ा उठा लिया था। इस महान कार्य के लिए उसने दिन-रात एक कर दिया। उन्होंने अपने खून-पसीने एक कर दिए। उन्होंने करीब 22 वर्षों तक कड़ी मेहनत की। और अंततः अपने अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप उन्होंने इन पुस्तकों की रचना कर डाली। पी. ओ. बोडिंग ने इन पुस्तकों को मानक संताली के किसी भी तरह के दुश्मनों को मार गिराने के लिए हैड्रोजन बम तुल्य आविष्कार किया है :- 1. Materials for a Santali Grammar, Part-I (Mostly Phonetics); 2. Materials for a Santali Grammar, Part-II (Mostly Morphology) एवं 3. A Santal Dictionary (V Vols). अतः यह अब हमारी ड्यूटी बनती है कि हम उपरोक्त हैड्रोजन बमों का प्रयोग कब, कहाँ और किस तरह के दुश्मनों पर करें?

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